भोपाल में पत्रकार कोटे के मकानों की बंदरबांट, मानहानि याचिका पर हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

हाईकोर्ट जबलपुर ने भोपाल में पत्रकार कोटे के सरकारी मकानों के आवंटन में हो रहीं धांधलियों पर पेश अवमानना याचिका पर सरकार से चार सप्ताह मे जवाब मांगा है। इस मुददे पर दायर जनहित याचिका में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए के आदेश का सरकार ने पालन नहीं किया। सरकार की इस हीलाहवाली पर पिटीशनर श्रीप्रकाश दीक्षित ने अवमानना की याचिका दायर की थी। उनके मुताबिक गृह विभाग ने उन्हें जो प्रतिवेदन दिया है उसमें हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत किसी भी प्रकरण की न तो विधि सम्मत समीक्षा की है और न समुचित कार्यवाही ही की है। कार्यवाही की गई या कार्यवाही की जा रही है के स्थान पर कार्यवाही की जाएगी जैसे टालमटोल वाले शब्दों का उपयोग कर भ्रमित करने की कोशिश की गई है। इसी पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने के निर्देश दिए हैं।

न्यायमूर्ति राजेन्द्र मेनन और न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की पीठ के समक्ष पिटीशनर श्रीप्रकाश दीक्षित ने अपनी अवमानना याचिका की खुद पैरवी की। उन्होंने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि पहले तो सरकार ने जनहित याचिका पर कोई जवाब नहीं दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद जो जवाब दिया गया है उसमे एक भी मामले में कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई है। प्रत्येक प्रकरण में कार्रवाई की जाएगी जैसे लीपापोती वाले शब्दों का उपयोग कर शासन ने हाईकोर्ट के आदेश की घोर अवहेलना की है।              

इसके पूर्व श्री दीक्षित की जनहित याचिका पर जब सरकार ने एक वर्ष तक जवाब नहीं दिया तब माननीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस केके लाहोटी की बेंच ने इसी 13 जनवरी को एकतरफा आदेश पारित कर दिया। विद्वान न्यायाधीशों ने याचिका में लगाई गई आवासधारी पत्रकारों की सूची के हर प्रकरण की समीक्षा कर समुचित कार्रवाई करने के निर्देश गृह विभाग को दिए थे। बेंच ने यह निर्देश भी दिए कि इस बारे लिए गए निर्णयों की जानकारी पिटीशनर को 3 अप्रैल तक दी जाए।

प्रेसपूल के आवासों के लिए शासन द्वारा बनाए नियमों के मुताबिक इनका आवंटन केवल पत्रकारों को करने का प्रावधान है, अखबारों के ऑफिसों को नहीं। जबकि करीब बीस आवास मीडिया के ऑफिसों को दशकों से एलाट हैं। इनमे प्रेसट्रस्ट, यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स, नईदुनिया, लोकमत समाचार, फ्री प्रेस और स्वदेश सरीखे नामी गिरामी मीडिया समूह शामिल हैं। बडी संख्य ऐसे पत्रकारों की भी है जिन्हे रिटायर हुए सालों-साल हो गए पर वे अखबारों के संवाददाता बन बेशर्मी से बंगलों पर काबिज़ हैं। कई ऐसे हैं जो तबादले पर बाहर चले गए, कईयों की सालों पहले मृत्यु हो गई, पर बंगले पर कब्जा बरकरार है! कुछ ऐसे भी हैं जो बरसों पहले पत्रकारिता छोड चुके हैं, पर बंगले का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं।

दरअसल प्रदेश की दोनो प्रमुख पार्टियां अपने नेताओं और समर्थकों को पत्रकार बना सरकारी मकान की सुविधा से उपकृत करती रही हैं। संभवतः इसी कारण प्रेसपूल के लिए खुद के बनाए नियमों में से एक का भी किसी भी सरकार ने पालन नहीं किया है। भाजपा के कद्दावर नेता कैलाश सारंग, प्रवक्ता रहे बिजेश लूनावत तथा कांगे्रस के बड़े नेताओं में शुमार रहे स्वर्गीय ललित श्रीवास्तव, हाल ही चुनाव में बुदनी से मुख्यमंत्री के खिलाफ कांग्रेस के प्रत्याशी रहे महेन्द्रसिंह चैहान और कभी युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे बंसीलाल गांधी बहैसियत पत्रकार सरकारी बंगलों पर दशकों से काबिज हैं।

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श्रीप्रकाश दीक्षित
एचआईजी-108,गोल्डन वैली हाईटस
भोपाल-462042           
मोबाईल-9893268142  

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Comments on “भोपाल में पत्रकार कोटे के मकानों की बंदरबांट, मानहानि याचिका पर हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

  • aksha sharamjivi says:

    मध्य प्रदेश पत्रकारों की चारागाह बना हुआ है और यह सिलसिला शिवराज सिंह सरकार में भी चालू है। बल्कि शिवराज सरकार पत्रकारों के प्रति ज्यादा `संवेदनशील` दिखाई देती है। संवेदनशीलता सही दिशा में हो तो बेहतर है, लेकिन यहां सरकार अपनी कलई न खुल जाए, इसलिए रेवड़ियां बाट रही है। व्यापमं घोटाला, डंफर कांड, भर्ती घोटाला जैसे कई घोटाले जिनमें भगवा ब्रिगेड का स्पष्ट हाथ दिखाई दे रहा है की खबरें न छपें, इसका पूरा खयाल रखना है सरकार को। इस मामले में भी श्रीप्रकाश कितना भी एड़ी चोटी का जोर लगा लें, होना कुछ नहीं है। सरकार ने इस मामले में भी लीपापोती करने का पूरी तरह से मन बना लिया है। सभी पत्रकारों को औपचारिक आवेदन देने को कहा गया है, जिसके बाद सभी के आवास पर कब्जे जारी रहेंगे। शिवराज सरकार में हिम्मत नहीं है कि अखबार मालिकों, मृत पत्रकारों, स्थानांतरित हो चुके पत्रकारों से मकान खाली करवा ले। सीएम एक नया सिरदर्द मोल नहीं लेना चाहेंगे, वैसे भी केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद सिरदर्द कम हैं क्या।

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  • shashank namdev says:

    पत्रकारों को तो मकान देना उचित है लेकिन पत्रकारों के ना पर ये जो मालिक पत्रकारों के नाम पर घुसकर बैठे हैं उन्हें तो तत्काल बाहर किया जाना चाहिए। और मालिक ही नहीं, उनके भाई, बेटे, सभी को सरकार ने गोद में बिठाकर, सरकारी मकान दिया है। बड़े बड़े अखबार, न्यूज एजेंसी क्या खुद के लिए किराए का आवास नहीं ले सकते कि उन्हें सरकारी आवास की जरुरत पड़ रही है। हां, जिन जिन पत्रकारों पर लाखों, करोड़ों की वसूली बाकी है, वह अलबत्ता तत्काल की जाए।

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  • akhilesh solanki says:

    श्रीप्रकाश जी की इस याचिका के साथ सरकार द्वारा किए जा रहे सलूक से ही साबित हो रहा है कि सरकार इस मामले में कतई गंभीर नहीं है। केवल टालमटोल करना ही उद्देश्य रह गया है। लेकिन श्रीप्रकाश को बधाई कि वे स्वयं अपनी पैरवी अदालत में कर रहे हैं। सही भी है आखिर कब तक वे महंगे वकील रखकर, जनहित के काम कर सकते हैं। इस मामले में उन्हें व्यक्तिगत रूप से तो लोग बहुत साथ दे रहे हैं लेकिन सामने कोई नहीं आ रहा। कोई क्यों बर्र के छत्ते में हाथ डालेगा।

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  • rajpal dubey says:

    Congratulations to Mr Dixit for raising such a good issue. The story has been nicely carried by the Indian Express, two days ago. Only a few media institutions and journalists dare to expose or reveal the truth. I hope that Mr Dixit will get success in his fight against big sharks. I also hope that the court should not confine to issuing the notices. It should take some harsh and serious steps so that the Government falls in line.

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