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पत्रकारिता की दुर्दशा देख रोना आता है... खास तौर से हिंदी पत्रकारिता का हाल बेहद बुरा है। बात कर रहा हूं प्रिंट मीडिया की। इलेक्ट्रानिक पर बात करना तो समय जाया करना है। हाल बुरा है..कुछ सरकार के कारण, कुछ अखबार मालिकों के कारण, कुछ तथाकथित संपादकों के कारण और कुछ इस प्रोफेशन में घुस आए ऐसे लोगों के कारण जिन्हें इस पेशे के तय मानदंडों से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें मतलब है तो सिर्फ नेताओं और अधिकारियों के साथ तस्वीरें खिंचाने, उन तस्वीरों को छापने और फिर उसे दिखा कर राजनीतिक गलियारों में घुस अपना स्वार्थ साधने व अपनी दुकानदारी चलाने से।

यकीन नहीं आता तो इसका जीता जागता उदाहरण है राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होने वाला दैनिक अखबार प्रयुक्ति। सच, सोच और समाधान के टैग के साथ पाठकों के प्रति प्रतिबद्धता का ढ़िढोरा पीटने वाले इस समाचारपत्र के 18 मई, 2017 के अंक में मुख्य पृष्ठ पर एक भी खबर नहीं है। है तो सिर्फ अपना बखान...नेताओं के साथ समाचारपत्र के समूह संपादक की फोटो और उनके जन्मदिन की सूचना। अब आपही बताइए कि इन चीजों से आम पाठक का क्या लेना देना है। अखबार ने एक वर्ष पूरे किए, बहुत अच्छी बात है। समूह संपादक का जन्मदिन है, ठीक है, लेकिन खबर कहां है।

यदि किसी पाठक ने 17 मई को यह अखबार 3 रुपए में खरीदा होगा तो क्या यह पढ़ने के लिए कि संपादक का जन्मदिन कब है। क्या यह पाठकों के साथ विश्वासघात नहीं है? अखबार की कथनी और करनी में फर्क देखिए। अखबार छापता है कि हर खबर रही आपकी... लेकिन पेज 1 और 6 व 7 पर एक भी खबर नहीं है। अखबार लिखता है कि पत्रकारिता के पावन यज्ञ...यज्ञ क्या है समूह संपादक का गुणगान। दावा है कि अखबार ने पूरे साल पत्रकारिता के प्रतिमान गढ़े....कौन से प्रतिमान? गाल बजा दिया और गढ़ लिए प्रतिमान। ऐसे ही लोगों ने पत्रकारिता की मां बहन एक कर रखी है। ऐसे ही अखबार की वजह से पत्रकारों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। न नेता भाव देता है और न ही अधिकारी इज्जत।

अखबार ने अफसोस जाहिर किया है कि प्रयुक्ति शब्दकोश से मुक्त नहीं हो पाया। और इसका ठीकरा आज की शैक्षणिक व्यवस्था पर यह कहते हुए फोड़ दिया है कि शैक्षणिक व्यवस्था ने जैसे पत्रकार पैदा किए हमने उसी से काम चलाया। यानी पूरे पत्रकार बिरादरी को कठघरे में खड़ा कर दिया। क्या बेशर्मी है...वहां काम करने वाले कई पत्रकारों व उनकी काबिलियत को मैं जानता हूं। कई तो राष्ट्रीय समाचारपत्र में महत्वपूर्ण पदों पर रह कर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं। प्रतियुक्ति जैसे घटिया अखबार (जो न तो कहीं दिखता है और न बिकता है) में मजबूरी में काम कर रहे हैं। दिल भरा पड़ा है लेकिन कुछ बोल नहीं सकते क्योंकि नौकरी चली जाएगी...। टैग लाइन सच, सोच और समाधान पर वहीं काम करने वाले लोग बाहर आ कर मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं कौन सा सच है...सोच से तो दूर दूर का वास्ता नहीं और समाधान काहे का..।

प्रयुक्ति जैसे दिशाहीन अखबार का एक साल से निकलना चौंकाने वाला सच है। आखिर क्यों निकल रहा है यह अखबार? आड़े तिरछे तरीके से। प्रयोग के नाम पर क्या स्वस्थ्य पत्रकारिता की घज्जियां उड़ाने की अनुमति किसी को मिलनी चाहिए। ऱाष्ट्रीय अखबार की एक गरिमा होती है जिसे चूर चूर कर रख दिया है प्रयुक्ति ने। अजीबो गरीब हेडिंग...कमजोर कंटेंट, बीमार खबरों का चयन, रसहीन प्रस्तुति..। कहीं भी कुछ भी छाप दो। क्या कहा जाए..कभी मौका लगे तो 3 रुपए खर्च कर अखबार खरीद पढ़िएगा...या फिर कहीं दिख जाए (यदि) तो पढ़िएगा...। हकीकत समझ आ जाएगी। समूह संपादक ने एक साल के सफर का मूल्यांकन मांगा था...ईमानदारी से दिया है। संपादक को अच्छा लगे या बुरा मेरी बला से ...वैसे लगेगा तो बुरा ही। पर परवाह किसे है।

'प्रयुक्ति' में कार्यरत एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. लेखक ने अपने नाम-पहचान को गोपनीय रखने का आग्रह किया है.

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