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किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं... तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब... है तो कड़वा सच... मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती... अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है.....

अव्वल तो अख़बार में काम करने वाले बेचारे हैं तो पत्रकार... लेकिन वोह किसी विज्ञापन एजेंसी, किसी कम्प्यूटर एजेंसी, किसी प्रिंटिंग एजेंसी, किसी लेबर सप्लायर के यहां, कार्यरत कमर्चारी बताये जाते है... ऐसे में यह सब मुमकिन भी नहीं... क्या मजीठिया, क्या दूसरे आयोग... सब बेकार हैं... सारी रिपोर्ट बेकार है भाई.... अख़बार एक रोशनी, अख़बार का मालिक एक रोशनी, लेकिन अख़बार कर्मचारी पत्रकार हो चाहे जो भी हो, एक दिया, जिसके तले, अँधेरा है.

और, इसकी वजह सिर्फ आपसी फूट, सर फुटव्वल, संगठनों पर दारु भाइयों का क़ब्ज़ा, प्रेस क्लबों में शराब के शौक़ीनों का जमावड़ा है, जो सिर्फ अपनी बात करते हैं. पत्रकारों को उनके कल्याण, उनके उत्थान, उनके लिए संघर्ष, बड़े अखबारों के क्रूर प्रबंधन से उन्हें न्याय दिलवाने की बात चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो, चाहे राज्य स्तर पर हो, चाहे क्षेत्रीय स्तर पर हो, किसी भी संगठन ने एक संगठित और व्यवस्थित आंदोलन के रूप में आवाज नहीं उठाई है...

पत्रकार संजय तिवारी और अख्तर खान अकेला की एफबी वॉल से.

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  • Guest - sanjib

    Par mai to kehta hoon, ki "chalo achchha hua, ek apne kamgaron ka Khoon-pipashu gaya..., ab ooper apne saarey daulat aur workers ki gadhi kamai ka hisaab dega aur Kharch karega..." Ek din sabon ko jana hai bhai. Isiliye kuchh achchhey karm kar jao, kyonki sab kuchh yahin chhod ker apney bete, bhai, bhatijon, betiyon ke naam chhod kar jana hai. Saari chori-chamari yahin rah jayegi. Saath jayega, to sirf tumharey achchhey karm...

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