पत्रकारिता, प्रिंटलाइन और परितोष : अलविदा परितोष जी!

अजय तिवारी-

परितोष चक्रवर्ती को नमन! एक बेहतरीन इंसान, समर्थ कथाकार और निष्ठावान पत्रकार परितोष चक्रवर्ती का आज सुबह ५.३० बजे रायपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। लंबी, कष्टकर बीमारी के बाद उनका जाना हिंदी समाज के लिए अत्यंत पीड़ादायक है।

परितोष की उपस्थिति ने हिंदी के साहित्यिक भूगोल का दो अर्थों में विस्तार किया था। एक, यूपी-बिहार केंद्रित हिंदी साहित्य के परिदृश्य में परितोष छत्तीसगढ़ की समर्थ रचनात्मकता के उदाहरण थे; दूसरे, हिंदी पत्रकारिता में बंगला-भाषियों के योगदान का वर्तमान प्रमाण थे।

परितोष चक्रवर्ती जितने अच्छे लेखक थे, उससे भी ज़्यादा शानदार इंसान थे। समझौता-विहीन जीवन जीने की क़ीमत चुकाने वाले, फिर भी माथे पर शिकन न लाने वाले। दिल्ली में रहते हुए जिन लोगों से परितोष की निकटता थी, उनमें श्री मोहन गुप्त के अलावा मुझे भी यह सौभाग्य प्राप्त था।

इस दुखद समाचार से परितोष की अनगिनत स्मृतियाँ कौंध रही हैं। लेकिन यह समय उन बातों को विस्तार से कहने का नहीं है। जल्दी ही उनकी यादों को टटोलकर और उनकी रचनाओं को लेकर लिखना होगा। तभी कर्तव्य अदा होगा।

परितोष, आपको हार्दिक नमन!

दिनेश चौधरी-

उनसे पहली मुलाकात ‘अमृत-सन्देश’ अखबार के दफ्तर में हुई थी। कोई औपचारिक परिचय नहीं। हाथ मिलाना या हाथ जोड़कर नमस्ते करना भी नहीं हुआ था। वे वरिष्ठ पत्रकार कमल ठाकुर के साथ सामने मेज पर बैठते थे और बीच-बीच में जब कभी नज़रें मिल जातीं, मुस्कुरा देते। मेरी भर्ती नई थी और वे वरिष्ठ पत्रकार थे। इतना परिचय तो हमने एक-दूसरे का ले लिया था। फिर वे अचानक उठकर आए और कहा कि चलो चाय पीकर आते हैं। दफ्तर के बगल में बजरंग होटल। सीढियाँ उतरते हुए उन्होंने मेरे एक कंधे को हौले से दबाया और कहा, “मुझे परितोष चक्रवर्ती कहते हैं।”

‘अमृत सन्देश’ में काम करने का माहौल खुशनुमा न था। सन्नाटा-सा पसरा रहता और कोई कुछ बोलता तो एकबारगी सब चौंक जाते। गर्दनें मेज की ओर झुकी रहतीं और हाथ न्यूज-प्रिंट पर कलम घसीट रहे होते। ऐसे में किसी से बात करना सम्भव न होता। बातचीत होती भी तो फुफुसाहट की तरह। ठीक-ठाक परिचय तब हुआ जब समाचार सम्पादक पारख जी ने अचानक रघु ठाकुर का एक इंटरव्यू लाने का काम सौंप दिया। मेरी रुचि कला-संस्कृति- साहित्य वगैरह में थी तो समझ में नहीं आया कि किस तरह और क्या लिखा जाए। परितोष जी ने मदद की। नगरी-सिहावा के विस्थापित आदिवासियों के आंदोलन की पृष्ठभूमि की जानकारी दी, जिस मुद्दे पर रघु ठाकुर भूख हड़ताल पर बैठे थे। शाम को देवेंद्र नगर वाले अपने घर ले गए और ‘रविवार’ की पुरानी प्रति निकाल कर दी, जिसमें आंदोलन की विस्तृत जानकारी थी। रिपोर्ट ठीक-ठाक बन गयी और आगे के लिए अपनी झिझक कम हुई।

इसी बीच ‘हंस’ में उनकी कहानी ‘दूसरी मौत से पहले’ पढ़ी। यह एक अद्भुत कथा थी, जिसकी तफसील में जाने के लिए यह मुनासिब जगह नहीं है। कहानी के जरिए उनकी प्रतिभा के एक और आयाम से परिचय हुआ। फिर एक किताब “अभिशप्त दाम्पत्य” पढ़ी जो पूर्व में ‘धर्मयुग’ में धारावाहिक की शक्ल में छपी थी। उनके अनुवादों के जरिए बांग्ला लेखक मति नंदी से परिचय हुआ और “स्टॉपर” व “स्ट्राइकर” पढ़ सका। यह भी जान सका कि फुटबॉल को लेकर कोलकाता में जो ‘क्लब कल्चर’ है वह किस तरह का है। इन दिनों बहुत-सी महिला खिलाड़ी जब ओलिम्पिक पदक लेकर आती हैं, तब हमें उनकी तिल-तिल कर संघर्ष करने वाली कहानी पता चलती है। परितोष जी ने मति नंदी के नावेल “कोनी” का अनुवाद किया था जो एक गरीब तैराक की कुछ इसी तरह की कथा था। इसकी याद आती है तो अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस नावेल को टाइप कराने और प्रूफ देखने का सौभाग्य मुझे हासिल हुआ। यह धारावाहिक रूप से “चौथी दुनिया” में छपा था। तब संतोष भारतीय सहित “चौथी दुनिया” का लगभग आधा स्टाफ “रविवार” छोड़कर आया था। परितोष जी के साथ इसके दफ्तर में जाना हुआ। संतोष भारतीय, कमर वहीद नकवी, अजय चौधरी, धीरेंद्र अस्थाना वगैरह से हाथ मिलाने का अवसर मिला तो अपने पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उन दिनों अपन “राष्ट्रीय पत्रिका” के पत्रकारों को स्टार समझते थे और यहाँ जाने की एक दबी हुई ख्वाहिश भी थी। संतोष भारतीय चाहते थे कि परितोष जी भोपाल शिफ्ट होकर अखबार के प्रांतीय ब्यूरो का जिम्मा सम्भाले पर बात आई-गई हो गई। इसका सबसे बड़ा सदमा मुझे लगा। मैं इस फिराक में था कि यदि वे ब्यूरो चीफ बनते हैं तो मैं उनके सहायक के रूप में लटक लूँगा!

इस बात की जानकारी मुझे बहुत बाद में हुई कि सुरेंद्र मोहन पाठक के पात्र सुनील को केंद्र में रखकर उन्होंने कुछ कहानियां रची थीं। सुनील अपना भी प्रिय पात्र था और एक जमाने में अपन उनके खूब नावेल पढ़ते थे। विमल सीरीज के भी। जासूसी नावेल पढ़ने को लेकर एक अपराध-बोध भी था। संयोग देखिए कि इसी दौर में कहीं पढा कि मुक्तिबोध जी भी जासूसी नावेल पढ़ना पसंद करते थे तो अपराध-बोध कम हुआ और इन्हें पढ़ने की मात्रा और आवृति और अधिक बढ़ गई।

फिर मैंने किसी हादसे की तरह “अमृत संदेश” छोड़ दिया। कप्पू जी की सिफारिश पर नैयर जी ने मुझे भास्कर में दाखिला दिलाया और परितोष जी वापस बिलासपुर चले गए। बिलासपुर की नौकरी उन्हें नहीं छोड़नी थी, पर इतने कटु अनुभवों के बाद भी पत्रकारिता से उनका मोहभंग नहीं हुआ क्योंकि वे मूलतः पत्रकार ही थे। इन दिनों पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, वह हम सबकी आँखों के सामने है। ललित जी ने कहीं लिखा था कि आज के समय में “गुरिल्ला पत्रकारिता” की जरूरत है।

बहरहाल, परितोष जी जब बिलासपुर की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर “लोकायत’ के सम्पादक बन गए, तो उसका पहला अंक मैंने चक्रधरपुर में देखा। मेरी आदत है कि कोई भी नई पत्रिका हाथ में आती है तो सबसे पहले मैं उसकी प्रिंट-लाइन देखता हूँ। इस आदत के कारण मुझे पत्रिकाओं के सम्पादक से लेकर प्रसार-प्रबन्धक तक के नाम याद रहा करते थे। पत्रिका में परितोष जी का नाम देखा तो एसटीडी से फोन खड़काया। तब तक शायद मोबाइल नहीं आए थे या इसका बिल्कुल शुरुआती दौर रहा होगा। परितोष जी ने कहा कि आकर “लोकायत” ज्वाइन कर लो। एक क्षण को तो मेरा भी मन डांवाडोल हो गया। पर इस बीच मैं अपनी सरकारी नौकरी को लेकर बहुत धक्के खा चुका था और अब जबकि वहाँ मन जरा रमने लगा था, मुझे वापस पत्रकारिता में जाना सही नहीं लगा। आज के हालात के लिहाज से सोचता हूँ तो यह एक सही निर्णय था।

फिर परितोष जी दोहरे सम्पादक हो गए। “लोकायत” और “जनसत्ता” एक साथ। जमशेदपुर से उनके लिए मैंने कुछ सांस्कृतिक रिपोर्टिंग भी की। आगे जो कुछ भी हुआ वह बहुत विस्तार से उनके नावेल ‘प्रिंटलाइन’ में दर्ज है, जो ज्ञानपीठ से छपा है। ‘धर्मयुग’ में नहीं जाने से लेकर ‘रविवार’ को छोड़ने तक परितोष के पास पत्रकारिता का एक लंबा अनुभव रहा पर उनके पाँवों में ‘भँवरी’ (चकरी) लगी हुई थी, इसलिये वे किसी एक जगह टिककर नहीं रह पाते। यह बात वे खुद के लिए ही कहते थे। नौकरियाँ छोड़ने का रोग उन्हें खाज की तरह रहा है जो उन्हें कोई 15-16 जगह घुमाता रहा और इसी सिलसिले में अनेकानेक लोग उनके संपर्क में आए जो इस उपन्यास के पात्र हैं – कई वास्तविक नामों से और कुछ काल्पनिक। लगभग हकीकत और थोड़े फसाने को लेकर रचा गया यह उपन्यास एक ओर तो विगत् चार दशकों की हिंदी पत्रकारिता का लेखा-जोखा है तो दूसरी ओर नायक ‘अमर’ की जीवनी भी जो इस समस्त घटनाक्रम में सक्रिय रूप से सम्मिलित है।

उपन्यास का एक किरदार ‘कप्पू’ भी है, जिसके साथ काम करने का अवसर इन पंक्तियों के लेखक को भी हासिल हुआ और जिनका जिक्र पहले भी आया है। उन दिनों अखबार में साहित्यिक पत्रकारिता का अवसान पूरी तरह नहीं हुआ था और अखबार में नया होने के कारण मैं हरेक पत्रकार को ‘साहित्यकार’ समझते हुए उन्हें बड़ी श्रद्धा व आदर के साथ देखा करता था। परितोष, दीवाकर मुक्तिबोध व कप्पू उर्फ निर्भीक वर्मा उसी अखबार में काम करते थे। मैंने पहले भी जिक्र किया है कि अखबार का माहौल दमघोंटू था और हर वक्त कर्फ्यू जैसा लगा रहता था, जहाँ किसी को भी हँसते-बोलते देख लिये जाने पर फौरन गोली मार दिये जाने का अंदेशा बना रहता था। दीवाकर स्वाभाव से ही गंभीर थे और मैंने उन्हें प्रायः चुपचाप अपना काम करते हुए ही देखा था। ‘कर्फ्यू’ तोड़ने का काम या तो परितोष करते या कप्पू और इसलिये ही हम नये ‘रंगरूटों’ के हीरो थे। एक बार प्रधान संपादक जी ने कप्पू को समय पर अखबार के दफ्तर में आने की सलाह दी तो ‘‘टाइम पर आना और टाइम पर जाना’’ के मौन नारे के साथ कप्पू घर से एक बड़ी -सी अलार्म घड़ी लेकर आने लगे जो टेबल में उनके ठीक सामने रखी रहती, ताकि समय पर जाने में चूक न हो। लेकिन असल किस्सा कुछ और है।

तब साहित्यिक व ‘मिशन वाली पत्रकारिता’ का अंत तो नहीं हुआ था लेकिन नयी तकनीक के आगमन के साथ बाजारवाद की पदचाप सुनाई पड़ने लगी थी, जो इतनी महीन थी कि कम से कम हम जैसे नये रंगरूटों की पकड़ से बाहर थी। कोई नया आदमी मिलता और कप्पू से परिचय कराया जाता तो काम के बारे में कप्पू का कहना होता, ‘‘जी मैं रद्दी बेचने का काम करता हूँ।’’ परितोष इस पर मुस्कुराते रहते और मैं आहत होता कि पत्रकारिता जैसे ‘महान’ व ‘पवित्र’ कार्य को कप्पू इस तरह लांछित कर रहे हैं और उन्हें परितोष का मूक समर्थन हासिल है। बहुत बाद में जब दिल्ली में एक ट्रेड यूनियन के दफ्तर में काफी दिनों तक अपना डेरा रहा तो उन दिनों अंग्रेजी के दो बड़े अखबारों में कीमत घटाकर ज्यादा पन्ने देने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। एक दिन बातों ही बातों में अखबार के हॉकर ने बताया कि ‘‘लंबे समय की मजबूरी है, वरना अखबार को बाँटने के बदले यदि उसे रद्दी में बेच दिया तब भी उतने ही पैसे मिल जायेंगे।’’ मुझे उसी क्षण कप्पू व परितोष की याद आयी और दरअसल ‘प्रिंट लाइन’ की समस्त कथा उस पूरे दौर कथा है जिसमें सरोकारी पत्रकारिता रद्दी बेचने के कारोबार में बदल गयी।

छत्तीसगढ़ के छोटे-से गाँव से उपन्याय का नायक अखबारी लेखन की शुरूआत करता है और रायपुर के एक अखबार से सक्रिय पत्रकारिता में प्रवेश करते हुए अंततः देश की राजधानी दिल्ली में पहुँचता है जहाँ उसकी नियति बाजारू हथकंडों द्वारा छले जाने के लिये अभिशप्त है। लेकिन मजे की बात यह है कि ‘मिशन’ के खाज का मारा नायक अब भी ‘‘सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या किया’’ कहने के बजाय ‘‘जो घर फूँके आपना’’ के मंत्र का जाप करता दिखाई पड़ता है। इसलिये लक-दक गाड़ियों में घूमने व लाखों की सैलरी लेने वाले आज के पत्रकारों के लिये यह पत्रकार किसी अजूबे से कम नहीं है जो संपादक- प्रबंधक द्वारा छूट दिये जाने पर भी अपने लिये न्यूनतम वेतन तय करता है और एक डूबती हुई पत्रिका को बचाने और चलाने के लिये अपना वेतन व खर्च कम कर लेता है।

लेकिन इस आत्मकथात्मक उपन्यास में केवल पत्रकारिता की कथा नहीं है। बहुस-सी और भी कथायें हैं जो साथ-साथ चलती रहती हैं। छत्तीसगढ़ के गाँवों कस्बों में वर्ण-व्यवस्था, गाँवों से मजदूरों का पलायन, आपातकाल के काले दिन, पृथक छत्तीसगढ़ का आंदोलन -आदि अनेक प्रसंग कथा में बार-बार में आते हैं ओर इस कथा को अत्यंत रोचकता के साथ इतिहास की तरह भी पढ़ा जा सकता है। छत्तीसगढ़ की कथा यहाँ की प्रमुख पैदावार धान के उल्लेख के बगैर पूरी नहीं हो सकती सो कुछ पन्नों पर आप धान की विभिन्न किस्मों से भी रू-ब-रू हो सकते है। सबसे बड़ी बात यह है कि किताब को पढ़ने के लिये प्रयास की जरूरत नहीं है, किताब स्वयं को पढ़ाती चलती है।

सेंस ऑफ ह्यूमर विपरीत परिस्थितियों में कुछ ज्यादा ही जागृत हो जाता है। जब वे दिल्ली से अपनी पत्रिका निकाल रहे थे और घाटे में चल रहे थे तो अचानक मैंने देखा कि पत्रिका के अंग्रेजी संस्करण के शुभारंभ की घोषणा की गयी है। मैंने तुरंत फोन घनघनाया और इस उलट-बाँसी का आशय पूछा। परितोष ने कहा कि ‘‘तुम नहीं समझोगे। गरीब आदमी ही ज्यादा बच्चे पैदा करता हैं।’’ लेकिन ‘प्रिंटलाइन’ के लोकार्पण पर वे रूआँसे-से हो गये। पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि तस्वीर खिंचवाते हुए प्रेमचंद के जूते फटे हुए दिखाई पड़ते हैं और बोलते हुए परितोष का गला रूंध जाता है! हिंदी-समाज अपने लेखकों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों करता है? वह आज तक अपने लेखकों की कद्र करना नहीं सीख पाया। वे अपनी मूल भाषा बांग्ला में लिखते तो स्टार होते।

अपनी पहली ही मुलाकात में परितोष जी मुझे पत्रकारिता से दूर रहने की सलाह देते रहे, पर खुद इसके मोह से उबर नहीं पाए। जहाज के पंछी की तरह वे लौट-लौट कर उसी जहाज पर आते रहे, पर वो एक डूबता हुआ जहाज था। इस पर कई बार लिखने का मन हुआ पर पता नहीं क्यों उन पर कलम ही नहीं चल पाई। ऐसा लगता रहा कि कोई उंगलियों को जकड़ रहा है। ऐसा क्यों होता रहा यह मेरे लिए अबूझ है। यों भी मैं उन पर बहुत आत्मीय संस्मरण इसलिए नहीं लिख सकता क्योंकि उम्र के फासले की वजह से एक लिहाज रहा, अंतरंगता नहीं। गोकि वे एक फ्रेंड नहीं बल्कि फिलासफर और गाइड रहे।

अपने लिए गए फैसलों पर वे शायद पछताते भी रहे हों। आखिरी दिनों की टूटन से ऐसा कुछ मुझे आभास होता रहा, पर खुलेआम कभी उन्होंने स्वीकार किया हो ऐसा याद नहीं पड़ता। आदरणीया भाभीजी (श्रीमती प्रीति चक्रवर्ती) उनके हरेक फैसलों के साथ रहीं। कभी विरोध नहीं किया, चिंता अलबत्ता वे खूब करती रहीं। छोटे बेटे बाबू को मैंने बढ़ते हुए देखा। वह “पान पसन्द का स्वाद, गजब की मिठास’ नामक एक विज्ञापन की नकल खूब मजे लेकर किया करता थे। अब बाबू के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है। अभी तो उससे बात कर पाने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ।

पत्रकारिता और प्रिंटलाइन के नायक को सादर नमन!



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