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ये चुनावी इंकलाब सिवाय ज़़ुबानी जमा-खर्च और कुछ नहीं

वाराणसी। न शहादत दिवस है और न ही जन्म दिवस फिर भी अपने शहर बनारस की सरज़मीन पर इंकलाब-जिदांबाद के नारे को सुन रहा हूं तो भगत सिंह की बातें इंकलाब का मतलब अन्याय पर टिकी व्यवस्था का खात्मा है, जेहन में गूंज रहा है। चुनावी मौसम में इस नारे के औचित्य को समझना चाहता हूं पर समझ छोटी पड़ रही हैं। नारे लगाने वाले राजनीतिक दल कौन सा इंकलाब लाना चाहते हैं। इनका इंकलाब कब आयेगा, ये तो नहीं पता पर अफसोस काश भोली-भाली आवाम इन्हें समझ सकती? जान पाती इनके मंसूबों को? इनके चेहरों को पहचान पाती? वैसे ये शहर एक लम्बे समय से किसी इंकलाब की बाट जोह रहा है, जो यहां के हालात में आमूल-चूल परिवर्तन ला दे।

इनके भीतरखाने में झांक कर देखिए चुनाव जीतने के लिए जात-धर्म, अगड़ी-पिछड़े के सभी समीकरण को आजमाने में इन्हें कोई गुरेज नहीं है। इन्हें किसी तरह सत्ता पाना है। जन सुविधाओं की कीमत पर उसे पचाकर सुख भोगना है। चुनाव से पहले ही खुद को इस मुल्क का प्रधानमंत्री मान चुके एक माननीय यहां से चुनाव लड़ रहे है। हाल ही में छोटे पर्दे पर बीतें 23 मार्च को भगत सिंह के शहादत दिवस पर इन्हें देखा था, कोई स्वामी जी है, जो आजकल राश्ट्र भक्त होने का प्रमाण पत्र बांटते फिर रहे है, उन्ही के मंच पर ये महाशय विराजमान थे इनके बोलने का मौका आया तो इनके गले से एक बार भी नहीं निकला इंकलाब-जिदांबाद, भगत सिंह जिदांबाद।

किसी तरह से बामुश्किल कह सके शहीदो,,,,शहीदों हैरत हुई किसकी शहादत दिवस पर किसे याद कर रहे थे ये महाशय। इनसे ये सवाल पूछने वाला कोई नहीं कि जिसकी शहादत दिवस पर आप मौजूद थे उसके सपनों का भारत आपके इलेक्शन मैनिफेस्टों में किस जगह पाया जाता है? जबाब नहीं खामोशी है, आगे बढ़ता हूं। दो दिन पहले एक सभा में, एक और महोदय जिनकी घोषणा है कि ये महाक्रांति करने बनारस आये है। जनता से संवाद करने पहुंचे नारा दिया इंनकलाब-जिन्दाबाद लेकिन ये इन्कलाब है क्या बताने की जहमत नहीं उठाई। और भी है यहां, समाजवादी से लेकर राश्ट्रवादी तक, बहुजन समाज से लेकर सर्वजन समाज तक की बेहतरी की बात करने वाले। लेकिन इन सबके बीच भगत सिंह का इंनकलाब कहां खड़ा है? जो तब तक नहीं रूकता या थमता जब तक कि शोषण पर टिकी व्यवस्था का अंत नहीं होता।

कम से कम ऐसा कोई संघर्ष तो यहां फिलहाल नहीं दिखता। रंग-बिरंगी टोपी, झंडे और साथ में जिन्दाबाद का नारा लगाने वाले जिस किसी से भी मिलते है, हर मर्ज के इलाज का दावा करते हुए जब कहते है, हां-हां सब ठीक है तो मुझे कवि धूमिल के शब्दों में कहना पड़ता हैं, 'आप सब के मुंह में जितनी वाहवाही है, उससे ज्यादा पीक है, इसे कहा थूकेंगे लोगो की इच्छाओं और आंकाक्षाओं पर' …… और फिर निकल लेंगे अगले 5 सालों के लिए। और वक्त की दौड़ में पीछे छूट जायेगा मेरा शहर बनारस। एक इंकलाब की आस लिए और उस सवाल का जबाब भी नहीं मिलेगा रोटी-रोजी से जो खेलता है, वो तीसरा आदमी कौन है।

भास्कर गुहा नियोगी
वाराणसी।

 

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