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जनता से सीधा संवाद, राजनीति में नई परम्परा की शुरूआत

वाराणसी। परम्परागत राजनीति से अलग हटकर चुनौती, विरोध और सवाल-जबाब के जरिए राजनीति की नयी परिभाषा गढ़ने चली आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार की शाम कटिंग मेमोरियल स्थित गोकुल लान में जनता से सीधा संवाद स्थापित कर लोकसभा चुनावों में एक नई परम्परा की शुरूआत की। बनारस में अब तक हुए लोकसभा के चुनावों के इतिहास में षायद ऐसा पहली बार हुआ कि खुद चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी ने जनता के सवालों के सीधे जबाब दिया, नही तो चुनावी सभाओं, रैलियों में पहुंचे नेता अपनी ही कहकर चलते बनते है।

छोटे-छोटे कदमों से बड़े लक्ष्य को भेदने के प्रयास में लगी आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट तौर पर कहा कि राजनीति में सवाल-जबाब का दौर है, लेकिन नरेन्द्र मोदी या राहुल गांधी तो जबाब ही नहीं देते। बनारस को राजनीति के महाक्रांति का मंच बताते हुए जनता से आह्वान किया कि मोदी को हरा कर इस महाक्रांति के अग्रदूत बने क्यों कि मोदी की हार से ही इस देश में नई राजनीति की शुरूआत होगी। उन्होने कहा कि अगर मोदी जीत गये तो बड़ौदा भाग जायेंगे और हारे तो देश की राजनीति की फिजा ही बदली सी होगी। साथ ही में उन्होनें दो सीटो से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने की मांग की।

मो. इकबाल के पहले सवाल कि आप के खिलाफ मोदी ने इतना कुछ कहा पर आपने चुनाव आयोग से शिकायत क्यों नही की? इसके जवाब में केजरीवाल ने कहा जनता कि अदालत सबसे बड़ी अदालत है जनता इस बार तय करेगी कि कैसे लोग देश की राजनीति का प्रतिनिधित्व करे। इसके बाद आरक्षण से लेकर जातीय व्यवस्था, अर्थवयवस्था से लेकर रोजगार, शिक्षा नीति, खेती-किसानी पर एक के बाद एक पूछे गए तीखे सवालों के जबाब केजरीवाल देते रहे। लोकतंत्र में लाख बिमारियों की एक जड़ भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनता से मौजूदा व्यवस्था की सफाई करने के लिए निर्णायक भूमिका में आने को कहा। कहा खराब राजनीति का विकल्प ईमानदार और जनपक्षीय राजनीति ही हो सकती है। खुद को भगौड़ा कहे जाने के सवाल के जवाब में कहा मैं पाकिस्तान तो नहीं भाग गया। यही हूं भ्रष्टाचारियों से लड़ने के लिए खड़ा हूं और आगे भी लड़ता रहूंगा।
 
सब मिलाकर देखा जाए जनता से संवाद के जरिए आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, और आकाश के रास्ते हेलीकाप्टर से सीधे मंच पर टपके नेताओं के रटे-रटाये डायलागनुमा उत्तेजित और भावनात्मक भाषणों से परे हटकर राजनीति में एक बेहतर परम्परा की नींव डाली है। साथ ही आम आदमी के छोटे-छोटे मगर जीवन को प्रभावित सवालों का जबाब देते हुए अपने चुनावी लक्ष्य को भेदने की कोशिश की शुरूआत भी की।

 

भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट।
 

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