अब आप सीएम हैं, आयकर अधिकारी की मानसिकता से बाहर आइए

अरविन्द 'हलफनामा स्कैम' को डायवर्ट करने के लिए लोग अब अन्य मुख्यमंत्रियों के निवास की बात कर करके अरविन्द को क्लीन चिट देना चाहते हैं. 'आन्तरिक लोकपाल' मानो नए-नए रूपों में प्रकट हो रहा है. ऐसे आदेशपालों से साफ़ कहिये की शाखामृग की तरह इधर-उधर उछलने से नहीं काम चलेगा. यहाँ सवाल बंगले की भव्यता का नहीं बल्कि हलफनामे के उल्लंघन का है जो कानूनन भी दंडनीय है. कार्य की प्रकृति के अनुसार इमारतों में रहना कोई बुरी बात नहीं है. महात्मा गांधी दिल्ली के बिरला हाउस में रुकते थे. शायद वो दिल्ली की उस समय सबसे भव्य इमारत रही होगी. निधन भी उनका वहीं हुआ. तो क्या इससे गांधी की सादगी पर कभी सवाल पैदा हुआ? सवाल सादगी या भव्यता का नहीं बल्कि झूठ और धोखाधड़ी का है. गलत हलफनामा देकर लोगों को गुमराह करने का है.
 
जब आप सादगी जैसी पवित्र चीज़ को नगरवधू बना कर बेचने निकलेंगे. उसे स्वामी श्रद्धानन्द मार्ग पर सज़ा-सवांर कर खडा कर देंगे तो लोग 'छिद्रान्वेषण' करेंगे ही. मीडिया और जनता के दबाव में डुप्लेक्स वापस कर आप अपराध से मुक्त नहीं हो सकते. ऐसे तो राजा और कनिमोझी भी दूध के धुले माने जायेंगे क्यूंकि आपके सहयोगी कांग्रेस सरकार को टू जी के सभी 122 लाइसेंस केंसिल करने पड़े. ऐसे में तो मनमोहन सिंह भी इमानदार हो जायेंगे जिन्हें अंततः कई कोल ब्लोक्स के आवंटन रद्द कने पड़े हैं. ऐसे तो हर चोर मुक्त हो जायेगा अगर पकड़े जाने पर अपने चोरी का सामान छोड़ दे तो. ऐसा नहीं होता अरविन्द जी.
 
अब आप सीएम हैं. आयकर अधिकारी की मानसिकता से बाहर आइये. जिस तरह रिश्वत नहीं देने वाले सभी लोग आयकर वालों की नजर में चोर ही समझे जाते हैं वैसे ही आप भी वोट नहीं देने वाले हर व्यक्ति को बे-ईमान मान बैठे हैं. अपनी इस सोच पर लगाम लगाइए और अपनी नयी नौकरी बजाइए. बहुत हो गया ताम-झाम. कुछ काम भी कीजिये अब. आप कोई आसमान से नहीं टपक गए हैं. बड़ा देश है भारत. आप जैसे सैकड़ों आये और गए. मुगालता दूर कीजिये अपना.
 
पत्रकार और बीजेपी नेता पंकज झा के फेसबुक वाल से

अधिकतम सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी ‘आप’, अरविंद नहीं लड़ेंगे चुनाव

नई दिल्ली: दिल्ली के मुख्यमंत्री और 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वह खुद लोकसभा चुनाव नहीं लडेंगे बल्कि पार्टी के उम्मीदवारों का प्रचार करेंगे। अपनी राष्ट्रीय रणनीति को सामने रखते हुए 'आप' ने शनिवार को कहा कि पार्टी आगामी लोकसभा चुनावों में ज्यादातक राज्यों की अधिकतम सीटों पर अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। उम्मीदवारों की पहली सूची अगले 10-15 दिन में जारी कर दी जाएगी।
 
वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण ने संवाददाताओं से बातचीत में यह साफ कर दिया कि लोकसभा चुनावों मुख्यमंत्री केजरीवाल की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद ही फैसला लिया जाएगा। प्रशान्त भूषण ने यह ऐलान पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद किया। इस बैठक में केजरीवाल समेत पार्टी के सभी नेता मौजूद थे।
 
भूषण ने कहा, ''आप ज्यादातर राज्यों में अधिकतम सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ेगी। हम मध्य फरवरी या बहुत से बहुत अगले महीने के अंत तक अपने ज्यादातर उम्मीदवारों की घोषणा कर देंगे।" यह पूछे जाने पर कि क्या केजरीवाल को 'आप' का प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया जाएगा, इस पर उन्होंने कहा कि इस बाबत आज फैसला नहीं किया गया है।
 
भूषण ने कहा, 'अरविंद केजरीवाल पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं पर हमने अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के नाम पर फैसला नहीं किया है। ये हमारे लिए अहमियत नहीं रखता कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन बनेगा।'
 
'आप' के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने कहा, 'आगामी लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों की पहली सूची 10 से 15 दिनों में जारी कर दी जाएगी। दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चयन में जो प्रक्रिया अपनायी गयी थी वही लोकसभा चुनावों में भी अपनायी जाएगी।'
 
सिंह ने कहा कि पार्टी उन राज्यों से चुनाव लड़ेगी जहां उसकी संरचना अच्छी है और जहां उसे ईमानदार उम्मीदवार मिलेंगे।
 
'आप' के इस नेता ने कहा, 'अगले एक महीने के दौरान पार्टी हर राज्य में बैठक कर लोकसभा उम्मीदवारों के नाम तय करेगी। आपराधिक और भ्रष्टाचार के आरोपों तथा अपने नैतिक चरित्र को लेकर सवालों का सामना कर रहे लोगों को टिकट नहीं दिए जाएंगे।'
 
संजय सिंह ने कहा कि दिल्ली विधानसभा चुनावों की तरह लोकसभा चुनावों में भी हर संसदीय सीट के लिए पार्टी का अलग घोषणा-पत्र होगा। यह पूछे जाने पर कि क्या 'आप' भाजपा के शहरी वोट काटेगी और नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की आकांक्षाओं को नुकसान पहुंचाएगी, इस पर सिंह ने कहा कि पार्टी कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनकर उभरी है और वह किसी पार्टी को 'फायदे' या 'नुकसान' के लिए चुनाव नहीं लड़ रही है।
 
सिंह ने कहा, 'राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी हमारे लिए चुनावी मुद्दे नहीं हैं। हम लोगों की समस्याएं खत्म करने के लिए यहां आए हैं।' भूषण ने कहा, 'शहरी इलाके के लोगों की तरह ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग 'आप' को लेकर उत्सुक हैं। कई ऐसी जगहें हैं जहां गांवों के लोग ज्यादा उत्सुक हैं।'
 
उन्होंने कहा कि लोग अब कांग्रेस और भाजपा का विकल्प चाहते हैं और 'आप' जनांदोलन है, कोई राजनीतिक पार्टी नहीं।
 
भूषण ने कहा, '' 'आप' का मानना है कि सरकार जनता की आकांक्षाओं के मुताबिक चलनी चाहिए।' लोकसभा चुनावों के लिए गठित पार्टी की दो सदस्यीय उप-समिति के सदस्य सिंह ने कहा कि पार्टी के भविष्य को लेकर राज्यों में भी उत्सुकता है और बड़ी तादाद में लोग 'आप' में शामिल होना चाहते हैं।
 
पार्टी लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवारों से पहले ही आवेदन आमंत्रित कर चुकी है। दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, हरियाणा और तमिलनाडु से आए पार्टी के बड़े नेताओं ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लिया। (साभार: एनडीटीवी)

मनमोहन बोले : तीसरी बार पीएम पद की दौड़ में नहीं

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज अपने दूसरे कार्यकाल में तीसरी प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं। यूपीए-2 में पीएम की ये दूसरी कांफ्रेंस है। प्रधानमंत्री आज दिन में 11 बजे नेशनल मीडिया सेंटर पहुंचे। प्रेस कांफ्रेंस में सबसे पहले देशवासियों को नए साल की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनावों से लेकर भ्रष्टाचार पर चर्चा की।
 
विधानसभा चुनावों में करारी हार और आदमी पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता के आने वाले लोकसभा चुनावों पर पड़ने वाले असर की चिंता प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में दिखी।
 
प्रधानमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया वहीं अगले लोकसभा चुनावों में अपनी उम्मीदवारी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। पढ़ें क्या कह रहे हैं प्रधानमंत्री-
 
प्रधानमंत्री ने मौन रहने पर अपनी आलोचना होने के मुद्दे पर अपनी सफाई देते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर बोलता रहा हूं। वहीं प्रधानमंत्री ने विधान सभा चुनावों में पार्टी की हार का कारण मंहगाई को बताया। दिल्ली विधानसभा के बारे में बताते हुए कहा कि कांग्रेस आप के स्पीकर का समर्थन करेगी।
 
वीरभद्र मामले पर प्रधानमंत्री ने कहा कि वे वीरभद्र मामले में कुछ नहीं कहना चाहेंगे। अभी उन्हें वीरभद्र मामले में सोचने का वक्त नहीं मिला है। उन्होंने वीरभद्र मसले पर अरूण जेटली की चिठ्ठी मिलने की बात स्वीकार की।
 
इस्तीफे की अटकलों पर विराम लगाते हुए पीएम ने कहा कि मैने कभी इस्तीफा देने के बारे में नहीं सोचा। मैं अपना काम करता रहा हूं। पीएम ने कहा कि उन्होंने कभी अपने पद का गलत इस्तेमाल नहीं किया। प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई में कहा कि जब हमारा इतिहास लिखा जाएगा तब हम पाक-साफ साबित होंगे। उन्होंने कहा कि यूपीए-1 के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, लेकिन देश की जनता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और हमें दूसरा कार्यकाल सौंपा था।
 
अपनी उम्मीदवारी पर स्थिति साफ करते हुए पीएम ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनावों में मैं खुद को प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी से अलग करता हूं। लोकसभा के गठन के बाद मैं नए पीएम को सत्ता सौंप दूंगा। पीएम ने आगे कहा कि मुझे विश्वास है कि अगला प्रधानमंत्री यूपीए का ही होगा।
 
उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पीएम पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करेगी। राहुल गांधी की उम्मीदवारी पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये फैसला पार्टी करेगी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवार हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को 
 
चुनाव नतीजों की चिंता प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में साफ दिखी। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी ने चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। पीएम ने कहा कि हम इस चुनाव के नतीजों से सबक लेंगे। उन्होंने कहा मंहगाई ने चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ जनमत को एकजुट कर दिया। पीएम ने फल और सब्जियों तक के दाम बढ़ने पर चिंता जताई।
 
अपनी उपलब्धियों को गिनाते हुए पीएम ने कहा कि उनके कार्यकाल में देश के कोने-कोने तक विकास पहुंचा। देश प्रति व्यक्ति आय चार गुना तक बढ़ गई। मनरेगा को अपने कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि मनरेगा से देश के गरीब तबके को सबसे ज्यादा फायदा हुआ। देश का मजदूर और गरीब वर्ग इसके चलते आत्मनिर्भर हुआ है।
 
मनमोहन सिंह ने विकास दर में तेजी आने का भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव होता रहता है। वहीं भारत में रोजगार और मंहगाई की समस्या पर कहा कि वैश्विक मंदी का असर देश पर भी पड़ा है। ज्ञात हो कि इससे पहले पार्टी ये कहती रही है कि प्रधानमंत्री की नीतियों के चलते भारत पर वैश्विक मंदी का असर नहीं पड़ा है.

रफ्तार न्यूज ने दो महीने तक रखने के बाद बिना पैसे दिए निकाल दिया

रफ्तार न्यूज मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पत्रकारों को अच्छी सेलरी का वादा करके रखा जाता है और महीना पूरा होने के पहले ही नया टारगेट दे दिया जाता है. टारगेट भी किसी न्यूज का नहीं बल्कि पैसे का, जाइए मार्केट से पैसा लाइए और सेलरी लीजिए. चैनल इसी तरह पत्रकारों को रिक्रूट करके दो-तीन महीने तक काम चलाता है फिर निकालकर नया रिक्रूटमेंट कर लेता है और गोरखधंधा चलता रहता है.
 
रफ्तार न्यूज एमपी-सीजी के हेड हैं शिवकुमार और उनके बेटे अमन शर्मा चैनल के आपरेशन हेड हैं. करीब चार माह पहले अमन शर्मा ने चैनल में रिपोर्टर के तौर पर आलोक शर्मा, दीपक सिंह नरवरिया, गोविन्द कुशवाहा और कई अन्य लोगों को चालीस हजार रूपये प्रतिमाह की सेलरी पर रखा. जब महीना पूरा होने वाला था, चैनल के एमपी-सीजी के एडिटर-इन-न्यूज जयेश कुमार ने इन लोगों से कहा कि एक लाख रूपये मार्केट से लेकर आओ तो सेलरी मिलेगी जिस पर इन सबके द्वारा कहा गया कि हम लोग कैसे पैसे ला सकते हैं, पर इनकी सुनी नहीं गई.
 
जब इन लोगों को लगा कि चैनल पैसा वसूली के लिए खोला गया है तो इन लोगों आपरेशन हेड अमन शर्मा से कह दिया कि उन्हें इस महीने काम करने के बाद उनका वेतन देकर कार्य से मुक्त किया जाय. उसके बाद इन सभी ने एक महीने और काम किय.। उसके बाद बिना सेलरी दिए ही चैनल से इन्हें निकाल दिया गया. इन लोगों ने तब से कई बार प्रयास किया लेकिन इन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया. चैनल छोड़े हुए दो महीने से ऊपर हो गए लेकिन चैनल में काम करने के एवज में एक रूपया नहीं मिला है. इसके अतिरिक्त निकालने के पहले इन सभी को चैनल के अधिकारियों के द्वारा अपमानित भी किया गया.
 
चैनल में हालात बहुत खराब हैं. कुछ दिनो पहले ही चैनल की आपसी तनातनी में एमपी-सीजी के ब्यूरो चीफ गिरिराज शर्मा को आरोप लगाकर निकाल दिया गया. गिरिराज शर्मा चैनल के महत्वपूर्ण लोगों में रहे हैं, तथा चैनल की लांचिंग में उनकी प्रमुख भूमिका रही है. गिरिराज शर्मा की ये हालत देखकर उनके सहयोगी सतीश शर्मा ने खुद ही चैनल से इस्तीफा दे दिया. पूरे एमपी-सीजी में केवल पांच लोगों के सहारे चैनल चल रहा है.

कोलकाता गैंगरेप पीड़िता ने आत्महत्या नहीं की, उसे जिंदा जलाया

कोलकाता: कोलकाता में सामूहिक दुष्कर्म की पीड़िता की कथित आत्महत्या मामले में नया मोड़ आ गया है। पीड़िता के परिजनों ने बुधवार को कहा कि उनकी बेटी ने आत्मदाह नहीं किया बल्कि बलात्कारियों ने उसे जिंदा जला दिया। पीड़िता की मां ने बुधवार को कहा कि उनकी बेटी ने मृत्यु पूर्व पुलिस को दिए अपने बयान में कहा है कि उसे जिंदा जलाया गया है।
 
पुलिस ने पीड़िता के द्वारा बयान दिए जाने की पुष्टि की है। अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त निंबालकर संतोष उत्तमराव ने कहा कि चिकित्सक और पुलिस अधिकारी के समक्ष मृत्यु पूर्व दिए अपने बयान में पीड़िता ने दो व्यक्तियों रतन सिल और मिंटा सिल पर उसे जलाए जाने का आरोप लगाया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है। मामले में अभी तक छह आरोपियों की गिरफ्तारी की जा चुकी है।
 
पीड़िता के परिजनों का कहना है कि उस पर घटना के दिन मामले को वापस लेने के लिए धमकी देने कुछ युवक आए थे जिन्होंने उसे घर में अकेला पाकर उसके शरीर में आग लगा दी और घर बंद करके चले गए। पीडिता को 23 दिसम्बर को अस्पताल में भर्ती कराय गया था और उसके एक सप्ताह बाद उसने दम तोड़ दिया।
 
वहीं पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दुष्कर्म की शिकार पीड़िता का जबरन अंतिम संस्कार कराए जाने को लेकर राज्य में राजनीतिक तूफान शुरू हो गया। पीड़िता के साथ अक्टूबर माह दो बार दुष्कर्म किया गया था। शुरू में कहा गया था कि उसे बार-बार मामले को वापस लेने की धमकी दी जा रही थी, और ताने मारे जा रहे थे जिसके चलते उसने आत्महत्या कर ली।
 
पीड़िता के परिजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बुधवार को अपना विरोध दर्ज कराते हुए राज्यपाल से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपा। पीड़िता के पिता ने राज्यपाल एम के नारायणन से मिलकर आरोपियों को मौत की सजा दिलवाने की मांग की। वहीं वाम मोर्चा ने पीड़िता के परिवार को ही प्रताड़ित किए जाने की निंदा करते हुए राज्य भर में जुलूस निकालने का फैसला किया है।
 
पुलिस ने पीड़िता के परिवार को प्रताड़ित किए जाने के आरोपों से इंकार किया है। इस बीच राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले पर संज्ञान लिया है। आयोग का कहना है कि वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से इस मामले में सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर रिपोर्ट तलब करेगा।

जस्टिस गांगुली पर सरकार आज ले सकती है फैसला

लॉ इंटर्न के साथ यौन शोषण के आरोपों का सामना कर रहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस गांगुली के भविष्य पर सरकार आज फैसला कर सकती है। आज कैबिनेट की बैठक में गांगुली को हटाने के लिए राष्ट्रपति के पास अर्जी भेजने का प्रस्ताव रखा जा सकता है।
 
सरकार गांगुली को हटाने का फैसला करती है तो वह राष्ट्रपति को अर्जी भेजेगी जिस पर राष्ट्रपति विचार करेंगे। अगर इस पर राष्ट्रपति की सहमति मिलती है तो इसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया जाएगा। हालांकि सरकार क्या फैसला लेगी अभी इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।
 
इससे पहले यौन उत्पीड़न की जांच कर रही सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की समिति ने जस्टिस गांगुली के व्यवहार को यौन उत्पीड़न की प्रकृति का बताया था। इसके पहले अटार्नी जनरल जी ई वाहनवती ने भी कहा था कि जस्टिस गांगुली के ऊपर केस बनता है।
 
जस्टिस गांगुली पर लॉ इंटर्न ने कुछ समय पहले यौन शोषण का आरोप लगाया था। इंटर्न ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि 2012 में जब निर्भया के साथ हुए रेप से पूरा देश गुस्से में था और आंदोलन कर रहा था तब उसे सुप्रीप कोर्ट के हाल ही में रिटायर्ड एक जज के हाथों यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था।

मिस्र में गिरफ्तार पत्रकारों की हिरासत अवधि बढ़ी

काहिरा प्रशासन ने मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किए गए पत्रकारों की हिरासत अवधि बढ़ा दी है। मिस्र के न्यायिक विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इन तीनों पत्रकारों को दो सप्ताह के लिए हिरासत में रखे जाने का आदेश दिया गया है। इनकी हिरासत अवधि बढ़ाई भी जा सकती है।
 
अल-जजीरा के चार पत्रकारों को रविवार को काहिरा प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया था। चैनल से प्राप्त जानकारी के अनुसार काहिरा के ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद अदेल फाहमी, आस्ट्रेलियन पत्रकार और बीबीसी के पूर्व संवाददाता पीटर ग्रेस्ट तथा चैनल के प्रोड्यूसर बहर मोहम्मद को गिरफ्तार किया गया है। कैमरामैन मोहम्मद फावजी को भी गिरफ्तार किया गया था लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया।
 
अभियोजन पक्ष ने तीनों पत्रकारों पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। आरोप में कहा गया पत्रकारों के द्वारा मिस्र के महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थानों को फिल्माया गया, तथा ऐसे वीडियो रिकॉर्ड कर फैलाए गए जिनसे शांति और व्यवस्था को खतरा पहुंचता है।
 
रिपोर्टरों पर लैपटाप में सेना के नक्शे रखने का भी आरोप लगाया गया है। इन पर मिस्र में अल-जजीरा का लाइसेंस रद्द किए जाने के बावजूद उसके लिए काम करने का भी आरोप लगाया गया है जो कि एक अपराध है।
 
अल-जजीरा को मिस्र में प्रतिबंधित किया गया है क्यूंकि अल-जजीरा की फंडिग कतर के द्वारा की जाती है। कतर मध्य-पूर्व में मिस्र के अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी का खुला समर्थन करता है।
 
पीटर ग्रेस्ट पूर्व बीबीसी संवाददाता रहे हैं और इन्हें सोमालिया पर बनाई गई इनकी डॉक्यूमेंट्री के लिए 2011 में पीबॉडी अवार्ड से सम्मानित किया जा  चुका है।


मूल खबर—

अल्जजीरा चैनल के तीन पत्रकार काहिरा में गिरफ्तार

 

पत्रकारों के लिए भारत बना दूसरा सबसे असुरक्षित देश

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट द्वारा लंदन में एक रिपोर्ट जारी की गई है. इस रिपोर्ट में दुनिया में पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों की सूची जारी की गई है. जिसमें भारत को दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया गया है. इस सूची में पहला स्थान सीरिया का है.
 
सर्वे के मुताबिक भारत में इस साल 12 पत्रकारों सहित कुल 13 मीडियाकर्मी मारे गए हैं. इनमें से सात पत्रकारों की तो हत्या की गई. वहीं दो पत्रकार उस समय मारे गए जब वो उत्तर प्रदेश में हुए मुजफ्फरनगर दंगों की खबर करते हुए मारे गए. चार कर्मियों की मृत्यु काम के दौरान दुर्घटना के चलते हुई.
 
रिपोर्ट में पूरी दुनिया से आंकड़े इकठ्ठा किए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में विश्व के 29 देशों में कुल 126 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गए. हालांकि यह संख्या पिछले साल मारे गए पत्रकारों की तुलना में 17 प्रतिशत कम है.
 
इस साल सबसे ज्यादा 19 पत्रकार सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध की रिपोर्टिंग करते वक्त मारे गए है जबकि सीरिया में पिछले साल 28 मीडियाकर्मी मारे गए थे. इस साल सीरिया में पत्रकारों की मौत तो कम हुई है लेकिन इस साल सीरिया में मीडियाकर्मियों के अपहरण की घटनाएं बढ़ी हैं.

आइपीएस अफसर द्वारा जस्टिस गांगुली को हटाने की मांग

यूपी कैडर आइपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज भारत के राष्ट्रपति को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 23 में प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए जस्टिस एके गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हटाए जाने हेतु निवेदन किया है.
 
श्री ठाकुर ने अपने पत्र में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की जांच कमेटी द्वारा दोषी ठहराए जाने और विधि छात्रा के हलफनामे के सामने आने के बाद इस बात में कोई शंका नहीं रह गयी है कि जस्टिस गांगुली ने जांच कमेटी की भाषा में “अनुचित आचरण (जबरिया शाब्दिक/अशाब्दिक यौन कदाचार)” किया. जो बात अधिक कष्टप्रद और दुर्भाग्यपूर्ण है वह यह कि इन तथ्यों के सामने आने के बाद भी जस्टिस गांगुली एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज की गरिमा के विपरीत एक पेशेवर अपराधी की तरह आचरण कर रहे हैं और अपने आप को बचाने के लिए तकनीकी शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं.
 
श्री ठाकुर ने निवेदन किया है कि जस्टिस गांगुली के ये सभी आचरण सिद्ध दुराचरण की श्रेणी में आते हैं जिसके लिए राष्ट्रपति को न्याय हित में चीफ जस्टिस से तीन-सदस्यीय जांच कमेटी की रिपोर्ट मांगा कर उन्हें मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के धारा 23(1ए) के तत्काल हटाया जाना उचित होगा.
 
अमिताभ ठाकुर द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गया पत्र
 
To,
The Hon’ble President of India, 
New Delhi
 
Subject- Removal of Justice A K Ganguly, ex Judge of the Hon’ble Supreme Court of India, from the post of Chairman of West Bengal Human Rights Commission, Kolkata under the provisions of Protection of Human Rights Act 1993
 
Respected Sir,
 
1. That the applicant, Amitabh Thakur, is an officer of the Indian Police Service in Uttar Pradesh cadre but he is writing his letter in his individual capacity as a concerned citizen of this nation.
 
2. That the basic facts regarding the allegations of sexual harassment/sexual misconduct by a law intern from the West Bengal National University of Juridical Sciences (NUJS) against Justice A K Ganguly, ex Judge of the Hon’ble Supreme Court of India, are now too well-known to the entire Nation to be presented here.
 
3. That as is again quite well-known, Hon’ble Chief Justice of India (CJI, for short) Justice P Sathasivam immediately constituted a three-judge committee to inquire into this law graduate's sexual harassment charge, consisting of Hon’ble Justice RM Lodha, Hon’ble Justice HL Dattu and Hon’ble Justice Ranjana P Desai
 
4. That this Inquiry Committee submitted its report dated 27/11/2013 to the Hon’ble CJI on 28/11/2013 and a written statement on behalf of the Hon’ble CJI was posted on the official website of the Hon’ble Supreme Court which said-“The operative portion of the Report is as follows: "We have carefully scrutinized the statement (written as well as oral) of Ms. Stella James, the affidavits of her three witnesses and the statement of Mr. Justice (Retd.) A.K.Ganguly. It appears to the Committee that in the evening on 24.12.2012, Ms. Stella James had visited hotel Le Meridien where Mr. Justice (Retd.) A.K. Ganguly was staying to assist him in his work. This fact is not denied by Mr. Justice (Retd.) A.K. Ganguly in his statement. Further the Committee is of the considered view that the statement of Ms. Stella James, both written and oral, prima facie discloses an act of unwelcome behaviour (unwelcome verbal/non-verbal conduct of sexual nature) by Mr. Justice (Retd.) A.K. Ganguly with her in the room in hotel Le Meridien on 24.12.2012 approximately between 8.00 P.M. and 10.30 P.M."
 
5. That the official statement also said-“Considering the fact that the said intern was not an intern on the roll of the Supreme Court and that the concerned Judge had already demitted office on account of superannuation on the date of the incident, no further follow up action is required by this Court” and that-“As decided by the Full Court in its Meeting dated 5th December, 2013, it is made clear that the representations made against former Judges of this Court are not entertainable (sic) by the administration of the Supreme Court.”
 
6. That from the above facts it becomes clear that Justice Ganguly was definitely guilty of unwelcome behaviour (unwelcome verbal/non-verbal conduct of sexual nature) against a young Intern.
 
7. That it is also kindly stated that Justice Ganguly, after retirement, has been appointed as the Chairman of the West Bengal Human Rights Commission (the Commission, for short)
 
8. That as is quite well-known, Chairman of a State Human Rights Commission is appointed under section 22(1) of the Protection of Human Rights Act 1993 which says that-“The  Chairperson and Members shall be appointed by the Governor by warrant under his hand and seal.”
 
9. That the Chairman can be removed under the provisions of section 23(1A) and 23(2) of this Act which says-“ (1A) Subject to the provisions of sub-section (2), the Chairperson or any Member of the State Commission Shall only be removed from his office by order of the President on the ground of proved misbehaviour or incapacity after the Supreme Court, on a reference being made to it by the President, has, on inquiry held in accordance with the procedure prescribed in that behalf by the Supreme Court, reported that the Chairperson or such Member, as the case may be, ought on any such ground to be removed. (2) Notwithstanding anything in sub-section (1A), the President may by order remove from office the Chairperson or any Member if the Chairperson or such Member, as the case may be,–(a) is adjudged an insolvent; or (b) engages during his term of office in any paid employment outside the duties of his office; or (c) is unfit to continue in office by reason of infirmity of mind or body; or (d) is of unsound mind and stands so declared by a competent court; or(e) is convicted and sentenced to imprisonment for an offence which in the opinion of the President involves moral turpitude.
 
10.  That thus it is apparent that respected Sir can remove the Chairman in certain definite cases enumerated in section 23(2) which do not exactly hold true for Justice Ganguly at the moment
 
11.  That at the same time, having been indicted by a Committee consisting of three Hon’ble Judges of the highest seat of Justice in the Nation, it becomes very apparent that it is a case of proved misbehavior.
 
12.  That hence it seems a natural corollary for Justice Ganguly to be removed from the post of Chairman of the Commission because it is quite obvious and certain that a person against whom charges of “unwelcome behaviour (unwelcome verbal/non-verbal conduct of sexual nature)” have been stated and concluded by a Committee consisting of three sitting Hon’ble Judges of the Hon’ble Apex Court, is guilty of proven misbehavior without any doubt and cannot and shall not continue in this extremely important and sensitive post even for a minute.
 
13.  That what is even more sad, disgusting and reproaching is the behavior and response of Justice Ganguly in the aftermath of this report.
 
14.  That all through he has not only been denying these allegations, he has also been saying that there was no question of his demitting the post of Chairman.
 
15.  That this seems to be the second case of proven misbehavior where Justice Ganguly, having once committed sexual misbehavior, is showing further adamant behavior, definitely not befitting the holder of this post
 
16.  That what is more is the emergence of the Affidavit of the law intern through Ms Indira Jaisingh, learned Additional Solicitor General who has made public part of this Affidavit, where she narrated how Justice Ganguly offered her his bedroom to drink wine and relax, he wanted her to share his room, consumed alcohol, insisted she do as well and persisted and even put his hand on her back and moved forward to embrace her, a narration through which makes it very obvious that it was a case of extremely disgusting and obnoxious misbehavior on the part of Justice Ganguly.
 
17.  That what is even worse is that even after coming in open of this Affidavit, instead of accepting it gracefully and facing whatever legal and administrative consequences befitting his act and his position, Justice Ganguly has reacted in a most obnoxious manner where he is talking more of technicalities than the facts, saying-“That is supposed to be confidential as it was given before a Supreme Court committee. How can it come out in the open?"
 
18.  That this certainly is the third act of proven misbehavior where instead of any kind of remorse or repentance, justice Ganguly not only continues to hold his post, forgetting the fact that he has been Hon’ble Judge of the Hon’ble Supreme Court, he is even talking like any other accused/criminal, who tries all technical and legal means to save his skin.
 
19.  That in such a situation, with Justice Ganguly being responsible for all the above instances of proved misbehavior, it seems necessary to remove him from the post of the Chairman of the Commission, in the larger public interest for justice and also for the sake of morality, respect and dignity for these highly respected, revered and responsible posts.
 
20.  That hence it is most kindly prayed that the power and authority vested under section 22 of the Protection of Human rights Act may kindly be used to immediately remove Justice A K Ganguly from the post of Chairman of the West Bengal Human Rights Commission after having sought the Enquiry report from the Hon’ble CJI which has already enquired into the alleged misbehavior of Justice Ganguly and made definite assertions and conclusions in this regards.
 
Lt No- AT/JudgeAbuse/01     
Dated- 17/12/2013 
 
Yours,
 
(Amitabh Thakur),
 
5/426, Viram Khand,
Gomti Nagar,
Lucknow
#094155-34526
amitabhth@yahoo.com

किसान भूख से हार गया और मध्यवर्ग माइक्रोवेव से

‘एक डूबते जहाज की अन्तर्कथा’ मध्यवर्गीय विडम्बनाओं का उपन्यास है। जैसे प्रेमचंद के कफन व गोदान कोई आशा नहीं जगाते, वैसा ही कुछ इस उपन्यास में भी है। कोशिश है कि यह समाज का आईना बने और परिवर्तन की गहरी चाह पैदा करे। इसमें मध्यवर्ग पर लिखते हुए पूरे समाज पर बातचीत की गई है। औपन्यासिक प्रविधि में सीधे संवाद करने की कोशिश की गई है। डूबता जहाज मध्यवर्ग का रूपक है जो भूमंडलीकरण के सागर में गोते लगा रहा है। यह नव उदारवाद की फौज बन गया है।
 
यह बात कथाकार व उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा ने आज अपने नये उपन्यास ‘एक डूबते जहाज की अन्तर्कथा’ पर आयोजित परिसंवाद में कही। परिसंवाद का आयोजन आज लखनऊ विश्वविद्यालय के एपी सेन हाल में जन संस्कृतिमंच और उत्कृष्ट केन्द्र, हिन्दी विभाग द्वारा किया गया। इसकी अध्यक्षता करती हुई वरिष्ठ कवयित्री व पत्रकार वन्दना मिश्र ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास सामाजिक व राजीतिक उपन्यास है। यह आज की समस्याओं को गहरी संवेदना के साथ पकड़ता है, छोटे छोटे डिटेल्स हैं जैसे वृद्धावस्था का अकेलापन, भूख की समस्या, किसानों की अत्महत्या, पिता का चरित्र, नरेगा, भ्रष्टाचार आदि। इसकी ताकत रवीन्द्र जी की भाषा है जो बहुत कुछ बतकही की शैली जैसी है।
 
रवीन्द्र वर्मा के इस उपन्यास पर बोलते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा अपनी औपन्यासिक कृतियों में मध्यवर्ग का क्रिटिक रचते हैं। नवउदारवाद के साथ सांप्रदायिकता व कट्टरपंथ का जो जो गठजोड़ है उस पर उनकी निगाह रही है। पूंजीवादी व्यवस्था में रूपान्तरण हुआ है। नेहरू मॅडल से लेकर भूमंडलीकरण तक की पूंजीवाद की इस यात्रा का प्रभाव मध्यवर्ग की भूमिका पर हुआ है। उसकी जीवन शैली में बदलाव आया है। इस बदलाव ने उसे देश व समाज के सरोकारों से विछिन्न कर दिया है। इस मध्यवर्ग से वही आशा नहीं की जा सकती है जो कल थी। ऐसा भूमंडलीकरण की वजह से हुआ है। रवीन्द्र वर्मा के उपन्यासों में यह यथार्थ पहले भी आया है, यहां तक कि कई उपन्यासों के पात्र भी मिलते जुलते हैं। हम आशा करते हैं कि रवीन्द्र वर्मा अपने आगे की रचनाओं में इस अनुभव संसार का अतिक्रमण करेंगे।
 
कवि और आलोचक चन्द्रेश्व का कहना था कि यह उपन्यास बड़े सूक्ष्म तरीके से कई बातें कहता है। यह डूबता जहाज मध्यवर्ग का है। यह चिरगांव से गुड़गांव की यात्रा करता है। इस यथार्थ को सामने लाता है कि मध्यवर्ग उपभोक्तावाद का गुलाम बन गया है। किसान भूख से हार गया और मध्यवर्ग माइक्रोवेव से हार गया। युवा आलोचक व लविवि में हिन्दी के प्रवक्ता प्रो रविकान्त ने कहा कि यह उपन्यास मध्यवर्ग का नहीं, उच्च मध्यवर्ग का आख्यान है। गुड़गांव से चिरगांव की यह यात्रा वास्तव में ग्लोबल गांव की यात्रा है। देश का अमेरीकीकरण हो रहा है। मध्यवर्ग अपने सपने इसी के इर्द गिर्द देखता है। रवीन्द्र वर्मा का उपन्यास इसी की अर्न्तकथा है। 
 
कथाकार शकील सिद्दीकी का कहना था कि इस उपन्यास की भाषा बड़ी समृद्ध है। रवीन्द्र वर्मा ने इस उपन्यास के द्वारा अपने समय का आख्यान प्रस्तुत किया है। ‘निष्कर्ष’ के संपादक गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि मध्यवर्ग के अन्दर जिस तरह संवेदनाएं शुष्क व निर्मम हुई हैं, उस पर यह प्रहार करता है। भूमंडलीकरण में मध्यवर्ग का जो रूप सामने आया है वह नकारात्मक ज्यादा है। उसके अन्दर के अन्दर लोभ व लालच की संस्कृति ने अपनी जगह बनाई है। उपन्यास में इसकी अभिव्यक्ति है। प्रो रमेश दीक्षित का कहना था कि रवीन्द्र वर्मा मध्यवर्ग की कुंठाओं, स्खलन के प्रामाणिक लेखक हैं। यह उनके तमाम उपन्यासों में देखा जा सकता है। यह उपन्यास उस मध्यवर्ग का आख्यान है जो जमीन और अपनी जड़ों से कटा हुआ है, जो अमरीका में अपना भविष्य देखता है।  
 
अपने संयोजकीय वक्तव्य में कवि कौशल किशोर ने कहा कि रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास लघु है लेकिन इसका फलक बड़ा है। यह हमारे समय के खास दौर को सामने लाता है। यह न सिर्फ डूबते जहाज की नियति का बयान करता है बल्कि इस पर सवार यात्रियों की नीयत को सामने लाता है। यह मध्यवर्ग के द्वन्द और सपने का अख्यान है जो अभाव, कुंठा और लालच से निर्मित हो रहा है। इस अर्थ में रवीन्द्र वर्मा का यह उपन्यास आज के दौर का अत्यन्त महत्वपूर्ण उपन्यास है। 
 
परिसंवाद को भगवान स्वरूप कटियार, प्रताप दीक्षित, राकेश, उषा राय, केके वत्स आदि ने भी संबोधित किया। इस मौके पर नाटककार राजेश कुमार, कवयित्री प्रज्ञा पाण्डेय व विमला किशोर, उपन्यासकार शीला रोहेकर, ‘रेवान्त’ की संपादक अनीता श्रीवास्तव, कवि वी एन गौड़, रवीन्द्र कुमार सिन्हा, रेणु बाला, इंदु पाण्डेय आदि सहित लखनउ विश्वविद्यालय के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
 
कौशल किशोर
 
संयोजक, जन संस्कृतिमंच, लखनऊ
 
09807519227 
 
प्रेस रिलीज

हिन्दुस्तान बदायूं में चल रहा ‘पेड न्यूज’ का खेल

अखबारी दुनिया में भले ही पेड न्यूज को लेकर तमाम बयानबाजी की जाती हो लेकिन सच्चाई यह है कि अखबारों की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर होता है। हिन्दुस्तान बदायूं में तो जमकर पेड न्यूज का खेल चल रहा है। लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस समय सपा सांसद हर अखबार पर जमकर पैसे की बरसात कर रहे हैं लेकिन हिन्दुस्तान पर उनकी कुछ ज्यादा ही मेहरबानी है।
 
ये विज्ञापन हिन्दुस्तान को ऐसे ही नहीं मिल जा रहे हैं हिन्दुस्तान भी सपा के लिए पूरी ईमानदारी दिखा रहा है। भले ही खबरें छूट जाएं लेकिन सपा का विज्ञापन छपता है उसे अगले दिन खबर के रूप में जगह जरूर दी जाती है। 
 
हिन्दुस्तान बदायूं ने मंगलवार 17 दिसम्बर को मेडिकल कॉलेज बनवाने पर 70 संस्थाओं का आभार क्वार्टर पेज में विज्ञापन के रूप में छापा था तो 18 दिसम्बर बुधवार के अंक में उस विज्ञापन की ही खबर बनाकर छाप दी। और तो और अखबार जहां छोटी तथा असरदार खबरों को प्राथमिकता देते हैं वहीं इस खबर में पूरे के पूरे 70 संस्थाओं के बाकायदा नाम तक हिन्दुस्तान ने छाप दिए।
 
वास्तविकता ये है कि इस बैठक में केवल 15-16 संस्थाओं के लोग ही उपस्थित थे वह भी वो जिन्हें शहर में छपासी के नाम से जाना जाता है यानि कुछ भी खबर हो उनका फोटो छप जाना चाहिए। इन संस्थाओं में भी अधिकांशतः ऐसी संस्थाएं हैं जिनमें एक दो लोग ही शामिल हैं और घरों तथा अखबारों में विज्ञप्ति देकर चलाया जा रहा है। 
 
इन दिनों हिन्दुस्तान में इन पेड न्यूजों की भरमार दिखाई दे रही है जिसकी शहर में व्यापक चर्चा है। लोगों का कहना है कि हिन्दुस्तान तो सांसद और शहर विधायक का अखबार बनकर रह गया है।
 
बदायूं से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

संतोष भारतीय जैसे दलालों ने लोकपाल के लिए भी सरकार से डील कर ली है : दीपक शर्मा

Deepak Sharma : लोकपाल की भी दलाली. अगर सार्वजनिक तौर पर बोलें तो कांग्रेस ने लोकपाल कार्ड जनहित में खेला है. अगर राजनैतिक तौर पर बोलें तो कांग्रेस ने लोकपाल का कार्ड अन्ना को रिझाने के लिए खेला है. और अगर सच बोलें तो कांग्रेस ने लोकपाल का कार्ड केजरीवाल के पर कतरने के लिए खेला है.

इधर 8 दिसम्बर को केजरीवाल ने 28 विधायकों को जीताकर देश की राजनीति में इतिहास रचा और उधर सिब्बल और कमलनाथ ने इन विधायकों का जवाब विधेयक से देने का ट्रम्प कार्ड फेंका. बाकी तैयारी पहले से ही थी. दोस्तों, जिस डील में संतोष भारतीय हों वहां असंतोष हो ही नहीं सकता. भारतीय फर्रुखाबाद से हैं और खुला खेल फर्रुखाबादी खेलने के लिए मशहूर है.

बहरहाल केजरीवाल का कद बढ़े -घटे या अन्ना के सर लोकपाल की जीत का सेहरा बंधे ….ये अहम नहीं है. अहम ये है की भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जो विधयेक लाया जा रहा है उस पर भी डील हो रही है. दलालों ने लोकपाल के लिए भी सरकार से डील कर ली है. (क्या इसके आगे कुछ लिखा जा सकता है)

आजतक टीवी चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वाल से

बिहार की दामिनियों की इन समाजसेवियों को याद तक नहीं आती

दोस्तों, दिल्ली में “दामिनी” के साथ हुई घटना को अब एक साल बीत गया है। इस एक साल के अंदर देश और प्रदेश में परिस्थितियां बहुत बदली हैं। देश में रेप रोकने का सख्त कानून बन चुका है। दिल्ली में दामिनी के साथ जो कुछ हुआ था, उसके बाद से अबतक 4 और घटनायें हो चुकी हैं। एक तो अभी हाल ही में नयी दिल्ली स्टेशन के पास में हुआ है। देश की कामर्शियल राजधानी मुंबई में एक महिला पत्रकार के साथ गैंगरेप हुआ।
 
वैसे देश के अन्य राज्यों की बात छोड़ केवल अपने राज्य बिहार की बात करें तो शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जिस दिन कोई न कोई दामिनी हवस के दरिंदों का शिकार नहीं बनती है। बीते एक साल में बलात्कार की घटनाओं की कुल संख्या 972 हो चुकी है। यह आंकड़ा अक्टूबर 2013 तक का है। अगर इसी सरकारी आंकड़े को आधार मानें तो प्रतिदिन तीन बेटियां “दामिनी” बनती हैं।
 
सवाल उठता है कि आखिर क्या करेगा कानून और उसे क्या करना चाहिए। सरकार के पास अपने तर्क हैं और जैसा कि उसके मुखिया आये दिन कहते रहते हैं कि बिहार में कानून का राज है। कानून अपना काम कर रहा है। हंसी आती है बिहार के इस दुर्भाग्य पर जब बिहार में एक सामाजिक कार्यकर्ता की पत्नी का रेप कर उसके गुपतांग में पत्थर डाल दिया जाता है, वह मर जाती है और फ़िर भी यह खबर पटना से प्रकाशित होने वाले अखबारों के लिए कोई खबर नहीं बनती। हद तो तब हो गयी जब छह महीने की बच्ची के साथ बलात्कार होता है और बिहार के मुख्यमंत्री कहते हैं कानून का राज है। आखिर कैसा है यह कानून का राज?
 
सवाल उठना लाजमी है। एक घटना राजधानी पटना के हृदयास्थली इलाके की है। करीब तीन महीना पहले आयकर गोलंबर के पास वह स्थल जहां पहले बाल श्रमिक आयोग का कार्यालय था उसके ठीक पीछे एक स्लम बस्ती नाले पर बसी थी। एक महिला शौच करने के लिए अपने झोपड़ी से बाहर निकली थी और फ़िर वह हवस के दरिंदों के हाथ लग गयी। जिस दिन यह घटना घटी, पटना पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। जब कुछ संगठनों ने इस मामले को उठाया तब जाकर पुलिस ने पीड़िता की प्राथमिकी को दर्ज किया और फ़िर अपराधियों को पकड़ने की कार्रवाई शुरु की गयी।
 
बहरहाल, बिहार में रोज बनती “दामिनी” की यह फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। अब चूंकि राज्य के मुख्यमंत्री ही बिहार में कानून के राज की दुहाई दे रहे हैं फ़िर इन 'दामिनियों' की कौन सुने। सबसे अधिक दिलचस्प तो तब होता है जब दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में 'दामिनी' की घटना पर पटना में कुछ एलीट महिलायें और पुरुष मोमबत्तियां जलाने निकल जाती हैं और वही दामिनी जब बिहार की बेटी होती है तब इन महान समाजसेवियों को उनकी याद तक नहीं आती है।
 
                 लेखक नवल कुमार www.apnabihar.org के संपादक हैं. इनसे nawal.buildindia@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

भोपाल में वीकली अखबार के पत्रकार की गला रेतकर हत्या

भोपाल। बागसेवनिया इलाके में तड़के कार में एक पत्रकार की लाश मिलने से सनसनी फैल गई। प्राथमिक जांच में उनकी हत्या गला रेतकर होना बताई जा रही है। पुलिस ने इस मामले में मुकदमा कायम कर जांच शुरू कर दी है। टीआई दिनेश जोशी के मुताबिक टीला जमालपुरा में रहने वाले रतन जायसवाल सीमेंट का कारोबार करते थे। साथ ही वह जनसंपर्क लाइफ नाम से एक सप्ताहिक अखबार भी निकालते थे।

मिनाल रेसीडेंसी के पीछे उनकी रतन ट्रेडर्स नाम से एक सीमेंट की दुकान है। बीती रात उन्होंने करीब ग्यारह बजे दुकान बंद करने के पहले तीन लोगों के साथ बैठकर शराब पी थी। बाद में वह अपनी कार लेकर कहीं चले गए थे। देर रात जब वह अपने घर नहीं पहुंचे तो उनके परिजनों ने उन्हें खोजने की कोशिश की, लेकिन कोई सुराग हाथ नहीं लगा। 

सुबह ग्राम रापड़िया जोड़ के पास एक ग्रामीण ने रास्ते के किनारे कार में खून से लथपथ लाश पड़ी होने की सूचना पुलिस को दी थी। बताया जाता है कि मृतक ने जिनके साथ शराब पी थी, वह उसके परिचित ही हैं। पुलिस ने तीनों की तलाश शुरू कर दी है, लेकिन उनके नामों का खुलासा नहीं किया है। पुलिस ने प्राथमिक जांच में इसे हत्या का मामला पाया है। 

अब अन्धेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के

नये मीडिया के सन्दर्भ में एक कहानी बार-बार दोहराने योग्य हैं. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के एक गांव का सातवीं पास व्यक्ति काफी परेशान था मनरेगा की बे-इमानी को लेकर. उसे काम भी नहीं मिलता था और अधिकारियों से लांछित भी होना पड़ता था. उसे किसी ने फेसबुक के बारे में बताया. वो कस्बे के कैफे में गया और फिर नियमित जाने लगा. सीखा उसने फेसबुक और अपने गांव के भ्रष्टाचार की बात लिखने लगा. कुछ समय में ही उसकी मेहनत सफल हुई. बातें जिलाधिकारी तक पहुंचीं. उस व्यक्ति को बुलाया गया और न केवल उसे अच्छा काम दिया गया बल्कि सम्मानित भी किया गया अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम का इतने खबसूरत ढंग से उपयोग को लेकर. 
 
तो जुकरबर्ग ने भले फेसबुक को मित्रों के आपसी संवाद में आदान-प्रदान की सहूलियत के लिए फेसबुक का निर्माण किया लेकिन जाने-अनजाने आज यह माध्यम भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के तीसरे नागरिकों के दुःख-दर्दों का साझीदार बन कर भी सामने आया है. बाज़ार में ढेर सारे नए-नए फीचरों के साथ आते नित नए-नए मोबाइल सेट ने और मोबाइल सेवा प्रदाता कंम्पनियों के नाम मात्र के कीमत वाले प्लानों ने तो सच में इसे हम गरीबों का माध्यम बना डाला है.
 
कुछ दशक पहले तक भले ही पत्रकारिता, साहित्य और फिल्मों में जहां गांव-गरीब, किसान-मजदूर की बातों को जगह मिलती रही हो लेकिन आज आप मुख्यधारा कहे जाने वाले संचार माध्यमों में ऐसे किसी सरोकार की बात भूले-भटके भी नहीं सुन सकते. या यूं कहें कि ऐसी कोई भी खबरें बिरले ही आपकी आंखों से अब गुजरती हो जिसका कोई बाज़ार मूल्य नहीं हो. इसके अलावा साहित्य में भी, किस्से कहानियों में भी अब कोई पंच परमेश्वर, कोई बड़े घर की बेटी, कोई श्रीकांत या मैला आँचल, परती परिकथा के लिए कोई जगह नहीं होती न ही फ़िल्में आज दो गज ज़मीन के लिए या दो आंखें बारह हाथ के लिए बनती हैं. इश्क कमीना के इस ज़माने में मुन्नी को बदनाम करने वाले गीत-गान ही आज राष्ट्रीय सरोकार के विषय या फिर सनी लियोनी द्वारा कपड़ा पहन लेना राष्ट्रीय चिंता के विषय होते हैं. संविधान के 72-73वें संशोधन के बाद भले पंचायतों की मजबूती देख अखबारों में अब गांव-कस्बे के संस्करण भी निकाल लिए हों, भले कोक-पेप्सी की तरह अब इन संस्करणों ने गांव तक का रुख कर लिया हो लेकिन अखबार को आर्थिक रूप से फ़ायदा पहुचा सकने वाली खबरों को छोड़ दें तो उन पृष्ठों में ऐसे सरोकार कहीं नहीं देखने को मिलते.
 
ऐसे में सुदूर गांव-कस्बे में बैठा कोई जागरूक व्यक्ति आज जिस तरह इस नए मीडिया का इस्तेमाल कर अभिव्यक्त करने लगा है खुद को, यह काबिले गौर बात है और काबिले तारीफ़ भी. न केवल फेसबुक बल्कि ढेर सारे वेबसाइटों ने भी इस कमी को पूरा किया है. आप किसी कम नामचीन साईट पर भी लेख आदि लिखते हैं और उसका लिंक फेसबुक पर शेयर करते ही ग्लोबल हो जाते हैं. कंटेंट में अगर ज़रा भी दम रहा, कुछ नयी जानकारी भले ही जरा टूटे-फूटे शब्दों में भी रही तो वो जल्द ही वह मास तक कम्युनिकेट हो जाता है. फिर हर सूचना का चावल लेकर सुदामा की तरह द्वारिका-दिल्ली में आपको सकुचाते हुए खड़े होने की ज़रुरत नहीं होती. सूचना खुद माध्यम बन कर अपना पाँव फैला लेता है. आपके सूचना के बीज को वट वृक्ष बनने में फिर जरा सी ही देरी होती है. हाल-फिलहाल में इन्हीं गांव-खेड़ों से निकले-बने जनमत ने राजनीति में भी क्या कमाल दिखाया है, कैसे इसने राजनीति को भी प्रभावित किया है. किस तरह राष्ट्रीय दलों को भी अपना चेहरा बदल लेने को मजबूर किया है इस पर ढेर सारे उदाहरण देने की ज़रुरत नहीं है. जिस तरह एक बड़े राष्ट्रीय दल को अपना नेता तक घोषित करने में इस सोशल मीडिया ने दबाव बना कर अपनी बात मनवाई है यह तो राजनीति शास्त्र के अध्येताओं के लिए अचंभे का विषय ही है. कल के राजनीति विज्ञान के छात्र ‘रूसो’ के बोर सिद्धांतों से ज्यादा इन गाथाओं को पढ़ना पसंद करेंगे. 
 
अपनी इस उपलब्धि के अलावा इस माध्यम की एक और सबसे बड़ी विजय यह रही कि इसने दिल्ली दर्प दमन किया है. वहां बैठ कर सिगार सुड़कते हुए खुद को बौद्धिकता का समंदर समझते हुए संपादकों को बताया है कि आपको अब अभिव्यक्ति का बिचौलिया बनने की ज़रुरत नहीं है. आप बस नीरा राडिया में अपना साफल्य ढूंढते रहें, अपना दुःख-सुख हम आप ही बतिया लेंगे, बिना आपके ही. आपको न ही कष्ट करने के ज़रुरत है और न ही हमारे दुःख का सौदा कर हम आपको मर्सिडीज पर चढ़ने देंगे. आप हैं बड़े बुद्धि के गागर तो बने रहिये, राजनीति के आगे मेमिया कर भी जनता के आगे शेर बने रहिये लेकिन अगर मेरे खेत में बीज और खाद की कमी है या सिंचाई की ज़रुरत है तो इसी माध्यम का उपयोग कर हम शासकीय अधिकारियों का कंठ दबा सकेंगे. हमें कम से कम आपके जैसे बिचौलियों की ज़रुरत तो कतई नहीं है. बल्कि आपको भी अगर इस नए मीडिया का शौक चर्राया हो तो प्लीज़ कतार में खड़े होइए. काम लायक लगेगी आपकी बात तभी आपको लाइक करेंगे या कमेन्ट भी. ज्यादा बॉसगिरी दिखाया तो दो-चार सुना भी देंगे और ब्लोकिया-धकिया भी देंगे. खैर. 
 
पत्रकारिता के कुछ साल तक के पुराने छात्रों ने भले इस मीडिया के बारे मे कुछ नहीं पढ़ा हो लेकिन अब तो यह माध्यम पत्रकारिता समेत सभी शैक्षिक संस्थानों में विमर्श का विषय हो गया है. पहले कभी आकाशवाणी के छोटे-छोटे ‘एलआरएस’ (लोकल रेडियो स्टेशन) ने गांव तक की बात कहने का दायित्व लिया था लेकिन उसमें भी जनता की भूमिका बस रिसीवर तक की थी. उसमें उनकी कोई सहभागिता नहीं थी. लेकिन इस माध्यम ने हर श्रोता को वक्ता भी बनाया है. रेडियो या आजकल के कम्युनिटी रेडियो से भी जुड़ना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं थी. लेकिन सभी सम्प्रेषण विधाओं को एक तकनीक में समेट देने वाले इस माध्यम ने तो आपको ऑडियो, विडिओ, टेक्स्ट, कार्टून, एनीमेशन सबका बादशाह बना दिया है. जिस भी विधा में आप अपनी बात कहना चाहें, फेसबुक है न. पत्रकारिता के कुछ साल भी पुराने छात्रों ने भले नए मीडिया के बारे में नहीं पढ़ा हो लेकिन अब पत्रकारिता समेत सभी शैक्षिक संस्थानों के लिए यह विषय, विमर्श का हो गया है. हाल ही में वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने इस पर एक दो-दिनी सेमिनार का आयोजन किया. भोपाल और दिल्ली आदि में लगातार ऐसे सेमिनार आयोजित हो रहे हैं. यानी देश की राजधानी से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक में अब लोग जुट रहे हैं. अभिव्यक्ति के इस नए आकाश तक कैसे और अच्छे पंखों के साथ परवाज़ कर सकें, इस पर विमर्श कर रहे हैं. 
 
प्रसन्नता की बात है कि पूर्वांचल के देवरिया में कुछ उत्साही मित्रों ने भी इस विधा पर विमर्श करने के लिए एक गोष्ठी का आयोजन किया है. जिस देवरिया की पवित्र भूमि ने प्रदेश-देश को एक से एक साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी मुहैया कराये हों वहां यह गोष्ठी नए मीडिया के क्षेत्र में भी एक नयी तरह से प्रेरणा देने का काम करेगी. देश के अन्य छोटे-छोटे क्षेत्रों तक के लोग इससे प्रेरणा लेकर अपने यहां भी अभिव्यक्ति के इस सबसे अनोखे, सबसे सुन्दर, सबसे सरल, सबसे सस्ते, सबसे तीव्र माध्यम का उत्सव मनाने को क्रमशः इकट्ठा होंगे यही उम्मीद भी और यही शुभ कामना भी. आयोजकगणों को अशेष साधुवाद.
 
लेखक पंकज झा पत्रकार और बीजेपी नेता है. वर्तमान में वे भाजपा के छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखपत्र दीपकमल पत्रिका के संपादक के रूप में कार्यरत हैं. पंकज से  jay7feb@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


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क्षत्रपों की राजनीति को नापेगी आप

अरविंद केजरीवाल ने सपना दिखाया, लोगों ने उन पर यकीन करते हुए अपना समर्थन दिया। अब एक बार फिर से बारी अरविंद केजरीवाल की है। जनता की उम्मीदों पर अगर वे खरे उतरते हैं, तो इससे न सिर्फ लोगों की सोच बदलेगी, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था ही बदल जाएगी. 
 
जिस देश की पूरी राजनीति जातीय समीकरण, अपराध के राजनीतिकरण, सेक्युलर बनाम कम्युनल और धनकुबेरों पर आधारित हो, उसी देश में एक साल के भीतर एक आंदोलन से निकली पार्टी ने दिल्ली की राजनीति को बदल कर देश की जनता की आंखें खोल दी है। यह पार्टी है अरविंद केजरीवाल के संरक्षण में चलने वाली आम आदमी पार्टी अर्थात आप। 2013 के 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने न केवल 15 साल से दिल्ली की सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी को पैदल कर दिया, बल्कि भाजपा की राजनीति को भी रोक दिया है। लेकिन इस आप पार्टी की राजनीति यहीं तक नहीं है। 
 
इस चुनाव में कई तरह के उलटफेर आप पार्टी ने किए हैं। अरविंद केजरीवाल ने तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को करारी मात दी है। इस आप पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं की जमीन खिसका दी है। इसी आप पार्टी ने उन सभी बाहरी लोगों का वोट लिया है, जो कभी कांग्रेस और भाजपा में बिक जाते थे। इसी आप पार्टी ने चंदे के दम पर चुनाव लड़ने की कला देश के सामने पेश की है। जाति विहीन, संप्रदायविहीन और अपराधविहीन राजनीति कैसी होती है और इस राजनीति को देश की वही जनता कैसे आगे बढ़ाती है, जो अब तक कांग्रेस और भाजपा के बीच हांफती नजर आती थी, इसका भी एक सटीक नमूना केजरीवाल ने पेश किया है। याद रखिए केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की यह राजनीति आगे कितना सार्थक रहेगी और तमाम तरह के गुणा भाग से कब तक बची रहेगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो साफ है कि आगामी लोकसभा चुनाव में यह नई नवेली पार्टी तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की राजनीति को बिगाड़ने के लिए काफी है। मोदी की राजनीति को रोकने के लिए काफी है और लंपट राजनीति के लिए एक सबक है आप पार्टी। 
 
केंद्र सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार के गर्भ से निकली यह पार्टी आजाद भारत में 77 के बाद की एक दूसरी राजनीतिक क्रांति के रूप में सामने आई है, जिसके पास जनता के अलावा कोई अलग पूंजी नहीं है। 77 के चुनाव में जेपी की अगुआई में जनता पार्टी ने कांग्रेस की निरंकुश और भ्रष्ट सरकार को धूल चटा दी थी। उस जनता पार्टी के पास भी कोई पूंजी नहीं थी, न कोई जातीय समीकरण था और न ही किसी के पास राजनीति करने का कौशल, लेकिन जनता ने बदलाव किया और इंदिरा गांधी की हार हुई थी। अरविंद केजरीवाल आज उसी 77 के आंदोलन की याद दिला रहे हैं। आप की आगामी राजनीति का देश की सियासी राजनीति पर क्या असर होगा? इसकी हम चर्चा करेंगे, लेकिन थोड़ी जानकारी पार्टी के गठन, उसके आंदोलन और उसके इरादों को लेकर हो जाए।
 
आम आदमी पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल एवं लोकपाल आंदोलन के बहुत से सहयोगियों द्वारा संगठित भारतीय राजनीतिक दल है। इसके गठन की आधिकारिक घोषणा 26 नवंबर 212, को भारतीय संविधान अधिनियम की 63वीं वर्षगांठ के अवसर पर जंतर-मंतर पर की गई थी। वर्ष 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन संगठन द्वारा अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए जनलोकपाल आंदोलन के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा जनहित के प्रति प्रदर्शित उपेक्षापूर्ण और अहंकारपूर्ण रवैये के कारण राजनीतिक विकल्प की संकल्पना की जाने लगी थी। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, जबकि आंदोलन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव एवं अन्य सहयोगियों ने चुनाव में शामिल होने का फैसला किया। इसके द्वारा भारत के भ्रष्टाचार में संलिप्त राजनीतिक दलों का विकल्प देने की कोशिश की गई। गठन के बाद से इस दल ने अनेक प्रतिरोध किया, जिसमें सरकार एवं पूंजीपतियों की साठ-गांठ से बिजली, पानी आदि के मूल्यों में वृद्धि एवं यौन उत्पीड़न के विरुद्घ एक सशक्त कानून की मांग आदि शामिल हैं।
 
इंडिया अगेंस्ट करप्शन द्वारा सोशल साइट्स पर किए गए सर्वे में राजनीति में शामिल होने के विचार को व्यापक समर्थन का संकेत मिला। 19 सितंबर 2012 को हजारे और केजरीवाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनके राजनीति में शामिल होने संबंधी मतभेद अंतहीन हैं, इसलिए उन्होंने समान लक्ष्यों के बावजूद अपना रास्ता अलग करने का निश्चय किया। जनलोकपाल आंदोलन के मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव आदि कई प्रमुख लोगों ने केजरीवाल का साथ दिया, जबकि किरण बेदी, संतोष हेगड़े आदि कुछ अन्य प्रमुख लोगों ने हजारे से सहमति प्रकट की। केजरीवाल ने दो अक्टूबर 2012 को महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर राजनीतिक दल बनाने के फैसले की घोषणा की और भारतीय संविधान को अंगीकृत किए जाने की वर्षगांठ 26 नवंवर को इसका औपचारिक गठन किया गया।
 
इस पार्टी की संरचना भारत की अन्य राजनीतिक पार्टियों से अलग है। इस पार्टी ने अपने कामकाज के लिए निम्नलिखित मानक तय किए हैं-
 
-आम आदमी की पार्टी में कोई केंद्रीय आलाकमान नहीं होगा। परिषद के सदस्य ही कार्यकारिणी का चुनाव करेंगे और उन्हें वापस भी बुलाने की शक्ति भी होगी।
-इस पार्टी का वादा है कि हमारा कोई भी विधायक या सांसद अपने वाहनों पर लालबत्ती या किसी अन्य चिह्न का प्रयोग नहीं करेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि इस पार्टी का कोई विधायक या सांसद किसी विशेष सुरक्षाबल का प्रयोग नहीं करेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि हमारा कोई भी विधायक या सांसद किसी भी आलीशान सरकारी बंगले में नहीं रहेगा।
-आम आदमी पार्टी का वादा है कि उनकी पार्टी का कोई भी सांसद और विधायक 25 हजार से ज्यादा वेतन नहीं लेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि अपराधियों और गुंडों को कभी भी टिकट नहीं दिया जाएगा। इसके साथ ही जांच के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा की कि जिन व्यक्तियों का आपराधिक रिकॉर्ड है या जिनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं, उन्हें पार्टी से चुनाव लड़ने नहीं दिया जाए।
-इस पार्टी का वादा है कि वह पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता के साथ कार्य करेगी। दान द्वारा एकत्रित हर एक पैसे का ब्यौरा पार्टी की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाएगा। चुनावी खर्च को भी वेबसाइट पर घोषित किया जाएगा।
-इस पार्टी का वादा है कि वह एक ही परिवार के दो सदस्यों को टिकट नहीं देगी। साथ ही वे कार्यकरिणी के सदस्य भी नहीं बन सकते।
-इस पार्टी का वादा है कि अगर वह सत्ता में आती है, तो राइट टू रिजेक्ट कानून बनाया जाएगा।
-इस पार्टी का वादा है कि सत्ता में आने के बाद एक महीने के अंदर केंद्र में अन्ना वाला जनलोकपाल बिल और राज्यों में लोकायुक्त कानून पास किया जाएगा, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर चपरासी ग्रेड तक के लोग होंगे।
 
दरअसल, अन्ना जनांदोलन ने राजनीतिक दलों के चेहरों पर पड़े लोक हितैषी नकाब को हटाकर स्वार्थी सत्ताकांक्षी और जनविरोधी चरित्र को स्पष्ट कर दिया था। विपक्षी दलों के साथ ही इसमें सबसे विकृत चेहरा केंद्र में सत्ताधारी दल कांग्रेस का नजर आया। उसके वकील मंत्रियों कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम आदि ने स्वयं को शासक एवं अन्ना हजारे की टीम को गुलाम मानकर तुगलकी आदेश और बयान जारी किए थे। 14 अगस्त को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे पर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप लगाते हुए कहा कि अन्ना भ्रष्ट हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति सावंत की रपट का संदर्भ दिया था, जिसमें अन्ना को दोषी ठहराया गया था। उन्होंने यह नहीं बताया था कि न्यायमूर्ति सावंत की रपट के बाद इस मुद्दे पर सुखतांकर आयोग ने जांच की थी और अन्ना को आरोपमुक्त कर दिया था। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, अंबिका सोनी आदि के साथ ही विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, सीताराम येचुरी आदि का कद भी छोटा कर दिया। मनमोहन सिंह ने संसद में इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होने की चेतावनी दी थी। अंबिका सोनी ने इसे साफ करते हुए अमेरिका का नाम उजागर किया था।
 
सभी नेताओं ने बार-बार संसद की सर्वोच्चता की दुहाई दी और लोगों के प्रयासों को अराजक कार्रवाई ठहराने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होती है, जो भारत को संप्रभु, लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष बनाएंगे। कह सकते हैं कि अन्ना पर राजनीतिक दलों की टिप्प्णी को देश की जनता ने बर्दाश्त नहीं किया। केजरीवाल और अन्ना की राहें आज जुदा हो गई हैं, लेकिन यह अन्ना ही हैं जिसने केजरीवाल को जनता के बीच काम करने का सबक दिया है।
 
दरअसल, भारत में राजनीति इस बात पर चलती रही है कि देश की जनता भले ही भ्रष्ट हो, लेकिन शासक वर्ग को ईमानदार होना चाहिए। देश की जनता भी यही चाहती है। अगर जनता की सोच ऐसी नहीं होती, तो क्या लालू प्रसाद जेल जाते। चारा घोटाला में नेता और शासक वर्गों ने लूट मचाई, तो इस लूट में बहुत सारी जनता ने भी अपना हाथ साफ किया था। लेकिन उनका कुछ नहीं हुआ। आज भी जो लोग भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन करते दिखते हैं। संभव है कि उनके घरों में भी गलत तरीके से कमाए पैसे ही आते हों, लेकिन उसे वे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं करते।
 
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आप पार्टी की दिल्ली में धमाकेदार तरीके से आने के मायने क्या होंगे? सच मानिए, उत्तर प्रदेश की राजनीति से लेकर बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र से लेकर पूरे देश की राजनीति बदलती नजर आएगी। एक ओर तो चुनाव आयोग के कड़े नियम और दूसरी ओर आप जैसी पार्टी का अवतरण राजनीति को शुद्ध करने के लिए काफी है। आप से सबसे ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियों को खतरा है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक की राजनीति को आप प्रभावित करेगी। मोदी की राजनीति पर ब्रेक लगा सकती है आप। देश की जनता का मिजाज बदलते देर नहीं लगती और आप उस मिजाज को पहचान रही है।
 
लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे mukheeya@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

लोकमत समूह कर रहा कर्मचारियों का उत्पीड़न, जानिए सच्चाई

सन 1971 में नागपुर से शुरू हुआ मराठी दैनिक लोकमत आज 13 स्थानों से प्रकाशित हो रहा है. मराठी के 13 संस्करणों के अलावा हिंदी दैनिक लोकमत समाचार सात स्थानों से तथा अंग्रेजी दैनिक लोकमत टाइम्स तीन स्थानों से प्रकाशित हो रहा है. कुल 23 संस्करणों के साथ लोकमत समूह ने आज समाचार पत्र उद्योग में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है. लोकमत की इस भारी प्रगति में निर्‍संदेह कर्मचारियों का अभूतपूर्व योगदान है. 
 
बावजूद  इसके, आज लोकमत के कर्मचारी शोषण के शिकार हैं. बरसों काम करने के बाद भी कर्मचारियों को गैरकानूनी ढंग से कांट्रैक्ट पर कार्यरत कर्मचारी दिखाया जा रहा है तथा उन्हें अत्यंत कम वेतन पर काम करने को मजबूर किया जा रहा है.
 
समाचार पत्र कर्मचारियों के लिए भारत सरकार द्वारा लागू किए गए पालेकर अवार्ड (1979), बछावत अवार्ड (1988) मणिसाना अवार्ड (1998) और हाल ही में लागू मजीठिया अवार्ड (2010) में निर्देशित वेतनमान और अन्य सुविधायों से लोकमत के कर्मचारियों को वंचित रखा जा रहा है.
 
समाचार पत्र उद्योग को लागू उपरोक्त वेतनमान कर्मचारियों को देना नहीं पड़े इसलिए लोकमत समूह द्वारा कर्मचारियों को कभी 'गोल्डी एडवरटाइजिंग' तो कभी 'मानव सेवा ट्रस्ट' तो कभी ‘सरिता’ का कर्मचारी बताकर उनका शोषण किया जा रहा है. 
 
मुनाफे के आधार पर कर्मचारियों को अधिक वेतन देने की अवार्ड में व्यवस्था होने के बावजूद लोकमत कर्मचारियों को कम वेतन देकर उनका भारी शोषण कर रहा है. इतना ही नहीं औद्योगिक न्यायालय तथा हाइकोर्ट का आदेश होने के बावजूद लोकमत ने आज तक कोर्ट में अपनी बैलेंसशीट फाइल नहीं की है. ताकि उसे कर्मचारीयों को ज्यादा वेतन न देना पडे.
 
लोकमत के उपरोक्त और अन्य अन्यायपूर्ण और कामगार विरोधी कृत्यों के खिलाफ कर्मचारियों का मान्यता प्राप्त संगठन 'लोकमत श्रमिक संघटना' पिछले 16-17 वर्षों से लड़ रहा है और इसीलिए यूनियन को तोड़ने के लिए लोकमत प्रबंधन अनेक साजिशें कर रहा है.
 
कमोबेश ऐसी ही स्थिति लोकमत के सभी संस्करणों में कार्यरत सभी कर्मचारियों की है. अतः उनकी मांग के कारण अकोला में 15 अगस्त 2013 को तथा गोवा में 1 सितंबर 2013 को लोकमत श्रमिक संघटना की शाखाएं स्थापित की गईं. संगठन के इस कदम से चिढ़कर लोकमत प्रबंधन ने गोवा शाखा के अध्यक्ष श्री मनोज राजेश इन्मुलवार को 12.11.13 को नौकरी से बर्खास्त कर दिया. इस कारण लोकमत के सभी शाखाओं के कर्मचारियों में तीव्र असंतोष निर्माण हो गया. उपरोक्त कारणों से संघटना को शांतिपूर्ण आंदोलन चलाना पड़ा. इसके खिलाफ,लोकमत प्रबंधन ने अपनी मनमानी करते हुए नागपुर  के 36, अकोला के 21 तथा गोवा कार्यालय के 4, इस प्रकार कुल 61 कर्मचारियों को तुरंत प्रभाव से डिसमिस कर दिया है.
 
दर्डा परिवार का एक भाई श्री राजेंद्र दर्डा महाराष्ट्र शासन में मंत्री हैं तथा बड़े भाई श्री विजय दर्डा राज्यसभा के सदस्य हैं. संवैधानिक पदों पर रहने के बावजूद ये लोग खुल्लमखुला श्रम कानूनों का उल्लंघन कर कर्मचारियों को प्रताड़ित कर रहे हैं क्योंकि उनके हाथ में सत्ता, अखबार और अथाह पैसा है.
 
आज अखबारों से सभी भयभीत हैं. राजनेता डरते हैं कि उनसे पंगा लेने पर उनके खिलाफ समाचार प्रकाशित कर उनकी बदनामी कर दी जाएगी. इन्हीं कारणों से प्रशासन भी अखबारों के खिलाफ कार्रवाई से बचना चाहता है. अखबार जनहित का प्रहरी बनने की बजाय निहित स्वार्थों के बढ़ावे का तथा उनके रखवालों का माध्यम बन गया है. यह दुखद है.
 
आम जनता से तथा आप जैसे प्रबुध्द नागरिकों से हमारी प्रार्थना है कि आप दर्डा परिवार को इन अन्यायपूर्ण मार्ग पर चलने से रोकें और उन्हें न्याय, सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें जिससे लोकमत जैसा अखबार जनता के कल्याण का माध्यम बन सके. 
 
लोकमत श्रमिक संघटना
 
नागपुर

साहित्य कहीं बचा है तो वह लघुपत्रिकाओं में ही है

पटना । ’भूमंडलीकरण के दौर में लघुपत्रिकाओं की भूमिका’ विषय पर प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई द्वारा डा. रानी श्रीवास्तव की अध्यक्षता में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। संचालन राजकिशोर राजन ने किया।
    
’भूमंडलीकरण के दौर में लघुपत्रिकाओं की भूमिका’ पर कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कवि योगेन्द्र कृष्णा ने कहा कि आज के दौर में जब बाजार के प्रभाव में साहित्य हाशिए पर धकेला जा रहा है और उसकी बुनियाद पर ही हमला किया जा रहा है ऐसे में लघुपत्रिकाओं ने आगे बढ़कर रचनाकारों का हाथ थामा है। श्री कृष्णा ने इस अवसर पर कई लघुपत्रिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पहल, दोआबा, सनद, चिंतन दिशा, अक्षर पर्व, कृति और गुफ्तगू जैसी पत्रिकाओं ने बाजार की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए हिन्दी पट्टी में लेखकों, कवियों, विचारकों की सामुहिकता को बचाए रखता है।
 
डा. रानी श्रीवास्तव ने कहा कि अंतिम जन, समकालीन अभिव्यक्ति, संवदिया, समकालीन सृजन, जैसी लघुपत्रिकाओं के संपादकों ने अपनी गाढ़ी कमाई से पत्रिका निकालते हुए लगभग इस साहित्य विमुख समय में साहित्य को जिलाए रखने का काम किया है।
 
कवि शहंशाह आलम ने विमर्श को बढ़ाते हुए कहा कि लघुपत्रिकाएं हथियार की तरह काम करती हैं वह भी बिल्कुल सूक्ष्म। विभूति कुमार का ख्याल था कि लघुपत्रिकाएं ’अकाल में सारस’ की तरह हैं।
 
अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा कि लघुपत्रिकाओं का सफ़र साम्राज्यवाद के उपनिवेशवादी प्रभाव को खत्म करने के लिए हुआ था। बाजारवाद में साहित्य के लिए स्पेस सिमट गया है, साहित्य कहीं बचा है तो वह लघुपत्रिकाओं में ही। कवि राजकिशोर राजन का मानना था कि लघुपत्रिकाएं माचिस की तीली की तरह होती है। राकेश प्रियदर्शी ने कहा कि लघुपत्रिकाओं ने पूंजीवाद का गहरा विरोध किया है।
 
परमानंद राम ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब सबकुछ बाजार में ढह रहा है, ऐसी परिस्थिति में रोशनाई, अभिधा, सांवली, जनपथ, वातायन प्रभात, एक और अंतरीप, शेष आदि छोटी-बड़ी पत्रिकाओं ने प्रगतिशील विचारों को संजोकर रखा है।
 
कार्यक्रम का समापन महान योद्धा व भारतरत्न नेल्सन मंडेला को श्रद्धांजलि देने के साथ हुआ।
 
अरविन्द श्रीवास्तव / मधेपुरा (बिहार)
 
मोबाइल- 9431080862.
 
प्रेस विज्ञप्ति

लोकपाल के असली जनक तो केजरीवाल हैं

लोकपाल विधेयक जिस हड़बड़ी में कानून बनने जा रहा है, वह अटपटा है, क्योंकि इसके कई मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर संसद में ही नहीं, संसद के बाहर भी जमकर बहस होनी चाहिए। देश की सारी अक्ल का ठेका संसद ने ले रखा हो, ऐसा नहीं है। संसद ने यों अब तक काफी संतुलित और प्रामाणिक कानून बनाए हैं, लेकिन आपात्काल और राजीव-काल के ऐसे उदाहरण भी हैं, जबकि उसने अनेक हास्यास्पद और घोर आपत्तिजनक विधेयक पारित किए हैं। 
 
ऐसा भी हुआ है कि जिस विधेयक को एक सदन ने पारित कर दिया, उसे मूर्खतापूर्ण मानकर दूसरे सदन में पेश ही नहीं किया गया। लोकपाल बिल के साथ भी लगभग ऐसा ही हो रहा है। एक सदन ने उसे पारित कर दिया। फिर उसमें दर्जनों संशोधन सुझाकर दूसरे सदन की प्रवर समिति को भेज दिया। अब उस संशोधित विधेयक को दोनों सदन दुबारा पास करेंगे।
 
यह हड़बड़ी इसलिए भी बढ़ गई है कि अन्ना हजारे अपने काठ के घोड़े पर दोबारा सवार हो गए हैं। उनका अनशन सामने हैं। सबको पता है कि रामलीला मैदान में जो लीला हुई थी, वह लोकपाल या अन्ना के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के इलाज़ के लिए हुई थी। लोकपाल का असली पिता तो अरविंद केजरीवाल है। अन्ना को लोकपाल की समझ न तब थी और न अब है। अरविंद ने इशारे ही इशारे में कह भी दिया है कि अन्ना ने शायद उस विधेयक को ध्यान से नहीं पढ़ा है। जो भी हो, देखिए कितना मजेदार तमाशा हो रहा है। गुरु कहता है- इसे पास करो, वरना मर जाउंगा और चेला कहता है कि इस लोकपाल में दम ही नहीं है। यह चूहे को भी नहीं पकड़ सकता। यह लोकपाल नहीं, जोकपाल है।
 
लोकपाल पर सभी पक्ष घनघोर राजनीति कर रहे हैं। अन्ना चाहते हैं, इस संसार से कूच करने के पहले उनके सिर पर पगड़ी बंध जाए। कांग्रेस और भाजपा चाहती हैं कि लोकपाल आगे जाकर चाहे जोकपाल या धोकपाल ही सिद्ध हो, उन्हें इसका श्रेय मिल जाए और इस लोकपाल का असली जनक अरविंद चाहता है कि अन्ना समेत सभी इसका श्रेय क्यों लूटें? उसका असली जनक क्या हाथ मलता रह जाएगा? कोई भी यह नहीं कह रहा है कि जो विधेयक पिछले 40 साल से अधर में लटका हुआ​ ​है, उस पर कम से कम 40 घंटे तो बहस चलाओ। राजनीतिक दल उसे आंख मींचकर पास करने पर आमादा हैं और केजरीवाल एंड कंपनी उसे जड़मूल से ही रद्द कर रही है। लोकपाल चाहे जिस ब्रांड का आप ले आएं, जब तक देश में ईमानदारी का नैतिक माहौल नहीं बनेगा, वह भी नेताओं के हाथ का खिलौना बनकर रह जाएगा।
 
लेखक डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

पटेल सेक्युलर नहीं साम्प्रदायिक थे

आज के कुछ कांग्रेसी नेता सरदार पटेल को सेक्युलर साबित कर रहे हैं जो कि एकदम गलत है, अगर इतिहास देखें तो इस बात का सबूत मिलता है कि पटेल सेक्युलर नही थे. गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाने से पटेल सेक्युलर नहीं हो गये. केन्द्रिय मंत्रिमंडल और देश के अधिकतर लोगों ने संघ पर पाबंदी लगने की मांग की थी. उस समय पटेल पर ये भी इल्जाम था कि उन्होंने गांधी जी को समुचित सुरक्षा प्रदान नहीं की थी. पटेल ने संघ पर लगी पाबंदी को कुछ दिनों बाद हटा भी लिया था.
 
कुछ दिन पहले ही आडवाणी ने एक किताब का हवाला देते हुआ कहा है कि हैदराबाद पर पुलिस हमला (जो कि फ़ौजी हमला था) के बारे में नेहरू और पटेल में आपस में विवाद था नेहरू फ़ौजी कार्रवाई के विरुद्ध थे जब कि पटेल फ़ौजी कार्रवाई के समर्थन में थे, विवाद इतना बढ़ा कि पटेल मीटिंग से उठ कर चले गये थे, आखिर नेहरू को उनकी बात मांनी पड़ी थी. हैदराबाद राज्य पर हमला किया गया और सुन्दर लाल आयोग के अनुसार इस फ़ौजी हमले में 25-40 हज़ार मुसलमान मारे गये थे. आडवाणी ने सैम मानेक शॉ के एक पुराने इंटरव्यू का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू कश्मीर में भी फ़ौजी कर्रवाई के खिलाफ थे.
 
हम सभी जानते हैं कि पटेल साम्प्रदायिक सोच के करण ही संघ के हीरो हैं. संघ परिवार उन पर फक़्र करता है और उन्हें हिन्दुत्व का नेता मानता है. नेहरू की मुखालफत के बाद भी पटेल ने सोमनाथ मंदिर को बनवाया. नेहरू जागीरदारी खत्म करना चाहते थे जब कि पटेल पूंजीवाद को आगे लाना चाहते थे. नेहरू अमन शान्ति और जनतांत्रिक तरीकों पर यकीन रखते थे जबकि पटेल उग्र विचार और डिक्टेटर वाली सोच रखते थे नेहरू सेक्युलर थे जबकि पटेल सेक्युलर नही थे. कांग्रेस में भी बहुत से नेताओं की सोच साम्प्रदायिक थी और उसमें एक ग्रुप था खरे, डॉक्टर संजय, केएम मुंशी, लाजपत राय आदि का जो कि पटेल के समर्थक थे. अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम में लिखा है कि कांग्रेस में साम्प्रदायिक सोच वाले नेताओं के करण मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा था और मुसलमान कांग्रेस छोड़ रहे थे.
 
मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने अपनी किताब इंडिया विन्स फ्रीडम के पृष्ट 215-217 पर लिखते हैं कि ''मैं, नेहरू और पटेल, गांधी जी के पस बैठे हुए थे, नेहरू ने गांधी जी से कहा के दिल्ली में मुसलमान बिल्ली कुत्ते की तरह मारे जा रहे हैं और मैं चाह कर भी उन्हें नहीं बचा पा रहा हूं तो पटेल ने कहा कि नेहरू गलत बोल रहे हैं सिर्फ 1-2 इस तरह की घटनायें हुई हैं बाकी शान्ति है तो गांधी जी ने कहा के पटेल मैं चीन में नहीं दिल्ली में ही हूं और अपने आंखो से देख रहा हूं और तुम कहते हो कि कुछ नही हो रहा है.''
 
एक और घटना जो कि पृष्ट 214-215 पर लिखी है जिससे पटेल की साम्प्रदायिक सोच बेनक़ाब होती है. ''पटेल ने गांधी जी को बताया कि दिल्ली में मुसलमानों के घर से खतरनाक हथियार मिले हैं जो कि हिन्दू और सिखों की हत्या करने के लिये जमा किये गये हैं. हथियार को जब्त कर लिया गया है और उसे गवर्नमेंट हाउस में रखा गया है. सुबह जब हम मीटिंग मे गये और जब्त हथियार को देखने के लिये गये तो टेबल पर दर्जनों सब्जी काटने वाली चाक़ू, जेबी चाकू, हथौड़ी छेनी आदि और कुछ कील जब्त किये गये थे. लॉर्ड माउंट बेटेन ने दो चाकू उठा कर मुस्कराते हुए कहा के पटेल इससे मुसलमान हमला करेंगे. आपकी सोच पर हमे हंसी आती है. ऐसी बहुत से घटनायें हैं जो हमें बताती हैं के पटेल सेक्युलर नहीं थे और उनकी सोच सम्प्रदायिक थी.
 

लेखक अफ़ज़ल ख़ान का जन्म समस्तीपुर, बिहार में हुआ. वर्ष 2000 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई कंप्लीट की. इन दिनों दुबई की एक कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत हैं. 2005 से एक उर्दू साहित्यिक पत्रिका 'कसौटी जदीद' का संपादन कर रहे हैं. संपर्क: 00971-55-9909671 और  kasautitv@gmail.com के जरिए.


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भड़ास पर अफ़ज़ल

 

पत्रकार राजेन्द्र राजपूत आत्महत्या मामला : पत्नी ने कहा, दिल्ली से लड़ूंगी लड़ाई

भोपाल में मंत्रालय की चौथी मंजिल पर सचिव के दफ्तर के सामने जहर खाकर आत्महत्या करने वाले राजेन्द्र राजपूत के परिवार का मध्य प्रदेश सरकार से भरोसा भरोसा उठ गया है. राजपूत की पत्नी रचना ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है. उन्होंने कहा कि पति को न्याय दिलाने के लिए वह दिल्ली जाकर बड़े नेताओं से मिलकर न्याय की गुहार करेंगी.
 
ये बातें रविवार को पत्रकार वार्ता में रचना राजपूत ने कहीं. उन्होंने कहा कि उनके पति को आत्महत्या किए दो महीने बीत गए लेकिन पुलिस ने उन्हें खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया है. मामले में आरोपी 12 लोगों ने अग्रिम जमानत तक ले ली और पुलिस कहती रही कि विवेचना चल रही है. उन्होंने कहा कि चूंकि आरोपियों में बड़े लोग हैं इसलिए पुलिस जानबूझकर सही जांच नहीं कर रही है. आरोपियों के खिलाफ दिए गए किसी भी सबूत का पुलिस ने अब तक इस्तेमाल नहीं किया.
 
गौरतलब है कि पत्रकार राजेन्द्र राजपूत ने पिछली 15 अक्टूबर को एक न्यूज चैनल को सूचित करके मंत्रालय की चौथी मंजिल पर सल्फॉस खाकर खुदकुशी कर ली थी. इसके लिए उन्होंने अपने फेसबुक पर भी पहले ही चेतावनी दे दी थी. पुलिस ने इस मामले में 33 लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर लिया था. इस मामले की जांच के लिए आईजी ने एसआईटी बनाई थी जो अभी तक जांच कर रही है.

भारतीय मीडिया से मुकाबला करने अब पाक सेना लाएगी अपना चैनल!

पाकिस्तानी सेना के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने सुझाव दिया है देश में भारतीय मीडिया के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए पाक सेना को अपना टीवी चैनल शुरू करना चाहिए. सूत्रों के अनुसार अधिकारी ने पाक सेना की प्रतिष्ठित ग्रीन बुक के लिए लिखे जाने वाले रणनीतिक पत्रों में ये सिफारिश की है.
 
मेजर जनरल मोहम्मद आजम आसिफ ने कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय टीवी और समाचार पत्रों के प्रचार को नहीं रोक पाने के लिए पाकिस्तानी मीडिया की आलोचना की है. उन्होंने कहा है कि पाकिस्तानी सेना का एक टीवी चैनल और रेडियो स्टेशन होना चाहिए जो भारतीय प्रचार का मुकाबला कर सके.
 
आसिफ ने कहा है कि पाकिस्तानी मीडिया में विश्वसनीयता की कमी है इसलिए संकट के समय या महत्वपूर्ण घटना होने पर लोगों को आल इंडिया रेडियो, बीबीसी और भारतीय टीवी चैनलों को देखने के लिए मजबूर होना पड़ता है. उन्होंने कहा है कि हमारे शत्रु (भारत) ने काफी मेहनत से मीडिया की शक्ति हासिल की है और वह इसे अपने लाभ के लिए अच्छे तरीके से इस्तेमाल कर रहा है.
 
इसमें ये भी चिन्ता जताई गई है कि भारतीय मीडिया के प्रचार ने सेना में ऐसी भावना भर दी है कि भारत एक ऐसा शत्रु है जिसे हराया ही नहीं जा सकता. ग्रीन बुक में ये भी कहा गया है कि भारतीय मीडिया के प्रचार तंत्र की वजह से ही पाकिस्तानी सेना को हार का सामना करना पड़ा क्यूंकि भारतीय मीडिया ने भारतीय सुरक्षा बलों के बारे में बढ़-चढ़कर प्रचार किया जिससे पाकिस्तानी सेना को सारा जोश ही ठंडा पड़ गया.
 
पाकिस्तानी सेना अपने आंतरिक प्रकाशन के तहत हर दो वर्ष में ग्रीन बुक प्रकाशित करती है. पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी का कहना है कि ग्रीन बुक सेना के नजरिए का प्रतिनिधित्व नहीं करती. रिपोर्ट से पता चला है कि कई मौजूदा वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पत्रों में भारतीय टीवी और प्रिंट प्रकाशनों के पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर मौजूदगी पर चिंता जताई है.

समरथ को नहीं दोष गोसाईं …जी नहीं रामायण बदल गयी है

Deepak Sharma : आजतक में मुझे तकरीबन १२ साल काम करते हो गये हैं. इन १२ सालों में मैंने आजतक में काम करने वाली किसी महिला सहयोगी के साथ कभी चाय तक नही पी है.ये इत्तेफाक नही अपनी मजबूरी का एक उसूल रहा है. इस उसूल का मतलब ये नही कि मै दफ्तर में महिलाओं से बात ही नही करता …बिलकुल करता हूँ पर पूरे सम्मान के साथ …शायद इसीलिए इन १२ सालों में किसी महिला सहियोगी के साथ झगडा तो दूर तल्ख़ लव्जों में भी बात नही हुई. 
 
मैं कोई धीरेन्द्र ब्रह्मचारी नही हूँ. लेकिन टीवी इंडस्ट्री और दिल्ली के हाल देखकर मैंने दफ्तर में एक अनुशासन बनाने की कोशिश की. पर इस अनुशासन का एक कारण मुझे और भी लगता है. आजतक में मै कभी अपने एडिटोरियल बॉस के बेहद नजदीक नही रहा और हमेशा एक फिसलते हुए विकेट पर मैंने बैटिंग की. शायद इसी दबाव के चलते मेने दफ्तर में अपने काम से ज्यादा और न कुछ सोचा न देखा. शायद इसी वजह से मे दफ्तर में किसी महिला सहयोगी से न ज्यादा बात कर सका न lets have a cup of tea कह पाया. 
 
मित्रों दफ्तर में जब आप सत्ता के करीब होते हैं या बेहद मज़बूत स्थिति में होते हैं तभी आपका मिजाज़ बदलता है और रंगत भी. कुछ लोग रगों में बहने वाले लहू से अय्याश होते है और कुछ लोग सत्ता के नशे में हो जाते हैं. तभी महिला सहयोगी आपको आकर्षित करती हैं. तभी आप फ़्लर्ट शुरू करते है. तभी आप लूज़ कमेन्ट करने का दुसाहस कर पाते है. और अगर आप दफ्तर के मालिक हैं तो कहना ही क्या. शायद तब ईमान के साथ आपकी नज़रें भी धोखा खा जाती है. तभी किसी तेजपाल की तरह आप ये भी भूल जाते है की कौन आपकी बेटी के बराबर है और कौन बेटी की उम्र से भी छोटी है.
 
मित्रों असाइनमेंट के दबाव में पिसे श्रमजीवी की आँखें कभी दफ्तर में नीली नही होती. काम करने वाले श्रमजीवी कभी कामशास्त्र में उलझे नही मिलेंगे. अय्याशी शुरू ही ऐशो आराम से होती है. बड़े संस्थानों में लड़कियां वही छेड़ते हैं जो प्रबंधन के ब्लू आइड बॉय होते हैं. पर मैं सलाम करता हूँ उन बहनों को जो अब इस ब्लू आइड अय्याशी को बेनकाब कर रही हैं. मेरा सलाम मुंबई की तहेलका की पूर्व रिपोर्टर को…मेरा सलाम कोलकाता की ला इंटर्न को…आप भी इन्हें सलाम करिए …ये देश की नई निर्भया है. इन्होने तुलसीदास की कथनी को बदल दिया है. ……समरथ को ही दोष गोसाईं .
 
आजतक में कार्यरत पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वाल से

महिला ने एक साथ 10 बच्चों को जन्म दिया

भोपाल : आपने यह तो सुना होगा कि किसी ने 3 या 4 बच्चों को एक साथ जन्म दिया लेकिन कभी सुना है कि किसी महिला ने एक साथ 10 बच्चों को जन्म दिया। मेडिकल की दुनिया को हैरान करने वाली एक ऐसी ही खबर सामने आई है। मध्यप्रदेश के सतना जिले की 28 वर्षीय महिला ने रविवार देर रात को एक साथ 10 बच्चों को जन्म दिया लेकिन उनमें से कोई भी जीवित नहीं बचा।
 
मध्यप्रदेश के सतना जिले की अंजू कुशवाहा ने रविवार देर रात को संजय गांधी मैमोरियल (एसजीएम) अस्पताल में बच्चों को जन्म दिया अस्पताल के डॉक्टर एस.के.पाठक ने बताया कि महिला ने 9 बच्चों को अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही जन्म दे दिया था जबकि दसवें बच्चे की प्रसूति अस्पताल के स्टाफ और एनआईसीयू की टीम की सहायता से हुई लेकिन सभी बच्चे 12 सप्ताह के मृत थे। 
 
डॉक्टर पाठक ने बताया कि महिला अपने पति के साथ रात 11 बजे उनके अस्पताल पहुंची थी और उसका पति 9 मृत बच्चे जो कपड़े में लिपटे हुए थे को पकड़े हुए रो रहा था और 10वां बच्चा रात करीब 12.31 पर हुआ। इस खबर के बारे में जब लोगों को पता चला तो वार्ड के बाहर मां और बच्चों को देखने के लिए कतार लग गई। यह खबर अपने में चाहे हैरान करने वाली और कुदरत का एक अजूबा ही है लेकिन एक मां के ऊपर क्या बीत रही होगी यह तो वहीं समझ सकती है। वहीं डॉक्टर मेडिकल में हुए इस अजूबे को देख दंग हैं और यह बहुत बड़ी बात मानी जा रही है कि 12 हफ्ते के मृत बच्चों को पेट में रख महिला ठीक है। फिलहाल महिला डॉक्टरों की निगरानी में है।
 
भोपाल से आमिर खान की रिपोर्ट

बदलाव की बयार से भागने का मतलब

ढूंढ़ों….ढूंढ़ों….अरविंद केजरीवाल की जाति….पता कर ली है? कल ही एक मित्र आए थे, बोले, "अरविंद केजरीवाल सवर्ण है, पक्का व्यापारी……बनिया है. कुछ देर पहले ही एक मित्र का एसएमएस आया है," दूसरों की तरह यह भी व्यक्ति से पहले जाति ही ढूंढते हैं, लेकिन खुद उसी के शिकार हैं.
 
भाजपा को आप चाहते ही नहीं हो, क्योंकि वह साम्प्रदायिक पार्टी है. कांग्रेस भ्रष्ट है तथा वंशवाद की शिकार है, यह आप ही कहते हैं. पूरा देश भ्रष्टाचार के चंगुल में फंसा है, यह तो आप कहते ही रहते हो. लेकिन जब कोई व्यक्ति, पार्टी, 'इस बार आप राज करो', नीति के तहत जनता की शोषक कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ कोई चुनौती देते हुए आता है तो आप उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं.
 
विश्लेषक कहते हैं कि दिल्ली में 'आप' पार्टी को जितनी सीटें मिली हैं, यह पहला मौका है, जब चुनाव में इतनी कामयाब पार्टी के उम्मीदवारों की जाति और धर्म का प्रोफाइल चुनावी पंडितों के पास भी उपलब्ध नहीं. इसके उम्मीदवारों ने ना सिर्फ जाति, धर्म और क्षेत्रीयता का नाम लिए बिना चुनाव लड़ा बल्कि चुनाव लड़ने के लिए पैसे भी लोगों से ही लिए.
 
मीडिया मानने लगा हैं कि दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की शानदार सफलता ने राजनीति में नए युग का सूत्रपात कर दिया है. अरविंद केजरीवाल की धमाकेदार एंट्री ने वर्षों से जोड़-तोड़ की राजनीति करने वाली पार्टियों को न केवल आइना दिखा दिया बल्कि जनता के मन में यह विश्‍वास भी जगाया कि राजनीति में साफ-सुथरे लोग आ सकते हैं. एक साधारण सा व्‍यक्ति बगैर धनबल और बाहुबल के चुनाव जीत सकता है.
 
कुछ दलित विश्लेषक कह रहे हैं कि 'आप' पार्टी की जीत के पीछे मीडिया का हाथ है. जबकि सच्चाई क्या है, सब जानते हैं. मीडिया का बस चलता तो 'आप' पार्टी को एक सीट भी नहीं लेने देती. आखिरी समय तक इस कोशिश में लगी रही कि भारतीय जनता पार्टी ही सत्ता में आए. उसने पूरी कोशिश की 'आप' पार्टी को बदनाम करने की. वह तो जनता पूरी तरह समझ रही थी कि मीडिया पैसा खाकर डकार ले रही है. पैसा खाकर मीडिया डकार ना ले तो भाजपा के लोग क्या उसका क्या न करते, पैसा खाया है तो डकार लेनी ही थी. उसने खूब ली. लेकिन उसकी डकार ने कोई काम नहीं किया. 'आप' पार्टी ढेर सारी रूकावटों को पार करते हुए 28 सीटें जीती और दूसरे लोगों को संदेश दिया कि बगैर धनबल तथ बाहुबल के चुनाव जीता जा सकता है.
 
अरविंद केजरीवाल की जाति का पता करने वालों को खुशी इस बात की नहीं है कि आप' पार्टी ने इस मिथ को तोड़ा है कि दारू की बोतल और बांटकर वोट खरीदे जा सकते हैं. बिना पैसा, दारू बांटे 'आप' पार्टी के काफी विधायक जीते हैं. जबकि भाजपा, कांग्रेस के उम्मीदवार पैसा, दारू बांटने के बाद भी हारे.
अब मैं बात करता हूं उनकी, जो सवर्णों का विरोध करते हैं. कहते हैं कि कथित ऊंची जाति के लोग दलितों को व्यापार में भी उभरने नहीं देते.
 
इसी साल विश्व पुस्तक मेले की बात है. सवर्णों का घोर विरोध करने वाले दलितों लेखकों में से एक बड़े लेखक (ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं) एक दलित लेखिका को मिले. लेखिका ने खुश होते हुए बताया, "मेरा एक कहानी संग्रह आया है."
"किससे?" यह सवाल बड़े लेखक का था.. जवाब लेखिका को देना ही था,"सम्यक प्रकाशन" से.
"यह क्या किया? अरे किसी बड़े प्रकाशक से छपवातीं. राजकमल है, वाणी प्रकाशन है, शिल्पायन है….आदि."
आप तो जानते ही होंगे, यह बड़े प्रकाशन कौन चला रहा है.
 
एक समय था, जब दलित साहित्य को कोई कथित बड़ी जाति का प्रकाशक, अखबार, पत्रिका छापने को तैयार नहीं था. दलित पत्रिकाओं में छपे. दलित प्रकाशक आए. लेकिन बाद मे उन्हीं से मुंह मोड़ लिया. जबकि दलित साहित्य को छापना कथित बड़ी जाति के लोगों की व्यवसायिक मजबूरी है, जबकि दलित प्रकाशकों का मिशन. दलित प्रकाशक ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली चीजें नहीं छापेगा. जबकि दूसरे सबकुछ छापते हैं, अश्लीली साहित्य भी.
 
दलित जातियों के लेखकों में भी अपनी ही जाति के लेखकों के बढ़ने पर खुशी होती है, दूसरी जाति के लेखक के अच्छा लिखने पर भौहें तन जाती हैं.
जब कोई छोटा सा सवर्ण लेखक इनती तारीफ कर दे तो इनकी छाती फूल जाती है. मन में हमेशा चाह रहती है कि कोई सवर्ण लेखक तारीफ करे, कोई कर भी दे तो ढोल नंगाड़ों के साथ शोर मचाएंगे, देखों फला बड़े सवर्ण लेखक, आलोचक ने उसकी तारीफ की. क्यों चाहना है भईया उसके स्वीकार करने या न करने को.
 
पूरे जीवन भर ब्राह्मणों का विरोध करने वाले दलित लेखकों को वैतरणी यही ब्राह्मण पार करवाते हैं. इनकी हिम्मत कभी इतनी नहीं होती कि यह अपने परिवार के लोगों को अंतिम इच्छा बताकर इस दुनिया से जाएं कि मेरा अंतिम संस्कार किसी ब्राह्मण से मत कराना. शमशान घाट में मजबूरी हो तो कम से कम हरिद्वार में जाकर ब्राह्मणों से मेरी आत्मा की शांति के लिए कुछ मत कराना. मजे की बात यह कि जिन ब्राह्मणों को जीवनभर कोसा, वही ब्राह्मण इनकी आत्मा की शांति के लिए मंत्र पढ़ते हैं और यज्ञ करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि 'आत्मा नहीं होती' कहते-कहते मन के किसी कोने में यह भी डर सताता रहता हो कि मरने के बाद ब्राह्मणों ने आत्मा की शांति के लिए कुछ नहीं किया तो कहीं उनकी आत्मा भटकती न रहे.
 
16 दिसंबर 2012 की रात को एक लड़की के बुरी तरह प्रताड़ना देते हुए बलात्कार होता है तो दलित समाज के नुमाइंदे, रहनुमा कहे जाने वाले यह विचारक उसमें शामिल इसलिए नहीं होते कि वह लड़की दलित नहीं थी. अरे भईया मान लिया लड़की दलित नहीं थी, दलित होती तो शायद इतना हंगामा नहीं होता, लेकिन वह महिला तो थी. आप यह कहते हुए आंदोलन का समर्थन तो करते कि देखो, जब हमारी बहन बेटियों के साथ बलात्कार, अत्याचार होता है आप विरोध तो नहीं करते, लेकिन हम तुम्हारी बहन बेटियों के साथ होने वाले बलात्कारों, अत्याचारों का विरोध करते हैं. बताइए, जब महिलाओं खिलाफ होने वाले जुर्मों के खिलाफ नियम-कानून बनाए तो आपकी क्या भागीदारी रही? जब 16 दिसंबर की घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतर रहे थे तो आप घर में बैठे लड़की की जाति वह किस वर्ग से आती है, यह ढूंढ रहे थे. जबकि आप खुद, अपने दलित समाज की स्त्री के साथ बलात्कार होता है तब विरोध नहीं कर पाते. आपको चाहिए कि आप दलित समाज की स्त्री पर होने वाले अत्याचारों का खुलकर विरोध करें. आप लोगों की संख्या भी तो कम नहीं है, लेकिन आप खुद ही एकजुट नहीं हो पाते. आप एक मीटिंग के लिए भी 1000 लोगों को सूचना भेजते हैं, तो मुश्किल से 50 लोग जुट पाते. आपके लिए वही सबसे सफल विरोध मिटिंग बनकर रह जाती है.
 
अन्ना हजारे दिल्ली में भूख हड़ताल कर रहे थे. देश के कोने-कोने से लोग आकर आंदोलन में शामिल होकर सरकार को झुकाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन आप कह रहे थे, भई इसमें दलितों की भागीदारी कहां है? आम आदमी कहां है? जबकि उस आंदोलन में दलित भी शामिल था, आम आदमी भी. जब अन्ना का अनशन दलित, मुस्लिम के बच्चों से तुड़वाया तो आपने व्यंग्य कसा, "अब खुश, दलितों के बच्चों से अनशन तुड़वाया. उसमें मुस्लिम भी थे. अब न कहना, आंदोलन में दलितों, मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया."
 
अब कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि 'आप' सरकार बनाने से क्यों डर रही है? यह नहीं सोचा भाजपा सरकार बनाने से क्यों डरी? इस पर भी विचार करने की जरूरत नहीं कि भई जब 'आप' ने समर्थन मांगा ही नहीं तो कांग्रेस खुद ही क्यों एलजी के आमंत्रण से पहले ही 'आप' को समर्थन करने का पत्र एलजी को थमा दिया. जबकि पार्टी समर्थन देने वाली पार्टी से बात करने उनके नाम के साथ राष्टपति या राज्यपाल के पास जाती है तथा बताती है कि फलां लोग, पार्टी हमें समर्थन देने के लिए तैयार है, इसलिए हम सरकार बना सकते हैं. कांग्रेस कहती है कि हमें जनता को चुनावी खर्च से बचाना है. यदि यही राय है तो भाजपा को जाकर समर्थन दो न, क्यों खुद ही 'आप' के पीछे लगे हो. दूसरी बात जब 'आप' पार्टी के 18 मांगे जनहितैषी हैं तथा आप उससे मौखिक सहमत हैं तो तथा आप पार्टी खुद भी उन्हें लागू कर सकती है आप लिखकर कह दो कि आपके जनहितैषी बिंदुओं पर सहमत हैं. आप बनाइए सरकार.
 
जिस पार्टी ने जिस पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ा, उसी से आसानी से समर्थन ले ले, यह धोखा नहीं होगा, जिस पर सोच नहीं रहे हैं. बस 'आप' सरकार बनाने से डर रही है, भाजपा, कांग्रेस, मीडिया की भाषा बोल रहे हैं.
 
असल में कुछ लोग कांग्रेस व भाजपा के षड़यंत्र को नहीं समझ रहे हैं. यह दोनों पार्टियां अपनी लोकसभा की सीटें बचाना चाहती हैं. यदि आप पार्टी राष्ट्रपति शासन की तरफ ढकेल रही हैं तो क्या भाजपा ऐसा नहीं कर रही है. वह क्यों नहीं कांग्रेस का समर्थन लेकर दोबारा चुनाव के खर्चे से जनता को बचाती. दूसरी बात आप केवल आप से ही "सारी अपेक्षाएं रख रही हैं". आपकी बात से तो लगता है आपकी सारी अपेक्षा कांग्रेस या भाजपा पूरी कर देती.
 
कांग्रेस या भाजपा के आने से अच्छा है दोबारा चुनाव हों उसमें कोई तीसरी पार्टी आए. कम से कम हजारों, लाखों करोड़ के घोटालों से तो हम बचें. हम निष्पक्ष भाव से नहीं सोच रहे हैं, हमें दिक्कत यह हो रही है कि हमें दशक से ज्यादा बीत गये, कुछ तो चालीस पचास साल भी गंवा चुके, लेकिन वह चुनाव में कुछ हासिल नहीं कर पाए, आज की पार्टी 28 सीट ले गई. इसलिए अब हमारी माथा पच्ची इसी बात की रह गई है कि हम कहां से इस पार्टी की कमियों को निकालें. हम इस पार्टी से सीखने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, कमियां निकाल रहे हैं. इस समय भाजपा व कांग्रेस मिलकर यह राजनीति कर रही है कि इस पार्टी को यहीं खत्म कर दिया जाए. नहीं तो हम दोनों पार्टियों को यह लोकसभा चुनाव में भी नुकसान पहुंचाएगी और हम आप की कमजोरियों को ढूंढ़ने के चक्कर में भाजपा तथा कांग्रेस को मजबूती प्रदान करने का काम कर रहे हैं.
 
यह पब्लिक है, सब जानती है
कांग्रेस व भाजपा के विधायकों को चिंता इस बात की नहीं है कि जनता पर दोबारा से चुनाव के खर्च का बोझ पड़ेगा, चिंता तो इस बात की है कि इन पार्टियों के विधायकों ने लाखों की रूपये खर्च कर टिकट खरीदा. फिर सीट जीतने के लिए लाखों रूपये खर्च किए. वोट के लिए दारू तथा रूपया भी लोगों को दिया. अब दोबारा से यही खर्च करना पड़ेगा. दोबारा से जीत भी जाएंगे, यह भी पक्का नहीं है. आम लोग तो यह कहते हैं कि अबकी बार 'आप' पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी. इसलिए भाजपा व कांग्रेस मीडिया के साथ मिलकर 'आप' पार्टी को जिम्मेदारी से भागने वाली साबित करने पर तुले हैं लेकिन आम जनता सब जानती है. 
 
मीडिया की चलती तो 'आप' पार्टी को उसी के कहे अनुसार 6 से ज्यादा सीट नहीं मिलती. मीडिया तो आखिर तक इसी प्रयास में रहा कि आए तो केवल भाजपा ही दिल्ली की सत्ता में आए. अब उनकी घबराहट इस बात को लेकर हो गई है कि वह केंद्र सरकार में भाजपा को देखना चाहती है, लेकिन 'आप' पार्टी तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के सपनों पर धूल झोंकने पर लगी. कांग्रेस तो उससे घबरा ही गई है. उसे पता है, इस बार भाजपा आनी थी, लेकिन उसकी बुरी हालत यह सोचकर हो रही है कि क्या कांग्रेस इज्जत बचाने लायक लोकसभा में सीट हासिल कर पाएगी. लेकिन जनता है, सब जानती है. इसलिए वह 'आप' को समर्थन देने पर तुली हुई है, वो भी उसकी बिना रजामंदी के. ताकि लोकसभा चुनाव में 'आप' पार्टी उसे कोई नुकसान न पहुंचा सके, तथा यह पार्टी सरकार के खिलाफ ज्यादा न बोल सके. वास्तविकता को समझें, केवल आंखों पर पट्टी बांधकर किसी की आलोचना करने से बचें.
 
लेखक कैलाश चंद चौहान साहित्यकार हैं तथा त्रैमासिक पत्रिका कदम का संपादन करते हैं. इनसे संपर्क kailashchandchauhan@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

75 हजार के स्टेंट के फोर्टिस एस्कॉट्स ने वसूले ने 1 लाख 27 हजार

हृदय रोगियों के इलाज के नाम पर स्टेंट (धमनियों में इंप्लांट किया जाने वाला स्टेनलेस स्टील का खास ट्यूब) का काला कारोबार देश में धड़ल्ले से चल रहा है। जरूरी न होने के बावजूद हृदय रोगियों की धमनियों में बेहद मंहगे स्टेंट स्थापित कर करोड़ो की काली कमाई की जा रही है। इस पर कोई सरकारी अंकुश न होने की वजह से एक ओर जहां मरीज और उनके परिजन जबरदस्त लूट के शिकार हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर नामी-गिरामी चिकित्सक और उनकी सेवाएं लेने वाले बड़े-बड़े कॉरपोरेट अस्पताल मालामाल हो रहे हैं। यही वजह है कि देश में स्टेंट का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। इस बात का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत में एक साल में कम से कम 600 करोड़ रुपये के स्टेंट्स की खपत हो रही है और इसका कारोबार 25 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के साथ बढ़ता जा रहा है। कम समय में बहुत पैसा कमा लेने का जरिया बन गया है स्टेंट। इसके चक्कर में दर्जनों प्रख्यात चिकित्सक या तो जेल की हवा खा चुके हैं या फिर बड़े-बड़े अस्पताल की नौकरियां गवां चुके हैं।
 
चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त इस भ्रष्टाचार की एक बानगी क्लाउन टाइम्स की निगाह में भी आयी। इस भ्रष्टाचार को परत दर परत उजागर करने का माध्यम बना बनारस का एक मरीज। कहानी की शुरुआत हुई बनारस से और अंत देश की राजधानी दिल्ली में। दिल के इस मरीज को एन्जाइना (सीने में दर्द) होने पर हाल ही में बनारस के शुभम अस्पताल की सीसीयू में भर्ती कराया गया था। यहां के एक डॉक्टर ने यह कहते हुए मरीज की एंजियोग्राफी कराने की सलाह दी कि उन्हें सीवियर हार्ट अटैक हो सकता है। इसके साथ ही परिचारकों को यह बताया गया कि इस जांच से यह पता चलेगा कि मरीज की धमनियों में कितना अवरोध (ब्लॉकेज) है। किसी अनहोनी की आशंका से मरीज के परिचारकों ने बीमारी की गंभीरता को समझने का प्रयास किया लेकिन उनको यह शक भी होने लगा कि एंजियोग्राफी के बाद ब्लॉकेज बताकर एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया शुरू करने का दबाव बनाया जायेगा। इस शक का एक कारण यह था कि हॉस्पिटल में शुरुआती जांच ‘कलर डॉप्लर’ नहीं की गई। लिहाजा मरीज और उसके परिचारक एंजियोग्राफी के लिए तैयार नहीं हुए। शुभम हॉस्पिटल के निदेशक डॉक्टर प्रशांत ने भी एंजियोग्राफी के लिए लगातार दबाव बनाया। शुभम हॉस्पिटल का प्रबंधन सीधे एंजियोग्राफी कराकर आगे की चिकित्सा सेवा प्रदान करने को आतुर था। भले ही यहां के चिकित्सकों के मन में रोगी की सेंवा करने का भाव रहा हो लेकिन स्टेंट के करोड़ो के कारोबार के बारे में आ रहीं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय खबरों ने मरीज और उसके परिजनों को सशंकित किये रखा। ऐसे में शुभम हॉस्पिटल के प्रबंधन को अंतत: मरीज को डिस्चार्ज करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद मरीज ने हेरिटेज हॉस्पिटल के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अजय पाण्डेय से अपनी जांच कराई। यहां एन्जाइना पेन की पुष्टि हुई। डॉ. पाण्डेय के सामने मरीज तथा उसके परिजनों ने बेहतर चिकित्सा के लिए दिल्ली के 'फोर्टिस एस्कॉट्स हॉस्पिटल' जाने की बात कही। इस पर डॉ. पाण्डेय ने मरीज को तात्कालिक तौर पर सीसीयू में भर्ती कराने की सलाह दी और परिचारकों से यह भी कहा कि चूंकि हेरिटेज में जगह नहीं है लिहाजा आप लोग मरीज को शहर के किसी और अस्पताल में ले जायं। मरीज का किसी डॉक्टर की देखरेख में 24 से 48 घंटे रहना जरूरी है। इसके बाद मरीज को उसके परिचारक डॉ. विनीत अग्रवाल के अस्पताल राजापुरिया हॉस्पिटल ले गये और वहां उसे सीसीयू में भर्ती कराया। 
 
यहां मरीज की स्थिति सामान्य होने पर परिचारकों ने देश के बड़े अस्पतालों में शुमार ‘फोर्टिस एस्कॉट्र्स हॉस्पिटल’ के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. उपेंद्र कौल से टेलीफोन पर संपर्क साधा और अपॉइंटमेंट लिया। तिथि का निर्धारण डॉ. कौल की सेक्रेटरी सुनीता ने किया। इसके बाद मरीज को 'फोर्टिस एस्कॉट्स' ले जाया गया। और फिर शुरू हुआ इस अस्पताल में अच्छे इलाज के नाम पर चिकित्सा सेवा का सिलसिला। डॉ. कौल के सहयोगी डॉ. अरविंद सेठी ने केस हिस्ट्री तैयार की। फिर डॉ. कौल ने अगले दिन एंजियोग्राफी कराने की सलाह दी। फोर्टिस एस्कॉट्स का जैसा नाम और काम दिख रहा था उससे मरीज और उसके परिजनों में भरोसा जागा। क्लाउन टाइम्स की तफ्तीश टीम भी इस दौरान तारांकित होटल जैसे दिखने वाले इस अस्पताल में थी। शुरू में सब कुछ ठीक-ठाक दिख रहा था। अगले दिन निर्धारित समय पर मरीज ने अपने परिचारकों के साथ डॉ. सेठी के पास जाकर अपनी एंजियोग्राफी कराई। इसके बाद बताया गया कि तीन धमनियों में 95 प्रतिशत ब्लॉकेज है और एक में 65 प्रतिशत ब्लॉकेज। आगे की चिकित्सा के लिए डॉ. कौल की सेक्रेटरी सुनीता ने तीन स्टेंट लगाने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर डॉक्टर के कहने पर. चौथा स्टेंट भी लग सकता है। डॉ. कौल के न रहने के बावजूद इस हॉस्पिटल के नाम, इसकी दो दशक से ज्यादा की उपलब्धियों और यहां नामी-गिरामी चिकित्सकों की भारी फौज को ध्यान में रखते हुए मरीज के परिचारकों का सेक्रेटरी की बातों पर भरोसा करना लाजमी था। परिचारकों ने 7 लाख 44 हजार 513 रुपये जमा कर मरीज की धमनियों में चार स्टेंट और चार बैलून इंप्लांट करा दिये। सेक्रेटरी ने बार-बार पूछने के बाद बड़ी मुश्किल से बताया कि अमेरिकी कंपनी 'एबॉट लैब' स्टेंट्स की सप्लाई करती है। लेकिन हॉस्पिटल प्रबंधन ने स्टेंट्स की खरीद के बिल दिखाने में असमर्थता जताई। इससे कहीं न कहीं संशय की स्थिति उत्पन्न हुई और फिर शुरू हुआ क्लाउन टाइम्स की टीम द्वारा तफ्तीश का सिलसिला। एक ओर जहां दिल्ली में 'एबॉट लैब' के सप्लायर मनीष से तफ्तीश हुई तो वहीं दूसरी ओर वाराणसी में क्लाउन टाइम्स की टीम ने वहां 'एबॉट लैब' के प्रतिनिधि प्रदीप सिंह से बेतार फोन से संपर्क कर सवाल किये स्टेंट के वास्तविक मूल्य के बारे में। इसी बीच यह पता चला कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. ओम शंकर पहले फोर्टिस एस्कॉटर्स में नौकरी करते थे लेकिन बाद में उन्होंने यहां का काम छोड़ दिया और बनारस आकर स्टेंट इंप्लांटेशन का काम करने लगे। वाराणसी में एबॉट के प्रतिनिधि प्रदीप सिंह ने भले ही खुलकर कुछ नहीं बताया लेकिन तफ्तीश में यह पता चला कि एबॉट लैब के जिस स्टेंट की कीमत फोर्टिस एस्कॉट्स में एक लाख 27 हजार रुपये वसूली गई वही स्टेंट 75 हजार रुपये या उससे भी कम कीमत पर मिल जाता है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में एबॉट लैब के प्रतिनिधि मनीष ने क्लाउन टाइम्स की तफ्तीश में यहां तक कहा कि जो दाम आपको पता है उसके बारे में नो कमेंट लेकिन इस बात पर ज्यादा केंद्रित रहे कि इलाज कहां हो रहा है। उनका कहना था कि कॉरपोरेट हॉस्पिटल्स में एबॉट लैब का एक स्टेंट एक लाख 27 हजार नहीं बल्कि डेढ़ से दो लाख रुपये में मिलता है। कहा कि ये सारी बातें मैंने मानवीय आधार पर कहीं, छापने के लिए नहीं। आगे की बात एबॉट के रीजनल हेड नितिन बाधवा से कर सकते हैं। हमारी कंपनी का स्टेंट सस्ते में लगवाना हो तो कॉरपोरेट हॉस्पिटल छोड़कर किसी और हॉस्पिटल में चले जाइये। स्टेंट के कारोबारियों और चिकित्सकों के इस गठजोड़ में कौन किस पर भारी है यह तो कहना मु्श्किल है पर देश स्तर पर चल रहा स्टेंट्स का करोड़ों का कारोबार खुली किताब के समान है। स्टेंट के वास्तविक मूल्य की जानकारी होने पर फोर्टिस एस्कॉट्स के डॉ. उपेंद्र कौल, उनकी सेक्रटरी सुनीता, सीनियर मैनेजर रेनू त्यागी, वाइस प्रेसिडेंट डॉ. राजीव सिंघल और एडमिनिस्ट्रेशन हेड संगीता दुआ को इ मेल कर कड़ा ऐतराज जताया गया। इसके बाद तो फोर्टिस एस्कॉट्र्स के प्रबंधन से लेकर डॉ. कौल सहित तमाम चिकित्सकों में खलबली मच गई और किसी तरह मामले को रफा-दफा करने का प्रयास शुरू कर दिया गया। इससे इस बात का स्पष्ट आभास होने लगा कि स्टेंट बनाने वाली कंपनियों, चिकित्सकों और बड़े अस्पतालों के बीच जबरदस्त खेल चल रहा है। इस खेल के जरिये बेहिसाब कमाई की जा रही है।
 
वेबसाइट हेल्थबीटब्लॉग डॉट कॉम पर सनसनीखेज जानकारी : अमेरिका की नामी कंपनी एबॉट लैबोरेटरी, जिसके स्टेंट लगाने की बात फोर्टिस एस्कॉट्स हॉस्पिटल के डॉ. कौल और उनकी सेक्रेटरी सुनीता कर रहे हैं, के बारे में वेबसाइट www.healthbeatblog.com पर विस्तार से चौंकाने वाली जानकारी मिली। इस बेबसाइट पर नौ पेज की जो रिपार्ट प्रकाशित हुई है उसके अनुसार अमेरिका के मैरीलैंड स्थित सेंट जोसेफ मेडिकल सेंटर में कार्यरत ‘डॉ. मार्क मीडी’ ने कम समय में बहुत ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में दो साल के अंदर 585 ऐसे मरीजों की धमनियों में एबॉट लैब के स्टेंट्स इंप्लांट कर दिये जिनको इसकी जरूरत ही नहीं थी। इस काम के लिए मेडिकल सेंटर द्वारा उक्त मरीजों से 6.6 मिलियन डॉलर वसूले गये। इस धनराशि में से 3.8 मिलियन डॉलर का भुगतान डॉ. मीडी को किया गया। इसके अलावा एबॉट लैब की ओर से डॉ. मीडी को अलग से लाभान्वित किया गया। जिन हृदय रोगियों की धमनियों में स्टेंट लगाया गया उनको यह बताया गया था कि उनकी धमनियों में 90 प्रतिशत तक ब्लॉकेज है जो झूठ था। सच्चाई यह थी कि ब्लॉकेज 10 प्रतिशत के आसपास था। अमेरिका में क्लिनिकल गाइडलाइंस कहती हैं कि किसी मरीज की धमनियों कम से कम 70 प्रतिशत ब्लॉकेज पाये जाने पर ही स्टेंट इंप्लान्टेशन होना चाहिये। लेकिन इन गाइडलाइंस की परवाह किये बगैर स्टेंट इंप्लांटेशन धड़ाधड़ किये जा रहे हैं। अमेरिका में यह धंधा पिछले करीब डेढ़ दशक से चल रहा है। हालांकि बेबसाइट में सेंटर फॉर मेडिकल कंज्यूमर्स की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि स्टेंट इंप्लांटेशन मरीजों की पसंद भी है क्योंकि यह क्विक फिक्स की तरह काम करता है और मरीज को एन्जाइना पेन से तुरंत राहत मिलती है।
 
कमीशन के चक्कर में प्रख्यात चिकित्सक जा चुके हैं जेल : टाइम्स ऑफ इंडिया, हैदराबाद की एक खबर के मुताबिक आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में हृदय रोगी स्टेंट बनाने वाली कंपनियों और चिकित्सकों के गठजोड़ के शिकार हो रहे हैं। यह खबर वेबसाइट articles.timesofindia.indiatimes.com पर उपलब्ध है। इस खबर में बताया गया है कि आंध्र प्रदेश में हर महीने लगभग 3500 इंप्लांट्स होते हैं जिनमें से 30 प्रतिशत गैरजरूरी होते हैं। लेकिन कंपनियों से मिलने वाली भारी कमीशन के चक्कर में चिकित्सक जरूरी न होने के बावजूद दिल के मरीजों की धमनियों में स्टेंट इंप्लांट करते रहते है। इसी कमीशनखोरी के चक्कर में निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद के कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. शेशागिरी राव जेल की हवा खा चुके हैं। खबर के अनुसार देश भर के स्वास्थ्य अधिकारी और नामी हृदय रोग विशेषज्ञ यह मानते हैं कि देश में स्टेंट इंप्लांट बेतहाशा किया जा रहा है। इसे देखते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) चिकित्सकों के लिए नई नैतिक गाइडलाइन जारी करने जा रही है। एमसीआई के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के वरिष्ठ सदस्य डॉ. पुरुषोत्तम लाल ने कहा कि स्टेंट उत्पादक कंपनियों के व्यापार को बढ़ाने के लिए जो डॉक्टर इस प्रकार का इंप्लांट कर रहे हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिये। उन्होंने कहा कि हमारी उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा पर आने वाले खर्च को कम करना होना चाहिये लेकिन इसके उलट कमीशनखोरी के कारण यह खर्च बढ़ता जा रहा है। दिल्ली के सर ‘गंगा राम हॉस्पिटल’ की कैथ लैब के निदेशक ‘डॉ. आरआर मंत्री’ भी मानते हैं कि देश में बेतहाशा हो रहे स्टेंट इंप्लांट के पीछे डॉक्टरों की कमीशनखोरी हो सकती है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि इस प्रैक्टिस को रोकने के लिए कोई सरकारी नियंत्रक नहीं है। अमेरिका के समान भारत में भी ऐसी नियंत्रक संस्था होनी चाहिये।
 
पांच से दस गुना दाम में बेचे जाते हैं स्टेंट्स : धमनियों में अवरोध (ब्लॉकेज) को समाप्त करने के लिए इंप्लांट किये जाने वाले स्टेंट आजकल अनेक बड़े अस्पतालों के लिए तेजी से पैसा बनाने का जरिया बन गये हैं। स्टेंट्स की बिक्री और उपयोग पर नियंत्रण के लिए कोई सरकारी एजेंसी न होने के कारण अस्पतालों ने हृदय रोग के चिकित्सकों और स्टेंट बनाने वाली कंपनियों के साथ साठगांठ कर बेतहाशा कमाई के लिए एक कमीशन सिस्टम बना लिया है। यह बात दक्षिण भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह सब कुछ मरीजों की कीमत पर किया जाता रहा है। अखबार की वेबसाइट www.thehindu.com/news पर उपलब्ध इस रिपोर्ट के अनुसार दिल के मरीजों को ज्यादातर विदेशी स्टेंट लगने के कारण बड़े-बड़े अस्पतालों को मरीजों से बेहिसाब दाम वसूलने का मौका मिल जाता है। स्टेंट की कीमत को नियंत्रित करने का कोई सरकारी तंत्र न होने के कारण मरीज बहुत ज्यादा दाम देने को मजबूर कर दिये जाते हैं। जो कंपनी सबसे कम दाम में आयातित स्टेंट सप्लाई करने की बात करती है उसी के माल की संस्तुति हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) द्वारा की जाती है और वही माल अस्पताल स्वीकार करता है। स्टेंट बनाने वाली कंपनी पहले चिकित्सक और बाद में अस्पताल प्रबंधन से बात कर दोनों के लिए कमीशन फिक्स कर देती है। इस कमीशनखोरी के चलते मरीज में कम दाम वाले लो क्वॉलिटी के स्टेंट्स इंप्लांट किये जाते है जबकि उनसे पांच से दस गुना दाम वसूला जाता है। इतना ही मरीजों के परिचारकों से स्टेंट्स की हैडलिंग के खर्च के रूप में 15-20 प्रतिशत राशि वसूली जाती है।
 
स्टेंट इंप्लांट के बाद फिर से हो सकता है ब्लॉकेज : किसी मरीज की धमनियों में स्टेंट स्थापित किये जाने के बाद उस समय तो ब्लॉकेज खत्म हो जाता और रक्त का प्रवाह सामान्य ढंग से शुरू हो जाने के कारण मरीज को राहत मिलती है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं रहती है कि धमनियों में फिर अवरोध या ब्लॉकेज नहीं होगा। अमूमन स्टेंट इंप्लांट के एक साल के भीतर फिर से धमनियों में ब्लॉकेज हो सकता है। यह जानकारी दक्षिण भारत की प्रमुख मैगजीन ‘हंस इंडिया’ की एक रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार मेडिकेटेड स्टेंट स्थापित होने पर फिर से ब्लॉकेज होने का जोखिम थोड़ा कम हो जाता है। 
 
साभार- क्लाउन टाइम्स

पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर सीएम से मिले महाराष्ट्र के पत्रकार

पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति के निमंत्रक एस.एम. देशमुख के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने नागपुर में राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से मुलाकात करके राज्य में शीघ्र पत्रकार सुरक्षा कानून लाने की अपील की. मुख्यमंत्री के साथ बातचीत करते देशमुख ने कहा कि राज्य में 2013 में दो पत्रकारों की हत्याएं हुईं, एक महिला पत्रकार के साथ बलात्कार किया गया, तीन मीडिया हाउसेस पर हमले किये गये और 68 पत्रकारों के उपर हमले किये गए. महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य के लिए यह स्थिति अच्छी नहीं है. महाराष्ट्र ने विचार, वृत्तपत्र, स्वातंत्र्य के लिए हमेशा ही अपना योगदान दिया है लेकिन आज इस स्वातंत्र्यका ही गला दबाने की कोशिश की जा रही है. इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून की महाराष्ट्र मे सख्त जरूरत है.
 
मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कानून बनाये जाने के बारे में कोई भी ठोस आश्वासन नहीं दिया लेकिन पत्रकार पेंशन योजना के बारे मे उन्होंने प्रतिनिधि मंडल को आश्वस्त किया. अन्य राज्यों में किस प्रकार पत्रकार पेन्शन योजना अमल में लाई जा रही है, इसका अध्ययन करके महाराष्ट्र में पत्रकार पेन्शन योजना के बारे मे लागू करने की बात मुख्यमंत्री ने कही है.
 
मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद भी प्रतिनिधि मंडल संतुष्ट नहीं हुआ. पत्रकार हमला विरोधी कृति समिति ने कहा है कि जब तक कानून नहीं आ जाता और पेन्शन योजना लागू नहीं की जाती तब तक आंदोलन चलता रहेगा. मुख्यमंत्री यहां नागपुर में महाराष्ट्र विधान सभा के शीतकालीन सत्र में भाग लेने नागपुर आए हुए थे.

यूएनआई के तीन और पत्रकारों को खानी पड़ सकती है जेल की हवा

दलित अत्‍याचार मामले में संयुक्‍त संपादक सहित दो पत्रकारों और एक क्‍लर्क को जेल भेजे जाने का मामला सामने आया ही था कि यूएनआई के तीन और पत्रकारों को भी जेल भेजे जाने की गहरी आशंका संबंधी चर्चा ने जोर पकड़ना शुरु कर दिया है। ये मामला 'महिला उत्‍पीड़न' का है और इसमें पहले से ही जेल की हवा खा रहे पत्रकार भी शामिल हैं। 
 
दलित अत्‍याचार मामले में पूरे मीडिया जगत में किरकिरी होने के बाद से प्रबंधन पहले से ही सकते में है। प्रबंधन की भी टांग इस मामले में फंसी हुई दिखती है क्‍योंकि इस प्रतिष्ठित संस्‍थान में विशाखा मामले में उच्‍चतम न्‍यायालय के दिशा-निर्देशाों का भी पालन नहीं किया गया है। इस चर्चित मामले में महिला आयोग भी नजर रखे हुये है। (कानाफूसी)

दिल्ली में उपराज्यपाल ने की राष्ट्रपति शासन की सिफारिश

दिल्ली में कांग्रेस ने जहां केजरीवाल की सारी शर्ते मान ली हैं वहीं दूसरी तरफ इतने दिनों से राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए उपराज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की है. राज्यपाल ने सबसे बड़े दल भाजपा तथा आप और कांग्रेस से विचार विमर्श करने के बाद राष्ट्रपति को सौंपी अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रपति शासन का विकल्प सुझाया है. राज्यपाल के इस कदम से दिल्ली में सरकार बनाने के कदम को झटका लग सकता है.
 
भाजपा को पूर्ण बहुमत ना मिलने के कारण वह पहले ही सरकार बनाने से इंकार कर चुकी है. जबकि केजरीवाल ने राज्यपाल से मिलकर समय मांगा था. उसके बाद केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस को पत्र लिखकर 18 शर्तें रखी थी और कहा था कि इन सभी शर्तों पर अगर ये दोनों पार्टियां समर्थन देने को तैयार हों तो वह सरकार बनाएंगे. केजरीवाल के इस फैसले से दिल्ली में सरकार बनने की राह उलझ गई थी.
 
आज कांग्रेस ने केजरीवाल की सभी 18 शर्तें मान ली हैं. कांग्रेस ने कहा है कि केजरीवाल ने अनुभव की कमी के कारण ये शर्तें रखी थी क्यूंकि इनमें से 16 शर्तें तो ऐसी हैं जो कि प्रशासनिक हैं और इनके लिए विधानसभा या लोकसभा की जरूरत नहीं पड़ती. कांग्रेस ने कहा है कि वो बाकी दोनों शर्तों को भी मानने को तैयार है.

विज्ञान वाली टीचर की कहानी और वो लाख की चूड़ियां

कुछ लोग हमेशा याद आते हैं : इस वक्त जब मैं ब्लॉग के लिए नई पोस्ट तैयार कर रहा हूं तो मेरे मन में कई लोगों की यादें ताजा हो रही हैं। उनमें से कुछ बहुत कमाल के इंसान हैं और उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन लोगों को याद कर ईश्वर के प्रति मेरा विश्वास और पुख्ता हो जाता है, क्योंकि ऐसी विविधतापूर्ण सृष्टि की रचना आसान नहीं है। इस मामले में मैं बहुत नसीबवाला हूं। संभवत: मुझे इस दुनिया के सबसे रोचक लोगों का साथ मिला है और मैं उन्हें भूलने की गलती नहीं कर सकता। ऐसे लोग हमेशा याद आते हैं।
 
वह कहानी मैं भूला नहीं हूं : यह एक बेहद रोमांचक किस्सा है जिसकी आप कभी कल्पना नहीं कर सकते। यह एक खास कहानी है जो दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी स्कूल में सुनाई गई। मेरा अनुमान है कि अब शायद ही कोई इसे अपने विद्यार्थियों को सुनाने की हिम्मत करेगा। मैं हमारी विज्ञान की टीचर का इसके लिए आभार व्यक्त करना चाहूंगा। वह एक खास शाम थी जब टीचर हमारी क्लास में आर्इं। उस दिन हमने पढ़ाई में अरुचि दिखाई और पढ़ने की किसी भी संभावना से साफ इंकार कर दिया। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि अगले दो दिन लगातार छुट्टियां थीं, जिसकी कल्पना मात्र से हमारे मन में साहस का संचार हो रहा था। हमने टीचर से पढ़ाई के बजाय कोई कहानी सुनाने की मांग की। इस पर उन्होंने असमर्थता जताई, क्योंकि उन्हें कोई कहानी नहीं आती थी। उन्होंने ईदगाह और काबुली वाला जैसे कुछ नाम गिनाए लेकिन ये कहानियां हम कई बार पढ़ चुके थे। आखिर उन्हें एक कहानी याद आई और सुनानी शुरू की। उनके सुनाने के तरीके से साफ मालूम होता था कि उस कहानी पर उन्होंने काफी मेहनत की है। शायद वह कहानी उन्होंने खुद भी कई बार सुनी होगी। कहानी पूरी होने के बाद मालूम हुआ कि वह करवाचौथ की कथा थी और क्या गजब संयोग था कि अगले दिन करवा चौथ का व्रत भी था। मुझे पूरा यकीन है कि सृष्टि के निर्माण से लेकर आज तक केवल मेरी क्लास के बच्चों ने ही स्कूल में करवाचौथ की कथा सुनी है। मैं आज भी उस कहानी को भूला नहीं हूं। अगर परीक्षा में थ्रस्टी क्रो, ग्रीडी डॉग के बजाय यह कहानी पूछी जाय तो यकीनन मुझे सबसे ज्यादा नंबर मिलेंगे।
 
चूड़ियों को कमजोर मत समझो : यह किस्सा सुनाने से पहले मैं उम्मीद करता हूं कि जिन लोगों का यहां जिक्र किया जाएगा वे कभी मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ेंगे। साथ ही आपको मेरा विनम्र सुझाव है कि भविष्य में कभी इस मुहावरे का प्रयोग न करें कि "हमने हाथ में चूड़ियां नहीं पहन रखीं।" वास्तव में यह मुहावरा समय के साथ अपडेट नहीं हुआ। अगर ऐसा होता तो कोई यह बोलने की हिम्मत नहीं करता। यहां मैं किसी क्रांति या महिला अधिकारों का जिक्र नहीं कर रहा, लेकिन इस घटना के बारे में जानने के बाद आपका नजरिया पूरी तरह बदल जाएगा।
 
एक दिन मेरे गांव में नजदीकी कस्बे से एक व्यापारी चूड़ियां बेचने आया। उसके पास लाख की चमचमाती चूड़ियां थीं जो तुरंत बिक गर्इं। अगले दिन वह फिर आया और उसने मोहल्ले में आवाज लगाई। कुछ देर बाद मेरे स्कूल के मास्टरजी की पत्नी वहां आर्इं और उन्होंने चूड़ियां पसंद कीं। मोल-भाव करने के बाद 150 रुपए में बात तय हुई लेकिन उनके पास सिर्फ 50 रुपए थे। इस पर व्यापारी ने कहा, "कोई बात नहीं बहनजी, आप चूड़ियां ले लीजिए। पैसे कल ले जाऊंगा।" लेकिन यह बात उन्हें स्वाभिमान के विरुद्ध लगी और उन्होंने अगले दिन पूरी रकम के साथ ही चूड़ियां लेने की बात कही। शाम को मास्टरजी स्कूल से लौटे। किताबें अलमारी में रखने के बाद वे गर्मागर्म चाय पी रहे थे तभी उनकी पत्नी ने 100 रुपए की मांग की। मास्टरजी को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने इस मांग के पीछे वाजिब कारण जानना चाहा। जब उन्हें मालूम हुआ कि ये रुपए लाख की चूड़ियों के लिए मांगे जा रहे हैं तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। मास्टरनी जी ने संकल्प लिया कि अब तो लाख की चूड़ियां पहनने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करूंगी नहीं तो ऐसी जिंदगी से मरना कहीं ज्यादा सम्मानजनक है।
 
अगले दिन जब हम स्कूल गए तो एक महिला वहां झाड़ू लगा रही थी। उनके बारे में सबके अलग-अलग अनुमान थे। कोई कहता कि सरकार ने उन्हें यहां स्थायी नियुक्ति दी है तो कोई कहता बेचारी दुखिया है। पेट पालने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता! यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। थोड़ी देर बाद मास्टरजी बगल में पोथी दबाए स्कूल में हाजिर हुए। उन्हें सफाई कार्य में लगी महिला कुछ जानी-पहचानी लगी। वे उससे बातें करने लगे, कुछ देर बाद उनमें झगड़ा होने लगा। मास्टरजी उसके सामने हाथ जोड़कर अपनी इज्जत बचाने की गुहार कर रहे थे। घटना का भंडाफोड़ होने पर मालूम हुआ कि वह महिला मास्टरजी की पत्नी थीं। इधर स्कूल में भीड़ बढ़ती जा रही थी और गांव के लोग भी नजारा देखने आने लगे। मास्टरजी की फजीहत होने की पूरी संभावना थी। कोई और उपाय न देख उन्होंने अपनी जेब में हाथ दिया और 100 का नोट देकर लाज बचाई।
 
चलते-चलते : शेक्सपियर की एक मशहूर कविता पढ़ने के बाद मैं इस बात से सहमत हूं कि पूरी दुनिया एक रंगमंच है। कुछ लोग एक निश्चित किरदार निभाने के लिए मंच पर आते हैं। यह जरूरी नहीं कि उनकी भूमिका पर हर कोई तालियां बजाए लेकिन वे लोग एक खास भूमिका के लिए ही बने होते हैं। यह भी जरूरी नहीं कि उनकी जिंदगी की किताब सुनहरी स्याही से लिखी जाए। जिंदगी की किताब में महत्व इस बात का नहीं कि वह किस रंग की स्याही से लिखी गई है, बल्कि महत्व इस बात का है कि इसमें कैसे शब्द शामिल किए गए हैं।  
 
राजीव शर्मा
 
संचालक- गांव का गुरुकुल

खबरें अभी तक से दिनेश कुमार की छुट्टी, अमृतांशु मिश्र जनसेवा मेल से जुड़े

खबर है कि चैनल खबरें अभी तक ने पलवल से संवाददाता को निकाल दिया है. दिनेश पलवल में चैनल की लांचिंग के साथ से ही जुड़े हुए थे. उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के चैनल से निकाल दिया गया. पलवल में दीपावली के बाद से ही चैनल पेमेंट ना होने की वजह से बंद पड़ा था. दिनेश कुमार पर चैनल चलवाने और विज्ञापन लाने का दबाव बनाया जा रहा था. उन्हें 13 दिसम्बर को नौकरी से निकाल दिया गया.
 
लखनऊ से खबर है कि वॉयस ऑफ लखनऊ के रिपोर्टंग हेड अमृतांशु मिश्र ने संस्थान को अलविदा कह दिया है. उन्होंने झांसी से प्रकाशित जनसेवा मेल के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. आमृतांशु को जनसेवा मेल का लखनऊ ब्यूरोचीफ बनाया गया है.
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

लॉ इंटर्न को जबरन अपने कमरे में रोक रहे थे जस्टिस गांगुली

जस्टिस गांगुली की मुश्किलें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं. गांगुली पर आरोप लगाने वाली लॉ इंटर्न ने उन सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को बताया है कि उन्होंने उसके साथ होटल के कमरे में अश्लील हरकते की. पीड़िता का यह बयान सालीसिटर इंदिरा जयसिंह के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस में छपा है. इंदिरी जयसिंह ने अपने लेख में लिखा है पीड़िता ने कमेटी के सामने ये कहा था कि गांगुली ने उस पर होटल में उनके साथ रात में अकेले रुकने और शराब पीने के लिए दबाव बनाया था.
 
उन्होंने कहा कि मुझे यह बयान इसलिए सार्वजनिक करना पड़ रहा है क्यूंकि जस्टिस गांगुली इसकी आड़ में खुद को बेकसूर बता रहे हैं और बड़े वकीलों और जजों को अपने पक्ष में लामबंद कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि पीड़िता ने उन पर जो आरोप लगाये हैं वो बहुत गंभीर हैं लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है.
 
पीड़िता ने अपने बयान में कहा है कि गांगुली ने शराब पीने के बाद उसे बाहों में भरने की कोशिश की लेकिन वह हट गई. इसके बाद उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसकी बाह चूमने लगे. उसके होटल से जाने के बाद भी गांगुली उसे बार-बार फोन कर रहे थे. अगली सुबह गांगुली ने उससे रात के बर्ताव के लिए मैसेज करके माफी मांगी थी.
 

महिलाओं अगर जिंदा रहना है तो घर छोड़ो!

शंभूनाथ शुक्ल : 16 दिसंबर को निर्भया कांड की बरसी के तौर पर याद करते हुए हम बड़े भावुक होकर सब लोग बता रहे हैं कि महिलाएं घर के बाहर कितनी असुरक्षित हैं मानों घर के भीतर तो वे सौ फीसद सुरक्षित हैं। दो दिन पहले से न्यूज चैनल वालों ने इसके लिए विशेष आयोजन करने की योजना बना रखी थी। कुछ महिला पत्रकार गईं और किसी खास बस अड्डे में खड़ी होकर वहां से गुजर रहे बाइक वालों से लिफ्ट मांगी और इसके बाद इस बातचीत को हिडेन कैमरे से लाक कर न्यूज चैनल पर चलवा दी और टीआरपी लूट ली। नतीजा क्या निकला? हर आदमी डर गया कि भई अकेली दुकेली कोई लड़की दिखे और लिफ्ट मांगे तो गाड़ी मत रोकियो पता नहीं वह अपने हिडन कैमरे से आपकी बातचीत को रिकार्ड कर ले और फिर बाइट चलवा दे कि देखो यह पुरुष कितना घटिया है हर लड़की को लिफ्ट देता है। 
 
अरे यह सब करने के पहले अपने आफिस को देखो अपने घर को देखो। आफिस में एक बॉस क्या-क्या कर सकता है, इसे तरुण तेजपाल ने बता दिया। और घर के भीतर निर्भया के साथ कितना दोगला व्यवहार होता है यह बताओ। मैने तमाम महिलाओं को अपने उन पतियों की सेवा करते देखा है जो रोज प्रेस क्लब से दारू पीकर आते समय गाड़ी में ही मूत लेते हैं, वहीं पान की पीकते हैं और उनकी पत्नियां उनके उन अंतर्वस्त्रों को धोती हैं। पियक्कड़ पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं। प्याज, टमाटर, आलू आदि सब्जियों की मंहगाई का रोना रोते हैं। दूध, फल, अंडा और मांस में कटौती करते हैं। उनके बच्चे कुपोषित रहते हैं लेकिन पति महोदय शराब में कटौती नहीं करते न चखने में करते हैं। बच्चों की फीस स्कूल में यथासमय जाए या न जाए पर वे शराब जरूर पिएंगे। बच्चे अपने ऐसे पिता से नफरत करते हैं, पत्नी ऐसे दुराचारी पति की सेवा नहीं करना चाहती लेकिन समाज के दिखावे के लिए उसे करना पड़ता है। क्या सड़क पर अकेले जा रही किसी महिला की सुरक्षा के बारे में चिंता कर रही संस्थाएं, महिलाएं और महिला आयोग कभी ऐसे मामलों में चिंता करता है?
 
आज सुबह-सुबह एक न्यूज चैनल में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह कह रही थीं- "उस बेचारी बलत्कृत निर्भया…….." पर मुझे लगा कि बेचारी वह निर्भया नहीं वरन् ऐसे विचार रखने वाली महिलाएं हैं। अगर महिला आयोग की अध्यक्ष किसी को बनाना ही है तो उसे बनाइए जो ऐसे किसी हादसे का शिकार हुई हो। महिलाओं को नौकरी देनी है तो ऐसी महिलाओं को दीजिए जिसने अपने ऐसे शराबी और धूर्त पति को त्यागा हो और उन लड़कियों को दीजिए जो सामंती दिमाग वाले अपने पिता के घर को छोड़कर आई हो। तब ही आप सही मायनों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलवा पाएंगे। फालतू की बातें कर नहीं। और रोने-धोने वाली कवितााएं लिखकर नहीं।
 
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से

कितना कुछ बदला है 16 दिसम्बर से आज तक?

दिल्ली रेप कांड को आज एक साल पूरा हो गया। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिरकर इस एक साल में देश की महिलाओं की स्थिति में क्या बदलाव आये। क्या महिलाएं देश में सुरक्षित हो गयी हैं। क्या महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों का ग्राफ नीचे आया है। क्या महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के लिये बने कानून अपराधियों पर नकेल कस पा रहे हैं। क्या पुलिस, प्रशासन और सरकार महिला अपराधों के प्रति पहले से ज्यादा संवेदनशील और संजीदा हुई है। क्या समाज का नजरिया बदला है? क्या महिलाएं अपनी सुरक्षा को लेकर सचेत हुई हैं? क्या महिलाओं ने रेप जैसे मामलों में चुप होकर घर बैठ जाने की बजाय इनके विरूद्व आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है? क्या देश भर में रेप के मामले की रिपोर्ट दर्ज करवाने की दर में बढ़ोतरी हुई है? 
 
ये वो तमाम सवाल है जो देश के सामने मुंह बाए खड़े हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली रेप कांड ने देश की आत्मा को झकझोरने, महिलाओं और बच्चियों के प्रति संवेदनशल तरीके से सोचने और सम्मान देने को विवश किया है। वहीं महिलाओं को भी अपने हक और हुकूक के लिए लड़ने की शक्ति प्रदान की है। दामिनी तो आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उसके बलिदान ने देश भर में महिला अधिकारों के प्रति नये सिरे से बहस शुरू करने के साथ ही नयी पीढ़ी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम भी किया है। आंकड़ों की जुबानी यह कहा जा सकता है कि दामिनी कांड के बाद देश में बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी हुई है लेकिन इस तस्वीर का उजला पक्ष यह भी है कि ऐसे मामलों को लेकर समाज का नजरिया बदला है और अब महिलाएं ऐसे मामलों में बदनामी के डर से घर बैठने की बजाय अपराध व अपराधी की खिलाफ आवाज बुलंद करने से डरती नहीं हैं। सुधार व विकास एक सतत प्रक्रिया है दामिनी ने अपने प्राण देकर देश में महिला अधिकारों, सशक्तीकरण, समाज के नजरिये को बदलने और महिलाओं को शक्ति संपन्न बनाने और खुद महिलाओं की सोच बदलने प्रक्रिया को जन्म देने का महान काम किया है। 
 
वहीं तस्वीर का स्याह पक्ष यह है। कि 16 दिसम्बर की घटना और उसके बाद पूरे देश में हुये भारी विरोध प्रदर्शन के बाद भी राजधानी दिल्ली में बलात्कार की घटनायें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। मुंबई में प्रेस फोटोग्राफर के साथ घटी घटना ने दुनियाभर में देश का मान सम्मान गिराने का काम किया। जब देश की राजधानी और मुंबई जैसे आधुनिक शहर में महिलाएं सुरक्षित नहीं है तो वो कहां सुरक्षित होंगी ये बड़ा सवाल है। दामिनी हत्याकांड के चौबीस घण्टे में दिल्ली में बलात्कार की तीन जघन्यतम घटनायें प्रकाश में आयी थीं। इन घटनाओं ने मानवता को तार-तार कर दिया है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों से एक 19 साल की युवती समेत एक पांच साल की बच्ची और एक ढाई साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला प्रकाश में आया है। दिल्ली के गांधीनगर इलाके में पांच साल के बच्ची को अपहृत कर उसके साथ जिस प्रकार की निर्ममता एवं निर्दयता हुई है उसे सुनकर आत्मा कांप उठती है। आज बच्चियां अपने आंगन तक में सुरक्षित नहीं हैं। समाज में महिलाओं के प्रति इस तरह बढ़ते अत्याचारों को रोकने में पुलिस, प्रशासन समेत सरकार पूरी तरह असफल सिद्ध हुई है तभी तो दिसम्बर में घटित घटना के बाद जिस पर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुआ था, लगभग हर दिन दिल्ली एक नहीं कई बलात्कार की घटनायें लगातार प्रकाश में आ रही हैं। पुलिस-प्रशासन द्वारा किये गये वादे केवल हाथी दांत सिद्ध हो रहे हैं। वे किसी भी प्रकार से महिलाओं की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। आज देश की राजधानी का कोई भी कोना महिलाओं के लिये सुरक्षित नहीं है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। दिल्ली में 2010 में 507, 2011 में 572, 2012 में 706 बलात्कार के मामले दर्ज किये गये थे। 2012 में दिल्ली रेप कांड के बाद दिल्ली में ऐसी घटनाओं में कमी की बजाय इजाफा हुआ है। इस साल 31 अक्टूबर तक दिल्ली में 1330 मामले दर्ज हुए हैं। दामिनी रेप कांड के बाद पुलिस ऐसे मामलों में संवेदनशील हुई है इसलिए ऐसे अपराध रिकार्ड में दर्ज होने लगे है यह भी हो सकता है कि अब महिलाएं चुप रहने की बजाय अपने प्रति हुये अत्याचार को जाहिर करने में झिझकती नहीं है। आसाराम, नारायण साईं, तरूण तेजपाल का बलात्कार के मामलों में जेल जाना इस बात को पुख्ता करता है कि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत हुई हैं।
 
बच्चियों के साथ बढ़ती हुई आपराधिक घटनायें एवं ऐसी घटनाओं में परिचितों की संलिप्तता बहुत ही चिन्ता का विषय है कि समाज आखिर किस ओर बढ़ रहा है? समाज का इस तरह नैतिक पतन एक बहुत बड़ी खतरे की घण्टी है। सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब सुरक्षा की बात करने वाले हमारे रक्षक पुलिस-प्रशासन घटना घटने के बाद भी सजग नहीं दिखते। सजगता की तो बात तक दूर है एफआईआर तक दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। प्रशासन की अक्षमता देखकर यही लगता है कि कहीं न कहीं पुलिस-प्रशासन एवं सरकार में ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रति इच्छाशक्ति में कमी है और वे आंख मूंदकर यही सोच रहे हैं कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दो या कोई अलादीन का चिराग आकर सारी समस्याओं को खत्म कर देगा। सरकार को इन घटनाओं को न रोक पाने का जवाब देना ही होगा। ऐसे ढुलमुल रवैये से काम नहीं चलेगा। कब तक ये सिलसिला चलता रहेगा और कोई कारगर कदम उठाने के बाजय केवल बातें होती रहेंगी। यह साफ जाहिर है कि केवल कानून बना देने से घटनाओं पर अंकुश नहीं लगने वाला। आवश्यकता है उन कानूनों को सख्ती से लागू करने की और समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के मूल कारण पहचानने और उस तक जाने की।
 
देश में महिलाओं के प्रति अत्याचार, दुष्कर्म व यौन उत्पीड़न की घटनाओं की चर्चा खूब हो रही है। केवल चर्चा ही न हो इन घटनाओं को रोकने के सार्थक उपाय भी हों, क्योंकि ऐसी घटनाओं को कोई महिला या लड़की जीवनभर भूल नहीं पाती है। बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य की शिकार महिलाओं व बालिकाओं का जीवन उनके लिए अभिशाप बन जाता है। कुछ महिलाएं तो इन घटनाओं के बाद इतनी विक्षिप्त हो जाती हैं कि वे आत्महत्या तक कर लेती हैं। बालिकाओं व महिलाओं के साथ छेड़छाड़, उन पर ताने, व्यंग्य व फब्तियां कसना तो एक आम बात हो गई है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रति मिनट 106 महिलाएं छेड़छाड़ की शिकार होती हैं। एक अन्य अनुमान में भी देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते उत्पीड़न व अत्याचारों की ओर संकेत करते हुए स्पष्ट किया गया है कि देश में प्रत्येक 29 मिनट में एक दुष्कर्म, 19 मिनट में एक हत्या, 77 मिनट में एक दहेज मृत्यु, 23 मिनट में एक अपहरण, 3 मिनट में हिंसा व 10 मिनट में एक धोखाधड़ी होती है।
 
आंकडों पर गौर करें तो बलात्कार के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बच जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सजा केवल 30 फीसदी गुनाहगारों को ही मिल पाती है। बाकी तीन चौथाई बच जाते हैं। इसका कारण वे सबूतों को मिटाने में सफल रहते हैं या पैसे के बल पर पीड़ित पक्ष से समझौता कर अपनी जान बचा लेते हैं। ऐसे में अगर गुनाहगारों का हौसला बुलंद होता है या वे दूसरों के लिए जुल्म की नजीर बनते हैं तो अस्वाभाविक नहीं है। दिल्ली की गैंगरेप की घटना केवल एक व्यक्ति या कुछ लोगों की घिनौनी कारस्तानी व नीचता की पराकाष्ठा नहीं है बल्कि यह हमारे समूचे सामाजिक तंत्र की विद्रुप सोच, असंवेदनशील आचरण और अस्थिर चरित्र की घटिया बानगी भी है। 16 दिसंबर की घटना को रोका जा सकता था यदि पुलिस वास्तव में थोड़ा सचेत होती और प्रशासन मुलायम तकियों पर सिर रखकर गहरी नींद नहीं सो रहा होता। घटनायें घटित होंने पर बयानबाजी की झड़ी लग जाती है, लेकिन जमीनी तौर पर सुधार के लिये कोई कोशिश नहीं होती। इसी का दुष्परिणाम है रोज इतने मासूमों की जिन्दगियां बर्बाद हो रही हैं और वे बिना किसी अपराध के बलात्कार का शारीरिक और मानसिक कष्ट भोगने को विवश हैं। दिल्ली रेप कांड ने देश में महिलाओं के प्रति होने वाले जघन्य अपराधों के प्रति समाज को सोचने को मजबूर किया है और कुछ सुधारात्मक कार्रवाइयां सरकार और समाज के स्तर पर हुई भी हैं। जरूरत महिलाओं के प्रति समाज, सरकार, पुलिस व प्रशासन को और ज्यादा संवेदनशील बनाने की है।
 
लेखक आशीष वशिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे avjournalist@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

जो सिंहासन पर बैठेगा वो काली लंगोटी जरूर पहनेगा

काले धन के बारे में जो ताज़ा आंकड़े ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी’ नामक संस्था ने जाहिर किए हैं, यदि वे प्रामाणिक हैं तो हमारी सरकार के लिए इससे बढ़कर शर्म की बात क्या हो सकती है। उसके अनुसार 2011 में लगभग 5 लाख करोड़ रुपए का काला धन स्विस बैंकों में भारतीय लोगों ने जमा किया है। 2010 के मुकाबले यह राशि सवाई हो गई है जबकि भारत का सालाना बजट सिर्फ 13 लाख करोड़ का होता है। 
 
काले धन की खोज करनेवाली कुछ संस्थाओं का मानना है कि स्विस बैंकों में यदि किसी देश का काला धन सबसे ज्यादा जमा है तो वह भारत का है। दुनिया के सबसे मालदार देशों को भी भारत ने मात कर दिया है। अमेरिका, चीन और रुस का कुल मिलाकर जितना काला धन जमा है, उससे ज्यादा काला धन अकेले भारत का जमा है। यह सब अनर्थ हो रहा है, एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की देख-रेख में। इसे मैं उनकी देख-रेख क्यों कहता हूं? क्योंकि वे बस देखते रहते हैं। करते-धरते कुछ नहीं। कोई चौकीदार अपनी आंख के सामने चोरी होने दे, उसके साथ आप क्या सलूक करेंगे? या तो आप उसे निकम्मा समझकर निकाल बाहर करेंगे या उसे चोरों का सरदार मानकर जेल भिजवाएंगे।
 
देश का दुर्भाग्य है कि न तो कोई नेता हमारे पास ऐसा है और न ही कोई राजनीतिक दल, जो इस ‘चैकीदारी’ को तत्काल खत्म करे। शायद इसका कारण ये है कि वे लोग भी सीधे हाथ साफ कर रहे हों।
 
यदि 2014 के बाद ये लोग भी सत्ता में आ गए तो क्या ये लोग आजकल के चौकीदार की ही तरह ‘चौकीदारी’ नहीं करेंगे? वर्तमान चैकीदार कम से कम खुद तो साफ-सुथरा है लेकिन भावी चौकीदार तो हाथ की सफाई के ऊंचे कलाकार हैं। भारत की गरीब जनता की जेब से उड़ाए गए ये अरबों-खरबों रूपये यदि वापस आ जाएं तो हिंदुस्तान की जनता को वर्षों तक कर चुकाने की जरुरत ही नहीं होगी। आयकर और बिक्री-कर भी खत्म किया जा सकता है।
 
बाबा रामदेव ने काले धन की वापसी के बारे में जबर्दस्त अभियान चलाया था लेकिन सरकार ने उनके खिलाफ काली कार्रवाई करके अपना मुंह काला कर लिया था। बाबा रामदेव के पास भक्तों की जबर्दस्त फौज है। वे हवाई आंदोलनकारी नहीं हैं। वे चाहें तो अगले छह माह में ऐसा दबाव बना सकते हैं कि यह भागता भूत अपनी काली लंगोटी देश के हवाले करता चला जाए। कोई राजनीतिक दल या नेता स्वेच्छा से काला धन वापस नहीं लाएगा, क्योंकि वह उसका सबसे अंतरंग वस्त्र है। लंगोटी है। दुर्योधन की लंगोटी! इस लंगोटी पर भीम गदा-प्रहार करे, यह दुर्योधन को कैसे बर्दाश्त होगा?
 
जो भी इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठेगा, वह काले धन की यह काली लंगोटी जरुर धारण करेगा। रामदेव जैसे धनुर्धर को इसी लंगोटी को मछली की आंख मानकर अपना निशाना बनाना होगा। यदि तीर ठीक निशाने पर बैठ गया तो भारत की गरीबी एक झटके में दूर हो जाएगी।
 
लेखक डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

नवदुनिया को बरबाद करने में जुटा है मैनेजमेंट

भोपाल : जागरण समूह द्वारा खरीद लिए जाने के बाद नईदुनिया के भोपाल स्थित अखबार नवदुनिया को मैनेजमेंट ही बरबाद करने में जुट गया है. यहां पर अखबार खुद को भास्कर समझने लगा है और इसी रुआब में मैनेजमेंट ने दाम बढ़ा दिये हैं. वहीं मुख्यालय में कुछ स्वार्थी तत्वों के बैठ जाने से अखबार दिनो दिन खात्मे की ओर जा रहा है.
 
संपादकीय, सरकुलेशन और मार्केटिंग की आपसी खींचतान से अखबार लगातार कमजोर होता जा रहा है. पहले कंपनी ने ग्राहकों के लिए सर्वे कराया था जो बाद में बुरी तरह पिटने के बाद बंद हो गया. इसके बाद बिना अनुमति ही एजेंटों की कापियां बढ़ा दी गईं. संपादकीय में बैठे लोग भी ब्यूरों की सुनने की बजाय अपने स्वार्थों की पूर्ति करवाने में लगे हैं.
 
ऐसी हालत में यहां काम कर रहे लोग अब नौकरी छोड़ने का मन बना चुके हैं. वैसे भी यहां ईमानदार लोगों को सुनने की जगह अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने वालों को ही अवसर दे रहे हैं. पुराने ब्यूरोचीफ की को हटाकर उनकी जगह अपने लोगों की नियुक्ति की जा रही है जिससे अखबार में काम करने वाले लोग यहां से निकलने के लिए विकल्प तलाशने में लग गये हैं.
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

सरकारे तो आती जाती हैं, देश की असली सेवा कम्युनिटी सर्विस है

Deepak Sharma : अजय अवस्थी भारतीय मूल के कंप्यूटर इंजिनियर है जो अमेरिका में सैटलाईट फोन के बेस स्टेशन बनाने वालों में से एक है. वो वाशिंगटन डीसी के पास बाल्टिमोर में रहते है. हर शनिवार को अजय बाल्टिमोर के पास सीनियर सिटीजन होम जाते है जहां वो अनाथ वृद्ध नागरिकों को घर का बनाया खाना परोसते हैं. हर हफ्ते के एक दिन वो इस होम को समर्पित करते हैं. अमेरिका में आर्थिक रूप से संपन्न ऐसे अवस्थियों की गिनती लाखों में है जो अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग में बाँट देते है. इसे कम्युनिटी सर्विस कहते हैं और अमेरिका में कम्युनिटी सर्विस का रिवाज़ बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है. ऐसे लोगों की समाज में इज्ज़त व्यापारियों और जन प्रतिनिधियों से भी ज्यादा है.
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हिंदुस्तान में इसका उलट है. यहाँ विधायकों और सांसदों को कम्युनिटी सर्विस के लिए अलग से एमपी लैड फण्ड दिया जाता है पर इसका उपयोग निजी और राजनैतिक कार्यों के लिए ज्यादा हो रहा है. आर्थिक रूप से संपन्न भारत के अधिकतर नागरिक अपना अतिरिक्त धन कम्युनिटी सर्विस में नही … संपत्ति और रियल एस्टेट में निवेश करते हैं. इस दिशा में सबसे दयनीय स्थिति एनजीओ सेक्टर की है जहाँ ज़रूरतमंदों के नाम पर सरकारी ग्रांट हज़म की जा रही है. सलमान खुर्शीद का ट्रस्ट इसकी एक मिसाल था. सलमान अपवाद नही एनजीओ के घपलों के अभिप्राय हैं. देश की राजनीती में कई सलमान बैठे है.
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मित्रों कम्युनिटी सर्विस के नाम पर ही आरएसएस का गठन किया गया था. कम्युनिटी सर्विस ही अन्ना का आन्दोलन भी था. नक्सलबारी में भी सार्वजनिक हितों को लेकर एक मुहीम शुरू की गयी थी. लेकिन सबके मकसद अलग थलग होकर बिखर गये. मित्रों मेरी गुजारिश आम आदमी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं से है …अगर वो इस देश को वाकई आगे ले जाना चाहते है तो राजनीती के साथ साथ कम्युनिटी सर्विस की दिशा में भी आगे बढ़े . यह अच्छा काम भाजपा वाले भी कर सकते हैं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी ऐसा नेक काम करने से कोई नहीं रोकेगा. मित्रों कम्युनिटी सर्विस ही देश की असली सेवा है. सरकारें तो आती जाती है.
 
आजतक में कार्यरत पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वाल से

राजस्थान विधानसभा चुनाव और महिलाएं

राजस्थान में चौदहवीं विधानसभा चुनावों में एक तरफ महिला मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई तो दूसरी तरफ 28 महिलाएं चुनकर विधानसभा में पहुंची हैं। इस बार कुल 168 महिलाओं ने चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाई थीं। स्वतंत्र भारत में 1952 से वर्ष 2013 तक राजस्थान विधानसभा के चौदह बार हुए चुनाव में अब तक कुल 882 महिलाओं ने चुनाव लड़ा। इनमें से 174 यानी लगभग बीस प्रतिशत महिलाएं विधानसभा पहंची हैं।
 
विधानसभा चुनावों का विश्लेषण करें तो पिछले चुनावों में पुरुषों के मुकाबले महिला मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है। पहली बार 75.51 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मतों का प्रयोग किया, जबकि पुरुषों का आंकड़ा 74.91 रहा। 2008 के विधानसभा चुनावों में सिर्फ 58 सीटों पर महिलाओं का अधिक मतदान हुआ था। इस बार 102 सीटों पर पुरुषों से अधिक वोट डाले। 129 सीटों पर महिला वोटिंग 80 प्रतिशत से अधिक रही। यद्यपि 1972 से 1990 के बीच महिला मतदाताओं का प्रतिशत 50.02 से घटते बढ़ते वर्ष 1990 में 59.5 और वर्ष 2003 में 64.23 प्रतिशत तक पहुंच गया था। पुरुष और महिला मतदाताओं के मतदान प्रतिशत का अंतर वर्ष 1950 में 35.01 प्रतिशत था जो वर्ष 2003 में घटकर 5.37 रह गया था। 2008 में पुरुष मतदाताओं की संख्या 2.62 प्रतिशत गिरावट आने के कारण दोनों का अंतर घटकर 1.91 प्रतिशत के आंकड़े पर आ गया है। इस बार के विधानसभा चुनावों में चौदह प्रतिशत यानी अट्ठाइस महिलाओं ने जीत दर्ज कराई है। 13वीं विधानसभा में भी कुल 28 महिलाएं जीती थीं। वर्ष 1952 में हुए पहले चुनावों में चार महिलएं खड़ी हुई थीं, लेकिन एक भी महिला विधानसभा नहीं पहुंच पाई थी। वर्ष 1958 में महिला प्रत्याशियों की संख्या बढ़कर 21 हो गई। उनमें 9 महिला विधायक चुनी गईं। तीसरी विधानसभा के लिए 1962 में हुए चुनाव में महिला प्रत्याशी की संख्या घटकर 15 रह गई, जिनमें से आधी से अधिक आठ विधायक चुनी गई।
 
राजस्थान विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि चौथे चुनाव में 19 में से 6 महिलाएं विधायक बनीं, जबकि 1972 में 17 में से 13 महिलाएं विधानसभा पहुंचीं। छठी विधानसभा के 1977 में जनता पार्टी की लहर में चुनाव में खड़ी होने वाली महिलाओं की संख्या बढ़कर 31 हो गई लेकिन आठ ही विजयी हो पाईं। सातवीं विधानसभा के 1980 में हुए चुनाव में एक बार 31 महिलाओं ने अपना भाग्य आजमाया, जिनमें से 10 विधानसभा में पहुंचीं। वर्ष 1985 में आठवीं विधानसभा के चुनावों में खड़ी होने वाली महिलाओं की संख्या 45 हो गई और 17 महिलाएं विधानसभा में पहंच पाईं। नौवीं विधानसभा में महिलाओं का चुनाव के प्रति रुझान बढ़ा और चुनाव में उतरने वाली महिलाओं की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई। गत चुनाव से दो गुना से पार होकर 93 हो गई लेकिन विजयी होने वाली महिलाओं की संख्या गत चुनाव के 17 से घटकर 11 तक ही सिमट गई। इसके बाद 1993 से दसवीं विधानसभा के चुनाव में महिला प्रत्याशियों की संख्या बढ़कर 97 हो गई। विधानसभा में दस महिलाएं पहुंचीं। राजनीतिक पार्टियों के महिलाओं के टिकट देने में रुचि नहीं दिखाने के कारण 1998 में ग्यारहवीं विधानसभा चुनाव में 69 महिलाएं ही मैदान में उतरीं लेकिन उनमें से जीतने वाली महिलाओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई। भाजपा और कांग्रेस के महिलाओं पर दांव नहीं लगाने के बावजूद 2003 में हुए बारहवीं विधानसभा के चुनाव में 118 महिलाओं ने भाग्य आजमाया, जिसमें से करीब दस प्रतिशत यानी 12 महिलाएं चुनी गईं। राजस्थान में पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल करने वाली भाजपा की वसुंधरा राजे के सत्ता में आने के बाद उन्होंने वर्ष 2008 में हुए तेरहवीं विधानसभा के चुनाव में 32 महिलाओं को तथा कांग्रेस की 21 प्रत्याशियों सहित कुल 154 महिलाओं के खड़े होने से चौदह प्रतिशत यानी 28 महिलाओं ने रिकॉर्ड जीत दर्ज कराई। इससे पूर्व कभी भी यह आंकड़ा साढ़े सात प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाया।
 
भारी बहुमत से सत्ता में पहुंची भाजपा ने इस बार चौदहवीं विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक 26 महिलाओं को मौका दिया जिनमें से 22 महिलाएं जीती हैं। कांग्रेस ने 24 महिलाओं को मौका दिया लेकिन केवल एक ही जीत कर विधानसभा पहुंचीं। जमींदारा पार्टी की दो महिलाएं विधायक चुनी गईं, जबकि नेशनल पीपुल्स पार्टी की प्रदेशाध्यक्ष गोलमा देवी सहित इस पार्टी की दो महिलाएं विजय रहीं। वहीं एक निर्दलीय महिला अंजू धानका लगातार दूसरी बार विधानसभा में पहुंचने में सफल रही। चौदहवीं विधानसभा चुनावों में कुल 168 महिलाएं खड़ी हुई थीं। इनमें 28 महिलाएं चुनी गईं। राजस्थान विधानसभा में महिला विधायकों की बढ़ी हुई संख्या एक शुभ संकेत है। औरतों पर हो रही हिंसा और भेदभाव में तब ही कमी आ सकती है जब अधिकाधिक महिलाएं निर्णायक भूमिकाओं में पहुंचें।
 
राजस्थान से बाबूलाल नागा की रिपोर्ट

साई रेड्डी की हत्या के विरोध में पत्रकारों ने दिया धरना

जगदलपुल : छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों के हाथों पत्रकार साई रेड्डी की हत्या के विरोध में पत्रकारों ने विशाल धरना दिया. घटना के बाद मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर पत्रकारों ने साई रेड्डी के परिजनों को 20 लाख रूपये देने, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा संवेदनशील क्षेत्र में कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा तथा कल्याण के लिए ठोस योजना बनाये जाने की मांग की.
 
घटना की निंदा करते हुए कहा कि पत्रकार बस अपनी लेखनी का इस्तेमाल सच लिखने के लिए करता है वो किसी की तरफ नहीं होता. नक्सलियों ने पत्रकारों को निशाना बनाकर दिखा दिया है कि उनकी ना तो कोई नीयत है और ना ही कोई विचारधारा है. पत्रकारों ने प्रशासन की भी आलोचना करते हुए कहा कि पत्रकारों को एक तरफ तो नक्सलियों का खतरा रहता है तो दूसरी तरफ प्रशासन भी उन्हें प्रताड़ित करता रहता है. 
 
पत्रकारों ने कहा कि साई रेड्डी पर नक्सलियों से सांठ गांठ का आरोप लगाकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. अगर उनकी नक्सलियों से साठ गांठ होती तो उनकी हत्या क्यूं की जाती. धरने में बस्तर, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बिलासपुर, रायपुर तथा कई अन्य स्थानों के पत्रकार पहुंचे थे.

भड़ासी कानाफूसी हुई सच, सिद्धार्थ वरदराजन इंडिया टुडे पहुंचे

सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में भड़ास पर हुई कानाफूसी आखिरकार सच साबित हुई. सिद्धार्थ वरदराजन ने इंडिया टुडे ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. वरदराजन को इंडिया टुडे ग्रुप का एडिटोरियल डायरेक्टर बनाया गया है. सिद्धार्थ इसके पहले द हिंदू के एडिटर थे जहां पर कस्तूरी एडं संस फेमिली के एडिटोरियल में हस्तक्षेप के चलते इस्तीफा दे दिया था.
 
टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के साथ 1995 में पत्रकारिता की शुरुआत करने के पहले न्यूयार्क यूनिवर्सिटी में शिक्षके रहे थे. 2004 में उन्हें द हिंदू का एडिटोरियल डायरेक्टर बनाया गया था. सिद्धार्थ वरदराजन अंग्रेजी के अच्छे पत्रकारों में गिने जाते रहे हैं. उन्होंने यूगोस्लाविया के खिलाफ नाटो वार को कवर किया था.  2010 में सिद्धार्थ को 'जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर' (प्रिंट) के रामनाथ गोयनका अवार्ड से नवाजा गया था.

इससे सम्बन्धित जो कानाफूसी भड़ास तक पहुंची थी वो ये थी-

इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर बनेंगे सिद्धार्थ वरदराजन!

 

लुटेरे हिंदू बनाम कमेरे हिंदू!

शंभूनाथ शुक्ल : अच्छा हुआ ब्राह्मण समाज में भस्म करने की क्षमता कभी नहीं रही वर्ना सभ्यता कब की समाप्त हो चुकी होती। वे आपको श्राप के जरिए भस्म कर देने की नौटंकी भर करते हैं। अब देखिए तमाम ब्राह्मण जाति के मूर्धन्य संपादकों और उन उप संपादकों तथा अदने से रिपोर्टरों ने भी मुझे भस्म कर देने और मेरे घर के सामने आमरण अनशन की धमकी दी है जो उस वक्त कभी मेरे चेंबर तक में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे जब मैं संपादक था। आज अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं जो लिखता हूं सब कूड़ा है और मेरे अंदर एक सफल पत्रकार बनने की क्षमता कभी नहीं रही। अगर मैं कूड़ा लिखता हूं तो भैया फेसबुक में पढ़कर आप विचलित क्यों हो जाते हो? आखिर आप सब तथाकथित ब्लू ब्लड वाले कुलीन ब्राह्मणों का ही कहना है कि यह तो निठल्ले लोगों का शगल है। फिर क्यों बेचैन हो जाते हो? मुझे अपने किसी संस्कार के लिए आप जैसे मूढ़मति के लोगों की जरूरत नहीं है।
 
मेरी एक ऐसी ही पोस्ट पर ब्राह्मण नायकों की प्रतिक्रिया पर मित्र अतुल गंगवार ने ठीक ही लिखा कि कमेरे हिंदुओं और लुटेरे हिंदुओं में यही फर्क है। लुटेरे गाली ही दे सकते हैं वे कभी भी श्रम करना नहीं चाहते। मुझे याद है जब वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल की घोषणा की थी तो तमाम जगह इन्हीं तथाकथित दूसरों के हिस्से की मलाई खाने वाले हिंदुओं ने दांत में तृण दबाकर वीपी सिंह को भस्म हो जाने का श्राप दिया था पर वीपी सिंह उनके इस श्राप के १८ साल बाद तक जीवित रहे। ये लोग तब रोना रो रहे थे "भला ब्राह्मणों से गरीब कौन होगा? हम सदैव से सुनते आए हैं कि हर कहानी किस्से में लिखा गया कि एक गरीब ब्राह्मण था। अब देखिए कि गरीब ब्राह्मण तो गरीबी का ही पर्याय है इसलिए अगर आरक्षण मिले तो ब्राह्मण को ही मिले।" 
 
उस समय नवभारत टाइम्स में एक लेख छपा था जिसमें कहा गया था- "ब्राह्मण गरीब इसलिए कहा जाता रहा कि यह जाति काम नहीं करना चाहती। ब्राह्मण दूसरे के श्रम पर हाथ साफ करना चाहता है इसीलिए उनके श्रम विभाजन में ब्राह्मण के पास सिर्फ हराम का भोजन ही लिखा गया।" अब ऐसे नाकारा ब्राह्मण मेरा क्या बिगाड़ पाएंगे? मुझे फख्र है कि मैं इस लुटेरी जाति की मानसिकता के बाहर आ गया हूं। पत्रकारिता में मैं कोई लूटपाट करने अथवा लिखने का शगल जैसी बातें करने नहीं आया था मैने पत्रकारिता में कदम इसलिए रखा था ताकि मैं इस एकरस बगिया को वैविध्यता प्रदान कर सकूं। और मुझे खुशी है कि पत्रकारिता में मैने तमाम मुस्लिमों और पिछड़ी तथा दलित जातियों को लाने का प्रयास किया और सफल भी रहा।
 
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से

आज कुछ मर्यादावादी लोग वशिष्ठ के भी गुरू हो गये हैं

Sanjay Tiwari : योग वशिष्ठ में वर्णन आता है. राम जी ने गुरू वशिष्ठ से कहा – मुझे पता है. मैं देव हूं. लेकिन फिर भी मेरे मन में स्त्री के उरोज (स्तन) जंघा, कटि जैसे अंगों को लेकर आकर्षण है.
 
तब वशिष्ठ जी ने राम जी को कहा था- इसमें कुछ भी गलत नहीं है राम. यह तो मानव देह की मर्यादा है. मानव देह में रहकर आकर्षण की इस मर्यादा से मुक्ति संभव नहीं.
 
अब कुछ मर्यादावादी लोग गुरू वशिष्ठ के भी गुरू हो गये हैं जो सामान्य इंसान से भी वह उम्मीद करते हैं जो खुद वशिष्ठ जी ने मर्यादापुरुषोत्तम राम से भी उम्मीद नहीं की थी.
 
पत्रकार संजय तिवारी के फेसबुक वाल से

पत्रकार से बदसलूकी करने वाले हुड्डा ने फिर दी मीडिया को नसीहत

पानीपत । एक दिन पहले पत्रकारों को हड़काने के बाद अब हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पत्रकारों को सच लिखने की सलाह दे डाली है। यही नहीं उन्होंने तो दुख जताकर यहां तक कह दिया है कि मीडिया अपने लक्ष्य से दूर होता जा रहा है और खोजी पत्रकारिता दूर होती जा रही है। हुड्डा का यह बयान किसी प्रेस कांफ्रेंस या प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से नहीं आया है, बल्कि पत्रकारों के एक संगठन के सम्मेलन के दौरान बयां किया गया है। यह सम्मेलन पानीपत में हुआ। जिसमें हुड्डा बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे।
 
शुक्रवार को वे अंबाला में पत्रकारों पर भड़क उठे थे, जब एक पत्रकार ने हरियाणा सिविल सर्विस के अफसरों की भर्ती से संबंधित सवाल उठाते हुए हुड्डा से जवाब मांगा था। दरअसल दैनिक भास्कर अखबार ने यह समाचार प्रकाशित किया था कि अफसरों की भर्ती में मुख्यमंत्री के रिश्तेदार और हरियाणा के विधायकों व अधिकारियों के रिश्तेदारों की भर्ती की गई है। हुड्डा एक कार्यक्रम के सिलसिले में अंबाला पहुंचे तब उनसे सवाल किया गया था। तब उनका गुस्सा साफ देखने को मिला था।
 
अंबाला की घटना को अभी एक ही दिन बीता था कि हरियाणा के मुख्यमंत्री आज पानीपत में सलाहकार की भूमिका में आ गए। सम्मेलन पत्रकारों के संगठन का था, इसलिए उन्हें भी मौका मिल गया। अपने दिल में जो कुछ भड़ास थी, वह जमकर निकाली। अब यहां हुड्डा का विरोध करने वाला भी कोई नहीं था। करता भी कौन, किसी में इतनी हिम्मत है ही कहां। जब आप अपने सम्मेलन में पत्रकारों का एक दिन पहले अपमान करने वाले को मुख्य अतिथि ही बुला रहे हैं तो फिर हिम्मत कहां से पैदा होगी। किसी ने जिक्र तक करना उचित नहीं समझा। नहीं तो होना तो यह चाहिए था कि हुड्डा का कार्यक्रम ही स्थगित कर देते या फिर अगर वे आ ही गए तो मंच से ही अंबाला की घटना की कड़े शब्दों में मुख्यमंत्री के सामने ही निंदा की जाती। अब चुप रहने की बाद में कीमत भी मिली। मुख्यमंत्री ने संगठन को दस लाख रूपए देने की घोषणा जो कर डाली। 
 
अब बात हुड्डा की सलाहकार संपादक वाली भूमिका की हो जाए। सम्मेलन के दौरान मंच से अपने संबोधन में भूपेंद्र सिंह हुड्डा जब एक बार शुरू हुए तो फिर बोलते ही चले गए। बकौल हुड्डा पत्रकार को खबर लिखते समय सच्चाई तक जाने की आवश्यकता है और उसको एक सकारात्मक सोच के साथ चलना चाहिए। सकारात्मक सोच से समाज व देश का फायदा होता है। लेकिन यह दुःख की बात है कि मीडिया अपने लक्ष्य से दूर होता जा रहा है। खोजी पत्रकारिता खत्म होती जा रही है। हुड्डा यहीं नहीं रूके। आगे उन्होंने आजादी से पूर्व पत्रकारिता का जिक्र कर डाला। बोले आजादी से पूर्व जिस प्रकार पत्रकारों का लक्ष्य था, उसी मिशन भावना से ही आज एक पत्रकार को अपनी लेखनी का प्रयोग करना चाहिए तभी एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकेगा। यही नहीं हुड्डा यह बताना भी नहीं भूले कि हरियाणा में कांग्रेस सरकार ने पत्रकारों के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम किए हैं। हरियाणा देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां मीडिया नीति लागू की गई है। हर नीति में सुधार की सदैव सम्भावना होती है और वे चाहते हैं कि हरियाणा और अधिक बेहतर मीडिया नीति लेकर आए, जिससे पत्रकारों के लाभ के साथ-साथ समाज का भी भला हो।
 
हुड्डा की इन दिनों इस कार्यशैली से तो ऐसा लगता है कि हरियाणा में पत्रकारों के लिए आने वाले दिन ठीक नहीं लगते। हो सकता है कि आगे हुड्डा साहब कागज कलम लेकर खुद ही खबर लिखकर न दिखा दें।
 
हरियाणा से दीपक खोखर की रिपोर्ट

भदोही में पत्रकार को लूटे जाने के सात माह बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

आपराधिक वारदातों के बोझ से हांफती भदोही पुलिस ने अपराध और अपराधियों के सामने हाथ खड़ा कर दिया है। किसी भी संगीन अपराध का सहजता से मुकदमा दर्ज कर फजीहत नहीं करवाना चाहती। अपराधों में कमी लाने का उसने एक तरीका खोज निकाला है, न मुकदमा दर्ज होगा और न ही अपराध बढ़ेगा। 
 
खुदा न खास्ते न्यायालय के आदेश पर अगर रपट दर्ज भी कर ली गयी तो तफतीश में अपराधियों को इतना मौका दे दिया जाता है कि वह साक्ष्य मिटाने में सफल रहे। हालात तो यहां तक बिगड़ गए है कि आपके पास सत्ता और जेब का पावर नहीं है तो अपहरण, डकैती, लूट, चोरी के बड़े मामलों में भी एफआईआर दर्ज करवाना हथेली पर दूब जमाने जैसा है। एफआईआर दर्ज करवाने के तथाकथित मानक पर यदि आप खरे नहीं उतरे तो फिर परिक्रमा करते रहिए, चप्पल घिस जायेगी, लेकिन मामला दर्ज नहीं होगा। यहां आने वाली तमाम अर्जिया रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती हैं। आईजी, डीआईजी, डीजीपी व पुलिस अधीक्षक को दी जाने वाली शिकायती प्रार्थना पत्रों की भी सुनवाई नहीं की जाती है। कुछ ऐसा ही आपबीती है संतरविदासनगर भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी की। 
 
सात माह पहले पत्रकार का घर-बार लूटे जाने के बाद कार्रवाई न होने पर अर्जी जिला न्यायालय में दी गयी। न्यायालय के आदेश पर 156 (3) के तहत काफी हीलाहवाली के बाद कोतवाली पुलिस रपट तो दर्ज कर ली, लेकिन तीन माह बाद भी कार्रवाई नहीं कर सकी। आरोपी खुलेआम छुट्टा साड़ की तरह घूम रहे है। ऐसा इसलिए कि आरोपी धनवान व दबंग है और इन पर पूर्वांचल के कई ईनामी माफिया व बाहुबलि जनप्रतिनिधियों सहित पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का उन पर संरक्षण है। 
 
सात माह पहले तत्कालीन कोतवाल संजयनाथ तिवारी के सह पर विनोद गुप्ता पुत्र स्व बाकेलाल गुप्ता व सुमित उर्फ बिट्टू गुप्ता पुत्र विनोद गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही आदि कमरे का ताला तोड़कर कम्प्यूटर, कैमरा सहित 20 लाख से भी अधिक का घरेलू सामान लूट गये। घटना की सूचना तत्काल दिए जाने के बावजूद भी पुलिस ने रपट दर्ज नहीं की। 
 
गौरतलब है कि सुरेश गांधी पिछले 15 सालों से मेहीलाल बिल्डिंग अयोध्यापुरी कालोनी स्टेशन रोड भदोही में किराये के मकान में रहते थे। उनके साथ उनकी पत्नी रश्मि गांधी व दो बच्चे सेजल व साहिल भी रहते थे। श्री गांधी 1996 से पत्रकारिता से कर रहे हैं। वह 1996 से 2012 तक हिन्दुस्तान, तीन साल से टीवी न्यूज चैनल आज तक व एक साल से लखनऊ-वाराणसी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स भदोही के ब्यूरोचीफ हैं। वह सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों के साथ-साथ गरीब, दलितों व पीड़ितों की आवाज को प्रमुखता से उठाने के अलावा प्रशासनिक व जनप्रतिनिधियों की खामियों को भी उजाकर करते थे। इससे कुपित लोगों के दवाब में साजिश के तहत कोतवाल भदोही संजयनाथ तिवारी बिना किसी अपराध के धारा 110 जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत उपजिलाधिकारी को रिपोर्ट दी। 
 
इस रिपोर्ट के बाबत जब श्री गांधी ने 23 मार्च 2013 को दोपहर में एसडीएम न्यायालय में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई की कार्यवाही के तीनों मुकदमों में पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त है, तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही को साजिश में लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रपट दर्ज कर दी और गुडां एक्ट की कार्यवाही कर रिपोर्ट डीएम को दी। डीएम ने बगैर मौका दिए 9 अप्रैल 2013 को जिला बदर कर दिया। इसी बीच उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने 20 मई को जिलाबदर की कार्यवाही पर रोक लगा दी। इसके पूर्व पत्रकार पर जब गुण्डाएक्ट व जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर था तो 7 मई 2013 को मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता पुत्र स्व. बाकेलाल आदि ने कमरे का ताला तोड़कर विज्ञापन के 1.5 लाख नगद, जेवर, जरूरी कागजजात व तमाम साक्ष्य उठा ले गये। इसकी सूचना पत्रकार की पत्नी रश्मिी गांधी ने कोतवाली से लेकर एसपी तक को दी, लेकिन रपट नहीं लिखी गई। 30 मई 2013 को लूट की प्रार्थना पत्र तैयार कर पहली जून 2013 को सुबह सीजीएम न्यायालय में 156 (3) जाब्ता फौजदारी के अन्तर्गत याचिका दायर की और सुबह 10 बजे कमरे पर आकर अपनी मौसी के बेटे के शादी में शामिल होने के लिए रांची चले गये। उसी दिन पुलिस की मौजूदगी में शाम 4 बजे मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता आदि कमरे का ताला तोड़कर 15 साल से तिनका-तिनका जुटाई गई 20 लाख से भी अधिक की सम्पत्ति व विवाह में मिले सामानों व जेवरात आदि लूट ले गए। फर्जी मुकदमों में हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बाद भी गांधी को गिरफ्तार कर सरेराह बेइज्जत किया गया। पुलिस ने मकान मालिक द्वारा गलत तरीके से दर्ज मुकदमें में चार्जशीट लगा दी। इस उत्पीड़न की शिकायत श्री गांधी ने कोतवाली पुलिस से लेकर मुख्यमंत्री, डीजीपी, आईजी, डीआईजी व एसपी को दी, लेकिन रपट दर्ज नहीं की गयी। 
 
अब जब सुरेश गांधी व उनकी पत्नी की अलग-अलग प्रार्थना पत्र में जिला न्यायालय के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 156(3) के तहत रपट दर्ज करने का आदेश दी। मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन माफियाओं के दवाब में कार्यवाही नहीं कर रही। आरोपी खुलेआम घूम रहे है। लूटे गए सामानों की पुलिस बरामदगी नहीं कर रही है। इससे इस ठंड में बच्चों की पढाई लिखाई, रहन-सहन प्रभावित तो हो ही रहा है, श्री गांधी अपनी पत्रकारिता भी नहीं कर पा रहे हैं।

पत्रकारों से बदसलूकी के मामले पर हरियाणा में राजनीति गरमाई

अम्बाला में मीडियाकर्मियों से बदसलूकी का मामला अब गरमाता जा रहा है. मुख्यमंत्री के द्वारा पत्रकारों से बदसलूकी के मामले पर इनेलो पार्टी ने मुख्यमंत्री के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और हरियाणा सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का पुतला फूंका. इनेलो ने हुड्डा से पत्रकारों से माफी मांगने की मांग की है.
 
गौरतलब है कि हरियाणा के सीएम भूपेन्द्र सिंह हुड्डा एचसीएस भर्ती में अपने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने के सवाल पर मीडियाकर्मी पर बुरी तरह भड़क गए थे. अब इस मामले को विपक्ष जमकर भुनाना रहा है और हुड्डा सरकार को इसी बहाने घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता. इनेलो के युवा अध्यक्ष संदीप राणा ने कहा कि हुड्डा का मीडिया से ये व्यवहार शर्मनाक और मीडिया की आजादी पर कुठाराघात था. हुड्डा को पत्रकार समाज से माफी मांगनी चाहिए और भर्ती मामले की न्यायिक जांच करवानी चाहिए.

जनभावनाओं को नहीं समझ पाई कांग्रेस

राजस्थान विधानसभा के लिए पड़े रिकॉर्ड मतदान इसका संकेत था कि इस बार प्रदेश के चुनाव परिणामों में कुछ बड़ा उलटफेर होने वाला है। ऐसा हुआ भी। भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और 162 सीटों पर कब्जा किया। वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। दूसरी बार वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री का ताज पहना। अपने पिछले मुख्यमंत्री कार्यकाल में वसुंधरा राजे काफी लोकप्रिय हुईं थी। इसीलिए जनता ने एक अच्छे राजनीतिज्ञ को सत्ता में लाने की चाह में उन्हें फिर से चुना।
 
राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजे काफी चौकाने वाले रहे। खुद सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि भाजपा भी इन परिणामों से हतप्रभ है। स्वयं अशोक गहलोत भी नहीं समझ पाए कि ये सब कैसे हो गया। सारे आकलन धवस्त हो गए। विकास के नाम पर चुनावी मैदान में उतरी गहलोत सरकार के कई दिग्गज मंत्री ढेर हो गए। बाइस मंत्री अपनी सीट से हार गए। केवल तीन मंत्री ही वापसी कर पाए। कांग्रेस के हुए सफाए में गत चुनाव में जीते करीब सभी विधायकों का सूपड़ा साफ हो गया। पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में जीते 96 में से 76 विधायकों को पुनः उम्मीदवार बनाया था लेकिन इनमें से अशोक गहलोत सहित मात्र चार उम्मीदवार ही जीत सके। 17 जिलों में कांग्रेस का सफाया हो गया तो 12 जिलों में एक-एक सीट ही मिली। कांग्रेस मात्र 21 सीटों पर सिमट कर रह गई। गुजरात की राज्यपाल कमला के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी आलोक एवं हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया के पुत्र एवं कांग्रेस प्रत्याशी ओमप्रकाश पहाड़िया भी चुनाव नहीं जीत सके। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार और यौन शोषण के आरोपों में लिप्त नेताओं के परिजनों को भी टिकट दिया। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। मतदाताओं ने वंशवाद और परिवारवाद को नकार दिया। तीसरा मोर्चा खड़ा करने का सपना संजोए बैठे किरोड़ी लाल मीणा को भी महज चार सीटों से ही संतोष करना पड़ा जबकि सवाईमाधोपुर सीट से तो उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। मतदाताओं ने अपने दिल की आवाज सुनी और भाजपा का नेतृत्व कर रही वसुंधरा राजे को चुना।
 
दरअसल, अशोक गहलोत सरकार ने अपने कार्यकाल के शुरुआती तीन साल तक राजशाही अंदाज में सत्ता पर राज किया। चुनाव नजदीक आते ही सरकार की ओर से ताबड़तोड़ घोषणाएं की गईं। लोकार्पण व शिलान्यास की बाढ़ आ गई। मुफ्त दवा, मुफ्त जांच, पेंशन, दो रुपए किलो अनाज जैसे कई फैसले लिए। गहलोत सरकार को लग रहा था कि उनकी फ्लैगशिप योजनाएं उनकी नैया पार लगा देगी लेकिन नैया तो भाजपा की आंधी व मोदी लहर में डूब गई। ये सभी योजनाएं और फैसले भी सरकार की वापसी नहीं करा सकें। कांग्रेस ने जिस विकास के फार्मूले से सरकार बनाने का ख्वाब देखा था, वह ढह गया। चुनाव में महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे हावी रहे। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस की नीतियों को सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस जनभावनाओं को नहीं समझ पाई और अति आत्मविश्वास में रही। दूसरी तरफ गहलोत सरकार पूरे समय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी रही। गहलोत सरकार के मंत्रियों पर कई आरोप लगे। रिफाइनरी, नगरीय विकास, जमीन, डेयरी, पेयजल, बिजली, खनिज योजनाओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। दुराचार, यौन शोषण के आरोपों में मंत्री घिरे रहे। दबाव में उनसे मंत्री पद छीन लिया गया। इतना ही नहीं, कांग्रेस की आपसी खींचतान भी पार्टी को ले डूबी। पार्टी के कई नेता, मुद्दों की बजाए आपसी खींचतान में लगे रहे। सत्ता के प्रति उनकी महत्वाकांक्षाएं हावी रही। आखिरकार, सरकार की नाकाम नीतियों से कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.
 
लेखक बाबूलाल नागा विविधा फीचर्स के संपादक हैं.

‘टीम अन्ना’ और ‘आप’ को कुमार विश्वास ने बना दिया कौरव-पांडव सेना

लगता है टीम आप भी अब अन्ना एंड कंपनी को सस्ते में छोड़ देने के मूड में नहीं है. पिछले काफी दिनों से टीम अन्ना के सदस्य आप के सदस्यों पर राजनीति करने और आंदोलन को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं. टीम अन्ना के सरकारी लोकपाल पर सहमति जता देने पर अब आम आदमी पार्टी ने भी अन्ना और उनकी टीम को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है.
 
आज आम आदमी पार्टी के नेता और मशहूर कवि कुमार विश्वास ने आज अपने फेसबुक पेज पर अन्ना की तुलना भीष्म और द्रोण से की है जो राज्य के अन्याय से सहमत ही नहीं होते बल्कि उसका समर्थन भी करते हैं तथा खुद को पाण्डव बताया है और सच्चाई के लिए उनके बगैर और उनके खिलाफ भी लड़ने का इशारा कर दिया है. नीचे कुमार का फेसबुक स्टेटस दिया जा रहा है, इसे देखिए और इसमें छिपे संदेश को खुद पहचानिए…


Dr. Kumar Vishwas : महासमर में कभी-कभी ऐसा समय आता है कि पितामह भीष्म के मौन और गुरु द्रोण के सिंहासन से सहमत हो जाने पर भी कंटकपूर्ण पथ पर चल कर पाँच पांडवों को युद्ध ज़ारी रखना पड़ता है। सत्य की राह सारी परीक्षा दिए बिना आगे नहीं जाने देती, बाबा कबीर के अनुसार शीश दिए बिना परिणाम नहीं देती ! तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहे ! जय हिन्द

आम आदमी पार्टी नेता व कवि कुमार विश्वास के फेसबुक वाल से

पत्रकार के पोल खोल के बाद सीएम ने की अपने सचिव की विदाई

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चर्चित सचिव आलोक कुमार को हटा दिया है. उन पर खनन के मामलों में गड़बड़ी के आरोप लगे थे. इससे पहले वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का भी सारा काम देख रहे थे. स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन के सामने ही वीक एंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने इस योजना में धांधलियों के सारे सबूत भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दे दिए थे जिसके बाद आलोक कुमार और संजय शर्मा में तीखी झड़प हुई थी और बाद में सभी पत्रकारों ने खुल कर संजय का साथ दिया था. मामला इतना बिगड़ गया था कि स्वास्थ्य मंत्री के गनर तक अंदर भाग कर आ गए थे. 
 
बाद में वीकएंड टाइम्स ने लगातार इस योजना में धांधली की खबर छापी जिसके बाद आलोक कुमार ने यह योजना ही छोड़ दी. भड़ास ने यह पूरी खबर और प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो लगाया था जिसमें आलोक कुमार की कारगुजारियों की पूरी जानकारी दी गई थी.
 
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को देखना चाहिए कैसे अफसर उनकी लुटिया डुबो रहे हैं. वहीं वीकएंड टाइम्स को इस मामले को उठाने के लिए बधाई भी देना चाहिए कि जब बड़े बड़े पत्रकार आलोक कुमार की चमचागिरी में लगे रहते थे तब संजय शर्मा ने उनकी बोलती बंद कर दी. साथ ही संजय शर्मा ने ये भी साबित कर दिया कि अगर पत्रकार आज भी ईमानदारी से काम करें तो ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की पोल खुलने में देर नहीं लगती.

 

यह हिम्मत किसी शेर बिरादरी की महिला ही दिखा सकती है

शंभूनाथ शुक्ल : शत-शत नमन! आज दोपहर नोएडा फिल्म सिटी जाने के लिए जो टैक्सी मिली उसे एक महिला चला रही थीं। ऐसा पहली दफे हुआ। मैने पूछा कि टैक्सी चलाने का कैरियर उन्होंने क्यों ऑप्ट किया? उनका जवाब था कि कैरियर भी और मजबूरी भी। मुझे गाड़ी चलानी आती थी इसलिए पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर घर की गाड़ी चलाने की ख्वाहिश ने टैक्सी चलवाना शुरू करवा दिया। महिला बेहद सौम्य लेकिन अदम्य साहस की धनी दिखीं। 
 
उन्होंने बताया कि आज तक किसी ने भी उनसे बदसलूकी नहीं की न तो किसी अन्य ड्राइवर ने न ही किसी यात्री ने। उनके दो बच्चे हैं। लड़की एमए कर रही है और लड़का एमबीए की कोचिंग। हालांकि उनका पति आज एक अच्छे पद पर है। उन महिला के प्रति मेरा मन नमन करने लगा उनके साहस और उनकी हिम्मत व नेकनीयती को देखकर। उनके माथे पर चंदन का टीका एकदम दक्षिण भारतीय शैली में लगा हुआ था। पर उन्होंने बताया कि वह कोई दक्षिण भारतीय नहीं बल्कि दिल्ली की ही गूजर बिरादरी से है और उनके पति यादव हैं। मैने कहा कि यह हिम्मत किसी शेर बिरादरी की महिला ही दिखा सकती है पोंगा पंडितों की बिरादारी से नहीं।
 
मुझे अचानक बाबू वृंदावन लाल वर्मा का मशहूर ऐतिहासिक उपन्यास मृगनयनी याद आ गया। इसकी नायिका यानी कि मृगनयनी एक गूजर युवती है जो ग्वालियर के राजा मानसिंह को अपनी वीरता और तीर चलाने के अपने कौशल से मंत्रमुग्ध कर देती है। कालांतर में वही गूजर युवती ग्वालियर की राजरानी बनती है। और बाद के युद्धों में राजा मान सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती है।
 
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से

पंजाब केसरी के खिलाफ अखबार विक्रेता हड़ताल पर, रिपोर्टर बेचेंगे अखबार

जम्मू में अखबार विक्रेताओं की यूनियन ने पंजाब केसरी के खिलाफ रविवार को हड़ताल की घोषणा कर दी है. अखबार विक्रेता काफी समय से पंजाब केसरी के प्रबंधन से कमीशन बढ़ाये जाने की मांग कर रहे थे. जम्मू सरकुलेशन हेड अमित चोपड़ा से वेंडर एसोसिएशन की वार्ता असफल होने के बाद यूनियन ने कल रविवार को पंजाब केसरी के वितरण के बहिष्कार का फैसला किया है.
 
पंजाब केसरी के द्वारा अखबार विक्रेताओं को 25% कमीशन दिया जा रहा है लेकिन वेंडर इसे 30% बढ़ाने की मांग कर रहे थे. पंजाब केसरी प्रबंधन द्वारा उन्हें बार-2 आश्वासन देकर टाल दिया जा रहा था. इस सम्बन्ध में पिछले रविवार को वेंडर एसोसिएशन के सदस्यों और पंजाब केसरी के जम्मू सरकुलेशन हेड के बीच वार्ता हुई जिसमें सरकुलेशन हेड ने कमीशन बढ़ाने से मना कर दिया. अगले दिन सोमवार को यूनियन ने पंजाब केसरी प्रबंधन को पत्र लिखकर 15 दिसम्बर को हड़ताल पर जाने की सूचना दे दी.
 
जब इस बारे में जम्मू न्यूज पेपर वेंडर एसोसिएशन के चेयरमैन संजीव केसरी से भड़ास4मीडिया ने बात की तो उन्होंने कहा वेंडरों की मांग बिल्कुल जायज है. मंहगाई बढ़ी हुई है ऐसे में हर चीज के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन पंजाब केसरी प्रबंधन इनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा था. वहीं जागरण और अमर उजाला जैसे अखबार वेंडरों की मांग पर अपनी कमीशन 30% कर चुके हैं. अभी केवल एक दिन की हड़ताल पर जा रहे हैं लेकिन अगर जल्द ही मांग ना मांगी गई तो अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चलें जायेंगे.
 
वहीं खबर आई है कि पंजाब केसरी प्रशासन, जालंधर ने अखबार बेचने की जिम्मेदारी रिपोर्टरों के ऊपर डाल दी है. कल सुबह सभी रिपोर्टरों को वितरकों की दुकान तक अखबार पहुंचाने को कहा गया है.

छत्तीसगढ़ चुनाव में कांग्रेस ने बांटे पत्रकारों को पैसे, एक्सप्रेस के पत्रकार का खुलासा

रायपुर । छत्तीसगढ़ में बेशक कांग्रेस सत्ता बनाने में नाकाम रही हो लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए उसने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। वैसे यह नई बात तो नहीं है पर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में चुनाव के दौरान पत्रकारों की खरीद फरोख्त की। राजधानी रायपुर के 100 पत्रकारों और छायाकारों की सूची तय की गई, जिनके लिए 5 हजार से 50 हजार रूपए तय किए गए। यह राशि नकद राशि पार्टी इलेक्शन फंड के नाम पर थी, जो कुल मिलाकर 20 लाख रूपए बनती है। इंडियन एक्सप्रेस ने 14 दिसम्बर के अंक में यह खुलासा किया है। एक्सप्रेस के पत्रकार आशुतोष भारद्वाज ने कांग्रेस के इस खेल का भंडाफोड़ किया है। भारद्वाज को भी यह राशि ऑफर की गई थी लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया और जब उन्होंने विरोध जताया तो कांग्रेस पार्टी को माफी तक मांगनी पड़ी।
 
तमाम खबर तो एक्सप्रेस में है लेकिन हर बार की तरह इस बार फिर यहां अनुवाद किया जा रहा है, जिसमें तमाम सार है। एक्सप्रेस के पत्रकार के पास वह सूची है, जिसमें सभी 100 पत्रकारों और छायाकारों के नाम के आगे राशि लिखी गई है। कांग्रेस की नई बनी मीडिया सेल ने सारा प्रबंध किया। इस मीडिया सेल का गठन ही पत्रकारों को मैनेज करने के लिए किया गया। इस सेल का नेतृत्व पार्टी के महासचिव एवं पूर्व विधायक रमेश वारलयानी ने रायपुर के पत्रकारों एवं छायाकारों की सूची व उनके लिए राशि तय की। वारलयानी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा का नजदीकी बताया जाता है।
 
इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद सूची में सभी अंग्रेजी व हिंदी के प्रमुख समाचार पत्रों, टीवी चैनलों, न्यूज एजेंसी के पत्रकारों, कैमरामैन व छायाकारों के नाम हैं। 6 पेज की इस सूची में हर पेज पर वारलयानी के हस्ताक्षर हैं। साथ ही हर नाम के आगे राशि लिखी गई है। पत्रकारों के लिए 15 हजार, 25 हजार व 50 हजार और कैमरामैन के लिए 5 हजार रूपए। कुल मिलाकर कांग्रेस ने 20 लाख रूपए मंजूर किए। इस सूची में इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार को नेशनल प्रेस की सूची में रखा गया। वारलयानी ने एक्सप्रेस के पत्रकार को चुनाव के बारे में चर्चा करने के लिए रायपुर के काफी हाउस में बुलाया। वहीं पर उसे कांग्रेस इलेक्शन फंड के नाम पर नगद राशि ऑफर की गई। एक्सप्रेस के पत्रकार ने यह राशि लेने से इंकार कर दिया और बाहर चला आया। बाद में वह वारलयानी से उसके कार्यालय में मिला और इस बारे में जबरदस्त विरोध जताया। वारलयानी ने माफी मांगी और कहा कि उनका इरादा भावनाएं आहत करने का नहीं था।
 
एक्सप्रेस के पत्रकार ने वह सूची हासिल की और बाद में एक्सप्रेस के पत्रकार ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष चरण दास महंत और प्रदेश प्रभारी बीके हरिप्रसाद को इस बारे में मैसेज किया। जिसमें लिखा गया कि वे वारलयानी ने उन्हें कांग्रेस इलेक्शन फंड के नाम पर नगद राशि ऑफर की। वे इस बारे में शिकायत दर्ज करवाना चाहते हैं। साथ ही उनका पक्ष भी जानना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस के दोनों ही नेताओं ने इस पर बात करने से इंकार कर दिया। कांग्रेस की इस सूची में एक्सप्रेस के पत्रकार के नाम के आगे 50 हजार रूपए लिखे गए, लेकिन उन्हें 25 हजार रूपए ऑफर किए गए।
 
बाकी पत्रकार भी करें खुलासा
 
इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार ने आगे आकर तमाम खुलासा किया है। जब यह राशि 100 पत्रकारों और छायाकारों के लिए थी तो बाकी भी इस बारे में खुलासा करें। कितने ऐसे हैं जिन्होंने यह राशि ली। कम से कम न लेने वाले ही आगे आएं। यह मामला सिर्फ रायपुर का नहीं है बाकी जगहों पर भी यह खेल चला हो, लेकिन कितनों में दम है, जो स्वीकार कर सकें।
 
युवा और तेजतर्रार पत्रकार दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क- 09991680040

मैं उस जगह भी इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ हूं जिनका नाम आप लेना भूल गए हैं

Samar Anarya : जी हाँ, मैं इजिप्ट में इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ़ हूँ, तुर्की में खिलाफ़ हूँ, मोरक्को में खिलाफ़ हूँ, अल्जीरिया में खिलाफ़ हूँ, फिलिस्तीन में खिलाफ़ हूँ , सीरिया में खिलाफ़ हूँ. मैं हर उस जगह भी इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ हूं जिनका नाम आप लेना भूल गए हैं जैसे पाकिस्तान और अफगानिस्तान. पर साहब यह मेरी दिक्कत नहीं है कि आप को इस्लाम और इस्लामिक कट्टरपंथियों में फर्क करने की सलाहियत नहीं आई. इन सारे मुल्कों की अवाम, इस्लामिक अवाम, भी इन कट्टरपंथियों के खिलाफ है. बाकी अगर आपका इस्लाम अब्दुल कादिर मुल्ला और सय्यद क़ुतुब तक जाकर ही खड़ा हो जाता है तो मुझे आपसे हमदर्दी भी जरुर है. 
 
ज़रा कोई बांग्लादेशी अखबार पढ़ लीजियेगा, जिस बीबीसी का लिंक आपने दिया है उसी की तस्वीरों में मीरपुर के कसाईं के लिए मौत मांगती आखों में आग और हाथों में मशाल लिए सड़कों पर उतर आयी लाखों बांग्लादेशी औरतों को देख लिया होता. खैर, वह आपकी मर्जी, मेरे बारे में कोई मुगालता न पालिए. मुझे किसी धर्म से नफरत नहीं है (मुहब्बत भी नहीं है वैसे) और दुनिया के सारे धर्मान्धों से नफरत है. बला की हद तक.. बाकी मैं फिर भी फांसी की सजा के खिलाफ हूँ. फांसी तो किसी को नहीं होनी चाहिए, न अब्दुल कादिर मुल्ला को न माया कोडनानी को. सबसे बर्बर अपराधियों के सामने भी इंसान बने रहने से बड़ी हार आप उन्हें नहीं दे सकते.
 
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' उर्फ समर अनार्य के फेसबुक वाल से

फिल्म देखने के बाद बरबस उस चैनल की वो मैडम याद आती रहीं

Vikas Mishra : 2003 की बात है। मैं दैनिक जागरण मेरठ का सिटी चीफ हुआ करता था। एक बड़े चैनल की एक मैडम जी (निश्चित रूप से असाइनमेंट डेस्क पर रही होंगी) को कहीं से मेरा नंबर मिला। वो हर तीसरे दिन फोन करके मुझसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खबरें लिया करती थीं। कोई भी बड़ी खबर होती थी मेरठ से मुरादाबाद के बीच तो वो मुझसे पूछ लेती थीं। दस में नौ बार उनका काम बन भी जाता था। कई बार मौके पर मैंने उनके चैनल के लिए बड़े अधिकारियों के फोनो भी चलवाए। एक बार तो मेरा फोनो भी उन्होंने चलवाने की कोशिश की, लेकिन होल्ड ज्यादा करवा दिया, मैंने फोन काट दिया। 
 
बहरहाल वो अपने चैनल में काफी सीनियर थीं और मैं तो दैनिक जागरण में बड़ी पोजीशन पर था। बराबरी के स्तर पर बात हुआ करती थी। हर दूसरे-तीसरे दिन। उनका फोन लैंड लाइन नंबर से आता था, मैंने मोबाइल नंबर मांगा भी नहीं कभी। मुझे ऐसा लगने लगा कि जब भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आना चाहूंगा, तो ये मैडम खट से मेरी नियुक्ति करवा देगी। मैंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कई दोस्तों से भी कहा कि जब चाहूं, 'उस' चैनल में जा सकता हूं। खैर… एक दिन मेरी जिम्मेदारी बदल गई और मैं प्रादेशिक डेस्क पर चला गया। रवि शर्मा नए इंचार्ज हुए सिटी के। मैडम का फोन आया किसी खबर के लिए..। मैंने बताया कि मेरी जिम्मेदारी बदल गई है, बेहतर रवि बता सकते हैं, रवि का नंबर है–….। मैडम ने पूरी बात सुनी नहीं और फोन काट दिया। उसके बाद उनसे कभी बात नहीं हुई। 
 
ये अलग बात है कि मैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आ गया, देश के नंबर वन न्यूज चैनल आजतक में अच्छे खासे हैसियत में काम कर रहा हूं, लेकिन उन मैडम जी की फितरत ने मुझे हैरान कर दिया। अभी रात में मैंने फिल्म पीपली लाइव देखा। देख नहीं पाया था पहले। उसमें भी एक चैनल की मैडम पीपली आती हैं, जहां अखबार का वो रिपोर्टर मिलता है, जिसने ये खबर सबसे पहले लिखी थी (ये भूमिका नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाई है)। वो मैडम की पूरी सहायता करता है, जी जान से। उसे लगता है कि मैडम थोड़ा भाव देने लगी हैं। वो अपना बायो डाटा उन्हें देता है। जिसे वो लौटा देती हैं, उन्हें मतलब है तो बस अपनी स्टोरी से और रिपोर्टर मरा जा रहा है कि मैडम को कोई परेशानी ना हो। आखिरकार वो मर भी जाता है…। फिल्म देखने के बाद बरबस याद आती रहीं उस चैनल की वो मैडम जिनसे सवा साल तक लगातार अच्छी बातें होती रहीं।
 
आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत विकास मिश्रा के फेसबुक वाल से

वीके सिंह की जगह मोदी होते तो अन्ना गोपाल राय को इंडिया से बाहर भेज देते

Om Thanvi : ये अण्णा को क्या हुआ? गोपाल राय को गांव छोड़ने को कह दिया? झुंझलाहट असीम थी तो राय को सभा से विदा होने को कह सकते थे। गांव कोई रियासत तो नहीं होता। वीके सिंह ने अण्णा के सामने आप पार्टी पर हमला बोला। गोपाल राय तीव्र बचाव करने लगे। न जनरल को अण्णा के मंच पर इतना बड़बोला होना चाहिए था; न गोपाल राय को इतना नाजुकमिजाज। … पर वीके सिंह 'आप' के खिलाफ बोलें और अण्णा सुनते रहें, बल्कि जनरल की उग्र तरफदारी भी करें, तो कल इसके मायने क्या ये नहीं निकाले जाएंगे कि बीच में नरेंद्र मोदी की छाया में भी बैठ आए वीके सिंह अब अण्णा के नए सलाहकार और प्रवक्ता हो चले हैं?
 
Prem Prakash : अन्ना जी गाँधीवादी आदमी हैं,इसीलिए तो कल उन्होंने गोपाल राय को गाँव छोड़कर चले जाने को कह दिया. अब वो तो जनरल वीके सिंह थे मंच पर, इसलिए गाँव से निकालकर संतुष्ट हो गये अन्ना जी. कहीं खुद मोदी जी होते वीके सिंह की जगह तो अन्ना जी गोपाल राय को इंडिया से ही बाहर कर देते. गांधीवादी हैं आखिर. अब ये कौन तय करे कि अन्ना जी की आज जो हैसियत है, वो अरविन्द केजरीवाल ने बनाई थी या जनरल वीके सिंह ने..! या ये भी कौन तय करे कि अरविन्द केजरीवाल की जो हैसियत है आज,वो अन्ना ने बनाई है या अरविन्द ने खुद..?कल अन्ना जी के गाँव से जो खबर आई है, उसमें अच्छी बात एक ही है कि मोदी जी की जनता बहुत खुश है…खुश तो राहुल गाँधी की जनता भी है, लेकिन वो लोग ख़ुशी जाहिर नही कर पा रहे हैं….,अभी ताजा-ताजा मामला है न..दर्द बहुत है…
 
ओम थानवी और प्रेम प्रकाश के फेसबुक वाल से

जो औकात भूल रहे हैं, उनको डाक्टर केजरीवाल नीचे की तरफ इंजेक्शन लगा रहे हैं

Deepak Sharma : ATTN CHIDAMBARAMS & JAITLEYS हर एक फ्रेंड के लिए ये कोर्स ज़रूरी होता है मित्रों ये देश ना टूटने जा रहा है ना लुटने जा रहा है. केजरीवाल ना प्रधानमंत्री बनने जा रहे और ना ही राहुल गाँधी को जनता इटली भगाने जा रही है. ना कश्मीर भारत से अलग होने जा रहा है ना असाम में किसी समुदाय को बहुमत मिलने जा रहा है. घबराए मत कुछ दिन के लिए बीमार देश एंटी बायोटेक के सेवन में है. जी हाँ बीमार का इलाज़ हो रहा है. जो अपनी हैसियत और औकात भूल रहे हैं ..जो बे अंदाज़ हो रहे हैं …उनको डाक्टर केजरीवाल नीचे की तरफ इंजेक्शन लगा रहे है. 
 
दिल्ली के नतीजे को इसी निगाह से देखें. प्लीज़ आप सब पार्टी लाइन से ऊपर उठें और स्वीकार करें की ये उपचार अभी ज़रूरी है. मित्रों क्या आप जानते है किस बदतमीजी से चिदंबरम पेश आते हैं ? क्या राहुल के गुरूर का आपको अंदाजा है ? घर के नौकर की तरह ये मातहत से बात करते हैं ? मोदी तो मोदी ..उनके निजी सचिव ओ पी सिंह खुद को आर के धवन से कम नही समझते ? अरुण जेटली का मतलब ना हो तो शायद नमस्कार का भी जवाब ना दे ? शाहनवाज़ जैसे नेता का स्टाफ अपने घर से मिलने वालों को भगा देता है ? सिब्बल और सलमान के दरवाज़े पर आम आदमी से कहीं ज्यादा पालतू कुत्तों की हैसियत है ? अहमद पटेल दलाल और डीलरों के अलावा किसी को भाव नही देते? ट्वीट का वक्त इस देश की नेता विपक्ष के पास है पर वो देश के कितने गांव में पिछले ५ साल में गयी हैं जरा बताएं? प्रकाश जावडेकर से जैसे दो टके के नेता का निजी जीवन सार्वजनिक हो जाए तो राजनीति खत्म हो जायेगी ? मायावती के ड्राइंगरूमरूम में क्या कोई दलित बैठ सकता है ? कमलनाथ के अभिमान की आप कल्पना कर सकते है ? किसी गरीब की कटी ऊँगली पर वो पे…..? 
 
दोस्तों नेताओं की लिस्ट बहुत लंबी है ..और इससे बुरा हाल सुब्रत राय, मुकेश अम्बानी और माल्याओं का है जिन्होंने भ्रष्ट और गैर कानूनी तरीके से अकूत संपत्ति हथिया के अधिशासी तंत्र से बलात्कार किया है ? मुझे खुशी है एक अदने से केजरीवाल ने इन सब मठाधीशों को उनकी औकात बता दी है ? यही इस देश की ताकत है . इसलिए घबराएं नही "आप" कोई नक्सल आंदोलन नही है ये एक दबाव समूह है जो सत्ता को उसकी हैसियत बता रहा है. अगर ये नेता तंत्र सबक लेकर खुद को ठीक कर लें तो इस से बेहतर देश के लिए कुछ नही. कुछ समझ आया चिदंबरम साहब ?
 
आजतक में कार्यरत दीपक शर्मा के फेसबुक वाल से

अब या तो सरकार बन जाएगी या फिर ‘समर्थन लिमिटेड कम्पनी’ का शटर गिर जाएगा

Prem Prakash : चलिए, दिल्ली से अच्छे संकेत मिल रहे हैं.अरविन्द केजरीवाल ने पिछले कुछ दिनों से बहुतों के पेट में सरकार बनाने के लिए जो दर्द उठा है, उसके लिए कुनैन जैसी एक गोली भेजी है. १० दिन का समय लेकर उन्होंने बिना शर्त समर्थन देने और दिलाने वाले राजनीति के व्यावसायिक घरानों से इस बिना शर्त समर्थन का मतलब पूछकर उनको सकते में डाल दिया है. 'आप' ने पूछा है कि बिना शर्त समर्थन का मतलब क्या है..?क्या कांग्रेस 'आप' के मुद्दों का समर्थन करती है..?यही सवाल चिट्ठी के जरिये बीजेपी और कांग्रेस अध्यक्ष से पूछा गया है.अब ये लोग लिख के बताएँगे कि हाँ या ना. घुटे हुए लोगों को उनके फील्ड में जाकर कुछ सिखाना हो तो ऐसे सवाल ईजाद करने पड़ते हैं भाई.चलिए अब या तो सरकार बन जाएगी या फिर 'समर्थन लिमिटेड कम्पनी' का शटर गिर जाएगा…
 
शंभूनाथ शुक्ल : अरविंद कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। ऐसा धोबी पाट मारा कि कांग्रेस और भाजपा चारों खाने चित्त गिरी जाकर। जय हो "आप" की। लोकसभा में दिल्ली, हरियाणा ही नहीं अब तो पूरा यूपी बिहार भी हिल गया। पटना, छपरा और बनारस तक हिल रहा है।
 
प्रेम प्रकाश और शम्भूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से

मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए

Dilnawaz Pasha : कल अरविंद केजरीवाल दिल्ली के उपराज्यपाल से मिल रहे हैं. मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल को सरकार बना लेनी चाहिए.
 
1. सरकार बनाने से उन्हें अपने विचारों को अमली जामा पहनाने का मौक़ा मिलेगा. अरविंद के बारे में यह आम धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है कि वे सिर्फ़ बोलते ही हैं, कुछ करने की चुनौती लेने से बचना चाहते हैं.
 
2. दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को बदलाव के लिए वोट किया है. यदि बीजेपी सरकार नहीं बना रही है तो आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने का जोख़िम उठाते हुए दिल्ली में बदालव की शुरूआत करनी चाहिए.
 
3. अरविंद की सरकार अल्पमत में भले ही रहेगी लेकिन भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस उनकी सरकार को गिराने का जोख़िम नहीं उठाएंगी वो भी तब जब लोकसभा चुनाव होने वाले हों. अरविंद की 'ईमानदार' सरकार को गिराने वाली पार्टी जनता की नज़रों में विलेन बनने का ख़तरा नहीं उठाएगी.
 
4. अरविंद को आगे बढ़ने से रोकने का विपक्षी पार्टियों के पास सबसे कारगरहथियार यह साबित हो सकता है कि वे उन्हें 'निकम्मा' साबित कर दें. अरविंद
पर सवाल उठाने का विपक्षी दलों को मौक़ा तभी मिल सकता है जब उनकी सरकार सत्ता में आए और काम करे. अरविंद बेहतर काम करके इस मौक़े को भी विपक्षियों से छीन सकते हैं.
 
5. अभी तक अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक व्यक्तित्व सिर्फ़ भाषणों और जनसभाओं तक ही सिमटा रहा है. जनता अब काम देखना चाहती है और काम करने के लिए सत्ता में आना ज़रूरी है।
 
इसलिए मुझे लगता है कि कल अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल की ओर से सरकार बनाने के न्यौते को स्वीकार करेंगे और दिल्ली में तेज़ी से काम कर देशभर में अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार करेंगे.
 
बीबीसी में कार्यरत दिलनवाज पाशा के फेसबुक वाल से

समाचार प्लस के बाद अब भास्कर न्यूज है अतुल अग्रवाल का पड़ाव

Atul Agrawaal : 'समाचार प्लस' के बाद अब 'भास्कर न्यूज़' है मेरा पड़ाव. जैसे ही मैनें फेसबुक पर अपडेट किया, संबंधित लोगों ने अपनी-अपनी तरह से प्रतिक्रियाएं देना शुरू किया. कई सारे फोन कॉल्स और टेक्स्ट मैसेज ऐसे भी आए जिसमें 'समाचार प्लस' की बुराई करके अपने नंबर बढ़ाने का खेल खेला गया. 
 
फोन करने वालों को तो मैनें 'हिन्दी' में समझा दिया कि 'समाचार प्लस' मेरे घर-परिवार जैसा है और श्री उमेश कुमार बड़े भाई हैं लेकिन जो लोग लगातार मोबाइल एवं फेसबुक पर 'ऐसे-वैसे' मैसेज करके मेरा दिमाग खा रहे हैं वो ऐसा करना तुरंत बंद कर दें अन्यथा उनके नाम और नंबर मैं फेसबुक पर अपलोड कर दूंगा. मैं पुनश्च स्पष्ट कर दूं कि 'समाचार प्लस' मेरा अपना चैनल है. इससे मेरी तमाम भावनाएं जुड़ी हुई हैं और उन्हें आहत करने का अधिकार किसी को नहीं है. किसी को भी नहीं.
 
अतुल अग्रवाल के फेसबुक वाल से

अमिताभ श्रीवास्तव, प्रणय यादव, शिवेन्द्र कुमार, सुकेश रंजन समेत कई इंडिया टीवी से जुड़े

लोकसभा चुनावों की तैयारियों के चलते इंडिया टीवी काफी संख्या में बदलाव देखने को मिल रहे हैं. आजतक से पिछले हफ्ते इस्तीफा देने वाले अमिताभ श्रीवास्तव ने बतौर सीनियर एक्सिक्यूटिव एडिटर ज्वाइन किया है. अमिताभ श्रीवास्तव आजतक की शुरूआत के साथ ही इस ग्रुप से जुड़े थे. कमर वहीद नकवी के आने के बाद से ही ये माना जा रहा था कि चैनल में आजतक से काफी लोग आ सकते हैं.
 
आजतक से ही आने वाले राहुल चौधरी को एक्सक्यूटिव एडिटर बनाया गया है. उन्हें रिपोर्टिंग टीम के हेड की जिम्मेदारी दी गई है. शमसेर सिंह को एडिटर करेंट अफेयर्स, प्रतीक द्विवेदी को असोसिएट एडिटर बनाया गया है. संदीप सोनवलकर भी इंडिया टीवी की एडिटोरियल टीम से जुड़ गये हैं. ये सभी आजतक से आये हैं.
 
वहीं टीवी9 से इस्तीफा देकर प्रणय यादव फिर से इंडिया टीवी में वापसी कर रहे हैं. उन्हें एक्सक्यूटिव एडिटर बनाया गया है. शिवेन्द्र कुमार भी एबीपी न्यूज छोड़कर बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर इंडिया टीवी के साथ जुड़ गए हैं. आईबीएन7 से का साथ छोड़कर आने वाले सुकेश रंजन को इंडिया टीवी का पॉलिटिकल एडिटर बनाया गया है.
 
इंडिया टीवी अपने जादू टोना चैनल वाली छवि से मुक्ति चाह रहा है. इसीलिए चैनल ने कमर वहीद नकवी को साइन किया था. अब लोकसभा चुनावों के चलते चैनल फिर सोच रहा है कि उसकी छवि एक गम्भीर न्यूज चैनल की हो क्यूंकि चुनावों के समय तो भूत-प्रेत देखेगे नहीं और चैनल की छवि ऐसी है नहीं कि लोग उस पर चुनावी चर्चा देखने के लिए चैनल ट्यून करें.

जादूगोड़ा प्रशासन द्वारा पीड़ित पत्रकार ने की खुद के नार्को टेस्ट की मांग

प्रिय यशवंत जी, अब जादूगोड़ा में अवैध चिटफंड संचालक कमल सिंह के एजेंटो द्वारा निवेशकों को परेशान करने के लिए झूठा मुकदमा किया जा रहा है, इस प्रकार के झूठे मुकदमो मे एजेंट अपनी पत्नी तक को शामिल कर रहे हैं और लोगों से कहते फिर रहे हैं कि औरत का केस टाइट होता है। अब पैर पकड़वाकर माफी मंगवाऊंगा साले को, पेपर में नाम छापने का बहुत शौक है ना.
 
मामला ये है कि जादूगोड़ा मे कमल सिंह का एक बड़ा एजेंट है बाल्मीकि प्रसाद मेहता. इसने भी लोगों का करोड़ों रूपये कमल के कंपनी में निवेश करवाया था. इन्हीं निवेशकों में से एक यूसिल सुरक्षा विभाग में कार्यरत रिटायर्ड फौजी श्री काशीनाथ सिंह ने चार लाख रूपये बाल्मीकि प्रसाद को दिसंबर 2012 को दिया था. पैसा लेते समय बाल्मीकि प्रसाद मेहता ने काशीनाथ सिंह से कहा था कि पैसों की जरूरत पड़ने पर चार दिन पहले बोल देना पैसा वापस कर दूंगा, मई 2013 से काशीनाथ सिंह अपना पैसा बाल्मीकि से वापस मांग रहे थे पर उन्होने पैसा वापस नहीं किया की इसी बीच कमल सिंह जादूगोड़ा से फरार हो गया. कमल के जादूगोड़ा से फरार होने के कुछ दिनों के बाद काशीनाथ सिंह ने जादूगोड़ा थाना में लिखित आवेदन देकर बाल्मीकि मेहता पर प्राथमिकी दर्ज करते हुए पैसे दिलाने की मांग की. लेकिन बाल्मीकि मेहता ने जादूगोड़ा थाना के दलाल टिकी मुखी के साथ मिलकर अपने ऊपर केस दर्ज नहीं होने दिया. 
 
इसके कई दिनों बाद 12 नवंबर 2013 को मैंने अखबार में कमल सिंह के बहुत से एजेंटों का नाम प्रकाशित किया जिसमें बाल्मीकि प्रसाद मेहता का नाम भी शामिल था. यह समाचार छपने के बाद थाना के दलाल टिकी मुखी के साथ मिलकर बाल्मीकि प्रसाद मेहता ने हमें सबक सिखाने एवं सच्चाई का मुंह बंद करवाने के उदेश्य से अपनी पत्नी श्रीमती सुनीता देवी (50 वर्षीय) से 30/12/2013 को एक झूठा मुकदमा कोर्ट से हम दोनों भाइयों पर यह कह कर दर्ज करवा दिया कि हम दोनों सगे भाइयों ने लगातार 12, 13 और 14 नवंबर को यूसिल कालोनी स्थित उनके घर जाकर उनसे छेड़खानी की और तीस हज़ार की रंगदारी मांगी. इसके अलावा एक और झूठा मुकदमा कोर्ट से काशीनाथ सिंह पर भी कर दिया जिसमें काशीनाथ सिंह पर 6.5 लाख की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है एवं 18/11/2013 को रात दस बजे घर मे तोड़फोड़ का आरोप लगाया है (जबकि सच्चाई यह है कि काशीनाथ सिंह 18/11/2013 को रात दस बजे यूसिल में ड्यूटी कर रहे थे). इस केस में मुख्य गवाह अपनी पत्नी सुनीता देवी को बनाया है एवं हमारे केस में थाने के दलाल टिकी मुखी के दोस्त हीरा यादव एवं हरीश भकत को गवाह बनाया गया है. यही हीरा यादव हमारे ऊपर किए गए पहले के तीन केस में भी गवाह है और यह जादूगोड़ा के भूमाफिया राजकुमार यादव का भाई है एवं हरीश भकत खुद कमल सिंह का बड़ा एजेंट है.
 
पूरे मामले मे काशीनाथ सिंह ने जादूगोड़ा पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाते हुए डीएसपी को बताया कि मैंने दो माह पहले ही आवश्यक कागजातों के साथ जादूगोड़ा थाने में केस दर्ज करने के लिए आवेदन दिया था और प्रतिलिपि पर जादूगोड़ा थाना के मुंशी के हस्ताक्षर भी हैं लेकिन निजी स्वार्थ के खातिर कोई कार्रवाई नहीं की गई बल्कि मुझ पर दवाब बनाने के लिए कोर्ट से झूठा मामला दर्ज करवा दिया गया और उसे थाना प्रभारी ने अविलंब दर्ज कर लिया ताकि मैं परेशान होकर अपना केस वापस ले लूं. अगर दो माह पहले ही बाल्मीकि पर कार्रवाई की गयी होती तो मुझ पर एवं पत्रकार बंधुओं पर इस प्रकार का झूठा मामला दर्ज नहीं होता. ये पूरी तरह से प्रशासन की मिलीभगत का मामला है.  
 
हमने अधिकारियों को लिखित दिया है कि एक साल से हम दोनों भाइयों को निशाना बनाकर कुछ असामाजिक तत्वों, जिसमें टिकी मुखी मुख्य रूप से शामिल है, ने पाँच पाँच झूठा मामला दर्ज़ कराया है. इनमें से कई मामलों को बड़े अधिकारियों ने अभियोजन के लायक भी नहीं समझा, इसीलिए बहुत जरूरी है कि केस करने वाले सभी लोग, सभी गवाहों के साथ, हम दोनों भाइयों का नार्को टेस्ट कराया जाए नार्को टेस्ट से पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी और मुख्य साजिशकर्ता कौन है यह भी पता चल जाएगा. अगर हम दोनों भाई किसी भी रूप में दोषी पाए गए तो हमें फांसी पर चढ़ा दिया जाए वरना उन्हीं धाराओं में उन सभी पर केस दर्जकर कार्रवाई किया जाए जो हमपर किया गया था. इस नार्को टेस्ट में होने वाले खर्च को हम दोनों भाई खुद वहन करेंगे चाहे इसके लिए हमे घर बार ही क्यों नहीं बेचना पड़े.
 
संतोष अग्रवाल
पत्रकार
जादूगोड़ा

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अरविन्द उज्जवल पहुंचे भास्कर, भुनेश्वर हिन्दुस्तान से जुड़े

पटना से प्रकाशित ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ का साथ छोड़ ‘दैनिक भास्कर’ जाने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। दैनिक हिन्दुस्तान के साथ 1996 से ही जुड़े विधि संवाददाता सह पटना हाइकोर्ट के स्थायी सलाहकार एवं वरीय अधिवक्ता अरविंद उज्जवल ने भी हिन्दुस्तान को गुडबॉय कह अपनी नई पारी दैनिक भास्कर के साथ शुरु की है। गौरतलब है कि इसके पूर्व भी हिन्दुस्तान से 16 लोग इस्तीफा देकर भास्कर का दामन थाम चुके हैं. 
 
1996 से अबतक मात्र 5670 रुपये मासिक वेतन पर हिन्दुस्तान में काम कर रहे अरविंन्द उज्जवल की विधि क्षेत्र में अपनी एक खास पहचान रही है तथा उनके परिवार के हरिवंश राय बच्चन परिवार से भी गहरे ताल्लुकात रहे हैं। अरविंद उज्जवल से जब बात की गई तो उन्होंने हिन्दुस्तान से इस्तीफा देने की पुष्टि की। 
 
आगामी 16 जनवरी से पटना से लांच होने वाले दैनिक भास्कर की आहट से सबसे ज्यादा क्षति हिन्दुस्तान को ही हुई है। लगातार लोगों के संस्थान छोड़कर जाने से पत्रकारों की कमी से जूझ रहे हिन्दुस्तान भी दूसरे अखबारों में सेंधमारी में लगा हुआ है. अखबार ने दैनिक जागरण के भुनेश्वर वात्सायन को पचपन हजार की सेलरी का वादा कर अपने साथ जोड़ा है. भुनेश्वर जागरण, पटना के लिए पुलिस मुख्यालय की बीट देख रहे थे.

कांग्रेस भी पार्टी है, धर्मशाला या अनाथालय तो नहीं है!!

रघुवीर सहाय की कविता की तर्ज पर कहा जाय तो चढ़ो चढ़ो जल्दी चढ़ो … भाजपा और कांग्रेस दोनों आप पार्टी को सूली पर चढ़ाने को बेताब हैं। कांग्रेस की बगैर शर्त समर्थन की पेशकश भी ऐसी ही कोशिश है। कि देखो समर्थन के बावजूद आप वाले आँख चुरा रहे हैं, कि वे सरकार बनाने से डरते हैं, कि वे झूठे वादों को कभी पूरा नहीं कर सकते। आप की मुश्किल शायद यह है कि कांग्रेस इतनी भली हुई कबसे? उसका भरोसा क्या? कौन जाने मौका देखकर कब सरे राह पीठ से उतार कर चलती बने! … 
 
हाँ, कांग्रेस गारंटी दे कि चाहे कुछ भी हो, विरोध करेंगे पर सरकार बनाने को दिया औपचारिक समर्थन पांच साल तक कायम रहेगा, आप अपना जादू दिखाए – तो बात बन सकती है। … मगर साहब, यह बिसात है। सियासत है। कांग्रेस भी पार्टी है, धर्मशाला या अनाथालय तो नहीं है!!
 
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वाल से

जब वो शख्स मुझे गाली दे रहा था, तो तुमने क्या किया?

Vikas Mishra : फरवरी 2005 की बात है। चैनल-7 (अब आईबीएन 7) की शुरुआत होनी थी, हम सब की ट्रेनिंग चल रही थी सूरजकुंड के एक होटल में। एक सेशन में देश की जानी मानी वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहन आई थीं। उन्होंने बताया कि एक बहुत बड़े नेता के खिलाफ उनके पास स्टोरी आई थी। स्टोरी धमाकेदार थी। स्टोरी देने वाले से उन्होंने पूछा- हू वांट टू प्लांट दिस स्टोरी। यानी कौन चाहता है कि ये स्टोरी छपे, उसका इसमें स्वार्थ क्या है। वो घटना मन में बस गई।
 
मेरे ही कभी के एक कनिष्ठ साथी ने मेरे एक बहुत ही प्रिय रहे एक साथी के बारे में कहा- सर फलाने सर तो आपको गाली दे रहे थे। मैंने पूछा- जब वो गाली दे रहा था, फिर तुमने क्या किया। उसे डांटा होगा, मारा होगा। वो सकपकाते हुए बोला नहीं सर मैं उनके साथ दारू पी रहा था। मैंने कहा तब तो तुमने जरूर गिलास फेंक दी होगी, ये कहते हुए निकल गए होगे कि नहीं मैं विकास सर के खिलाफ कुछ नहीं सुनूंगा। जाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। फिर मैंने उसे कड़ी फटकार लगाते हुए कहा- कमीने, तू मेरे और उस साथी के बीच दूरियां बढ़ाना चाहता है, ऐसा तूने किया क्यों। 
 
बहरहाल… इन दोनों बातों के जरिए मैं कहना चाहता हूं कि जब भी कोई आपके किसी अपने के खिलाफ कुछ कहे तो सबसे पहले इस पर विचार करें कि ये बात आपको बताकर ये शख्स चाहता क्या है। दूसरा- क्या आपके उसके रिश्ते इतने कमजोर हैं कि आप किसी तीसरे शख्स की बात सुनना चाहेंगे, मसले पर सीधे अपने उस साथी से बात नहीं करेंगे..? तीसरा- आपके किसी से अच्छे रिश्ते हैं तो क्या आपके बाकी साथी उसे आसानी से पचा पा रहे हैं। और चौथा- पंचतंत्र पढ़ें, कैसे शेर और बैल आपस में घनिष्ठ मित्र थे, लेकिन शेर कान का कच्चा था। करकट-दमनक नाम के सियार उसका कान भरते थे। बिना एक दूसरे के प्रति खता किए शेर और बैल घनिष्ठ दोस्त से दुश्मन बन गए। वफादार मित्र बैल बिना गुनाह मारा गया। इसीलिए कहता हूं कि अपने हर रिश्ते को करकटों-दमनकों से बचाइए। वैसे भी सियारों की बातों पर चलना शेर को शोभा नहीं देता। पोस्ट बड़ी हो गई, ज्ञान ज्यादा हो गया, माफ कीजिएगा। जिन्होंने पूरी पढ़ी, उन्हें धन्यवाद।
 
पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वाल से

अपनी वैचारिकी से पलटी मारना सीखना हो तो साहित्य भूषण वीरेंद्र यादव से सीखें

नौ-दस महीने में ही अपनी वैचारिकी से पलटी मारना किसी को सीखना हो तो वह लखनऊ के साहित्य भूषण वीरेंद्र यादव से सीखे। इसी बरस बीते मार्च में लखनऊ सोसाइटी ने लखनऊ लिटरेचर फ़ेस्टिवल आयोजित किया था। तब उनको उस कार्यक्रम में बुलाया गया था कि नहीं यह बात तो आयोजक और वह ही जानें। पर तब वीरेंद्र यादव ने हिंदुस्तान अखबार में साहित्य का फ़ेस्टिवल हो जाना शीर्षक से रुदन में लबालब एक टिप्पणी लिखी थी।
 
इस टिप्पणी में उन्होंने प्रेमचंद को बड़ी शिद्दत से याद किया था। लखनऊ में हुए लेखक सम्मेलन मे प्रेमचंद के भाषण को उन्होंने कोट किया था, 'साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उस का दर्जा इतना न गिराइए।'  आगे उन्होंने लिखा कि, लगता है प्रेमचंद की इस नसीहत से सबक लेते हुए लिट फ़ेस्ट के आयोजकों ने महफ़िल तो सजाई और मनोरंजन का सामान भी जुटाया लेकिन यह सावधानी भी बरती कि उन लेखकों को दूर ही रखा जाय जिनके दिलों दिमाग में प्रेमचंद के कथन की अनुगूंज अभी तक रची-बसी है। संभवत: इसी के चलते आयोजन के निमंत्रण पत्र में किसी हिंदी लेखक का नाम था और न ही एकाध अपवादों को छोड़ कर किसी को आमंत्रण।
 
ऐसी गलतबयानी वीरेंद्र यादव ही कर सकते हैं। नरेश सक्सेना, योगेश प्रवीन, यतींद्र मिश्र, रूपरेखा वर्मा और मैं खुद, अमरेंद्र त्रिपाठी आदि हिंदी के लेखक उस आयोजन में आमंत्रित थे। पर वीरेंद्र यादव को अपने इर्द-गिर्द के चार-छह लेखकों को छोड़ कर लखनऊ में लेखक ही नहीं दिखते। या वह किसी को लेखक मानते ही नहीं। उन की इस रतौंधी का इलाज अब बहुत मुश्किल दिखता है। गौरतलब यह भी है कि लोहिया को फ़ासिस्ट बताने वाले वीरेंद्र यादव ने यहां इस टिप्पणी में लोहिया के गुणगान भी गाए हैं। खैर, इसी टिप्पणी में वह संत और सीकरी आदि पर भी लफ़्फ़ाज़ी झोंक कर अफ़सोस जाहिर करते रहे कि इस आयोजन में राजा, नवाब आदि आए, विंटेज कार रैली आदि हुई, नाच-गाना आदि हुआ। और फिर निष्कर्ष देते हुए लिखा था कि, 'शायद साहित्य के सरोकारों से मुक्त होने और 'फ़ेस्टिवल' में तब्दील के अनिवार्य दुष्परिणाम है। सचमुच साहित्य के नाम पर यह दृश्य दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।'
 
चलिए न मानते हुए भी मान लिया यह भी एक बार। लेकिन कुतर्क और पलटीबाज़ी की भी एक सीमा होती है। मैंने इस के मद्देनज़र फ़ेसबुक पर एक टिप्पणी भी लिखी। आप भी गौर कीजिए :
 
सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ों की जागीर बन गया है यह शहर लखनऊ साहित्य के नाम पर?
 
अपने लखनऊ का साहित्यिक मंज़र भी खूब है। कि जो क्रांतिकारी लोग लिट फ़ेस्ट का पिछली बार बायकाट किए थे, वही सूरमा भोपाली लोग अबकी कैसे तो सूरमेदानी लिए मुस्कराते हुए खड़े फ़ोटो खिंचवाते रहे! यह देखना भी दिलचस्प था। हम तो शहर में थे नहीं लेकिन लौटे तो अखबारों और फ़ेसबुक पर उस की बदली-बदली बयार में बहती फ़ोटो देखी तो मन मुदित हो गया। तो क्या अबकी मल्टी नेशनल कंपनियां प्रायोजक नहीं थीं? अंगरेजी आदि का जाल बट्टा नहीं था कि अंगरेजियत नहीं थी? लेकिन अब मुस्कराते हुए फ़ोटो खिंचवाते इन क्रांतिवीरों से पूछे कौन? रही बात पत्रकारों की तो उन में यह सब पूछने की भूख और रवायत दोनों ही जय हिंद है। जहालत से उन की बहुत तगड़ी रिश्तेदारी है। अशोक वाजपेयी भी आए थे लेकिन क्रांतिकारी आलोचकों, संपादकों और लेखकों को उनके आने से कोई गुरेज़ नहीं था। उनके साथ यह कार्यक्रम शेयर किया। यह तो अच्छी बात हुई। कि पूर्वाग्रह छूटा तो सही, कुछ ऐंठ टूटी-छूटी तो सही। लेकिन रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित विश्व कविता समारोह भारी फ़ज़ीहत में फंस गया है। अशोक वाजपेयी रज़ा फ़ाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। इस पर भी इस शहर में किसी लेखक, पत्रकार या आलोचक ने उन से कोई बात क्यों नहीं की? यह भी हैरतंगेज़ है। क्या यह शहर इतना सोया हुआ है? या सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ों की जागीर बन गया है यह शहर लखनऊ साहित्य और संस्कृति के नाम पर? या कि बस सुविधा की ही बात रह गई है। कि मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू ! यह सवाल सुलगना लाजिम है। क्यों कि अवसरवादिता की यह तो पराकाष्ठा है।
 
दिलचस्प यह कि बीते मार्च में जब यह लखनऊ लिट्रेरी फ़ेस्टिवल का आयोजन हुआ, जिसे लखनऊ सोसाइटी ने आयोजित किया था तो वीरेंद्र यादव और उन का गिरोह खासा नाराज़ रहा। लेकिन अब की दिसंबर में जब यही आयोजन एक दूसरी संस्था लखनऊ एक्सप्रेसंस ने लखनऊ लिटरेरी कार्निवाल नाम से आयोजित किया तो वीरेंद्र यादव और उन के लोग हैप्पी हो गए। तब जब कि यह आयोजन भी लखनऊ लिटरेरी फ़ेस्टिवल की पुनरावृत्ति ही रहा। वह तो फिर भी फ़ेस्टिवल था यानी त्यौहार, और यह कार्निवाल था यानी तमाशा! और इस आयोजन में भी वही राजा और वही नवाब लोग थे। वही फ़िल्मी लोग थे। वही नाच-गाना और वही विंटेज कार एक्ज़ीबिशन आदि। मतलब वही सारे नखरे, वही टोटके आदि। वही महफ़िल, वही मनोरंजन के सामान आदि। लेकिन वीरेंद्र यादव गए इस आयोजन में राजेंद्र यादव को श्रद्धांजलि देने के बहाने। वह प्रेमचंद का कहा भी भूल गए। कि,  'साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उस का दर्जा इतना न गिराइए।'
 
लखनऊ के एक सुपरिचित लेखक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने फ़ेसबुक पर अपनी वाल पर लिखा है कि :
 
लखनऊ कार्पोरेटी लिटररी फेस्टिवल रिलायंस के पैसों से संपन्न हुआ है। अब यहाँ बताने की क्या जरूरत की यह साहित्य का आखेटीकरण है या साहित्यकारों के वैचारिकी की दुम और उसके कंपन का मापीकरण है। 
 
सुभाष चंद्र कुशवाहा की इस टिप्पणी पर कवि कौशल किशोर की एक टिप्पणी भी गौरतलब है:
 
यह फेस्टिवल साहित्य का कारपोरेटीकरण है जिसका मकसद साहित्य को उपभोक्तावादी माल में बदलना है, उसे सामाजिक सरोकार व उसकी मूल चिंता से दूर ले जाना है। लेकिन विडम्बना कहिए कि सब चुप हैं। ऐसे में मुझे मुक्तिबोध याद आते हैं: 
 
सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं,
उनके खयाल से यह सब गप है
मात्र किवदन्ति।
रक्तपाई वर्ग से नाभिनालबद्ध ये सब लोग
नपुंसक-भोग-शिरा-जालों में उलझे।
प्रश्न की उथली-सी पहचान
राह से अनजान
वाक् रुदन्ती।
 
सुभाष चंद्र कुशवाहा इसी टिप्पणी की एक प्रतिक्रिया में लिखते हैं :
 
धर्मेन्द्र राय जी, भैंस का दूध पी कर भैंस बनने वाली बात नहीं है, भैंस के अस्तित्व को नकार करने की विचारधारा पाल कर, भैंस का दरबार करने से है! बात इतनी सरल नहीं होती जितनी समाझ ली जाती है।
 
सुभाष चंद्र कुशवाहा की एक और टिप्पणी है :
 
सफाई मिली है की लखनऊ कार्पोरेटी लिटररी फेस्टिवल रिलायंस के पैसों से नहीं, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, स्टेट बैंक, सरकार और 'इत्यादि' के सहयोग से हुआ है। भाई मुझे आयोजन से क्या आपत्ति? आयोजन चाहे पप्पू यादव कराएँ या दाऊद इब्राहिम? आपत्ति उनसे है जो दूसरे के लिए आदर्श बघारते हैं और अपने के लिए रास्ता निकालते हैं, और अगर सफाई आ ही रही है तो यह आनी चाहिए की ये 'इत्यादि' कौन हैं. कुल कितना खर्च हुआ और किन-किन से कितना आया? यह बात सिर्फ इसलिए कि सफाई आई है, वरना तो क्या ?
 
अब सुभाष जी और कौशल किशोर जी के इस लिखे के आलोक में भी ज़रुर सोचा जाना चाहिए। दिलचस्प यह एक तथ्य भी है कि वीरेंद्र यादव ने न सिर्फ़ इस तमाशे में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई बल्कि वह इस आयोजन के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य भी हैं। और तब भी किसी दलित लेखक आदि जिस की तुरही वह अकसर बजाते रहते हैं अपने भाषणों में, नहीं बुलाया गया इस आयोजन में। इसी लखनऊ में मुद्रारक्षस, शिवमूर्ति, हरिचरण प्रकाश, नवनीत मिश्र, जैसे कई और सशक्त कहानीकार भी हैं, वह भी इस आयोजन से खारिज रहे। वीरेंद्र यादव के मार्गदर्शक मंडल में रहने के बावजूद। तो यह क्या था महफ़िल सजाना या मनोरंजन का साधन जुटाना? यह ज़रुर पूछा जाना चाहिए। फ़िलहाल तो इस आयोजन को ले कर किसिम-किसिम की चर्चा चल रही है। 
 
वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय में शोध छात्र हिमांशु वाजपेयी लखनऊ के ही हैं। और इस आयोजन से गहरे जुड़े हुए हैं। पिछले आयोजन से भी जुड़े थे। उन्होंने भी फ़ेसबुक पर अपनी वाल पर एक दिलचस्प टिप्पणी दर्ज की है:
 
लखनऊ वालों के लिए खुशखबरी! अगर आपमें भी ‘अपना खुद का’ लिटरेचर फेस्टिवल करवाने के कीड़े हैं लेकिन आप लाचारी के चलते बेरहमी से उनको मारने में जुटे हैं, तो अब आपको निराश होने की ज़रूरत नहीं है. लिटफेस्ट्स की इस सहालग में हम लेकर आए हैं खास आपके लिए ‘मस्तो बाबा गेसूदराज़’ का सिद्ध किया हुआ चमत्कारी ताबीज़. इस अद्भुत ताबीज़ को धारण करते ही पूरा लखनऊ शहर साहित्य और संस्कृति की दुनिया में आपके वर्चस्व को सजदारेज़ होकर तस्लीम कर लेगा. साहित्य को लेकर आपका और आपकी टीम का अज्ञान पूरी तरह से मिट जाएगा. दुनिया भर का साहित्य और उससे जुड़े मुद्दों की जानकारी सबके दिमाग में अपने आप फीड होने लगेगी. एक से एक खुर्राट और नामी साहित्यकार आपके दरवाज़े आकर गुज़ारिश करेंगें कि ‘लखनऊ में साहित्य और संस्कृति के पुनरूद्धार हेतु कृपया आप एक लिटफेस्ट करवाएं जिसमें हम बिना पैसे लिए शिरकत करेंगें’. सेलिब्रिटीज़ आपके यार-दोस्तों के साथ सटकर फोटो खिंचाने और नकली हंसी हसने में अपनी खुशकिस्मती समझेंगें. लखनऊ आपका अहसान मानेगा कि आपने उसे इतने बड़े सितारों के दर्शन करवाए. और तो और आपके बुलाए दो कौड़ी के शायर भी महफिल लूट लेंगें. एंकर चाहें अंग्रेज़ों के कक्का ही क्यों न हों, बिल्कुल शुद्ध हिन्दी बोलेंगे. आदिवासियों को चूस लेने वाली मल्टीनेशनल कंपनियां आपको स्पॉन्सरशिप देते वक्त दानवीर कर्ण बन जाएंगीं. आपका जलवा कायम होगा. इरादे लोहा होंगे, मन मुलायम होगा. दूसरों के लिटफेस्ट को कोई नहीं पूछेगा. उनके यहां की भीड़ भी उठकर आपके आयोजन में दौड़ी चली आएगी. जिला प्रशासन आपके कार्यक्रम को न सिर्फ बिना मांगे अनुमति देगा बल्कि मुफ्त जगह और सुरक्षा भी उपलब्ध करवाएगा. शहर के बड़े बड़े लोग आपके फेस्ट में शिरकत करने के लिए लबलबाए रहेंगें. पत्रकार लोग मनचाहा कवरेज देंगें. खूब चर्चा होगी. राज्य सरकार इस महान साहित्य सेवा हेतु आपका नाम पद्मश्री के लिए भेजेगी. विश्वविद्यालय साहित्य और संस्कृति में आपके योगदान पर पीएचडी करवाएंगें…
 
सुपर तांत्रिक ताबीज़ का मूल्य- 151 रूपए मात्र
स्पेशल तामसी ताबीज़ का मूल्य- 251 रूपए मात्र
 
गलत साबित करने वाले को 1000 रूपए इनाम…
 
सम्पर्क करें- ‘मस्तो बाबा गेसूदराज़’. फोन नंबर- 420840420840
 
(हिमांशु बाजपेयी जैसे फ्रॉडियों से सावधान: ये नास्तिक है और लोगों को आस्था से विमुख करता है)
 
चलिए हिमाशु की इस टिप्पणी को आप अपने ढंग से ले लीजिए। लेकिन वीरेंद्र यादव के उस रुदन का क्या करें? जो बीते आयोजन के समय उन्हों ने दर्ज किया था। यकीन न हो तो उन की वह टिप्पणी जस की तस आप मित्रों के ध्यानार्थ यहां साथ में नत्थी कर रहा हूं। और इस बार के आयोजन में उनकी उपस्थिति की चहक भरी फ़ोटो भी। अब आप ही सोचिए कि क्या किसी की वैचारिकी इतनी जल्दी पलटी मार जाती है? कि संतन को सीकरी से अब काम पड़ ही गया है? या कि खाने के दांत और दिखाने के और होते हैं और कि क्या अवसरवादिता भी इसे ही नहीं कहते हैं कि आदमी खुद का भी लिखा-कहा भी भूल जाए, 'शायद साहित्य के सरोकारों से मुक्त होने और 'फ़ेस्टिवल' में तब्दील के अनिवार्य दुष्परिणाम है। सचमुच साहित्य के नाम पर यह दृश्य दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।' फिर यह तो फ़ेस्टिवल भी नहीं कार्निवाल था, यानी तमाशा। बल्कि कहीं ज़्यादा। क्यों कि तब दो दिन का फ़ेस्टिवल हुआ था, अबकी तीन दिन का कार्निवाल हुआ है।
 
चलिए और तो सब ठीक है। यह सब अपनी-अपनी सुविधा और विवेक पर मुन:सर है कि आप कहां जाएं, कहां न जाएं और क्या करें और क्या न करें, क्या लिखें और क्या बोलें। पर प्रेमचंद के उस कहे का भी क्या करें, 'साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उस का दर्जा इतना न गिराइए।'  प्रेमचंद के कथन की अभी तक रची-बसी अनुगूंज इतनी जल्दी बिसर गई? तो क्या दर्जा सचमुच गिर गया है? साहित्य भूषण वीरेंद्र यादव तो निश्चित ही नहीं बताएंगे। मित्रों, आप ही कुछ बताइए।
 

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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भड़ास पर दनपा

 

केजरीवाल ने समर्थन लेने के लिए रखी ये 18 शर्तें (पढ़ें चिठ्ठी)

कांग्रेस द्वारा केजरीवाल को बिना शर्त समर्थन देने के प्रस्ताव का जवाब देते हुए केजरीवाल ने कांग्रेस और बीजेपी दोनों के सामने समर्थन लेने के लिए 18 शर्तें रखीं हैं और कहा है कि अगर इन 18 शर्तों पर कांग्रेस या भाजपा सहमत हैं तो आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को तैयार है. अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को चिठ्ठी लिखकर अपनी शर्तें उनके सामने रखी हैं.
 
नीचे केजरीवाल द्वारा लिखी गई चिठ्ठी दी जा रही है. आप भी पढ़िए और जानिए कि क्या हैं केजरीवाल की शर्तें-

महिला पत्रकार से छेड़खानी पड़ी भारी, पहुंच गए हवालात

एक महिला पत्रकार को छेड़ना दो बदमाशों को भारी पड़ गया. न्यूज चैनल की पत्रकार को अकेला देखकर बदमाशों ने छेड़छाड़ शुरू कर दी. महिला पत्रकार ने बहादुरी दिखाते हुए शोर मचाया जिससे आस-पास के लोग इकठ्ठा हो गए. इसी बीच महिला पत्रकार ने घटना की जानकारी पुलिस को दे दी. पुलिस को देखकर दोनों आरोपी भागने लगे. इस दौरान मौजूद भीड़ ने एक को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया जबकि दूसरा भागने में सफल रहा. 
 
पुलिस के मुताबिक 24 वर्षीय महिला पत्रकार निजी न्यूज चैनल में काम करती है तथा पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर थाना क्षेत्र के अन्तर्गत मयूर विहार इलाके में रहती है. गुरुवार रात काम खत्म करके वह पैदल ही घर जा रही थी. सुनसान रास्ते में उसे अकेला देखकर दोनों बदमाशों ने उसे अश्लील इशारे शुरू कर दिए. महिला पत्रकार ने पहले इसे नजर अंदाज किया जिससे बदमाशों की हिम्मत बढ़ गई और उसका पीछा करने लगे. एक पब्लिक स्कूल के पास सुनसान जगह मिलते ही दोनों ने महिला के साथ छेड़खानी करने लगे. तब महिला ने शोर मचाया. महिला पत्रकार के विरोध करने पर दोनों ने उसके साथ मारपीट भी की.
 
पुलिस ने पकड़े गए बदमाश की पहचान शरीफ के रूप में की है जबकि फरार आरोपी की पहचान फंटूस के रूप में की गई है. पुलिस का कहना है कि दोनो बदमाश इलाके में पिछले दो सालों से रह रहे थे. पत्रकार की शिकायत पर पुलिस ने दोनों बदमाशों पर महिला के साथ छेड़छाड़ और मारपीट का मामला दर्ज कर लिया है.
 

हनीमून पर पत्नी के साथ बलात्कार कर डाला, जलती सिगरेट से दागा

शादी के बाद पति के साथ हसीन जिन्दगी के सपने तब चूर-2 हो गए जब उसके अपने ही पति ने उसके साथ हनीमून पर ही बलात्कार किया. एक नवविवाहिता ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसके पति ने बैंकाक और थाइलैंड में हनीमून के दौरान उसके साथ बलात्कार किया.
 
पीड़िता ने परसों अपने परिवार वालों के साथ दिल्ली पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई. पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा कि उसके पति ने हनीमून के दौरान उसके साथ बलात्कार किया और उसके साथ हिंसा भी की. पीड़िता ने कहा कि पहले उन्हें मालदीव जाना था लेकिन उसका पति उसे बैंकाक ले गया. उसने पति पर आप्राकृतिक यौनाचार का भी आरोप लगाया है. पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर पति पुनीत भारद्वाज के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.
 
मामला दर्ज करने के बाद पुलिस पीड़िता को जांच के लिए दीन दयाल उपाध्याय चिकित्सालय ले गई जहां मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि हुई है. पुलिस ने बताया कि आरोपी फिलहाल फरार है और उसे पकड़ने के लिए टीमें बनाई गईं हैं.
 
पीड़िता का पति एक मल्टीनेशनल कम्पनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत है जबकि पीड़िता भी एक निजी कम्पनी में काम करती है. पिछले 29 नवम्बर को इन दोनों की अरेंज मैरिज हुई थी. 1 दिसम्बर के दोनों हनीमून के लिए बैंकाक गए और 8 दिसम्बर को वापस लौट आये.

राडिया टेप कांड में सीबीआई ने की बरखा दत्त से पूछताछ

सीबीआई ने कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया की टेप की गई बातचीत की जांच के सिलसिले में हाल ही वरिष्ठ पत्रकार बरखादत्त से पूछताछ की. सूत्रों ने बताया कि रिकार्ड का गई बातचीत में बरखादत्त की भी आवाज पाई गई है जिसके लिए एजेंसी ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया था. बरखा दत्त एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर हैं.
 
सूत्रों का कहना है कि रिकार्ड बातचीत में किसी वित्तीय लेनदेन की चर्चा है. सीबीआई ने कहा है कि उन्हें केवल कुछ जानकारियों की पुष्टि के लिए बुलाया गया था. एजेंसी ने यह भी कहा कि पत्रकार का नाम किसी प्रारम्भिक जांच में नहीं है. जांच एजेंसी ने बताया कि कुछ अन्य लोगों के भी नाम हैं और उन्हें भी जांच के लिए बुलाया जा सकता है.
 
जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली सु्प्रीम कोर्ट की पीठ ने ऐसे तेईस मामलों की पहचान की है, जिसे शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त दल ने अधिकारियों, राजनेताओं, व्यापारिक घरानों के दिग्गजों की लाबिस्ट नीरा राडिया के साथ टेप की गई बातचीत की जांच के बाद तैयार किया था.

फर्जी कॉलेज संचालक से पत्रकारों ने वसूले 15 हजार

कोसीकलां। तथाकथित पत्रकारों की अवैध धनवूसली के कारनामे जनपद में थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इसका एक और ताजा मामला मथुरा के कस्बा कोसीकलां में सामने आया है जहां फर्जी कॉलेज की खबर उजागर ना होने देने के नाम पर 15 हजार की वसूली कर ली गई लेकिन खबर प्रकाशित होने के बाद कॉलेज संचालकों में हड़कम्प मचा हुआ है और सुविधा शुल्क के रूप में दी गई राशि को वसूलने के प्रयास में जुटे हुये हैं।
 
यह मामला पिछले दिनों कोसीकलां में उस समय उजागर हुआ जब हरियाणा में अवैध रूप से बच्चों के दाखिले कर कोसीकलां कॉलेज में परीक्षा दिलाने का आश्वासन कथित कॉलेज संचालकों द्वारा छात्रों को दिया गया। अभिभावकों को सन्देह होने पर प्रशासन के सहयोग से कॉलेज की खोज की गई तो वह फर्जी निकला। इसकी जानकारी होने पर फर्जी संचालक तो मौके पर पहुंचे ही साथ ही कुछ तथाकथित पत्रकार भी वहां पहुंच गये। पत्रकार साहब के पहुंचते ही फर्जी संचालक और पत्रकार के मध्य मीडिया में खबर उजागर ना करने के नाम पर सौदेबाजी का खेल शुरू हो गया। इस सौदेबाजी में कथित पत्रकारों द्वारा एक लाख की मांग सभी मीडिया में डील के नाम पर की गई। बाद में मोल भाव करने पर 15 हजार में दोनों के मध्य समझौता हो गया।
 
अब हुआ यूं कि उक्त पत्रकारों द्वारा वसूली गई रकम में किसी को फूटी कौड़ी नहीं दी गई और पूरी रकम को डकार गये जिसके चलते कुछ समाचार पत्रों ने खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया। खबर छपते ही कॉलेजों संचालकों ने हंगामा कर दिया और दी गई राशि को वापस मांगा। अब पत्रकार भी कम थोड़े होते हैं सो उन्होंने कालेज संचालक को ठेंगा दिखा दिया। बताया जाता है उक्त कथित पत्रकार शराब एवं सट्टा कारोबार भी अपने संरक्षण में चला रहे हैं। बताया जाता है कि पत्रकार साहब के दोस्ताना सम्बन्धों के चलते पुलिस सब कुछ जानते हुये भी खामोश है।

सपा विधायक की गुंडई से तंग अधिकारी ने की इस्तीफे की पेशकश

देवरिया । सपा के एक विधायक की धमकी से उत्तर प्रदेश सरकार का एक कर्मचारी ने नौकरी से त्याग पत्र देने का निर्णय लिया है। कर्मचारी का कहना है कि सपा के विधायक ने जान से मारने की धमकी दी है। इसलिए वह नौकरी नहीं करना चाहता क्योंकि यदि जिन्दगी रहेगी तो बहुत नौकरी नसीब होगी। 
 
मामला कुछ यूं है कि देवरिया जिले के लार थाना क्षेत्र के लार टाउन निवासी धुरन्दर सिंह पुत्र स्व. सुखेन्द्र सिंह इस समय आजमगढ़ के जीयनपुर नगर पंचायत में पिछले आठ नौ महीनों से अधिशासी अधिकारी के पद पर तैनात है। इसके पूर्व में वे सोनभद्र एवं चन्दौली में तैनात थे। अधिशासी अधिकारी का कहना है कि अच्छी सेवा के लिए उसे कई बार विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा गया है लेकिन रविवार की रात हुई घटना से वह तथा उसका पूरा परिवार अत्यन्त दहशत में है। 
 
श्री सिंह ने अनुसार वह बीते रविवार को वह देवरिया में थे। उस दिन रात में करीब आठ बजे उनके मोबाइल पर एक फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि वह आजमगढ़ के सगड़ी का समाजवादी पार्टी का विधायक अभय नारायण पटेल लखनउ से बोल रहा है। अधिशासी अधिकारी के अनुसार विधायक ने भददी भददी गालियां एवं जान से मारने की धमकी देते हुए अपने लोगों को ठेका देने की मांग की है और ठेका न देने पर गम्भीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। अधिशासी अधिकारी ने बताया कि फोन विधायक के सीयूजी नम्बर से किया गया था.
 
अधिशासी अधिकारी ने यह भी बताया कि जिलाधिकारी देवरिया सहित उसने प्रदेश के शासन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को इस सम्बन्ध में अवगत करा दिया है तथा किसी अनिष्ट की आशंका से जीयनपुर नौकरी पर न जाने का निर्णय लिया है। उसका कहना है कि विधायक अत्यन्त बलशाली एवं अपराधी प्रवृत्त का है इसलिए वह हत्या करा सकता है।   
देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट

मजीठिया मामले में 7 जनवरी को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 जनवरी की तिथि तय की गई है. 12 दिसम्बर को मामले की सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अगली तिथि की घोषणा की.
 
12 दिसम्बर को कोर्ट ने कर्मचारियों का पक्ष सुना. कर्मचारियों की तरफ से अधिवक्ता कोलिन गोन्साल्विस ने पक्ष रखा. अभी कर्मचारियों का पक्ष पूरा नहीं हो पाया है और अगली तिथि को भी गोन्साल्विस कर्मचारियों की तरफ से आगे की बहस करेंगे. इसके पहले कोर्ट में प्रबंधन की तरफ से बहस पूरी हो चुकी है.
 
गौरतलब है कि सरकार ने मीडिया कर्मियों के वेतन और अन्य सुविधाओं में वृद्धि के साथ अन्य उनकी शिकायतों पर सुनवाई के लिए 2009 में मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया था जिसके खिलाफ प्रबंधन कोर्ट चला गया था. सरकार कोर्ट के समक्ष मजीठिया की सिफारिशों को लागू करने के पक्ष में हलफनामा दे चुकी है.

कांग्रेस का ‘आप’ को बिना शर्त समर्थन, राज्यपाल को भेजी चिठ्ठी

आज दिल्ली में सरकार गठन करने के लिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा करके गेंद आप के पाले में डाल दी है. इस सम्बन्ध में पार्टी की तरफ से दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग को आधिकारिक रूप से चिठ्ठी भेज दी गई है. कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की है.
 
गौरतलब है कि भाजपा के द्वारा सरकार बनाने से इंकार के बाद राज्यपाल ने दूसरे सबसे बड़े दल 'आप' को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया है. आज अरविन्द केजरीवाल राज्यपाल से मिलकर स्थिति स्पष्ट करने वाले हैं. दिल्ली विधानसभा में आप के 28 जबकि कांग्रेस के आठ विधायक हैं. अगर आम आदमी पार्टी कांग्रेस का समर्थन ले लेती है तो उसके पास बहुमत के लिए जरूरी 36 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो जायेगा.
 
हालांकि अभी आप ने कांग्रेस के समर्थन पर कोई रुख साफ नहीं किया है. पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव ने कहा है कि पार्टी को राज्यपाल की तरफ से सरकार बनाने का प्रस्ताव मिला है और राज्यपाल ने चर्चा के लिए केजरीवाल को बुलाया है. तबीयत खराब होने बावजूद अरविन्द केजरीवाल आज उनसे मिलकर स्थिति स्पष्ट करेंगे. जो भी निर्णय होगा वह राज्यपाल से मिलने के बाद ही बताया जायेगा.
 

सिंगरौली में पुलिस फायरिंग में एक की मौत, कर्फ्यू लागू

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में पुलिस हिरासत में हुई मौत को लेकर हिंसा भड़क उठी जिसमें पुलिस की फायरिंग से एक व्यक्ति की मौत हो गई. हिंसा में करीब 16 लोग घायल हुए हैं. हालात को काबू में लाने के लिए कई जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया गया है.
 
सिंगरौली जिले के बैरन थाना क्षेत्र के निवासी भरत साहू के बेटे अखिलेश साहू को पुलिस पूछताछ के लिए ले गई थी. आज उसकी लाश अमझार गांव के एक कुएं में पाये जाने से ग्रामीणों का गुस्सा भड़क उठा. गुस्साये लोगों ने थाने का घेराव कर उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया. भीड़ ने थाने पर पथराव भी किया. इतना ही नहीं गुस्साई भीड़ ने जिला मुख्यालय में भी प्रदर्शन किया तथा तोड़फोड़ की. भीड़ ने पुलिस की कई गाड़ियों में आग लगा दी है.
 
जिलाधिकारी ने एस सेलवेन्द्रन ने बताया कि हालात को काबू में करने के लिए जिले के तीन थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया है. घायलों का जिला अस्पताल में उपचार चल रहा है तथा हालात पर नियंत्रण के लिए आस-पास के जिलों से अतिरिक्त सुरक्षाबल बुला लिया गया है.
 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घटना की गंभीरता देखते हुए न्यायिक जांच के आदेश दे दिेए हैं. हालात पर चर्चा के लिए डीजीपी ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की है. वहीं नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने घटना को दुखद बताते हुए पुलिस अधीक्षक को हटाने के साथ घटना की न्यायिक जांच की मांग की है.

‘दामिनी’ को एक युवा साहित्यकार की श्रद्धांजलि

महोदय, मेरा नाम आशीष सिंह 'मनमौजी' है. मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का निवासी हूँ. साहित्य मैं रूचि होने के कारण कविताएं लिखता हूँ. पिछले वर्ष २९ दिसम्बर २०१२ को देश जिस शोक में डूबा था, उस दामिनी के बाद ना जाने आज भी कितनी दामिनी काण्ड हो रहे हैं. मैंने उस घटना को महसूस किया और दामिनी को अपनी बहन मानते हुए एक कविता लिखी और चाहा कि समाचार पत्रों में इसे स्थान मिले. मैं इसे लेकर कई समाचार पत्रों के कार्यालयों पर गया पर हर जगह एक ही बात सुनने को मिली 'चुनाव चल रहे हैं ऐसी चीज़ें छापने के लिए स्थान नहीं है'. फिर मेरे एक मित्र ने आपको इस बारे में सूचित करने को कहा सो मैंने मेल कर दिया. जो दामिनी के माता पिता ने खोया उसे तो लौटा नहीं सकता पर चाहता हूँ कि इस रचना के माध्यम से उनके दर्द को बांटा जा सके. 
 
मेरी बहना 'दामिनी'
 
'द' से द्रोपदी 'द' से दामिनी, दोनों ने अपनी लाज समेटी
एक थी हस्तिनापुर की रानी, दूजी भारत माँ की बेटी
भरी सभा में दुष्ट दुःशासन, को श्री कृष्ण अकेले रोकने आये
शर्म करो अरबो में भी होकर, हम उन पाँचो का कुछ ना कर पाये
 
एक पुकार सुन द्रोपदी की, भाई कृष्ण दौड़ा-दौड़ा आया
पर अफ़सोस ये है कि 'दामिनी' बचाने, कोई भाई पहुंच न पाया
मेरी गुड़िया चली गयी, अब मैं किससे राखी बंधवाऊंगा
किसके घर मै तीज, खिचड़ी और भैया दूज को जाऊंगा
 
मैंने डोली नहीं उठायी, जनाजा उसका उठाया है
उसके सर को गोद में रखकर, सिंगापुर से लाया है
भारत आने तक उसे जगाया, पर मेरी बहना जगी नहीं
तेरह दिन उसके साथ रहा, मुझे रातो को नींद भी लगी नहीं 
 
चीख-चीखकर मेरी बहना, जीने की फरियादें करती थी
एक मेरे सामने कराह-कराह कर, वो लम्बी आहे भरी थी
कहती थी भैया तुम मुझे बचा लो, मैं भी दुल्हन बनना चाहती हूँ
सज-सँवर कर अपने हाथो में, मेंहदी लगवाना चाहती हूँ
 
पर आधी रात को घडी के कांटे, दो पर जाकर अटक गये
उसके सजाये सभी अरमां, भय के पथ पर भटक गये
मेरे सामने मेरी बहना, बिस्तर पर दम तोड़ रही थी
मानो जैसे उसकी सांसे, उसका दामन छोड़ रही थी
 
बोली भैया कसकर हाथ पकड़ लो मेरा, वर्ना मैं मर जाऊंगी
पापा से कहना मैं अब फिर मस्ती, करने घर नहीं आऊंगी
बस 'भईया' चीखकर उसकी बोली, ठुण्डी सासों में बदल गयी
पूरे माउन्ट अस्पताल में, सन्नाटे की लहरे पसर गयी
 
अब पापा ने अफसर बिटिया को, अपने सीने से लगा लिया
फिर धीर से ये कहकर उसको, वापस बेड पर सुला दिया
सब चुप हो जाओ वर्ना, मेरी दामिनी उठ जाएगी
और अभी फिर मेरी बेटी, जोरों से चिल्लायेगी
पापा मेरा कन्यादान करो, जरा मेरा भी सम्मान करो
ऐ मेरे भारत के सभी भाईयों, जरा मेरा भी सम्मान करो।
 
॥———- श्रद्धांजालि———- ॥
 
आशीष सिंह "मनमौजी"
 
युवा साहित्यकार
 
जौनपुर, उत्तर प्रदेश
 
मो०- 09506881328
ईमेल- ashish.ravishankar@gmail.com

 

सवाल पूछने पर भड़के भूपेन्द्र हुड्डा ने मीडियाकर्मियों से बदसलूकी की

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हाल ही सम्पन्न सरकारी नौकरियों में भर्ती में उनके रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाये जाने के सवालों पर मीडिया पर भड़क गये. मीडिया के सवालों से नाराज मुख्यमंत्री ने पत्रकारों के साथ बदसलूकी की. इस मामले में पुलिस और प्रशासन ने भी मुख्यमंत्री का जमकर साथ दिया.
 
मुख्यमंत्री आज अंबाला में हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष फूलचंद मुलाना के घर एक कार्यक्रम में पहुंचे थे. वहां पर पत्रकार उनसे सवाल कर रहे थे इसी बीच एक पत्रकार ने मुख्यमंत्री से एचसीएस भर्ती में उनके रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने पर जवाब मांगा. इतना सुनते ही हुड्डा तिलमिला गये और रिश्तेदारों का नाम पूछने लगे. इसके बाद मुख्यमंत्री अपना आपा खो बैठे और पत्रकार के साथ बदसलूकी शुरू कर दी. वे मीडिया को कैमरा ठीक से चलाने और पहले तजुर्बा लेने की सीख देने लगे.
 
इसी बीच जब पत्रकार ने रिश्तेदारों के नाम बताना शुरू किया तो पुलिस वाले तुरन्त उसे खींचकर पीछे ले गये. इसके बाद मुख्यमंत्री को अहसास हुआ कि पत्रकार के पास सच में नाम है तो उनके सुर कुछ नरम पड़े और उन्होंने संवाददाता को आगे बुलाकर सफाई दी. उन्होंने कहा कि जिस गायत्री हुड्डा का नाम लिया जा रहा है वह उनकी रिश्तेदार नहीं है और ना ही उनके गांव की है. इस तरह से ना जाने कितने लोग उनके रिश्तेदार बन जायेंगे.
 
मामला हरियाणा में हाल ही में हुई एचसीएस की भर्ती से जुड़ा हुआ है जिसमें सीएम के रिश्तेदारों व खास लोगों का बड़ी संख्या में चयन हुआ है. इनमें सीएम के कजिन और राजेन्द्र हुड्डा की बेटी गायत्री हुड्डा, सीएम के भाई इंदर सिंह हुड्डा की साली की पोती मीनाक्षी दहिया, हरियाणा के लोकसेवा आयोग के चेयरमैन मनबीर भड़ाना की बेटी राधिका, एचसीएम के ओएसडी एमएस चोपड़ा की बेटी एकता चोपड़ा, बिजली मंत्री कैप्टन अजय यादव के दामाद रोहित यादव, विधायक बीबी बतरा की भांजी गौरी मिड्ढा, सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा के साढ़ू गौरव अंतिल समेत कई कैंडीडेट्स ऐसे हैं, जिनके हरियाणा सरकार में बैठे लोगों से करीबी रिश्ते हैं. इंडस्ट्रियल प्लाटों की आपसी बंदरबांट के बाद हरियाणा सरकार अब सरकारी नौकरियां भी अपनों को बांटने में जुट गई है. 
 
हरियाणा भाजपा विधायक दल के नेता अनिल विज ने इस मामले पर प्रतिक्रया देते हुए कहा कि अंधे रेवड़ियां अपनो को ही बांट रहे हैं और पत्रकारों के सवाल पूछे जाने पर मुख्यमंत्री का भड़क जाना साबित करता है कि दाल में जरुर कुछ काला है. अनिल विज ने कहा कि पत्रकारों से बदसलूकी करने पर मुख्यमंत्री को पत्रकार समाज से माफी मांगनी चाहिए.

राजीव बेओत्रा बने स्टार स्पोर्टस के सेल्स हेड

स्टार ग्रुप से खबर है कि राजीव बेओत्रा ने स्टार इंडिया ज्वाइन कर लिया है. उन्हें प्रबंधन ने स्टार स्पोर्टस नेटवर्क के सेल्स हेड बनाये गये हैं. राजीव इसके पहले एचटी मीडिया से जुड़े हुए थे जहां उनके पास सर्कुलेशन और रेवेन्यू के नेशनल हेड की जिम्मेवारी थी.
 
राजीव बेओत्रा पिछले आठ सालों से एचटी मीडिया ग्रुप के साथ थे. वहां वे एडवरटाइजिंग, रेवेन्यू और सरकुलेशन का काम देख रहे थे. एचटी में आने से पहले वे व्हर्लपूल, कोकाकोला और एशियन पेन्ट्स के साथ काम कर चुके हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं भेजने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

लखनऊ पीटीआई के ब्यूरो चीफ रहे एएम खान को राज्यमंत्री का दर्जा

लखनऊ में पत्रकार एएम खान को सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा देकर लालबत्ती से नवाजा है. खबर है कि पीटीआई लखनऊ के पूर्व ब्यूरो चीफ एएम खान को उत्तर प्रदेश सरकार ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का अध्यक्ष बनाया गया है. इस विभाग के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त है.
 
एएम खान लखनऊ पीटीआई के ब्यूरो चीफ पद से अगस्त 2010 में पीटीआई से रिटायर हो गए थे. वे पंद्रह सालों तक लगातार लखनऊ पीटीआई के ब्यूरो चीफ की कुर्सी पर जमे रहे थे.
 

पत्रकारों के सवालों का जवाब दिए बिना ही चलते बने शिबू सोरेन

मिहिजाम। महुलबना में फुटबाल टूर्नामेंट के समापन समारोह में आए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सर्वेसर्वा शिबू सोरेन पत्रकारों से बिना बात किये ही चले गये जबकि पत्रकार ने तो पूरी सवालों की फेहरिस्त तैयार की थी. पत्रकार चार राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणामों को देखते हुए जेएमएम की भावी रणनीति के बारे में जानना चाहते थे पर सोरेन ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया. समापन समारोह में शिबू सोरेन मंच से ही लोगों को सम्बोधित कर चलते बने.
 
महुलबना के जेजीएस क्लब द्वारा स्वर्गीय गुपिन टुडू मेमोरियल विनर्स कप एवं स्वर्गीय कोका मोहली रनर्स कप के तीन दिवसीय फुटबाल टूर्नामेंट के समापन समारोह में मंगलवार को जेएमएम सुप्रीमों शिबू सोरेन भाग लेने पहुंचे थे. इस मौके पर जामताड़ा पुलिस ने उनके सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किये थे. मैदान के आस पास पुलिस बलों की भीड़ ही भीड़ तैनात थी. वहां पर मौजूद पत्रकारों ने कई बार आयोजकों से उनसे बात करने के लिए कई बार समय मांगा पर आयोजकों मने पत्रकारों को मिलने की अनुमति नहीं दी. 
 
झारखंड से ओम प्रकाश शर्मा की रिपोर्ट

रायपुर की पत्रकार तिकड़ी के बीजेपी प्रेम की चर्चा जोरों पर

छत्तीसगढ़ की राजधानी के तीन पत्रकारों की तिकड़ी की चर्चा जोरों पर है. तिकड़ी में आईबीसी न्यूज के धनवेंद्र जायसवाल, बंसल न्यूज के आशीष तिवारी और तीसरे सदस्य हैं राकेश पांडेय. कहा जा रहा है कि यह तीनों पत्रकार बीजेपी कार्यालय से लेकर मंत्रालय तक साथ-साथ नजर आते हैं. इनकी जुगलबंदी के पीछे क्या कहानी है यह तो वह ही जाने. लेकिन बाकी रायपुर पत्रकारजगत में यह चर्चा आम है कि यदि बीजेपी इस चुनाव में हार जाती तो यह बेचारे उपवास ही रख लेते. 
 
इनके लिए बीजेपी, बीट कम, प्रेम ज्यादा है. बीजेपी भी समय समय पर इनका खूब ख्याल रखती है और यह तिकड़ी किसी भी कार्यक्रम में नमस्कार का कोई मौका नहीं छोड़ती. आईबीसी 24, साधना न्यूज और बंसल न्यूज में काम कर रहे यह महारथी सही राह पर आगे हैं. पर बेचारे दूसरे पत्रकारों को कौन समझाए कि आजकल जी हुजूरी ही सही काम है बाकी सब बेकाम, मालिकों को भी तो यही चाहिए. (कानाफूसी)
 
रायपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

समलैंगिकता पर इतनी हायतौबा क्यों?

उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता पर विपरीत फैसला क्या दिया, चारों तरफ अफरातफरी सी मच गयी. बड़े बड़े मुद्दों को ताक पर रखकर मीडिया और सोशल मीडिया इसी तरफ मुड़ गयी. एक तरफ धर्माचार्य और पुरातनपंथी इस निर्णय का स्वागत करने में जुट गए, वहीं दूसरी ओर अपने को विकसित और आधुनिक सोच का मानने वाले लोग सुप्रीम कोर्ट की डटकर आलोचना करने लगे हैं. भाजपा ने इस मुद्दे पर अपना रूख अभी तक साफ नहीं किया है, परन्तु कांग्रेस पार्टी की हाई कमांड सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय को निशाने पर लेने से परहेज नहीं किया है. परन्तु मूल प्रश्न इन सभी बिंदुओं से हटकर है. 
 
पुराने सन्दर्भ में जाकर देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि न्यायपालिका पर सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप का प्रश्न कई बार उठाया गया है. न सिर्फ उठाया गया है, बल्कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने न्यायपालिका पर कड़े और बड़े हमले भी किये हैं. धारा ३७७ पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि उसने सरकार के काम काज में हस्तक्षेप से बचने की साफ़ कोशिश की है. उसने सिर्फ उसी बात पर मुहर लगाई है, जो धारा ३७७ में है. साथ में उसने केंद्र सरकार को यह कहते हुए पूरी आजादी दी है कि संसद इस कानून को बदल सकती है, जो कि पूर्णतः उचित भी है. 
 
जहां तक समलैंगिकता का प्रश्न है, तो यह बिलकुल साफ़ है कि हमारा समाज दशकों पहले इस दिशा में कदम बढ़ा चुका है और जिस प्रकार से लगभग सम्पूर्ण विश्व में इसको मान्यता मिल चुकी है, मजबूरन भारत में भी अन्य जगहों की तरह इसे स्वीकार कर ही लिया जायेगा. लेकिन इस मामले में उच्चतम न्यायालय को जबर्दस्ती घसीटना कहीं से भी उचित नहीं है. यह जिम्मेवारी पूर्ण रूप से केंद्र सरकार की है कि वह इस मामले में आगे क्या करती है. इस वाकये में जिस प्रकार फ़िल्मी जगत के लोग एग्रेसिव होकर सामने आये हैं, वह निश्चित रूप से चौंकाने वाला है. इस तथ्य में ऐसा लगा जैसे सबसे ज्यादा अधिकारों का हनन उन्हीं का हो रहा हो, या फिर यह बात भी हो सकती है कि समाज में जिस प्रकार से अश्लीलता बढ़ रही है, और गाहे बगाहे इसके लिए फ़िल्मकारों, अभिनेताओं, निर्देशकों, सेंसर बोर्ड इत्यादि को जिम्मेवार ठहराया जाता रहा है, उससे उपजी तिलमिलाहट पर यह प्रतिक्रिया रही हो. 
 
हालांकि यह फिल्मी जगत की बुद्धिजीविता भी हो सकती है, परन्तु यह कैसे भूला जा सकता है कि कास्टिंग काउच, अश्लीलता, नग्नता, टीआरपी के लिए असामाजिक तक हो जाने के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री बुरी तरह बदनाम है. यह बात भी सही है कि उदारता के नाम पर अश्लीलता के पैरोकारों की कमी नहीं रही है, परन्तु इतिहास तो एक ही चश्मे से देखेगा कि उदारता और अश्लीलता का समाज में प्रभाव क्या पड़ रहा है. यह ठीक है कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में बहुत कुछ वैश्विक रूख पर भी निर्भर हो गया है, लेकिन फ़िल्मकार और अन्य सामाजिक लोग अपनी जिम्मेवारी से कैसे भाग सकते हैं. जहां तक बात धारा ३७७ की है, तो यह केंद्र सरकार के हाथ में है कि वह भारतीय समाज और सभ्यता को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बीच का रास्ता कैसे निकालती है. 
 
लेखक मिथिलेश अमर भारती में सब एडिटर हैं.

कार्यक्रम तो शांति से हो गया मगर बिरयानी पर हंगामा हो गया

दिमाग में एक आइडिया आया जिसे मित्रों ने भी पसंद किया। आइडिया यह था कि किसी मंत्री को बुलाया जाए और उससे भाषण न कराया जाय बल्कि जनता उससे सवाल पूछे। अब आवश्यकता थी फाइनेन्सर की, जो समारोह और खाने का भी प्रबंध कर सके। इस बारे में परवेज हाशमी और उनके साथियों से बात की आइडिया उन्हें भी पसंद आया और प्रबंध की जिम्मेदारी भी ले ली। जामिया का अंसारी आडिटोरियम बुक करा लिया और केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से बात की। उन्हें बता दिया गया कि भाषण नहीं होगा बल्कि श्रोताओं के सवालों का जवाब देना होगा। श्री सिंह सहर्ष तैयार हो गए। समारोह शाम में था पांच बजते-बजते हाल भर गया। आगंतुकों को बताया गया कि आज भाषण नहीं होगा, श्रोताओं के सवालों का जवाब दिया जाएगा। इसके लिए श्रोताओं में पर्ची बांट कर कहा गया कि अपना सवाल लिख कर दे दें। थोड़ी देर में हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में लगभग 150 सवाल आ गए।
 
स्टेज पर दो कुर्सियां थीं। एक पर अर्जुन सिंह बैठे और दूसरी पर सवालों का बंडल ले कर मैं बैठा था। सवालों का जवाब आरंभ होने से पहले यह भी बता दिया गया कि अगर किसी को पूरक सवाल करना है तो इस सत्र के बाद कर सकता है। दरअसल इस आइडिया के पीछे कहानी यह थी कि कथित कारसेवकों द्वारा और प्रधानमंत्री नरसिंह राव की मिली भगत से बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद लोगों के जहन में कई सवाल थे मगर जवाब नहीं मिल रहा था। उस समय कांग्रेस के नेता मुसलमानों के बीच जाने से कतरा रहे थे। उस समय केवल अर्जुन सिंह ही ऐसे नेता थे जिन्हें मुसलमान पसंद करते थे।
 
सवालों का सिलसिला आरंभ हो गया लोग बहुत ध्यान से जवाब सुन रहे थे कई सवाल बहुत तीखे थे और लग रहा था कि इस पर अर्जुन सिंह उत्तेजित हो सकते हैं मगर तीखे सवालों पर भी श्री सिंह ने अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी। तीन घंटे के पूरे सत्र में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि श्री सिंह ने अपना आपा खोया हो। इसके बाद पूरक सवाल किए गए जो लगभग पंद्रह मिनट में निपट गए।
 
समारोह सम्पन्न होने जा रहा था और उधर बिरयानी की खुशबू वातावरण में फैल रही थी। समारोह समाप्ति की घोषणा से पहले ही भाई लोग बिरयानी पर टूट पड़े। कई लोगों को बिरयानी की खुशबू ही पागल बना देती है। फिर जो अफरा तफरी मची तो वालंटियर व्यवस्था संभाल नहीं पाए। एक लड़का बहुत शोर मचा रहा था तो उसे दो तगड़े वालंटियर ने उठाकर बिरयानी की एक खाली देग में पटक दिया इस पर भी काफी हंगामा हुआ तथा दो लोगों में हल्की मार पीट भी हो गई। कुल मिला कर समारोह जितना शांति पूर्वक सम्पन्न हुआ उससे अधिक हंगामा बिरयानी पर हो गया। 
 
इस अफरा तफरी में मुझे लखनउ में आयोजित बामसेफ का एक सम्मेलन याद आ गया इस सम्मेलन में पत्रकारिता पर भाषण देने के लिए मुझे बुलाया गया था। लंच के समय मैने देखा कि लगभग एक हजार कार्यकर्ता भोजन के लिए बने पांच काउंटरों पर लाइन लगा कर खड़े हो गए न कोई हंगामा न शोर शराबा लगभग आधे घंटे में सब को खाना मिल गया। काश कि अन्य लोग भी अपने कार्यकर्ताओं को इस प्रकार प्रशिक्षित कर सकें तो कितना अच्छा हो क्योंकि ऐसा न होने पर अच्छा खासा कार्यक्रम चौपट हो कर रह जाता है।
 

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207

अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

 

तहलका पर एक और कालिख, कोयला घोटाले में आरोपी कम्पनी से सम्बन्ध

नई दिल्ली । तरूण तेजपाल के बाद तहलका के मुंह पर एक और कालिख पुत गई है। पहले तेजपाल के चलते बदनामी झेल रही इस मैग्जीन के बारे में एक और नया खुलासा हुआ है। इस मैग्जीन में उन दो कंपनियों की हिस्सेदारी रही है, जिनका संबंध नवीन जिंदल की उस कंपनी से है, जिसका नाम कोयला घोटाले की एफआईआर में शामिल है। रोजाना कोई न कोई खुलासा करने वाले और पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित कर चुके इंडियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर ने 13 दिसम्बर के अंक में यह विशेष खबर प्रकाशित की है। इन दोनों कंपनियों ने तेजपाल की कंपनी अनंत मीडिया में 28 करोड़ 35 लाख रूपए का निवेश किया।
 
अनंत मीडिया ही तहलका मैग्जीन का प्रकाशन करता है। एक्सप्रेस में प्रकाशित उसी खबर के अनुवाद का सार यहां प्रस्तुत किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूदा दस्तावेज के मुताबिक एनलाइटेंड कंसल्टेंसी सर्विसेज ने 16 करोड़ 75 लाख रूपए और वेल्डन पोलिमर्स प्राइवेट लिमिटेड ने 11 करोड़ 60 लाख रूपए का निवेश अनंत मीडिया में किया। दोनों ही कंपनियों ने तहलका में अपने शेयर की पहली दो हिस्सेदारी में निवेश एक ही तारीख 20 जून 2008 और 20 नवम्बर 2008 को किया। दोनों कंपनियों ने अनंत मीडिया का 10 रूपए का शेयर 10,623 रूपए के प्रीमियम पर खरीदा। इस प्रकार अनंत मीडिया को 93.1 करोड़ रूपए में आंका गया, जो उस समय 21.06 करोड़ रूपए के नुकसान में थी। उदाहरण के तौर पर एनलाइटेंड कंपनी ने वर्ष 2008 में 10,623 रूपए के प्रीमियम पर शेयर खरीदे और फिर वर्ष 2009 में वापस तहलका को 10 रूपए प्रति शेयर के हिसाब से बेच दिए। कुछ ही दिनों के बाद तहलका ने ये शेयर तृणमूल कांग्रेस के सांसद केडी सिंह के रायल बिल्डिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को 2,505 रूपए के प्रीमियम पर जारी कर दिए। एनलाइटंड ने कुल मिलाकर 22,605 शेयर केडी की कंपनी को जारी किए। वर्ष 2010 में केडी सिंह की कंपनी के कुल शेयर 29,139 हो गए। जिनमें से 6,534 शेयर वेल्डन पोलिमर्स से खरीदे गए। इस तरह अनंत मीडिया ने 10 रूपए के एक शेयर के लिए 13,128 रूपए इकट्ठे किए। 
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित यह खबर सिर्फ तहलका से जुड़ी हुई है, इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका महत्व इसलिए भी है कि जिन दो कंपनियों एनलाइटेंड अैर वेल्डन का जिक्र किया गया है, उनका जुड़ाव नवीन जिंदल की कंपनी से रहा है, जिसका नाम कोयला घोटाले की एफआईआर में दर्ज है। इस खबर के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए 13 दिसम्बर 2013 के इंडियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर को पढ़ा जा सकता है। यह खबर इंटरनेट संस्करण पर भी उपलब्ध है।
 
दीपक खोखर युवा व तेजतर्रार पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क 09991680040 के जरिए किया जा सकता है.

फर्जी स्टिंग के चक्कर में चैनल वन के मालिक जा सकते हैं जेल

देश के प्रमुख न्यूज चैनलों के बीच अपनी जगह बनाने की होड़ में लगे 'चैनल वन' न्यूज ने एक स्टिंग आपरेशन को इस कदर प्रसारित किया कि एक आईएएस को जेल जाना पड़ा लेकिन जब स्टिंग के बारे में गहराई से पता चला तो चैनल के मालिक और संपादक जगह-जगह सफाई देते फिर रहे हैं।
 
मामला है उत्तराखंड के अतिरिक्त सचिव गृह जेपी जोशी का जिसने नौकरी का झासा देने के लिये एक लड़की का पिछले 4 साल से लगातार शारीरिक शोषण किया। जब लड़की ने विरोध किया तो उसे जान से मारने की धमकी देते रहे। पीड़ित लडकी ने इसकी गुहार उत्तराखंड के हर उन आला अफसरों से लगाई जो प्रशासन से लेकर सियासत के उच्च पद पर बैठे हैं, पर किसी ने इस पीड़िता का एक ना सुनी। तंग आकर पीड़िता चैनल वन न्यूज के दफ्तर में आई और चैनल मालिक की सलाहकार गीतांजली शर्मा से मिली। गीतांजली ने पीड़िता को चैनल के संपादक नवीन पांडे से मिलवाया जिन्होंने रातों रात चैनल को फर्श से अर्श पर पहुंचाने और खुद को साबित करने के लिये स्टिंग आपरेशन को चैनल वन पर दिखाया लेकिन उन्हें क्या पता था कि चैनल के मालिक के खिलाफ कितने मामले दिल्ली से लेकर मुंबई तक हैं।
 
दरअसल मालिक भी एक नंबर का फर्जी है, हवाला का पैसा इधर उधर करता है। उस पर मुंबई की कई कंपनियों से धन उगाही का मामला, अमर सिंह के जरिये रिलायंस ग्रुप से भी धन उगाही का मामला तथा एक मामला प्रवर्तन निदेशालय में भी है। अगर आप चैनल वन वाच करते होंगे तो देखा होगा एमएलएम का फर्जी वाड़ा एक प्रोमो चलता है। कुछ दिन पहले चैनल वन ने साईं प्रसाद ग्रुप के बारे में एक खबर चलाई उसके बाद पांच करोड़ की मांग की लेकिन फूटी कौड़ी भी हाथ नहीं लगी। जब न्यूज एक्सप्रेस ने चैनल वन और उसके मालिक के खिलाफ खंगालना शुरु किया तब मालिक के होश फाख्ता हुए और मामले को ठंडे बस्ते में डाला गया। 
 
जब देश के प्रतिष्ठित चैनल तहलका मामले पर कंसंट्रेट थे तब चैनल वन अलग राग अलाप रहा था जेपी जोशी मामले को लगातार कई दिनों तक दिखाया जब तक कि जेपी जोशी गिरफ्तार नहीं हो गये। जेपी जोशी के गिरफ्तारी के पहले चैनल के हुक्मरान ने पैसे की डिमांड की लेकिन जेपी जोशी ने पैसे देने से इंकार कर दिया, साथ ही उत्तराखंड में एक एफआईआऱ भी दर्ज कराया कि चैनल वन के तरफ से मामले को दबाने के लिये पैसे की मांग की जा रही है जेपी जोशी ने ब्लैकमेल करने का आरोप भी लगाया। इसी मामले में चैनल वन के ब्यूरो चीफ को 14 दिन हवालात की हवा खानी पड़ी। अब आप को एक बात और भी बता दें, जब चैनल वन पर लड़की लाइव बैठी थी तब वह लगातार कह रही थी कि मुझे न्याय चाहिये, साथ ही ये भी कह रही थी कि अगर मुझे प्लाट और जीवन यापन के लिये कुछ राशि मिल जाए तो मैं सेटलमेंट कर लूंगी। 
 
खैर नवीन और गीतांजली ने तो चैनल को डुबोने का खेल कर दिया लेकिन जब यहां से लड़की उत्तराखंड गयी तो उसने एक निजी चैनल नेटवर्क 10 पर बयान दिया कि चैनल वन की गीतांजली शर्मा और नवीन पांडे ने मुझे बरगलाया और साथ ही मेरे ऊपर दबाव बनाकर मुझे जेपी जोशी के खिलाफ बोलने के लिये कहा। हालांकि उत्तराखंड पुलिस पीड़ित से भी लगातार पूछताछ कर रही है। वहां भी लड़की ने यही बयान दिया जो नेटवर्क 10 पर दिया था। कभी भी चैनल वन पर भी रेड पड़ सकती है। अब मामला फंसता नजर आ रहा है। चैनल वन ने तो वो हर हथकंडे अपनाये जिससे नेम फेम औऱ साथ में धन भी मिले। इसके चक्कर में लड़की और जेपी जोशी को खूब बदनाम किया लेकिन मिला कुछ नहीं। लड़की ने बयान बदल लिया और अब चैनल के मालिक और संपादक कोर्ट कचहरी का चक्कर काट रहे हैं।
 
देहरादून से शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. शशिकांत से shashikantsingh999@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

‘यूएनआई’ के संयुक्त संपादक समेत दो पत्रकारों व क्लर्क को एससी/एसटी एक्ट में जेल

आदरणीय यशवंत जी, यह समाचार 'न्‍यूज एजेंसी यूएनआई' से संबंधित है। संभवतया यह देश का पहला मामाला होगा जब एससी/एसटी एक्ट के तहत देश के चोटी के पत्रकारों को हिरासत में लेने का आदेश दिल्‍ली की पटियाला हाउस अदालत ने दिया। 
 
आप जानते हैं कि मीडिया में दलित वर्ग की मौजूदगी नगण्‍य है। फिर उसमें किसी का हिम्‍मत करके केस दायर करना और फिर उसमें निर्णय भी दलित के अनुरूप आना दुर्लभतम मामला है। 
 
आपकी प्रतिष्ठित वेबसाइट पर यह समाचार प्रकाशित होने से देश की मीडिया को यह संदेश मिल सकेगा कि दलित उत्‍पीड़न अब पूरी तरह बंद किया जाए।
 
इनमें से हिरासत में लिये गये संयुक्‍त संपादक नीरज वाजपेई इस समय न्‍यायमूर्ति मार्कण्‍डेय काटजू की अध्यक्षता वाली 'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया' के सम्‍मानित सदस्‍य भी हैं। 
 
इस संबंध में नवोदय टाइम्स ने खबर प्रकाशित की है लेकिन अखबार ने संवाद समिति का नाम छापने से परहेज किया है। यह आपके विवेक पर है कि आप एजेंसी का नाम देंगे अथवा नहीं, क्योंकि यह मामला दो पार्टियों के बीच है न कि संस्‍थान और व्‍यक्ति के मध्‍य। नवोदय टाइम्स में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशाट दिया जा रहा है.
मामले में शामिल एक अन्‍य अभियुक्‍त पत्रकार स्‍वयं को पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्‍ण आडवाणी का दायां हाथ समझते हैं और उन्‍हें प्रधानमंत्री बनवाने के लिए पत्रकारिता धर्म का इस्तेमाल करने में एड़ी चोटी का जोर लगाये हुये हैं। इसलिए भी यह मामला बहुत महत्‍वपूर्ण हो जाता है क्‍योंकि राजनीति के शिखर पुरूषों के पत्रकार चेलों से पंगा लेना बहुत साहस का काम है और इसकी प्रशंसा की जानी चाहिये। 
 
खबर की सत्‍यता के लिए 'पटियाला हाउस कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर चेक किया जा सकता है या फिर आपके यूएनआई में जो सोर्स हों उनसे भी पता किया जा सकता है।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

समूह संपादक बन गए तो क्या हुआ, इतना कृतघ्न नहीं होना चाहिए

यह कहानी एक समूह संपादक जी के बारे में हैं। वह हिंदी पत्रकारिता में खुद को एक आइकन मानते हैं। उनके हर संपादकीय वर्तमान की घटनाओं से शुरू होते हैं और खत्म होते-होते इतिहास की गहराईयों में गोते लगाने लगते हैं। क्या करें? परास्नातक इतिहास से जो किया था, इसलिए आदत से मजबूर हैं। सभी को जबरन इतिहास की घुट्टी पिलाते रहते हैं, चाहे पाठक को जरूरत है या नहीं। वह जितने बड़े संपादक हैं उतने बड़े कृतघ्न भी हैं। लोगों के अहसान या संबंधों को अपने लाभ-हानि के अनुसार याद रखना व भुलाना उनका हुनर रहा है। जोड़-तोड़ उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। दूसरों को टंगड़ी मारकर अपना कैरियर बनाना, जैसे सिद्धांतों में प्रयोगात्मक रूप से सिद्धहस्त रहे हैं।
 
वर्तमान में महाशय समूह संपादक के रूप में कनॉट पैलेस के नजदीक स्थित एक बहुमंजिला इमारत में बनी ऑफिस में बैठते हैं। उसी इमारत में भारत सरकार के एक आयोग का भी कार्यालय है। अखबार के मालिकान कांग्रेस से सांसद हैं और भारत के प्रमुख व्यावसायिक घराने से संबंध रखते हैं। संपादक जी का हिंदी साहित्य व पत्रकारिता से पुश्तैनी संबंध रहा है। इऩके पिताजी केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में बड़े अधिकारी रहे हैं, जिसका उन्हें पत्रकारिता में कैरियर आरंभ करने से लेकर ऊंचे ओहदे तक पहुंचने में लाभ मिलता रहा है।
 
संपादक जी के पिता और मेरे पारिवारिक दादाजी (सगे नहीं, दादाजी के भाई), दोनों घनिष्ठ मित्र रहे हैं। मेरे सगे दादाजी की मृत्यु मेरे पैदा होने से पहले ही हो गई थी। इन्हीं पारिवारिक दादाजी ने मुझे सगे दादा की तरह प्रेम किया। यही पारिवारिक दादाजी उन्नीस सौ पचास के दशक में आगरा कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष रहे। हिंदी साहित्य जगत से उनका गहरा नाता रहा है। हिंदी साहित्य सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा आगरा के भी वह अध्यक्ष रहे। अपने दौर में उनके कई कविता व कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं व प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें हिंदी साहित्य सेवा के लिए समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है। करीब सालभर पूर्व उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने प्रदेश की जीवित साहित्यिक हस्तियों को सम्मानित किया था, जिसमें उन्हें भी सम्मानित किया गया।
 
मेरे पारिवारिक दादाजी और उक्त संपादक जी के पिताजी एक ही क्षेत्र हिंदी साहित्य से जुड़े होने के कारण दोनों में गहरी मित्रता थी। दादाजी ने मुझे बताया कि “संपादक जी के पिताजी की शादी के लिए लड़की देखने वालों में वह भी शामिल थे।” उनकी शादी दादाजी ने अलीगढ़ से कराई थी। वैसे उनकी पत्नी मेरे दादाजी से बहुत चिढ़ा करती थीं। सामान्यतौर पर होता भी यही है कि महिला अपने पति के गहरे मित्र से चिढ़ती जरूर है, उसे शायद लगता है कि इसी की वजह से मेरा पति घर में नहीं टिक पाता है, और इऩका यह मित्र जब चाहे मुंह उठाए घर में चला आता है। वह सोचती है 'इसके घर आते ही मेरे पति घर की सारी रामायण इसे बताना शुरू कर देते हैं, उसका पति अपने मित्र से उसकी बुराई करने को तो उतावला ही नजर आता है। साथ ही सारे काम छोड़कर इसके चाय-पानी के इंतजाम करने के लिए पतिदेव का ऑर्डर अलग से मिलता है।' ऐसी परिस्थिति में स्वाभाविक रूप से कोई भी महिला अपने पति के घनिष्ठ मित्र से जरूर चिढ़ेगी।
 
दादाजी ने उक्त संपादक जी को बचपन में गोदी में खिलाया है। दादाजी के बच्चे यानी मेरे रिश्ते के चाचा-ताऊ और संपादक जी साथ-साथ खेलेते-कूदते बड़े हुए हैं। युवा अवस्था वाले सभी काम मिल-जुलकर किए हैं, चाहे वो घर वालों से छिपकर फिल्म देखना हो या किसी मामूली सी बात को लेकर बाजार में किसी से झगड़ना, किसी लड़की को प्यार भरे अंदाज में छेड़ना हो या कॉलेज से बंक मारना, सभी साथ-साथ किया है।
 
मेरे पारिवारिक बाबा के पोते ने मास्टर डिग्री पत्रकारिता एवं जनसंचार में किया है। वह, मेरा चचेरा भाई होने के साथ अच्छा मित्र भी है। उसके पत्रकारिता में परास्नातक करने के पीछे घर का साहित्यिक माहौल भी जिम्मेदार रहा है। पत्रकारिता करने बाद करीब दो वर्ष तक उसने एक हिंदी के राष्ट्रीय समाचार पत्र में काम किया। किसी कारणवश वहां से उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। उसने मुझे बताया कि जब दादाजी से उसने नौकरी छोड़ने और नई नौकरी की तलाश करने में आ रही दिक्कतों के बारे में बताया तो दादाजी ने उसकी मदद करने के लिए उक्त संपादक जी को फोन करके अपने पोते की मदद करने की सोची।
 
वह अपने पोते को आगरा या यूपी के अन्य अखबारों की यूनिटों में आसानी से उसे लगवा सकते थे। उनके कई घनिष्ट मित्र विभिन्न अखबारों या पत्रिकाओं
में संपादक या अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। लेकिन वह दिल्ली में पत्रकारिता करने की जिद पर अड़ा हुआ था। उन्होंने उक्त संपादक जी को फोन मिलाया। संयोगवश मैं वहां मौजूद था। दादाजी की संपादक जी से काफी सालों बाद बात हो रही थी। दूसरी तरफ से फोन उठते ही दादाजी ने अपना परिचय दिया। संपादक जी ने लोक मर्यादा निभाते हुए चाचाजी संबोधन के साथ प्रणाम कहा। दादाजी ने संपादक जी से परिवार का हालचाल जानने के बाद अपने पोते के बारे में बताते हुए उसकी मदद करने व अपने अखबार में दिल्ली रखने के लिए कहा। काफी देर बात हुई। संपादक जी ने अंत में कृतघ्नता और अहं का छोड़ा सा नमूना दिखाते हुए कहा “मैं केवल संपादकीय स्तर के मामलों को देखता हूं। सब एडिटर या सीनियर सब एडिटर की भर्ती प्रक्रिया को स्थानीय संपादक देखते हैं। चलिए देखता हूं”। दादाजी ने संपादक जी को बोल दिया कि उनका पोता आपसे मिलने दिल्ली आएगा।
 
दादाजी ने संपादक जी से बातचीत होने के बाद उनके पिताजी यानि अपने पुराने घनिष्ठ मित्र को फोन मिलाया। घर का हाल-चाल पूछा। इसके बाद वह उनके लड़के यानि संपादक जी के बारे में बात करने लगे। संपादक जी के पिताजी फोन पर ही रोने लगे और अपने बेटे के बारे में बुरा-भला बताने लगे। उनके पिताजी ने बताया कि उनका अपने बेटे से कोई संबंध नहीं हैं, वह अलग रह रहे हैं। शायद ओल्ड हाउस बताया था। वैसे दादाजी का उद्देश्य अपने मित्र से उसके संपादक बेटे की शिकायत का था। फोन पर हुई बातचीत के बाद अपने मित्र और उनकी पत्नी की हालत देखकर उन्होंने इरादा छोड़ दिया।
 
दादाजी के कहे अनुसार उनका पोता संपादक जी से मिलने दिल्ली पहुंच गया। कनॉट पैलेस के नजदीक बहुमंजिला इमारत में स्थित अखबार के कार्यालय में तैनात रिसेप्शन वालों ने उससे पूछा “आप किससे मिलने आए हो”। उसने बताया “समूह संपादक जी से”। रिसेप्शन पर तैनात व्यक्ति ने नाम, पता व रेफरेंस पूछकर तुरंत समूह संपादक जी के पीए को फोन मिला दिया। पांच मिनट बाद जवाब आया कि हमने इसे मिलने के लिए नहीं बुलाया था। आ ही गया है तो अंदर भेज दो। अंदर पहुंचते ही पीए ने बायोडाटा मांगा, और वरिष्ठ स्थानीय संपादक के पास भेज दिया। समूह संपादक जी ने कृतघ्नता का एक और नमूना पेश किया, उससे मिलना भी जरूरी नहीं समझा। वरिष्ठ स्थानीय संपादक ने उसे टेस्ट के लिए एनई के पास भेज दिया। एनई ने उससे दिल्ली में गरमाए हुए एक ज्वलंत मुद्दे पर एक खबर लिखवाई। संयोगवश उसकी लिखी हुई खबर हूबहू अगले दिन दिल्ली के संस्करण में फर्स्ट पेज की लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुई।
 
टेस्ट के बाद वरिष्ठ स्थानीय संपादक और समूह संपादक के पीए ने फोन पर जानकारी देने की बात कहकर उसे घर भेज दिया। काफी दिनों तक कोई सूचना ना मिलने पर उसने जब समूह संपादक जी और वरिष्ठ स्थानीय संपादक से बात की। उन्होंने बताया कि उसका टेस्ट के दौरान इंप्रेशन बेहद खराब रहा है, हम तुम्हें अपने अखबार में नहीं ले सकते हैं। दादाजी के पोते ने जब समूह संपादक जी को बताया कि टेस्ट में लिखवायी गई खबर आपके अखबार में पहले पेज की लीड स्टोरी बनी थी, तो वह चौंक गए। लेकिन, उसका सलेक्शन नहीं हुआ। उसने भी संतोष कर लिया जो व्यक्ति अपने माता-पिता को घर से निकाल सकता है, वह पुराने संबंधों और अहसानों को कैसे ध्यान रख सकता है। वह तो केवल पद, नाम, शक्ति और पैसे की शब्दावलियों को जानता है। उसे दु:ख केवल इस बात का है कि वह केवल पुरानी जानकारी के आधार पर नौकरी नहीं मांग रहा था, उसने टेस्ट के जरिए अपनी योग्यता भी सिद्ध की थी।
 
                         आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार में शोध कर रहे हैं. इनसे 09411400108 के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

कोई इतना असंवेदनशील या कोई कौम इतनी ‘मुर्दा’ कैसे हो सकती है!

Dilnawaz Pasha : कितनी अजीब बात है कि राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में लिखा होता है, "बेग़ुनाह मुसलिम नौजवानों को रिहा किया जाएगा." पहले ये तो बताओ कि जो बेग़ुनाह हैं उन्हें गिरफ़्तार करने की तुम्हारी मजबूरियाँ क्या हैं? जिन्होंने ग़लत गिरफ़्तारियों को अंजाम दिया उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाइयाँ की गईं? 
 
और सिर्फ़ मुसलमान बेग़ुनाहों को ही क्यों रिहा किया जाए? तुम ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाते जिसमें कोई भी बेग़ुनाह जेल में न जाए? ज़ाहिर है तुम्हारे ये घोषणा पत्र वोट बैंक की राजनीति से ज़्यादा कुछ नहीं है. 
 
पहले तुम बेग़ुनाहों को गिरफ़्तार करोगे और फिर उन्हें रिहा करने के नाम पर वोट माँगोगे. और इस बीच उन बेग़ुनाहों की ज़िंदगी के जो साल ज़ाया हो जाएंगे, उनके परिवार जिस पीड़ा से गुज़रेंगे उसका हिसाब तुम 'हर्ज़ाने' में दोगे. 
 
समझ नहीं आता कि कोई इतना असंवेदनशील या कोई कौम इतनी 'मुर्दा' कैसे हो सकती है!
 
पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वाल से

Workers of ‘Daikin plant’, Neemrana are on strike for last 53 days

846 workers of Daikin plant in Neemrana, Rajasthan are on strike for last 53 days asserting their right to form union and demanding the reinstatement of 125 fellow workers who have been terminated by the management for being part of the process of union formation. Daikin Air-conditioning India Pvt. Ltd., a100% Japanese owned enterprise, is a part of Daikin Industries Ltd,  world’s no. 1 Air-conditioner manufacturing company with 60 production base units and 182 consolidated subsidiaries worldwide.
 
The Neemrana plant is the sole production unit of Daikin in India. It is located over 40 acre area beside National Highway-8, in the ‘Japanese Park’ of RIICO Industrial Complex in Neemrana at distance of 25-30 km from IMT Bawal and 97 km from Gurgaon. The plant was established in 2008 and the production started in 2009. Current annual production capacity of this unit is 20000 VRV (Variable Refrigerant Volume) units and 1800 chiller units with an annual net sale of Daikin in Indian market being Rs. 1200 crores, whereas the current global net sales is 15,234 million USD. Compared to this heavy profile of the company The working condition is too oppressive with heavy workload and the precarious rights and facilities given to the workers which has been made the precondition for foreign investment in the ‘Japanese Park’ in this new and fast developing industrial belt. Permanent workers presently get Rs. 7200 in hand, whereas trainees get Rs. 4700. There is no Dearness allowance, bonus given to the workers is also shown as part of their salary.
 
When the workers realized that without collective struggle the situation would not change, they came together and decided to form their union. They took the signatures of 116 workers and applied for union registration on 6th May 2013 through AITUC. When the management came to know about the process of union formation, they started to pressurize the workers who signed earlier for union registration to give a written statement declaring that they did not support any union in the plant. When the workers did not agree, the management started terminating workers, both permanent and trainee, without any show-cause or enquiry from 21 June, 2013. The workers got the registration of the union, “Daikin Air-conditioning Kamgaar Union”, on 31 July, 2013. At that very night 42 workers were terminated. On 2nd August, workers submitted their demand notice demanding 75% salary hike, DA, residential allowances, medical facilities, conveyance facilities, better canteen facilities, bonus etc. Among the 39 demands that they made, two of them were the demands to abolish contract system and to make the contract workers permanent and the facilities of maternity leave and crèche for female workers. 
 
The management responded to these demand by terminating more workers and in this process altogether 125 workers were terminated till 8th October. The workers declared strike from 21st October, 2013 demanding the reinstatement of all terminated workers and a settlement of their just demands. In response, company management suspended another 56 workers accusing that they were involved in the destruction of company properties during the period of strike. However, the management were forced to participate in a tripartite negotiation 9th November in the presence of DLC, Alwar and ALC, Jaipur. The workers turned down the management’s proposal when it was said that 89 workers among 125 would remain terminated and the remaining would face domestic enquiry under suspension. On 14th November in another round of tripartite meeting the management initially proposed that 50% of the total terminated and suspended workers would be taken back and the remaining workers would face enquiry, but they did not mention any concrete time frame when the remaining workers would be taken back. Thereafter few more negotiations took place but ended without any concrete outcome. 
 
Workers were firm on their position that as no terminated or suspended worker did any wrong, there was no right of the management to punish them. The brave workers are in sit-in demonstration 100 metre away from the company gate for last 53 days. The workers also reached to the nearby villages for support and many from the villages around came in support of the workers in a solidarity meeting held on 26th November. One crucial aspect of this struggle is the continuous assertion of unity of contract, trainee and permanent workers vis-à-vis the management and local administration. Manohar, a worker leader and the President of the Daikin Air-conditioning Kamgaar Union, said in a strong voice,“Against the attack of the management, our strength is our organization and unity. We are also trying to reach to the other unions and workers of Gurgaon-Manesar- Dharuhera-Bawal-Neemrana industrial belt and we already got some supports. Whatever happens, we will continue  for our just demands.”

एक वो नवाब साहब थे, एक ये नवाब साब हैं

Nadim S. Akhter : जो लोग ज्ञान झाड़ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल वाली आम आदमी पार्टी सरकार नहीं चला पाएगी, ये लोग डर गए हैं, सो सरकार नहीं बना रहे, अरविंद की सीमा यहीं तक है, आगे वे फेल हैं, वगैरह-वगैरह, वे अपने ज्ञान-बुक की तावीज बनाकर गले में डाल लें. जादू-टोना से बच जाएंगे.
 
तिलिस्म तो जनता ने तोड़ दिया है, आम आदमी पार्टी को अप्रत्याशित सीटें देकर. अपना मैनडेट देकर. वह भी घाघ राजनीतिक पार्टियों के लाख प्रोपेगंडा और घात के बावजूद. सब चारों खाने चित हैं. इसलिए हे विचार वीरों!! अपने ज्ञान का सामान खुद के पास रखो. फेसबुक पर मत बांटो. पोल खुल जाती है. समझा करो.
 
जिस दड़बे के आदमी हो, उसी में पड़े रहो. परिवर्तन तुम्हें कभी नहीं दिखेगा. तुम लोग उस नवाब से कम नहीं, जो रियासत-सत्ता गंवाने के बाद भी सिंहासन पर बैठा हुआ था. अंग्रेज भी हैरत में थे कि नवाब साहब, सब भाग गए. आप क्यों नहीं भागे??!!
 
नवाब साहब ने कहा- अरे, कमबख्त, जूता पहनाने वाली कनीज भाग गई, पैर में जूते नहीं हैं. क्या खाक भागते नंगे पांव!!!
 
नवाब साहब की बात सुनकर अंग्रेज अफसर भी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे और मन ही मन बोले. वाकई में ये आदमी असली नवाब है. नवाब हो तो ऐसा. ये हिंदुस्तान में ही हो सकता है.
 
तो इस देश की सत्ता के असली नवाबों, तुम यूं ही कुर्सी-संस्थान-फेसबुक पर बैठकर ज्ञान बघारते रहो. अपनी कनीजों को पुकारते रहो. जनता तुम्हें तुम्हारी असली जगह जल्द पहुंचाएगी. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से

चीन सरकार की विदेशी पत्रकारों को बाहर निकालने की तैयारी

चीन के सरकारी अधिकारियों ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए चीन में व्यापार संबंधी खबरों को कवर करने वाली एजेंसी ब्लूमबर्ग और अखबार न्यूयार्क टाइम्स के लगभग दो दर्जन पत्रकारों का वीजा रोक रखा है. ये पत्रकार अभी चीन में ही रह रहे हैं. चीन के इस कदम से ये चर्चा तेज हो गई है कि चीन विदेशी पत्रकारों को देश से बाहर करने की योजना बना रहा है.
 
चीन के मौजूदा नियमों के अनुसार हर साल देश में रह रहे विदेशी पत्रकारों को इस वक्त अपने प्रेस कार्ड को विदेश मंत्रालय से और वीजा को पुलिस से अलग-2 नवीनीकरण कराना होता है. 
 
माना जा रहा है कि चीन के शीर्ष नेताओं और अधिकारियों की सम्पत्तियों और उनके कारोबारी रिश्तों से जुड़ी खबरें भेजने के लिए सरकार इन पत्रकारों से नाराज है. इन समाचार संगठनों ने चीन के बड़े नेताओं से जुड़ी खबरें काफी खोजबीन करके प्रकाशित की थीं. इनमें पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियोबाओ और मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसी कद्दावर राजनैतिक हस्तियां भी शामिल थीं.
 
न्यूयार्क टाइम्स में पिछले महीने छपी वेन जियाबाओ और अमेरिकी बैंक जेपी मार्गन चेज के रिश्ते पर खबर आने के बाद विदेश मंत्रालय ने अपने यहां न्यूयार्क टाइम्स के सभी पत्रकारों के प्रेस कार्ड के नवीनीकरण पर रोक लगा दी थी, साथ ही जिन पत्रकारों के प्रेस कार्ड मंत्रालय जारी कर चुका था उनके पासपोर्ट बिना वीजा की अवधि बढ़ाये वापस कर दिए. इन पत्रकारों की वीजा अवधि दिसम्बर में समाप्त हो रही है और अगर इन्हें वीजा नहीं मिलता है तो इन्हें चीन छोड़ना पड़ेगा.
 
मीडिया जगत में इस समय बड़ी हैरानी है कि ऐसे समय में जब चीन के रिश्ते पूरी दुनिया के साथ सुधर रहे हैं और चीन की छवि दुनिया के सामने एक उदारवादी देश की बन रही है क्या चीन इस दो बड़े अमेरिकी समाचार संगठनों को अपनी गतिविधियां बंद करने के लिए कहेगा?
 

अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी फर्जीवाड़े में गिरफ्तार

अमेरिका में भारतीय वाणिज्य दूतावास में तैनात भारत की उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोबराडगे को फर्जी दस्तवेज पर एक भारतीय नागरिक को काम पर रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. देवयानी पर अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि देवयानी ने अपने घर में एक घरेलू नौकर के वीजा आवेदन के लिए अमेरिकी विदेश विभाग के सम्मुख नकली दस्तावेज तैयार कर प्रस्तुत किए थे.
 
अमेरिका में इस तरह की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ीं हैं. बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों को नकली वीजा पर रखा जाता है. इन तरह काम करने वाले लोगों को बहुत कम वेतन दिया जाता है तथा इनका शोषण किया जाता है. अवैध रूप से रहने के कारण ये लोग डरे होते हैं और मालिकों के शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते हैं.
 
मैनहट्टन के संघीय वकील प्रीत बरार ने बताया कि अमेरिका में घरेलू नौकर के रूप में काम कर रहे विदेशी नागरिकों को भी शोषण के विरुद्ध वही अधिकार प्राप्त हैं जो अमेरिकी नागरिकों को प्राप्त हैं. उन्होंने बताया कि वीजा पाने के लिए झूठ बोला गया, गलत दस्तावेज प्रस्तुत करके सुरक्षा को धता बताया गया ताकि घरेलू नौकर को वीजा मिल सके और उसका मनमाना शोषण किया जा सके. अमेरिका सरकार इस तरह के फर्जीवाड़े और व्यक्तियों के शोषण को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है.

आज राज्यसभा में पेश होगा लोकपाल बिल, कांग्रेस और भाजपा दोनो सहमत

आखिर अब लगने लगा है कि शायद अब लोकपाल बिल पास हो जाये. आम आदमी पार्टी की सफलता से डरी सहमी भाजपा और कांग्रेस पहली बार लोकपाल पर सहमत नजर आ रही हैं. आज राज्यसभा में सरकार लोकपाल बिल पेश करेगी. अगर सब ठीक रहा तो इस बार लोकसभा बिल पास कर दिया जायेगा.
 
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायणस्वामी आज उच्च सदन में चर्चा के लिए लोकपाल बिल पेश करेंगे. इस पर सदन में चर्चा के लिए छह घंटे का समय रखा गया है. चर्चा के बाद बिल पर मतदान होगा. पूर्व आईपीएस अधिकारी और अन्ना आंदोलन की सक्रिय सदस्य किरण बेदी ने भी ट्वीट कर सभी दलों से इसका समर्थन करने को कहा है. राज्य सभा की सेलेक्ट कमेटी की सिफारिशों को करीब-2 मांग लिए जाने के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनो ने इस पर सहमति जता दी थी. किरण बेदी ने कहा कि अन्ना ने भी इस बिल को अपनी स्वीकृति दे दी है.
 
वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि वह सदन में इस बिल का विरोध करेगी. पार्टी नेता रामगोपाल यादव ने कहा है कि पार्टी किसी भी सूरत में इस बिल का समर्थन नहीं करेगी. सपा के इस रूख से सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं लेकिन अगर अन्य दलों का समर्थन मिला तो बिल के पास होने में कोई मुश्किल आने की आशंका नहीं है.
 
उधर अन्ना हजारे पिछले चार दिनों से जनलोकपाल को लेकर रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठे हुए हैं. अन्ना ने कहा है कि जब तक जनलोकपाल बिल पारित नहीं कर दिया जाता उनका अनशन जारी रहेगा. अन्ना ने बिल पास नहीं करने पर अपनी नाराजगी जताते हुए प्रधानमंत्री, यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी और मु्ख्य विपक्षी दल बीजेपी के नेता अरुण जेटली को चिठ्ठी लिखी है.
 
अन्ना ने अपनी चिठ्ठी में कहा है कि बिल पास करने का बार-बार झूठा आश्वासन देकर मुझे और देश के साथ धोखा किया गया है. अन्ना ने कहा कि कांग्रेस के इसी व्यवहार के कारण चारों राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस की हार हुई है और पार्टी ने यही रुख अपनाया तो आने वाले लोकसभा चुनावों में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ेगा.

कशिश न्यूज के चैनल हेड रविन्द्र भारती को लीगल नोटिस

यशवंत जी, मेरा नाम राज वर्मा है और मैं कशिश न्यूज रांची में वर्ष 2011 से में शेखपुरा जिले में स्ट्रिंगर के रूप में कार्यरत हूं. 2013 के सितम्बर माह में कशिश न्यूज़ में कार्यरत इनपुट इंचार्ज राकेश सिन्हा ने मुझे फोन किया और कहा कि आप कशिश न्यूज छोड़ दें अब वहां से दूसरा लड़का काम करेगा. मेरा खुद भी कशिश न्यूज में काम करने का मन नहीं था क्यूंकि वहां पैसे के नाम पर कुछ दिया नहीं जाता था. चैनल की तरफ से महीने में बमुश्किल हजार या दो हजार रूपये मिलते थे.
 
मैने राकेश सिन्हा से चैनल छोड़ने के लिए हामी भर दी और उनसे बकाया राशि की मांग की. राकेश ने मुझे बताया था कि मेरा सारा हिसाब जोड़कर पेमेंट कर दिया जायेगा लेकिन आज तक एक पैसा पेमेंट नहीं दिया गया. जब मैंने राकेश से पेमेंट के लिए बात की और उन्हें याद दिलाया तो राकेश ने पेमेंट देने से इंकार कर दिया.
 
इसके बाद मैने चैनल में कई दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों से इस बारे में बात करने की कोशिश की पर कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुआ. अंततः बाध्य होकर मैने चैनल हेड रविन्द्र भारती और राकेश सिन्हा को लीगल नोटिस भेजा है और 15 दिनों के भीतर पेमेंट की मांग की है. यदि नियत समय पर मुझे पेमेंट नहीं दिया गया तो मैं कशिश न्यूज के खिलाफ कोर्ट में परिवाद भी दायर करूंगा. 
 
एक तरफ ये चैनल दूसरों के हक की लड़ाई और न्याय की मुहिम चलाने के बड़े-2 दावे करते हैं वहीं दूसरी तरफ अपने ही यहां काम कर रहे कर्मचारियों का हक भी नहीं दिया करते. ये चैनल अपने यहां काम कर रहे स्ट्रिंगरों का सिर्फ शोषण करना जानते हैं. सारे चैनलों का यही हाल है.
 
राज वर्मा
 
शेखपुरा, बिहार
 
संपर्क-09204034189
 
चैनल हेड को भेजे गए लीगल नोटिस की स्कैन कॉपी नीचे दी जा रही है-

न्यूज एक्सप्रेस के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ बने विनोद कापड़ी

अंततः विनोद कापड़ी ने सांई प्रसाद ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. उन्हें सांई प्रसाद मीडिया ग्रुप का सीईओ और एडिटर-इन-चीफ बनाया गया है. इस संबंध में सांई प्रसाद ग्रुप द्वारा इंटर्नल मेल जारी कर दिया गया है.
 
भड़ास ने बहुत पहले ही बता दिया था कि इंडिया टीवी से निकाले जाने के बाद विनोद कापड़ी की सांई प्रसाद ग्रुप के मालिकों से बात चल रही है. आज मेल जारी होने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो गया.  बताया जाता है कि निशांत चतुर्वेदी चैनल हेड बने रहेंगे. एसएन विनोद जैसे वरिष्ठ संपादक विनोद कापड़ी के अधीन काम करने के लिए तैयार हो गए हैं.
 
उधर विनोद कापड़ी के साई प्रसाद ग्रुप ज्वाइन करने पर भड़ास4मीडिया के सीईओ यशवंत सिंह ने साई प्रसाद ग्रुप को मेल जारी कर सूचित कर दिया है कि साई प्रसाद ग्रुप के साथ भड़ास का कंटेंट और ब्रांड सपोर्ट का जो एग्रीमेंट चल रहा है उसे 31 दिसम्बर को खत्म कर दिया जाएगा क्यूंकि विनोद कापड़ी जैसे शख्स को इस ग्रुप का हिस्सा बनाये जाने के बाद इस कंटेंट और ब्रांड सपोर्ट एग्रीमेंट को आगे बढ़ा पाना मुश्किल है.

 

अमर उजाला वाराणसी से एक साथ पांच इस्तीफे, गोरखपुर से भी एक

अमर उजाला वाराणसी में हाहाकार मचा हुआ है. संस्थान से एक साथ पांच लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. कुछ और लोग भी जाने की तैयारी में हैं. खबर है कि छोड़कर जाने वाले सभी लोग हिन्दुस्तान पटना में गये हैं. अमर उजाला को बड़ा झटका सीनियर कर्मी और काम्पैक्ट के इंचार्ज हेमन्त श्रीवास्तव के जाने से लगा है.
 
इस्तीफा देने वाले अन्य लोगों में सीनियर सब एडिटर और जौनपुर ब्यूरो चीफ विनोद पाण्डेय, उजाला वाराणसी में जनरल डेस्क संभाल रहे अजीत सिंह भी हैं. इसके अतिरिक्त दो जूनियर सब एडिटर शैलेश सिंह और आलोक त्रिपाठी ने भी अमर उजाला को अलविदा कह दिया है. कुछ और लोग भी जल्द ही छोड़कर जाने वाले हैं. अपुष्ट सूत्रों से खबर है कि रवीन्द्र वर्मा ने भी इस्तीफा दे दिया है.
 
वहीं अमर उजाला गोरखपुर से भी एक इस्तीफे की खबर है. वहां से विनयमणि त्रिपाठी ने इस्तीफा देकर हिन्दुस्तान पटना में ही ज्वाइन कर लिया है.
 

उज्जवल कुमार का दैनिक भास्कर से इस्तीफा, हिन्दुस्तान पहुंचे

दैनिक भास्कर जमशेदपुर में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे उज्जवल कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने हिन्दुस्तान पटना के साथ अपनी नई पारी की शुरूआत की है. उन्हें यहां सीनियर सब एडिटर की जिम्मेवारी मिली है. उज्जवल कुमार पिछले पांच महीने पहले ही भास्कर में आए थे. 
 
उज्जवल कुमार भास्कर के पूर्व आई नेक्स्ट में डिप्टी चीफ रिपोर्टर और प्रभात खबर पटना में कॉपी एडिटर तथा रिपोर्टर का भी काम कर चुके हैं. एम. फिल. की पढ़ाई करने के लिए पिछले साल आई नेक्स्ट से नौकरी छोड़ कर वर्धा चले गए थे. 
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं

दैनिक हिन्दुस्तान के कारनामे के कारण शर्मिंदा हुई बिहार सरकार

पटना से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के एक कारनामे के कारण बिहार सरकार को बिहार विधान परिषद में शर्मिंदगी उठानी पड़ी। हालत यह हो गयी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सदन में खेद व्यक्त करना पड़ा और यहां तक कहना पड़ा कि आजकल आउटसोर्सिंग का जमाना है। लेकिन फ़िर भी जो भूल हुई है वह बहुत गंभीर है और सरकार इस पूरे मामले की जांच करवायेगी। दरअसल यह पूरा मामला बिहार सरकार के सूचना एवं प्रकाशन विभाग और दैनिक हिन्दुस्तान के संयुक्त प्रयास से बिहार के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रकाशित एक विशेष पत्रिका से जुड़ा है। इस मामले को मंगलवार को परिषद में भाजपा के विधान पार्षद हरेन्द्र प्रताप पांडेय ने उठाया।
 
गैरसरकारी संकल्प के रुप में श्री पांडेय ने संविधान सभा के सदस्य रहे स्व सच्चिदानंद सिन्हा के बक्सर स्थित पैतृक गांव में आदमकद प्रतिमा लगवाने की मांग की। लेकिन इससे पहले उन्होंने शर्त रखी कि इसका जवाब केवल मुख्यमंत्री ही दें तो वे अपना प्रस्ताव सदन में रखेंगे। श्री पांडेय के इस कथन पर हालांकि सत्ता पक्ष के सदस्यों द्वारा टोका टाकी हुई लेकिन जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी सहमति दे दी तब श्री पांडेय सदन को यह कहकर सकते में डाल दिया कि सूचना एवं प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका में स्व सच्चिदानंद सिन्हा का नाम है और उनके नाम पर जो तस्वीर प्रकाशित की गयी है वह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सचिव रहे सच्चिदानंद सिन्हा की है।
 
श्री पांडेय के इस खुलासे के बाद सदन में कुछ देर के लिये शांति छा गयी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यकीन दिलाने के लिए पत्रिका की प्रति श्री पांडेय ने खुद जाकर दी। बाद में पत्रिका पलटने के बाद श्री कुमार ने स्वीकार किया कि यह एक बड़ी चूक हुई है और इस मामले की सरकार जांच करवायेगी। वैसे इस पूरे मामले में दिलचस्प यह रहा कि दैनिक हिन्दुस्तान के जिस पत्रकार ने उक्त पत्रिका के लिए मसाले जुटाये थे, वे भी प्रेस दीर्घा में मौजूद थे। जब यह सब हो रहा था तब उनके चेहरे का भाव सारी कहानी बिना कहे ही बता रही थी। 
 
पटना से नवल कुमार की रिपोर्ट

श्री न्यूज छोड़ इंडिया न्यूज पहुंचे अजीत त्रिपाठी

श्री न्यूज में प्रोड्यूसर के पद पर काम कर रहे अजीत त्रिपाठी ने इंडिया न्यूज के साथ जुड़कर अपनी नई पारी शरू की है. यहां भी उन्हें प्रोड्यूसर बनाया गया है. अजीत त्रिपाठी ने सात महीने पहले ही श्री न्यूज से जुड़े थे. अजीत इसके पहले समाचार प्लस और न्यूज 24 में प्रोड्यूसर के पद पर काम कर चुके हैं. वे यूएनआई से भी जुड़े रहे हैं.
 
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महेश भट्ट जैसे लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर धब्बे की तरह हैं

महेश भट्ट जैसे लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर ऐसे धब्बे की तरह हैं जिनको अगर कोई और देश होता तो ज़रा बर्दाश्त नहीं करता। ताजा मामला संजय दत्त का है जिनकी हिमायत में महेश उतरे है. पहली बात तो जघन्य अपराध करने के बाद भी नेता-अभिनेता अपनी पहुंच के बल पर जल्द ही आजाद हो जाते हैं या भारतीय कानून की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं. ऐसा नहीं होता तो देशद्रोह जैसे आरोप के बाद भी संजय दत्त सजायाफ्ता होने के बाद समय-समय पर तफरीह के लिए जेल से बाहर नहीं आ पाते। सलमान पर चिंकारा हिरन के शिकार मामले की सुनवाई कब से चल रही है लेकिन फैसला नहीं आ पा रहा है अब तो उन्होंने मामले की पुनः सुनवाई की अर्जी भी लगा दी है.
 
महेश भट्ट का खुद का बेटा हेडली से सम्बन्धों को लेकर पहले ही आरोपित है फिर वे संजय की वकालत कैसे कर सकते हैं. खुलेपन के नाम पर आजादी के नाम पर जैसी फ़िल्में महेश भट्ट आज बना रहे है वैसी फ़िल्में सिर्फ एक विकृत दिमाग का आदमी ही बना सकता है. एक विलायती पोर्न एक्टर को हीरोइन बना कर बॉलीवुड में नंगेपन का नाच और भारतीय युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलना महेश भट्ट का ही कारनामा है.
 
अपनी ही बेटियों के किस लेते हुए भद्दे फोटो प्रकाशित कराना सिर्फ महेश भट्ट ही कर सकते हैं. पिछले ५-७ साल में महेश और भट्ट परिवार ने जैसी फ़िल्में बनाई है उनसे युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति भूल कर भटकाव के रास्ते पर ही बढ़ रही है जिसका पूरा श्रेय भट्ट और ऐसे ही दूसरे पैसे के लालची फिल्मकारों को है.
 
लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

ये अन्ना हजारे को क्या हो गया है? कुछ करते क्यों नहीं, उन्हें समझाओ भाई

Nadim S. Akhter : जरा पता लगाइए कि अन्ना हजारे कब अनशन तोड़ रहे हैं. उनके आसपास की मंडली उन्हें क्या सलाह दे रही है. अन्ना भी बुरी तरह एक्सपोज हुए हैं. आम आदमी पार्टी की जीत के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कह रहे थे कि यहां लोकतंत्र कहां है??
 
अरे भाई, लोकतंत्र नहीं है तो क्या मदारी का ठीया है??? अजब-गजब बात करने लगे हैं अन्ना. कह रहे थे कि मैं किसी पक्ष या पार्टी के साथ नहीं जाऊंगा. अच्छी बात है. ये आपकी लाइन रही है, आप इस पर कायम रहिए.
 
लेकिन ये तो अन्ना को सोचना ही होगा कि यदा-कदा-सर्वदा टाइप के अनशन से क्या जनलोकपाल बिल वो पास करवा लेंगे?? तब तो हुआ नहीं, जब सड़क पर जनता उतर गई थी और अन्ना अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा गए थे. अब जब रालेगण की जनता भी उनके अनशन से नदारद है, तब सरकार उनकी बात पर क्यों झुकने लगी भला?? अन्ना की जो थोड़ी बहुत खबर मीडिया में दिख रही है, वह इसलिए कि उनके चेले अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव में धमाका कर डाला है. तभी महाराष्ट्र में बुरे नतीजों से डरे सीएम ने अपने एक मंत्री को अन्ना के गांव भेजकर उन्हें अनशन तोड़ने के लिए कहा, खानापूर्ति के लिए. यह दिखाने के लिए कि हम अन्ना का ख्याल करते हैं और कहीं गुस्साई जनता लोकसभा चुनाव में वहां भी कांग्रेस-एनसीपी का बैंड ना बजा दे.
अन्ना की दिक्कत ये है कि अब वे अव्याहारिक बात करने लगे हैं. लोगों और सरकार को झकझोरने के लिए एक समय अनशन ठीक था. वह हो भी गया सफलतापूर्वक. लेकिन आगे अब और क्या?? उसी ढपली को लेकर कितना पीटा जाए, वह फट गया है अब. सो नई रणनीति बनानी होगी. और जब आप लोकतंत्र में जीते हैं, इस पर विश्वास करते हैं तो लोकतंत्र को गंदा क्यों कहते हैं?
 
लोकतंत्र गंदा नहीं है, राजनीति गंदी है. और इसे मैला हम-सब ने मिलकर किया है. तो आइए ना अन्ना, आप लोकतंत्र को सुधारने के लिए राजनीति की दशा-दिशा बदलने का साहस क्यों नहीं दिखाते?? और जब अरविंद केजरीवाल ने यह साहस दिखाया तो आप ने उसे सपोर्ट करने की बजाय पाजामे का नाड़ा ढीला करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. आखिर क्यों??? कौन हैं वे लोग, जो आपके आसपास अचानक से मंडराने लगे हैं, आंदोलन के बाद. मधुमक्खी बनकर चिपक गए हैं, पहले कहां थे ये लोग??
 
सो अन्ना, दूसरों की सलाह पर मत जाइए, अपनी अक्ल लगाइए. अभी आमरण अनशन एक बार फिर शुरु किया है, कुछ दिन बाद तोड़ भी देंगे. उनकी सलाह जब मिलेगी तो?? आपका अनशन का ये बंदूक अब मिसफायर हो रहा है. कोई संज्ञान नहीं ले रहा. क्यों अपनी भद्द पिटवा रहे हैं अन्ना जी???!! मैं आज भी मानता हूं कि देश की जनता आपसे प्यार करती है और आपमें अपना नैतिक बल देखती है. वो इसलिए कि आपने अपने विचार को आचार व व्यवहार में भी ढाला.
 
सो अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल कीजिए. आप ये कह रहे हैं कि अनशन करेंगे, लोगों को जगाएंगे…किसे जगाएंगे आप. उन लोगों को जो एक बार जगे थे, फिर सो गए. दिल्ली के बाद मुंबई में आए ही नहीं, जुटे ही नहीं. अपनी रणनीति बदलिए अन्ना. आजादी मिलने से पहले भी भारतीयों ने चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी. गांधी जी ने ये नहीं कहा था कि हम तो सत्य और अहिंसा पर चलने वाले लोग, आजादी मिलने के बाद ही चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे. जितना स्कोप मिला था गांधीजी को, उन्होंने उसका भरपूर इस्तेमाल किया और करवाया. प्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से. अपने गुरु महात्मा गांधी से ही कुछ सीख लीजिए अन्ना. वरना दुनिया तो बड़े-बड़ों को बिसरा चुकी है. गांधी यानी बापू को भी. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से

पीके तिवारी समेत महुआ के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज

मुंबई : भोजपुरी टीवी चैनल महुआ के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा की शिकायत पर मुंबई पुलिस ने धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया है. शत्रुघ्न सिन्हा ने महुआ चैनल के अधिकारियों पर गेम शो के बनी करोड़पति की मेजबानी के दौरान उन्हें और चैनल पर आए दूसरे फिल्मी और राजनीतिक हस्तियों के साथ 1.75 करोड़ रूपये की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है.
 
इस शो को शत्रुघ्न सिन्हा ने होस्ट किया था जिसमें अतिथियों के रूप में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, गोविंदा और सोनाक्षी सिन्हा जैसी हस्तियां पहुंची थी. सिन्हा की शिकायत के अनुसार चैनल ने इन मेहमानों के द्वारा जीती गई पुरस्कार की राशि का भुगतान आज तक नहीं किया गया. इनमें से कई मेहमान इस शो में चैरिटी के लिए राशि इकठ्ठा करने आए थे.
 
सिन्हा की शिकायत पर मुम्बई पुलिस की अपराध शाखा ने महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड, इसके सीएमडी पीके तिवारी, सीईओ युवराज भट्टाचार्य, वाइस प्रेसीडेंट त्रिनंजन मैती और जनरल मैनेजर पंकज तिवारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (विश्वास में लेकर धोखा देना) और 120 बी (षणयंत्र) का मामला दर्ज किया है.
 
एडवोकेट मोनेश प्रेम के अनुसार ये प्रोग्राम बिग सिनर्जी मीडिया लिमिटेड की द्वारा महुआ चैनल के लिए निर्मित किया गया था जिसके लिए अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से इसकी मेजबानी करने के लिए चैनल द्वारा 2011 में बात की गई थी. इसमें अभिनेता चैनल के अधिकारियों के कहने पर फिल्मी और राजनीतिक हस्तियों को बुलाया था. इन लोगों ने चैनल में आने के लिए कोई फीस नहीं ली थी और इनसे ये वादा किया गया था कि इन्हें पुरस्कार की राशि ही प्रदान की जाएगी.
 
आने वाले प्रतिभागियों के रूप में धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, यशवंत सिन्हा, गोविन्दा और सोनाक्षी सिन्हा प्रत्येक ने 25-25 लाख रूपये जीते थे. सिन्हा ने अपनी शिकायत में कहा है कि उनके द्वारा बार-2 याद दिलाये जाने के बावजूद चैनल ने किसी को भी एक पैसा नहीं दिया. अभिनेता ने ये भी कहा कि चैनल ने उनके पारिश्रमिक से 25 लाख रूपये का टीडीएस काटकर उन्हें भुगतान किया था लेकिन वह राशि भी आयकर विभाग को जमा नहीं की गई.

महिला एंकर ने की फांसी लगाकर जान देने की कोशिश

झारखंड के एक लोकल न्यूज चैनल 'न्यूज लाइन' की एक महिला एंकर ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. घटना कल शाम की है. संयोगवश घर वालों ने देख लिया और तुरंत उसे फंदे से उतारकर बेहोशी की हालत में धनबाद के केन्द्रीय अस्पताल में भर्ती कराया. जहां चिकित्सकों ने तत्काल इलाज कर उसे मौत के मुंह से बचा लिया. युवती फिलहाल आईसीयू में भर्ती है.
 
अस्पताल प्रशासन द्वारा सूचना मिलते ही सराय ढेला पुलिस तुरन्त अस्पताल पहुंच गई. लड़की के आईसीयू में भर्ती होने के कारण पुलिस उसका बयान नहीं दर्ज कर सकी. इस संबंध में युवती के रिश्तेदार ने कहा कि उसने एसएससी की परीक्षा दी थी जिसमें वह असफल हो गई थी. इस कारण वह तनाव में थी. वहीं लड़की की मां ने इस बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया. युवती के परिजनों की खामोशी के कारण गिरिडीह में तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं.
 
बताया जा रहा है कि चैनल 'न्यूज लाइन' गिरिडीह के एक उद्योगपति का है. उनकी झारखंड तथा दूसरे राज्यों में कई फैक्ट्रियां हैं. चैनल की एक बड़े नेता के साथ काफी नजदीकी भी बताई जा रही है. युवती कई सालों से चैनल में एंकर के तौर पर काम कर रही थी.
 
इस संबंध में जब भड़ास4मीडिया ने चैनल से जुड़े पुनुकांत से बात की तो उन्होंने कहा कि चैनल से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है और इस सम्बन्ध में चैनल के मालिक बाबूलाल से बात की जा सकती है. बाबूलाल से अभी तक कोई सम्पर्क नहीं हो पाया है.
 
इस सम्बन्ध में अगर आप के पास कोई जानकारी हो तो bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज कर भड़ास को सूचित कर सकते हैं.

कुमार विश्वास के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतरेंगे गिन्नीज ऋषि!

22 गिन्नीज वर्ल्ड रिकार्ड बनाकर गिन्नीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाने वाले निरंकारी कालोनी दिल्ली के निवासी 72 वर्षीय गिन्नीज ऋषि ने घोषणा की है कि 2014 में आने वाले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास के खिलाफ वो अपना नामांकन भरेंगे।
 
गिन्नीज ऋषि का कहना है कि वो लोगों से अपील करेंगे कि जनता स्वयं उन्हें अपना वोट ना दे ताकि वो जीरो वोट का वर्ल्ड रिकार्ड बना सके बल्कि सभी लोग ज्यादा से ज्यादा नोटा बटन का इस्तेमाल करे। गिन्नीज ऋषि ने यह भी घोषणा की कि यदि आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास किसी तरह अपनी जमानत भी बचा पाये तो वो उन्हें रूपये 99,999=99 का ईनाम देंगे। 
 
अपनी तरह की पेशकश करने वाले गिन्नीज ऋषि इससे पहले भी जीरो वोट का वर्ल्ड रिकार्ड बनाने के लिए भारत के राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन कर चुके हैं और दिल्ली नगर निगम के लिए धीरपुर इलाके से निगम पार्षद का चुनाव भी लड़ चुके हैं।

ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों के नाम सार्वजनिक किए जाने की मांग

देहरादून : 'जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड' ने पुलिस महानिदेशक को राजधानी क्षेत्र में कथित रूप से कार्यरत कई कथित पत्रकारों द्वारा ब्लैकमेलिंग के मामले में ज्ञापन दिया. जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड के प्रदेश अध्यक्ष जय सिंह रावत ने कहा कि इस तरह की चर्चाएं न केवल पत्रकारिता के पेशे के लिये बल्कि पूरे समाज और देश के लिये घातक हैं. अगर समाज के पथ प्रदर्शक ही पथभ्रष्ट हो जांय तो समाज कहां जायेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है.
 
उन्होंने कहा कि ताजा सेक्स स्कैंडल में पुलिस द्वारा बार-बार मीडिया के कुछ लोगों के ब्लैकमेलिंग में शामिल होने के संकेत दिये जा रहे हैं मगर ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है. अगर यह सच है तो यह मामला बहुत ही गम्भीर है. उन्होंने पुलिस महानिदेशक से अनुरोध किया है कि अगर सचमुच मीडिया के कुछ लोग ब्लैकमेलिंग और सेक्स स्कैंडल में शामिल हैं तो उनके नामों को सार्वजनिक किया जाय और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाय. उन्होंने कहा कि जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड पुलिस या किसी के भी द्वारा पत्रकारों के उत्पीड़न और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के खिलाफ अवश्य है मगर अपराधियों और ब्लैकमेलरों के साथ कतई नहीं है. 
 
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के महान पेशे का सम्मान अवश्य होना चाहिये मगर ब्लैक मेलिंग का नहीं. वैसे भी कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता. पुलिस भी कानून से ऊपर नहीं होती. उन्होंने पुलिस महानिदेशक से मांग की कि अगर इस कांड में या ब्लैक मेलिंग में किसी पत्रकार का हाथ नहीं है तो वह भी स्थिति स्पष्ट की जाय. इस सैक्स स्कैंडल और ब्लैकमेलिंग कांड के बाद चली चर्चाओं से पत्रकारिता के पावन पेशे की गरिमा को भारी ठेस पहुंच रही है, जो कि समाज के हित में भी नहीं है.
 
उन्होंने पुलिस महानिदेशक से अनुरोध किया है कि बिना समय गंवाये इस मामले में स्थिति स्पष्ट की जाय. अगर कोई दोषी है तो उसे तत्काल कानून के हवाले किया जाय और अगर इसमें मीडिया से जुडे लोगों की कोई भूमिका नहीं है तो उसे भी सार्वजनिक किया जाय. लेकिन पत्रकारों के बारे में पुलिस विभाग में किसी भी तरह की कानाफूसी बन्द की जाय.

झारखंड में पत्रकारों पर पुलिस ने भांजी लाठियां

गढ़वा : थाना परिसर में घटना को कवर करने गये मीडिया कर्मियों की पुलिस ने जमकर पिटाई कर दी. पुलिस की इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई में पत्रकार चंदन कुमार, धर्मेन्द्र कुमार, लव कुमार, अभिमन्यु, प्रताप आदि को गंभीर चोटें आईं. घटना से गुस्साए पत्रकार पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़ गए. एसडीपीओ हीरालाल रवि ने पत्रकारों के साथ वार्ता कर मामला सुलझाने की कोशिश की लेकिन बात बनी नहीं.
 
बुधवार दोपहर को सदर थाना में वनांचल डेंटल कॉलेज के 35-40 छात्र कॉलेज प्रबंधन के विरुद्ध छात्रों को मिलने वाली राशि के गबन के मामले की शिकायत लेकर पहुंचे थे. इस पर वहां मौजूद कुछ पत्रकारों ने इन छात्रों की जब तस्वीर लेनी चाही तो छात्र पत्रकारों पर भड़क उठे और पत्रकारों को धमकाने लगे. इसी बीच कुछ छात्रों ने पत्रकार लव कुमार का कैमरा छानकर मेमोरी कार्ड निकाल लिया और उनका नोट पैड भी फाड़ डाला. 
 
छात्रों के द्वारा किए गए इस अभद्र व्यवहार की सूचना दूसरे पत्रकारों को मिलते ही जिला मुख्यालय के और भी पत्रकार थाना परिसर पहुंच गए. पत्रकारों ने इसकी शिकायत थानाध्यक्ष से की तथा उनसे मामले में कार्रवाई करने को कहा. इसी बीच थानाध्यक्ष और पत्रकारों में नोकझोंक शुरू हो गई. बस इतने में थानाध्यक्ष ने पत्रकारों को पीटने का आदेश दे दिया और थाना परिसर में मौजूद पुलिस कर्मियों ने पत्रकारों को दौड़ा-2 कर पीटना शुरू कर दिया.
 
पुलिस द्वारा पत्रकारों की पिटाई की विभिन्न पार्टियों और संगठनों ने भर्त्सना की है. निंदा करने वालों में भाजपा नेता अलख नाथ पांडेय, कांग्रेस के अलख निरंजन चौबे, पूर्व जिप अध्यक्ष सह माले नेत्री सुषमा मेहता, अभाविप के मुन्ना कुमार, रितेश चौबे, झाविमो के रिंकू तिवारी, झामुमो नेता मिथलेश कुमार ठाकुर, परेश तिवारी आदि शामिल हैं.

अमर उजाला, दैनिक जागरण से दो-दो विकेट गिरे, सभी पहुंचे न्यायसेतु

अमर उजाला हिमांचल को बड़ा झटका लगा है. खबर है कि हिमांचल के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के प्रभारी शशि भूषण पुरोहित ने अमर उजाला का साथ छोड़ दिया है वहीं अमर उजाला चंडीगढ़ से पंजाब डेस्क इंचार्ज देवेन्द्र गुलारिया ने भी संस्थान को अलविदा कह दिया है.
 
वहीं पत्रकारों के संकट से जूझ रहे जागरण में कार्यरत लुधियाना जागरण की जिम्मेवारी संभाल रहे नितिन उपमन्यु और पटियाला जागरण का कार्यभार देखने वाले दिनेश शर्मा ने संस्थान को अलविदा कह दिया है.
 
खबर है कि ये सभी लोग हिमांचल प्रदेश के हमीरपुर जिले से शुरू होने जा रहे नए हिन्दी दैनिक न्यायसेतु की टीम का हिस्सा बन गए हैं. देवेन्द्र गुलारिया को समाचार संपादक का जिम्मा सौंपा गया है, जबकि शशि भूषण पुरोहित को मंडी संसदीय क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है. नितिन उपमन्यु को उप समाचार संपादक बनाया गया है, जबकि दिनेश शर्मा को चीफ सब एडिटर की जिम्मेवारी दी गई है.
 
भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल के जरिए भेज सकते हैं.

सेबी को सरकारी गुंडा कहने पर सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को लताड़ा

बाजार नियामक सेबी को 'सरकारी गुंडा' बताने वाले सहारा के विज्ञापन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए सहारा को चेतावनी दी है. कोर्ट ने बुधवार को कहा कि बाजार नियामक सेबी एक सरकारी निकाय है और केवल अपना काम कर रहा है. अदालत ने सहारा समूह से उन समाचार पत्रों में माफीनामा छापने को कहा है जिनमें ये विज्ञापन छापे गए थे.
गौरतलब है कि निवेशकों के 20000 करोड़ रूपये वापस करने के मामले में बाजार नियामक सेबी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार सहारा की सम्पत्तियों की जांच कर रहा है. जिस पर सहारा समूह ने सेबी के खिलाफ विज्ञापन छापकर कहा था कि सेबी सरकारी गुंडा है और उसे परेशान कर रहा है. इससे पहले सहारा प्रमुख सुब्रत राय ने इस मामले को राजनीति से प्रेरित बताया था.
 
जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जेएस खेहर की खंडपीठ ने सहारा के इस विज्ञापन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि आप इस मामले को हल्के में ले रहे हैं. समूह अदालत को धैर्य खोने पर मजबूर ना करे. इससे आपको कुछ हासिल नहीं होगा. आप के खिलाफ पहले ही अवमानना का मामला चल रहा है और ऐसा करके आप अपनी मुश्किलें और बढ़ा रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि सेबी हमारे आदेशों का पालन कर रहा है और आप उसके बारे में जो कह रहे हैं वो अप्रत्यक्ष रूप से हमारे बारे में कह रहे हैं.
 
सहारा समूह के वकील ने कोर्ट की इस टिप्पणी पर कोर्ट से माफी मांग ली. समूह ने अपनी 20000 करोड़ रूपये की 71 सम्पत्तियों के दस्तावेज सेबी को सौंपने पर सहमति जताई. 
 
वहीं कोर्ट ने सहारा के वकील की अर्जी खारिज कर दी जिसमें कहा गया था कि सहारा को विदेश यात्रा की अनुमति दी जाए. कोर्ट ने कहा कि ये हालत आपकी ही बनाई हुई है. अगर आपने तय समय पर सेबी को दस्तावेज सौंप दिए होते तो ये नौबत ही नहीं आती. न्यायालय ने समूह के बैंक खातों पर लगी रोक हटाने की अर्जी भी खारिज कर दी. इस मामले की अगली सुनवाई 9 जनवरी को की जाएगी.

धारा 377 आईपीसी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर विचार

Amitabh Thakur : आज अप्राकृतिक सेक्स से सम्बंधित धारा 377 आईपीसी के विषय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय पर दिन भर काफी शोर-शराबा होता रहा. कई लोग जिनकी व्यक्तिगत अलग प्रकार की व्यक्तिगत पसंद है द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की काफी खुली निंदा की गयी है. 
 
लेकिन यह उचित होता कि इस आदेश की आलोचना करने के पूर्व इसे पढ़ा गया होता और इसे इसकी सम्पूर्णता में देखा गया होता. 
 
इस आदेश को पढने के बाद मैं धारा 377 आईपीसी के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करता हूँ क्योंकि निर्णय में साफ़ कहा गया है कि पुलिस और कोर्ट के सामने मामले तभी आते हैं जब बिना मर्जी के बलपूर्वक अप्राकृतिक कृत्य किया जाता है जिन मामलों में कोर्ट स्वाभाविक तौर पर पीड़ित, चाहे वे बच्चे हों या महिलायें, को न्याय दिलाने को कृत-संकल्प होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे नहीं समझते कि कोर्ट सहमति से किये अप्राकृतिक कृत्य के मामलों में भी ऐसा ही कठोर रुख अख्तियार करेंगी. 
 
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि धारा 377 आईपीसी किसी समूह को आपराधिक नहीं घोषित करता है बल्कि यह मात्र कुछ कार्यों को अपराध बताता है. 
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मात्र उसके द्वारा जोर-जबरदस्ती से बिना मर्जी किये गए अप्राकृतिक कृत्य पर कड़ी कार्यवाही कराये जाने का प्रयास है और यह स्वागत योग्य है. 
 
अतः यह शायद उचित होता कि वे सारे लोग जो विधिक रूप से “अप्राकृतिक कृत्य” कहलाने वाले कार्य सहमति से कर रहे हैं इस आदेश को मानवाधिकार हनन का मामला बताते हुए इसकी निंदा करने की जगह इसे तमाम अन्य लोगों के मानवाधिकार रक्षा का निर्णय बताते क्योंकि ऐसे कानून के अभाव में तमाम लोगों पर यौन अपराध की संभावना बढ़ेगी ही. 
 
इस निर्णय को इसकी पूर्णता में देखने पर यह ज्ञात होगा कि यह आदेश तमाम पुरुषों, बच्चों और महिलाओं को अवांछनीय तथा अनुचित अप्राकृतिक यौन आक्रमण से बचाने का कार्य करेगा, अतः इस तरह के कार्यों से जुड़े लोगों को आत्मकेंद्रित होने के स्थान पर वृहत्तर सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की भी जरूरत है.
 
पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वाल से

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष कोछड़ का निधन

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष कोछड़ का आज सुबह देहान्त हो गया. वे 70 वर्ष के थे. श्री कोछड़ पिछले काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और उनका अमृतसर के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था. सुभाष कोछड़ सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हुए थे. वे सामाजिक संस्था सती लक्ष्मी देवी समिति से पिछले बीस वर्षों से जुड़े हुए थे.
 
बटाला श्रमजीवी पत्रकार संघ ने सुभाष कोछड़ के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए शोकसभा की. इस शोकसभा में संगठन के अध्यक्ष प्रदीप लूथरा, अवनीत तेजा राकेश रेखी महासचिव राजिंदर दर्दी व अन्य ने श्रो कोछड़ को श्रद्धांजलि दी.
 

हिन्दुस्तान, कानपुर प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई का नोटिस

हिन्दुस्तान प्रबंधन कानपुर द्वारा निकाले गए चारों पीड़ित कर्मियों संजय दूबे, पारस नाथ शाह, नवान कुमार एवं अंजनी प्रसाद  के मामले की सुनवाई में लेबर कमिश्नर द्वारा बार-बार बुलाये जाने के बावजूद प्रबंधन की तरफ से किसी के ना आने से लेबर कमिश्नर ने सख्त नाराजगी जताई है. लेबर कमिश्नर ने कर्मचारियों की अपील पर हिन्दुस्तान प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए 6 दिसम्बर उपस्थित रहने को कहा था. लेबर कमिश्नर के द्वारा नोटिस भेजने के बाद भी प्रबंधन की तरफ से कोई नहीं आया.
 
लेबर कमिश्नर ने एचटीमीडिया कानपुर प्रबंधन को पत्र लिखकर इस तरह से कर्मचारियों को परेशान करने और श्रम आयुक्त द्वारा बार-बार बुलाये जाने के बावजूद प्रबंधन की तरफ से किसी के उपस्थित ना होने पर सख्त ऐतराज जताया है. श्रम आयुक्त ने पत्र में पूछा है कि बार-बार आदेशों का उल्लंघन करने के लिए क्यूं ना आपके खिलाफ दण्डात्मक कार्रवाई की जाय.
 
लेबर कमिश्नर द्वारा भेजे नोटिस को हिन्दुस्तान प्रबंधन ने लेने से ही इंकार कर दिया था जिसके बाद नोटिस को स्पीड पोस्ट से भेजा गया. उसके बावजूद भी मैनेजमेंट की तरफ से कोई भी अधिकारी श्रम आयुक्त के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ था. प्रबंधन द्वारा बार-बार श्रम विभाग के आदेशों की अवहेलना करने के कारण श्रम आयुक्त ने जल्द ही मामले को लेबर कोर्ट में प्रस्तुत करने को कहा है.
 
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मोती बी.ए. न्यू मीडिया सम्मान से सम्मानित होंगे डॉ. सौरभ मालवीय

आगामी 21 दिसंबर 2013 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन नया मीडिया मंच द्वारा किया जा रहा है. उक्त कार्यक्रम में नया मीडिया के विस्तार एवं ग्रामीण अंचलों में इसकी जरुरत पर तमाम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों का वक्तव्य होना है. 
 
उक्त आयोजन में दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्वं संपादक श्री शंभूनाथ शुक्ल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ स्तंभकार एवं टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी सहित संपादक श्री पंकज झा, श्री यशवंत सिंह, श्रीमती अलका सिंह (रेडियो पत्रकार), श्री संजीव सिन्हा आदि वक्ता उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी देवरिया एवं आईपीएस श्री अमिताभ ठाकुर उपस्थित होंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल करेंगे. 
 
उक्त कार्यक्रम के माध्यम से नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता की तमाम संभावनाओं को टटोलने का प्रयास किया जाएगा. कार्यक्रम के दौरान ही पत्रकारिता एवं अध्यापन के क्षेत्र में नया मीडिया पर अपने उल्लेखनीय उपस्थिति के लिए देवरिया की माटी से आने वाले पांच गणमान्यों को 'मोती बी.ए. नया मीडिया सम्मान' से सम्मानित किया जाएगा. इसी क्रम में देवरिया के डॉ सौरभ मालवीय की नया मीडिया पर सशक्त उपस्थिति को देखते हुए उन्हें सम्मानित किए जाने की सूचना कार्यक्रम के सह-संयोजक शिवानन्द द्विवेदी सहर ने दी.

दसवीं ‘विकास संवाद मीडिया लेखन फैलोशिप’ के लिए आवेदन आमंत्रित

भोपाल। वर्ष 2014 के लिए दसवीं विकास संवाद मीडिया लेखन फैलोशिप की घोषणा कर दी गई है। इस साल प्रदेश के चार पत्रकारों को सामाजिक मुद्दों पर लेखन के लिए फैलोशिप दी जाएगी। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 10 जनवरी, 2014 है।
 
इस वर्ष की फैलोशिप ‘पोषण की सुरक्षा और कुपोषण’ विषय पर दी जाएगी। आवेदक को अपना प्रस्ताव और कार्य योजना को मध्यप्रदेश के किसी एक अंचल (मालवा, महाकोशल, चम्बल, मध्य क्षेत्र, बघेलखंड, बुंदेलखंड) में रहने वाले 'किसी एक' आदिवासी/दलित या अन्य वंचित तबकों में (पिछली फेलोशिप अध्ययन में शामिल हो चुके भील, कोरकू, बैगा और गोंड समुदाय को छोड़कर) पोषण और खाद्य सुरक्षा (बच्चों के सन्दर्भ में) की स्थिति पर केंद्रित रखना होगा। यह फैलोशिप छह माह के लिए होगी। यह चारों फैलोशिप हिन्दी व अंग्रेजी के प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के लिए है।  
 
आवेदन करते समय पत्रकार को अपना बायोडाटा, अपनी पांच ताजा प्रकाशित खबरें और चुने गए विषय पर लगभग 1000 शब्दों में प्रस्‍ताव देना होगा। पत्रकारों का चयन वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक चयन समिति करेगी।
 
इस चयन समिति में वरिष्ठ पत्रकार श्री नीलाभ मिश्र, श्री गिरीश उपाध्याय, सुश्री अन्नू आनंद, सुश्री श्रावणी सरकार, श्री जयराम शुक्ला, श्री अरुण त्रिपाठी तथा ज्यूरी सदस्य सचिव की भूमिका में वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान शामिल होंगे। फैलोशिप के दौरान पत्रकार को सम्बंधित विषय पर 15 खबरें और 5 आलेख लिखने होंगे। विषय से संबंधित एक विस्तृत रिपोर्ट भी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। इसके साथ ही माह में कम से चार दिन के क्षेत्रभ्रमण की भी बाध्यता होगी।
 
फैलोशिप से संबंधित विस्तृत जानकारी और आवेदन पत्र ई-7/226, अरेरा कालोनी स्थित विकास संवाद कार्यालय से भी लिए जा सकते हैं। आवेदन फार्म और प्रपत्र विकास संवाद की वेबसाइट www.mediaforrights.org से भी डाउनलोड किये जा सकते हैं।
 
राकेश दीवान/ प्रशांत दुबे
 
संपर्क– 09424467604, 09826066153, 09425026331
 
प्रेस विज्ञप्ति

जनसंदेश टाइम्स से हरेप्रकाश उपाध्याय ने दिया इस्तीफा

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ से खबर है कि प्रधान संपादक के करीबी और जनसंदेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हरेप्रकाश उपाध्याय संस्थान से अलग हो गये हैं. खबर आ रही है कि हरे प्रकाश ने सुभाष राय से मतभेद के चलते संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. कुछ ऐसी भी सूचना आ रही है कि प्रबंधन ने उन्हें हटाया है. सुभाष राय ने जनसंदेश से जुड़े सभी कर्मचारियों को संदेश भेज कर सूचित किया है कि अब सभी लेख और सूचनाएं हरेप्रकाश के बजाय सीधे उनके मेल पर भेजी जाय.
 
हरे प्रकाश जनसंदेश के प्रधान संपादक सुभाष राय के काफी करीबी माने जाते रहे हैं. जब सुभाष राय ने जनसंदेश छोड़ा था तो हरे प्रकाश ने उनके साथ संस्थान से अलग हो गये थे फिर वे सुभाष राय के साथ ही संस्थान में वापस आये थे. जनसंदेश से अलग होने के बाद उन्होंने सुभाष राय के साथ मिलकर समकालीन सरोकार नामक पत्रिका निकाली थी जो अभी भी निकल रही है.
 
इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने हरे प्रकाश ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि संस्थान से इस्तीफा देने की खबर गलत है और वे अभी संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं.

तरुण तेजपाल 12 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजे गए

पणजी : तहलका के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को गोवा जिला न्यायालय ने आज 12 दिेनों के लिए न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है. तेजपाल की चार दिनों की पुलिस रिमांड की अवधि आज समाप्त हो रही थी. तेजपाल पर उनकी महिला सहकर्मी ने यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसके बाद उन्हें 30 नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था जिसके बाद से तेजपाल को पुलिस रिमांड में भेज दिया गया था.
 
आज तेजपाल को दस दिन की पुलिस रिमांड अवधि खत्म होने पर गोवा पुलिस ने ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट क्षमा जोशी के समक्ष प्रस्तुत किया. पुलिस ने तेजपाल की जमानत का विरोध करते हुए कहा कि तेजपाल बाहर रहने पर पीड़िता और गवाहों पर दबाव बना सकते हैं. वे ऐसा पहले भी कर चुके हैं. पुलिस की दलीलें सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने तेजपाल को 12 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने का आदेश दे दिया. तेजपाल को वास्को की सदा सब जेल में रखा जाएगा.
 
तेजपाल पर अपनी महिला सहकर्मी के साथ यौन शोषण के मामले में आईपीसी की धारा 354-ए, 376 और 376 (2) के तहत मामला दर्ज किया गया है. तेजपाल पर 341 (अनुचित अवरोध) और 342 (अनुचित रोक) के तहत भी मामला दर्ज किया गया है. पुलिस इससे पहले पीड़िता, तहलका की मैनेजिंग डायरेक्टर शोमा चौधरी और तीनों गवाहों के बयान दर्ज कर चुकी है.

बुंदेली भाषा को हिंदी साहित्य में उचित स्थान दिलाने की कोशिशें तेज

बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह मुकाम नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। अब उसे वाजिब स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। हिंदी के चिंतकों न बुंदेली की गहरी जड़ें खोजने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी माह तीन और चार दिसंबर को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में देश के हिंदीचिंतकों और दिशा निर्धारकों का संगम हुआ। 
 
तारीख के लिहाज से यह अद्वितीय मौका था। पहली बार देश के विचारकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति के रचनासेवियों और उनके बहुमूल्य कार्यों को हिंदी साहित्य के इतिहास में उचित स्थान दिलाने की कोशिश समग्रता से की है। यह सब संभव हो पाया है विज्ञान के उच्चकोटि के विद्वान और हाइटेक अध्येता तथा हिंदी के हितचिंतक बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय के भागीरथ प्रयासों के चलते। इसकी अनुगूंज भारतीय हिंदी परिषद के इकतालीसवें अधिवेशन में पास एक विशेष प्रस्ताव में भी सुनाई पड़ी। इस प्रस्ताव में हिंदी परिषद के कर्ताधर्ताओं न खुले मन से यह बात स्वीकार की कि हालांकि प्रो. पाण्डेय विज्ञान के विशेषज्ञ हैं लेकिन भारतीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है। उनके विशेष प्रयासों और आग्रह के कारण ही भारतीय हिंदी परिषद का 41वां अधिवेशन बुंदेलखंड की हृदयस्थली झांसी में आयोजित किया गया। 
 
काबिलेगौर बात यह है कि भारतीय हिंदी परिषद की स्थापना सन 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डा. धीरेंद्र वर्मा और तत्कालीन कुलपति सर अमरनाथ झा के प्रयासों से हुई। सन 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापकता, विस्तार तथा गहनता इन तीनों तथ्यों से यह तय हो चुका था कि देश निश्चित रूप से शीघ्र ही स्वतंत्र होगा। इस अवधारणा को केंद्र में रखते हुए भारतीय मनीषियों ने स्वतंत्र देश के विविध सामाजिक संदर्भों से जुड़े भावी भारत के विकास के लिए योजनाएं निर्मित करने का संकल्प शुरू कर दिया था। यह संदर्भ राष्ट्रभाषा हिंदी के उन्नयन तथा उच्च शिक्षा के संकल्पों से भी जुड़ा। इस संस्था का संबंध उच्च शिक्षा संबंधी हिंदी की समस्याओं से रहा है। यह बराबर इसके लिए संघर्ष करती रही है। यह संस्था देश के सभी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापकों से जुड़ी हुई है। इसमें सामयिक और स्थायी लगभग दो हजार विद्वान सदस्य हैं। यह परिषद उच्चस्तरीय अध्यापन की समतुल्यता. स्तरीयता तथा राष्ट्रीय हितबद्धता को ध्यान में रखकर काम करती है। इसका दूसरा स्तरीय दायित्व हिंदी शोध कार्य को व्यवस्थित करके उसे उत्कृष्टता प्रदान करना है ताकि हिंदी शोध की दिशा स्खलित न होने पाए। हिंदी परिषद का संकल्प पूरी तरह से इस संदर्भ से जुड़ा है कि भारतीय समाज रचना की व्यवस्था कैसे संतुलित हो जिससे शैक्षिक प्रशासनिक एवं लोक व्यवस्था के स्तर पर हिंदी को अपेक्षित गौरव प्राप्त होता रहे।
 
भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन का मूल संदर्भ इस बार बुंदेलखंडी भाषा तथा साहित्य के सर्वांग मूल्यांकन का रहा। इसे तय करवाने में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय की अहम भूमिका रही। इसकी तस्दीक अधिवेशन के दौरान परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों ने अपने संभाषण में की। 
 
यहां आए हिंदी के विद्वानों ने यह तथ्य स्वीकार किया कि भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में उन्होंने बुंदेली भाषा के साहित्यिक विश्लेषण के साथ साथ ऐतिहासिक एवं सामयिक मान्यताओं से जुड़े तथ्यों का एकत्रीकरण और उस पर मंथन इसलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि का सही आकलन हो सके। उन्होंने बताया कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के आदिकाल से लेकर आज तक लगभग एक हजार से अधिक बुंदेलखंडी कवि हैं जिनसे जुड़ा इतिहास केवल विवरणात्मक है। जहां तक बात रही बुंदेलखंडी शब्द की तो यह चौदहवीं सदी का है। यहां अधिवेशन में आए चिंतकों के मन को यही सवाल मथता रहा कि ईसा की चौदहवीं शती से स्थापित इस ऋषिभूमि यानी बुंदेलखंड की भाषा को क्या नई भाषा कह सकते हैं। कारण यह कि इस भाषा के प्रारंभ का कोई साक्ष्य नहीं जिसके आधार पर वे यह कह सकें कि यह प्राचीन भाषा है।
 
भारतीय हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह का मानना है कि यजुर्वेदकाल में बुंदेलखंड क्षेत्र का नाम यर्जुहोतो था। आगे चलकर इसका नाम युज्रहोता पड़ा। इसका कारण यह था कि यहां ऋषिगण निवास करते थे। वे निरंतर चिंतन साधना में लगे रहते थे। आगे के कालखंड में यह क्षेत्र जुझौती कहलाया। इसका विवरण सातवीं सदी के चीनी यात्री युवान चांग ने दियी है। बाद में इसे जुझारखंड तथा और बाद में इस नगरी को विंध्यखंड कहा गया। कालांतर में यही नाम बुंदेलखंड पड़ा। बुंदेलखंड नाम 14वीं सदी में महाराज हेमकरण बुंदेला ने दिया।     
 
हिंदी के विद्वानों का मानना है कि मध्यकालीन भाषा क्षेत्र में हिंदी के तीन रूप रहे। पहला ब्रजभाषा तथा हिंदी पश्चिम भारत दूसरा मध्यदेशीय अवधी तथा हिंदी मध्य का भारत तथा तीसरा भोजपुरी का बिहारी भाषा पूर्व का भारतीय क्षेत्र। ब्रजभाषा तथा बिहार क्षेत्रों की भाषा का सर्वेक्षण तथा सांस्कृतिक विकासक्रम का सर जार्ज ग्रियर्सन से लेकर सुनीति कुमार चटर्जी तक व्यापक रूप से मूल्यांकन हो चुका है। अवधी भाषा के विकास पर भी यह कार्य डा.बाबूराम सक्सेना कर चुके हैं। हम मध्यप्रदेश को बुंदेली. बघेली. छत्तीसगढ़ी भाषाओं में बांट रहे हैं किंतु इसकी भाषिक रूप.रचना एवं साहित्यिक संदर्भों का जब तक सही मूल्यांकन नहीं किया जाता तब तक भाषिक सर्वेक्षण तथा साहित्यिक विश्लेषण का पक्ष अधूरा रहेगा।
 
विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए यहां बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न सभामारों में दो दिनों तक चल गोष्ठियों में हिंदी हितचिंतकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति से जुड़े पक्षों पर विचार मंथन किया। विद्वानों ने शोधपत्र पेश किए। इन्हें अहम दस्तावेज के रूप में सहेजा जाएगा। विश्वविद्यालय ने शोधपत्रों को एक पत्रिका के रूप में सहेजने का निर्णय लिया है। बुविवि के कुलपति ने पत्रिका के प्रकाशन पर आने वाले संपूर्ण खर्च को वहन करने का निर्णय लिया है।   
 
अब हिंदी के विद्वानों में यह उम्मीद जगी है कि बुंदेलखंड के लोक साहित्य और संस्कृति को हिंदी साहित्य के इतिहास में वह वाजिब स्थान मिल सकेगा जिसकी वह हकदार है। उनका मानना है कि हाइटेक भगीरथ के प्रयास रंग लाएंगे।           
 
उमेश शुक्ल
 
प्रवक्ता-
जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय.झांसी.  
मोबाइल 9452959936
 

टीवी पत्रकार पर हमले के मामले में मानवाधिकार आयोग ने भेजा एसएसपी को नोटिस

लखनऊ स्थित टीवी पत्रकार मोहसिन हैदर के साथ लखनऊ पुलिस के कर्मचारियों द्वारा किये गए आपराधिक हमले की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा की गयी शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान ले लिया है.
 
सहायक निबंधक (विधि) ने इस शिकायत पर एसएसपी लखनऊ को नोटिस जारी करते हुए उनसे छः सप्ताह में मामले पर रिपोर्ट मांगी है. आयोग ने इस शिकायत की प्रति एडीजी, मानवाधिकार, युओई को प्रेषित करते हुए कहा है कि यदि छः सप्ताह में रिपोर्ट नहीं प्राप्त होती है तो आयोग इस सम्बन्ध में अपने स्तर से कार्यवाही करेगा.
 
डॉ ठाकुर ने चौक थाने के सब इन्स्पेक्टर रुमा यादव तथा आरक्षी सुनील यादव और सियाराम यादव द्वारा मोहसिन हैदर और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ किये गए अकारण गाली-गलौज और मारपीट को मानवाधिकार उत्पीडन की एक गंभीर घटना बताते हुए तत्काल कार्यवाही की मांग की थी.
 
आयोग के द्वारा पुलिस को भेजा गया पत्र-

सुधाकर शर्मा, प्रमोद मिश्रा, शोएब और केके सक्सेना के बारे में सूचनाएं

बदायूं से खबर है कि तहसील बिसौली में अमर उजाला से हटाए गए सुधाकर शर्मा को जागरण में प्रभारी बनाया गया है. वहीं बिसौली में ही जागरण देख रहे प्रमोद मिश्रा अमर उजाला पहुंच गए हैं.
 
उधर बरेली से खबर है कि तहसील बहेड़ी में शोएब को हिन्दुस्तान का प्रभारी बनाया गया है. वे हिमांशु पांडेय की जगह लेंगे. शोएब इसके पहले अमर उजाला में काम कर चुके हैं जहां उन्हें आरोपों के चलते अमर उजाला ने बाहर कर दिया था. 
 
बरेली में ही केके सक्सेना ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर कैनिवज टाइम्स ज्वाइन कर लिया है. केके लंबे समय से जागरण से जुड़े थे. वह बदायूं के जिला प्रभारी भी रह चुके हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

जितेन्द्र ज्योति ने हिन्दुस्तान छोड़ा, भास्कर से जुड़े

हिन्दुस्तान पटना से खबर है कि जितेन्द्र ज्योति ने हिन्दुस्तान का दामन छोड़कर दैनिक भास्कर के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्हें जल्दी ही हिन्दुस्तान नोएडा से हिन्दुस्तान पटना के भागलपुर ब्यूरो में भेजा गया था लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी. 
 
जितेन्द्र हिन्दुस्तान पटना के इकलौते वरिष्ठ संवाददाता थे. वे हिन्दुस्तान के नोएडा ब्यूरो के इंचार्ज रहे हैं. इसके पहले जितेन्द्र सहारा पटना में चीफ करेसपांडेंट और हिन्दुस्तान पटना में कार्यालय संवाददाता के तौर पर काम कर चुके हैं.
 
भड़ास तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को गैर कानूनी माना

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाइकोर्ट के उस फैसले को गैरकानूनी करार दिया है जिसमें समलैंगिकों के सहमति से बनाये गए यौन सम्बन्धों को सही माना गया था. जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस जेएस मुखोपाध्याय की पीठ ने हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ योगगुरू रामदेव, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य के द्वारा दायर याचिका पर ये फैसला दिया.
 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि हाईकोर्ट का फैसला कानूनी दृष्टि से गलत है. कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता एक अपराध है और संविधान में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि धारा 377 को रद्द किया जा सके. कोर्ट ने महाधिवक्ता से कहा कि अगर सरकार चाहे तो कानून में संशोधन करवा सकती है.
 
इससे पहले हाइकोर्ट ने 2009 में समलैंगिक सम्बन्धों पर अपने फैसले में कहा था कि धारा 377 के अंतर्गत समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध घोषित करना समलैंगिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है. इस फैसले का जहां एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था वहीं कई व्यक्तियों और सामाजिक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था.
 

पुतिन ने रूस की सरकारी समाचार एजेंसी बंद की

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने सरकारी न्यूज एजेंसी आरआईए नोवोस्ती को भंग कर दिया है. आरआईए रूस की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी थी और इसके जिम्मे रूस की सभी सरकारी नीतियों और जनजीवन की हलचलों को कवर करना तथा देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुधारने की जिम्मेदारी थी. पुतिन का ये कदम रूसी मीडिया पर उनके नियंत्रण बढ़ाने के तौर पर देखा जा रहा है.
 
रूस ने इसकी जगह अब एक नई एजेंसी के गठन का आदेश दे दिया है. क्रेमलिन की वेबसाइट पर दिये गए विवरण के अनुसार इसकी जगह रेसिया सेगोदनया (रसिया टुडे) नई न्यूज एजेंसी होगी जो रूस की सभी सरकारी नीतियों को कवर करेगी. पुतिन ने दिमित्री किसलयेव को रसिया टुडे का प्रमुख बनाया है. खास बात यह है दिमित्री की छवि रूस में समलैंगिकता के विरोधी के तौर पर है. 

सोनभद्र पुलिस द्वारा प्रताड़ित पत्रकार ने की मुख्यमंत्री से शिकायत

सोनभद्र से निकलने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र कूटचक्र के सम्पादक महेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से पत्र लिखकर अनपरा के थानाध्यक्ष द्वारा वहां के एक पत्रकार के साथ मिलकर उन्हें प्रताड़ित करने की शिकायत की है। महेन्द्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में लिखा है कि वे पिछले कई दिनों से सोनभद्र के एक पत्रकार सुल्तान शहरयार की कथित जालसाजियों के खिलाफ कूटचक्र में लिखते रहे हैं। जिसकी वजह से उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है।
 
अपने खिलाफ खबरे छपने से नाराज सुल्तान शहरयार खान ने अनपरा के थानाध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार यादव के साथ मिलकर उन्हें फर्जी मुकदमे में फंसा दिया और उनके खिलाफ गिरफ्तारी का दबाव बना रहे हैं। जिसकी वजह से वे दहशत में हैं और सोनभद्र से बाहर रह रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पुलिस की ज्यादतियों से संरक्षण देने की मांग की है.
 
महेन्द्र अग्रवाल के द्वारा मुख्यमंत्री को भेजा गया पत्र दिया जा रहा है-
 
माननीय मुख्य मंत्री
उ0प्र0 शासन, लखनऊ
विषय – अनपरा सोनभद्र पुलिस द्वारा माफिया पत्रकारों के साथ गठजोड़ कर फर्जी मुकदमा में फंसाने, माफिया, जालसाज कथित पत्रकार सुल्तान शहरयार खॉ के खिलाफ लम्बित अनेकों शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं करने, संरक्षण देने के सम्बन्ध में
 
सन्दर्भ – पूर्व शिकायत पत्र संख्या 2378 दिनांक 24-09-2013, पत्र संख्या 2250 दिनांक 22-04-2013, पत्र संख्या 2196 दिनांक 08-03-2013, पत्र संख्या 2124 दिनांक 19-12-2012
 
माननीय महोदय,
आपका ध्यान अपने पूर्व सन्दर्भित शिकायत पत्रों की ओर आकृष्ट कराते हुए अत्यधिक खेद के साथ अवगत कराना हैं कि ‘भय तथा माफिया मुक्त शासन’ देने की आपकी महत्वाकांक्षी घोषणाओं की आपकी ही पुलिस के कथित कर्मठ तथा कर्तव्यनिष्ठ अनपरा थानाध्यक्ष विरेन्द्र कुमार यादव धज्जियॉ उड़े रहे हैं। जालसाजी, ठगी करने वाले, टैक्स चोर सफेदपोश माफियाओं की पोल खोलने, करोड़ों रूपयों के टैक्स चोरी का पर्दाफाश कर सरकार को राजस्व का फायदा कराने वाले प्रार्थी (सम्पादक कूटचक्र साप्ताहिक समाचार) को आपके शासनकाल में अवैध धनउगाही कर निरकुंश हो चुके सफेदपोशों द्वारा लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा हैं। इसी क्रम में आपका ध्यान अनपरा सोनभद्र के कथित पत्रकार (बिना किसी अखबार से जुड़े, ठगी, जालसाजी कर धनउगाही के बूते देश-विदेश घुमने वाले सुरक्षा के लिए खतरा बने) सुल्तान शहरयार खॉ के काले कारनामों, जालसाजी, ठगी के साथ-साथ फोन से जान-माल की धमकी देने, झूठी शिकायत करने, जाली लेटरपैड पर फर्जी हस्ताक्षर बनाकर भ्रमित करने वाला पत्र भेजने आदि के सम्बन्ध में उपरोक्त सन्दर्भित पत्रों द्वारा अवगत कराने, श्रीमान पुलिस महानिदेशक, श्रीमान प्रमुख सचिव गृह, श्रीमान प्रमुख सचिव सूचना आदि को भी सन् 2010 से लगातार दर्जनों पत्र लिखने, आपके निर्देश के बावजूद भी अनपरा जिला सोनभद्र की पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नहीं करने, संरक्षण व शह देने के कारण मनबढ़ सुल्तान शहरयार खॉ की झूठी तहरीर पर थानाध्यक्ष अनपरा ने दिनांक 06-12-2013 को रपट संख्या 654/13 लिखकर मुझे फर्जी मुकदमें में न केवल फॅसा दिया है बल्कि जबरन गिरफ्तार करने के लिए ऐसा दहशत फैलाया कि मुझे अनपरा छोड़ कर भागना पड़ गया।
 
सुल्तान शहरयार खॉ द्वारा पहले तो माननीय अल्पसंख्यक आयोग में मेरे खिलाफ शिकायत पत