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इस प्रकरण में राज एक्सप्रेस के संपादक अनुराग त्रिवेदी की भूमिका बेहद निंदनीय... मध्यप्रदेश की राजधानी से प्रकाशित दैनिक राज एक्सप्रेस में एक बार फिर आर्थिक संकट के बादल छा गए हैं। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। स्टाफ को बीते चार महीने से सेलरी नहीं मिली है। किसी के बच्चों की स्कूल की फीस पेंडिंग हो गई है तो कोई अपनी आजीविका चलाने के लिए संर्घष कर रहा है। लेकिन अखबार के मालिक और संपादक और संपादकीय विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अपने ही स्टाफ के विरुद्ध नजर आ रहे हैं।

बीते एक हफ्ते से संपादकीय विभाग का स्टाफ सेलेरी लेने के लिए एचआर विभाग के चक्कर लगा रहा है। लेकिन उन्हें रोजाना कोई न कोई आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है। पानी सिर से उपर हो जाने के कारण सोमवार को अपकंट्री में काम करने वाले सब एडिटर और आपरेटरों ने काम को रोक दिया और मालिक से मिलने के लिए संपादक के पास चर्चा करने गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए तथा​कथित संपादक अनुराग त्रिवेदी ने पहले तो जयचंद का रोल निभाते हुए सभी को अपने यकीन में लेकर मालिक से मिलने भेज दिया।

जब सब कर्मचारी मालिके के पास गए तो मालिक ने नेतृत्व कर रहे राजकुमार सोनी के साथ मारपीट कर दी। साथ ही सभी को धमकाते हुआ नौकरी छोड़कर जाने को भी कह दिया। ऐसे समय में स्थिति को संभालने के बजाए संपादक अनुराग त्रिवेदी, सेंट्रल डेस्क के इंचार्ज पवन सोनी ने अपनी ही टीम के कर्मचारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सभी कर्मचारियों की कमियां मालिक को गिनवाने लगे।

ये वहीं संपादक और इंचार्ज हैं जो परमानेंट मालिक के तलवे चाटते हैं। ये संस्था में ​मालिक को छोड़ किसी के सगे नहीं हैं। इनकी गुलामी का बड़ा कारण इन्हें कही दूसरी जगह नौकरी का न मिलना भी है। इन लोगों ने मालिक से कई दफा एडवांस सेलरी ले रखी है। इसके कारण ये न्याय दिलाने के बजाए अपने ही साथियों का दोहन करते रहते हैं। अनुराग त्रिवेदी को तो एक दफा अखबार में अश्लील चित्र प्रकाशित करने के कारण मालिक ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। लेकिन जब पूरे भोपाल में कहीं नौकरी नहीं मिली तो हाथ पैर जोड़कर वापस आ गया।

संस्था के तीन लोग अखबार को डुबाकर मोटी सेलरी ऐंठ रहे हैं, कभी अपने स्टाफ के साथ नहीं खड़े हुए। इनमें अनुराग त्रिवेदी अव्वल नंबर पर हैं। दूसरा पवन सोनी है जो सिर्फ कापी पेस्ट खबरों से अखबार के पन्ने भरता है। तीसरे नंबर पर हैं समूह संपादक जो 60 की उम्र पार कर चुके हैं और फ्री की पगार सिर्फ मालिक की चुगली करने की लेते हैं। खुद को संपादक कहने वाला अनुराग त्रिवेदी ग्वालियर का है और वहां के गठजोड़ से संबंधित कई किस्म के आरोप उस पर लगते रहते हैं। हर बार वह मालिक का करीबी होने के कारण बचता रहा है।

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