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‘येन केन प्रकारेण’ चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है

एक टी वी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के दौरान यह पता चला कि चुनावों में पैसे का कितना योगदान है और इसके दम पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता। डमी प्रत्याशी खड़ा करके किसी जीतने वाले प्रत्याशी के वोट किस तरह काटे जा सकते हैं। इसमें निर्दलीयों और छोटी -छोटी पार्टियों की क्या भूमिका होती है, यह तथ्य सामने आता है। कॉर्पोरेट लॉबिंग का क्या मतलब है और बड़ी पार्टियां किसके इशारों पर चलती हैं, यह भी स्पष्ट हो जाता है। अतः यह अनुमान लगन कठिन नहीं कि भारत में, भ्रष्टाचार का मुख्य सूत्र, भारत की राजनीतिक व्यवस्था के भीतर है। यदि यहां भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कोई भी सार्थक पहल की जाती है तो उसमें अवश्य ही राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव एक अत्यावश्यक आधार होगा।

किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। राजनीतिक दलों की 'येन केन प्रकारेण' चुनाव जीतने की लालसा, खर्चीले चुनावों की जनक है। एक अनुमान के अनुसार आज विधानसभा की एक सीट के लिए 1 से 5 करोड़ रुपए तक की राशि खर्च करनी पड़ती है। लोकसभा की एक सीट के लिए 5 से 25 करोड़ तक के खर्च का अनुमान है। यह अनुमान ग्रामीण, अर्द्धशहरी तथा बड़े शहरों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। यह पैसा कहाँ से आता है और कौन देता है, वह क्यों देता है यह गंभीर चिंता का विषय है। इतना चुनावी खर्च आखिर किसलिए? भ्रष्टाचार की तह में बस यही एक पहेली है जो इस तरह के कर्मों का पर्दाफाश कराती है।
 
हाल में राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को सूचना का अधिकार, कानून के दायरे में लाने की आवाज उठी तो सभी राजनीतिक दल अपने सारे मतभेद भुलाकर इस बात पर एकजुट हो गए कि ऐसा नहीं होना चाहिए। स्पष्ट था कि राजनीतिक दल अपनी कार्यप्रणाली को विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन को जनता के समक्ष नहीं लाने देना चाहते थे। तब इन पर कैसे अंकुश लगाया जाये? ऐसे राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने का एक अति साधारण उपाय है कि इनके वित्तीय लेन-देन को चुनाव आयोग के समक्ष प्रत्येक तिमाही अथवा छमाही अवधि के बाद प्रस्तुत करना अनिवार्य बना दिया जाए और ऐसा न करने वाले राजनीतिक दलों के मुख्य अधिकारियों को दंडात्मक प्रावधान का सामना करना पड़े।

कम्पनियों के गठन और संचालन पर जिस प्रकार कम्पनी कानून के प्रावधान प्रत्येक कम्पनी के लिए वित्तीय खातों को कम्पनी बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाते हैं और न करने वाली कम्पनी के डायरैक्टरों पर दंडात्मक कार्रवाई की तलवार लटकी रहती है, हालांकि कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ इसे कमजोर करने में अपनी भूमिका निभाता है फिर भी राजनीतिक दलों के अपकृत्यों को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग को भी ऐसे ही अधिकार दिए जाने चाहिए। भारत में राजनीतिक दलों की व्यवस्था, चुनाव आयोग के कितने नियंत्रण में है इसका आकलन जन प्रतिनिधित्व कानून की केवल एक धारा-29 से लगाया जा सकता है।

इस धारा-29 में नया राजनीतिक दल गठित करने के लिए चुनाव आयोग को पूर्ण विवरण सहित एक आवेदन दिया जाता है जिसमें मुख्य कार्यालय तथा पदाधिकारियों और सदस्यों की संख्या का विवरण दिया जाना होता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि कोई भी राजनीतिक दल व्यक्तिगत नागरिकों या कम्पनियों से दान स्वीकार कर सकता है। इसी धारा में यह प्रावधान है कि हर राजनीतिक दल का कोषाध्यक्ष चुनाव आयोग को अपने दल की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जिसमें उन व्यक्तियों या कम्पनियों के नाम शामिल करने आवश्यक होंगे जिन्होंने क्रमश: 20,000 और 25,000 रुपए से अधिक दान विगत वर्ष में दिया हो। इस धारा-29 में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जिसमें राजनीतिक दल द्वारा वित्त के संबंध में अनियमितता बरते जाने पर सजा या जुर्माने आदि की कोई आपराधिक व्यवस्था हो।

इसी कमी का लाभ उठाते हुए भारत के सभी राजनीतिक दल पूरी तरह से परदे के पीछे  रहकर इस तरह की हेरा-फेरी करने में सफल हो जाते हैं ताकि उनके वित्तीय लेन-देन जनता के सामने न आ पाएं। जाहिर है ऐसी स्थितियों में भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता। यह राजनीतिक व्यवस्था इसकी संरक्षक है। इसलिए इस व्यवस्था में बदलाव अत्यंत आवश्यक है तभी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव है।

 

शैलेन्द्र चौहान। संपर्क: पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद – 201014
 

Bhadas Desk

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