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रॉबर्ट बढेरा की संपत्ती पर अमेरिकी अखबार के खुलासे के निहितार्थ

पिछले कई दशकों में देखा गया है कि किस तरह दुनिया भर में अमेरिकी हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिकी सरकार, प्रेस और पूरा समाज एकजुट होता रहा है। लोकतंत्र का झंडाबरदार बना घूमने वाला अमेरिका शेष विश्व में कैसे अपनी कठपुतली सरकारें बनवाता है, यह देखा-सुना सच है। सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने में माहिर अमेरिकी समाज के दोहरे मानक हैं, अपने लिए कुछ और तथा दूसरों के लिए कुछ और। उनका अपना मतलब हल हो जाना चाहिए, बाकी दुनिया जाये भाड़ में। मानवता, नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत आदि सब का प्रयोग सिर्फ और सिर्फ वे अपने ही हित में किस तरह करते हैं, या फिर महज कागजी चीज के तौर पर इनकी अनदेखी-अनसुनी कर इन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है, इसका अनुभव पूरी दुनिया आये दिन करती रहती है।

 
विगत दस वर्षों में भारत में कांग्रेसनीत सरकार से यथासंभव लाभ कमाने के बाद अब नरेन्द्र मोदी के रूप में नये चेहरे को अपने देशवासी धन्नासेठों की तिजोरियां भरने को मुफीद मानने वाले अमेरिकी प्रेस ने इधर भारतीय लोकसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की ही बधिया उधेड़ डाली है। ताकि उसके इस नये प्रहार का लाभ मोदी और भाजपा को मिल सके।
 
ताजा
घटनाक्रम के अनुसार अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ द्वारा सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा की संपत्ति के बारे में किये गये सनसनीखेज प्रहार ने कांग्रेस के लिए असहज स्थित में पैदा कर दी है। फलस्वरूप कांग्रेस को फजीहत से बचने और भाजपा को घेरने की नीयत से गुजरात में उद्योगपति अडाणी को नरेंद्र मोदी की ओर से कौड़ियों के भाव कथित तौर पर जमीन देने के मामले को अपनी ढाल बनाना पड़ा है।

हालांकि बढेरा की संपत्ति की बहुत ही कम समय में हुई बेतहाशा वृद्धि को लेकर भारत में बहुत पहले ही काफी हो-हल्ला मच चुका है, फिर भी इस अमेरिकी अखबार ने ठीक लोकसभा चुनावों के दौरान एक बार फिर से लोगों की याद ताजा करने के इरादे से लिखा है कि सोनिया गाँधी के दामाद ने पिछले एक दशक में रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया है, जबकि उनके पास इसका कोई अनुभव भी नहीं था। वॉल स्ट्रीट जर्नल की बढेरा को लेकर चर्चित खबर में कहा गया है कि पिछले दस सालों के दौरान कांग्रेस की सरकार केंद्र में रही, इस दौरान बढेरा ने व्यापक पैमाने पर जमीन खरीदी। अखबार का कहना है कि उनके पास हाइस्कूल तक की योग्यता भी नहीं थी और न ही प्रॉपर्टी कारोबार का कोई अनुभव।

खबर विदेशी अखबार में होने की वजह से मीडिया में छाई रही। कांग्रेस हाइकमान के निकट सम्बंधी का मसला होने के कारण पार्टी के लिए इसका जवाब देना भी आसान नहीं रहा। इसलिए पार्टी की तरफ से मैदान में उतरे कानून मंत्री तथा वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने रॉबर्ट बढेरा कुछ ही समय में करोड़ों-अरबों में कैसे खेलने लगे इसके तथ्यों पर स्पष्टीकरण देने के बजाय सिर्फ इतना भर कहा कि कानून अपना काम करेगा और यदि किसी के पास कोई सबूत है तो वह सामने लाये। इसके साथ ही उन्होंने आक्रमण को बचाव का बेहतर विकल्प मानने की नीति पर चलते हुए यह भी कहा कि गुजरात में उद्योगपति अडाणी को मोदी ने कौड़ियों के दाम जो जमीन दी है, उसके सारे सबूत हमारे पास हैं।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि गुजरात में जमीन और शराब का अवैध कारोबार वैसे हो रहा है, जैसे कर्नाटक में खदान का काला धंधा हो रहा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में कुल हानि 30 हजार करोड़ की है जिसमें अवैध शराब के कारण तीन हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान भी शामिल है। उन्होंने मोदी से पूछा कि क्या अवैध शराब मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी। अखबार के खुलासे पर ज्यादा बोलने से परहेज करते हुए कांग्रेस ने मोदी और अडाणी के व्यापारिक रिश्तों को ज्यादा उछालकर अपना बचाव करने की कोशिश भर की है। पार्टी के डेमेज कन्ट्रोल मैनेजरों का कहना है कि भाजपा अगर इस मामले को आगे भी तूल देना जारी रखती है तो इसके बाद ही पार्टी के दिग्गज मैदान में उतरेंगे। फिलहाल उसकी तरफ से बढेरा पर ज्यादा नहीं बोलने की रणनीति बनी है।

सिर्फ दसवीं पास रॉबर्ट बढेरा कैसे खेलने लगे करोड़ों-अरबों में, 42 मिलियन डॉलर की है कुल संपत्ति; राजस्थान के कोलायत में 2,000 एकड़ जमीन 7 करोड़ में खरीदी, कैसे रचा गया गोरखधंधा

‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट बढेरा के बारे में एक सनसनीखेज खबर राजस्थान के कोलायत इलाके से प्रकाशित करते हुए खुलासा किया है कि कैसे दसवीं पास बढेरा ने सत्ता में संपर्क का फायदा उठाकर अरबों रुपये का रियल एस्टेट का साम्राज्य खड़ा कर लिया, जबकि उन्हें इस काम का कोई तजुर्बा तक नहीं था। अखबार के अनुसार, वर्ष 2004 से 2007 तक बढेरा का व्यवसाय बेहद मामूली था और वह सस्ती ज्वैलरी का निर्यात करते थे। इसके बाद 2007 में उन्होंने 2,000 डॉलर (लगभग एक लाख रुपये) के बहुत मामूली निवेश से स्काइलाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई। केवल एक वर्ष बाद ही 2008 में कंपनी ने गुड़गाँव में 3.5 एकड़ कृषि भूमि 1.3 मिलियन डॉलर में खरीदी (!) हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन 18 दिन के अंदर ही इसको कृषि से व्यावसायिक भूमि उपयोग की अनुमति दे दी, फलस्वरूप जमीन बेशकीमती हो गई। अगले चार साल में रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ. ने बढेरा को खासी रकम दी और कंपनी की बैलेंस शीट में इसे एडवांस बताया।

अखबार लिखता है कि पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के कोलायत इलाके के ग्रामीणों को साल 2009 अब भी याद है, जब काले रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी में सवार दरमियाने कद का एक शख्स वहाँ पहुँच कर ग्रामीणों से जमीन का मोलभाव करता है। यह शख्स बिना किसी हीला-हवाली के गाँववालों को उनकी जमीन के मुँहमाँगे दाम का हाथोंहाथ नगद भुगतान कर देता है। भू-राजस्व के रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों एकड़ जमीन की खरीदारी करने वाला यह शख्स कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट बढेरा हैं। जमीन की खरीदारी के दौरान ही केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन दिया जायेगा। जबकि 2011 में राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस की राज्य सरकार ने भी ऐसा ही ऐलान कर दिया।

भू-राजस्व के दस्तावेज बताते हैं कि तीन साल के अल्पकाल में ही इस जमीन की कीमत में छह गुना की अप्रत्याशित वृद्धि हो गई। बढेरा ने तब 2,000 एकड़ जमीन लगभग सात करोड़ रुपये में खरीदी थी। अखबार ने अपनी जाँच में पाया कि 44 वर्षीय बढेरा को रियल एस्टेट का पहले कोई अनुभव नहीं था। वर्ष 2012 में उन्होंने 12 मिलियन डॉलर की रियल एस्टेट संपत्ति बेची। अब भी उनके पास 42 मिलियन डॉलर की संपत्ति है। इस पर मचे बवाल पर सावधानी बरतते हुए राज्य सरकार के अधिकारी बस इतना ही कहते हैं कि वे जाँच कर रहे हैं कि कहीं जमीन खरीद में कोई गड़बड़झाला तो नहीं है।

मामले पर बढेरा के प्रवक्ता का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह की हायतौबा मचती ही है, जमीन की खरीदारी में कोई गड़बड़ नहीं है लेकिन चुनाव में यह मुद्दा जरूर है। हालांकि बढेरा अभी तक किसी सरकारी जाँच में दोषी नहीं पाये गये हैं। हरियाणा सरकार ने एक भूमि सौदे की जाँच के बाद उन्हें क्लीन चिट भी दे दी है लेकिन इंडिया अगेंस्ट करप्शन की राय है कि मामले की जाँच फिर से होनी चाहिए। हालांकि मुद्दा जरूर महत्वपूर्ण है परन्तु यह भी विचारणीय है कि अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इसे ठीक चुनावों के समय ही क्यों उजागर किया। पिछले दो-तीन सालों से वह चुप्पी साधे रहा और जैसे ही भारत में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ न केवल तीव्र हुईं बल्कि दो चरण का मतदान हो भी चुका तब अखबार को सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट बढेरा के जमीन से जुड़े प्रकरण की यक-ब-यक याद आ गई। अखबार ने ‘स्टोरी’ के लिए जो समय चुना उससे उसकी मंशा साफ झलकती है।

 

श्याम सिंह रावत। संपर्कः ssrawat.nt@gmail.com
 

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