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चरण सिंह राजपूत की रिपोर्ट...

सहारा अपनी ऐबदारी से बाज नहीं आ रहा है। जहां कर्मचारियों को 12-17 महीने का बकाया वेतन देने को तैयार नहीं वहीं सुप्रीम कोर्ट आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी। साथ ही कर्मचारियों का दूर-दूराज स्थानांतरण कर नौकरी छोड़ने को मजबूर कर रहा है। वह भी बिना बकाया वेतन भुगतान किए। राष्ट्रीय सहारा में हक की आवाज उठाने वाले 22 कर्मचारियों को पहले की बर्खास्त कर दिया गया था कि बिना कारण बताए कॉमर्शियल प्रिंटिंग में काम कर रहे 25 कर्मचारियों की सेवा आज समाप्त कर दी गई। इन कर्मचारियों का दोष बस इतना था कि इन लोगों ने अपना 17 महीने का बकाया वेतन मांगा था।

पीड़ित कर्मचारी सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन का बैनर लगाकर इस ठंड के मौसम में राष्ट्रीय सहारा के गेट पर अपने हक की गुहार लगा रहे हैं पर सहारा प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। हालांकि बंधुआ मुक्ति मोर्चा का समर्थन इन पीड़ित कर्मचारियों को मिला है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली से पीड़ित कर्मचारियों की लड़ाई लड़ने का दंभ भरा है।

कहने को तो जिला स्तर पर श्रमिकों के शोषण रोकने के लिए उप श्रमायुक्त कार्यालय की व्यवस्था की गई है। जिलाधिकारी की भी जिम्मेदारी बनती है कि किसी कंपनी में किसी श्रमिक के साथ किसी तरह का अन्याय न हो सके। राष्ट्रीय सहारा में गत ढाई साल से कई बार आंदोलन हो चुका है पर कर्मचारियों को उनका बकाया भुगतान नहीं दिया गया। उल्टे 47 कर्मचारियों को संस्था से निकाल दिया गया। बड़े स्तर पर स्थानांतरण किए जा रहे हैं। सहारा में कर्मचारियों के उत्पीड़न की दास्तां जिला प्रशासन से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक लिखी जा चुकी है पर किसी तरह की कोई राहत नहीं मिली। अब तो कर्मचारियों को अदालत ही एक सहारा है। संस्था की मक्कारी देखिए कि एक ओर कर्मचारियों को कई माह से वेतन नहीं मिला था दूसरी ओर 2014 में आयकर छापे में नोएडा के राष्ट्रीय सहारा परिसर से 134 करोड़ रुपए बरामद किए गए।

दिलचस्प बात यह है कि आयकर विभाग के इस छापे में एक डायरी बरामद हुई थी जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री समेत 100 नेताओं को पैसे देने की बात लिखी हुई है। जब इस बारे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को घसीटा तो आयकर नियामक आयोग से सहारा को राहत दिलवा दी गई। दरअसल सहारा ने नियामक आयोग में डायरी को सबूत न मानने की याचिका दायर की थी। पहले तो आयोग ने डायरी को सबूत मानते हुए याचिका ठुकरा दी पर किसी दबाव में यह याचिका स्वीकार की गई और मात्र तीन दिन के अंदर  फैसला देकर सहारा को राहत दे दी गई। यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन सुब्रत राय ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों की उगाही कर ली।

यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन ने कारगिल के नाम पर अपने ही वर्करों से 100-500 रुपए प्रति माह के हिसाब से दस साल तक वेतन से काटे। अब जब डायरी में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री को पैसे देने का मुद्दा उठा तो आयकर नियामक आयोग को भी सेट कर लिया। इसे भी मैनेज ही कहा जाएगा कि सहारा डायरी का मुद्दा अब न तो केजरीवाल उठा रहे हैं और न ही राहुल गांधी। हां प्रशांत भूषण अपने मिशन में जरूर डटे हैं। वह मीडियाकर्मियों के हित में सुप्रीम कोर्ट में चल रही मजीठिया वेजबोर्ड की सुनवाई में भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री कहने तो गरीबों के बड़े हितैषी बने घूमते हैं पर सहारा कर्मियों की उत्पीड़न की दास्तां उनके मंत्रालय को कई बार लिखी गई हैं पर उन्होंने न तो सहारा के खिलाफ कोई जांच बैठाई और नही कोई कार्रवाई की। पीएमओ से कर्मचारियों को भी कोई राहत नहीं मिली है। ऐसे में क्या माना जाए ? तो यह माना जाए कि प्रधानमंत्री बस जनता को बेवकूफ बनाने में लगे हैं। यदि नहीं तो सहारा के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते या जांच क्यों नहीं बैठाते?

चरण सिंह राजूपत

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