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बरेली : हिन्दुस्तान समाचार पत्र में यदि आप पत्रकार हैं, तो किसी मुगालते में न रहें। हिन्दुस्तान प्रबन्धन आपको मैनेजर बना चुका होगा और आपको पता भी नहीं चलेगा। हिन्दुस्तान प्रबन्धन की इस करतूत का खुलासा शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में सहायक श्रम आयुक्त के सामने उनके प्रतिनिधि और एचआर प्रभारी सत्येन्द्र अवस्थी ने लिखित में कर दिया। मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुनवाई को लेकर श्रम न्यायालय में हिन्दुस्तान में वरिष्ठ उप संपादक निर्मल कान्त शुक्ला, वरिष्ठ उप संपादक मनोज शर्मा और मुख्य संवाददाता पंकज मिश्र पेश हुए थे।

तीनों ने मजीठिया वेज बोर्ड की संतुतियों के आधार पर सहायक श्रम आयुक्त के समक्ष बकाया एरियर का क्लेम दाखिल कर रखा है। इस मामले हिन्दुस्तान प्रबन्धन की ओर से आज एक पत्र रिसीव कराया गया, जिसमें उपरोक्त तीनों कर्मचारियों को मैनेजमेन्ट कैडर का बताते हुए इन्हें मजीठिया वेज बोर्ड की संतुतियों के आधार पर दावा करने के लिए अर्ह नहीं बताया गया है। प्रबन्धन ने इस तरह सुपरीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए एक और सफेद झूठ श्रम न्यायालय के सामने बोल दिया।

हिन्दुस्तान का कहना है कि निर्मल कान्त शुक्ला, मनोज शर्मा और पंकज मिश्र हमारे यहां मैनेजर हैं इसलिए इन्हें जर्नलिस्ट नहीं माना जा सकता है, इसलिए ये मजीठिया वेज बोर्ड के हकदार नहीं हैं। यह दावा लिखित में करते समय प्रबन्धन शायद यह भूल गया कि उनके ही संपादक द्वारा हर साल वेतन बढ़ोतरी के लिए भरे जाने वाले अप्रेजल फॉर्म में उनके संपादकीय कार्य का मूल्यांकन करके रेटिंग दी गयी है। इससे यह जाहिर है कि प्रबंधन गलत जबाव देकर गुमराह कर रहा है और उसके सुप्रीम कोर्ट के आदेष की कोई परवाह नहीं है। सहायक श्रम आयुक्त ने शिकायतकर्ता निर्मलकांत शुक्ला, मनोज शर्मा और पंकज मिश्र से कहा है कि ऐसे सभी दस्तावेजों को वह पेश करें जो प्रबंधन ने उन्हें वर्किंग जर्नलिस्ट के तौर पर समय-समय पर जारी किए हैं।

इस दौरान वहां मौजूद शिकायतकर्ता राजेश्वर विश्वकर्मा ने कहा कि प्रबंधन का यह मूर्खता भरा जवाब हिन्दुस्तान में कार्यरत सभी पत्रकारों के लिए अपमानजनक है कि उनको मैनेजर बताया जा रहा है। अगर सब मैनेजर हैं तो फिर अखबार के संपादकीय विभाग में कौन काम कर रहा है?

इस दौरान तीनों शिकायतकर्ता पत्रकारों ने मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक बकाया एरियर आदि देने की मांग करते हुए एक पत्र सहायक श्रम आयुक्त को सौंपा, जिसके साथ लखनऊ में 16 कर्मचारियों को छह करोड़ की बकाया आरसी जारी करने का आदेश भी संलग्न किया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि प्रबंधन अब गुमराह कर रहा है। लखनऊ का मामला और उनका केस समान है, इसलिए अब प्रबंधन की आरसी काटने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है।

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