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Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

Shrikant Asthana : तलवा चाटने और अपनी बात न कह सकने वाले दरअसल कभी पत्रकार थे ही नहीं- भले उन्होंने अखबारी नौकरी में ही पूरा जीवन बिताया हो। पिछले दो दशको में चारणों-भाटों, और अधीनस्थों के शोषण में सक्रिय सहयोग के लिए तैयार चरित्रों को ही छांट कर सम्पादक बनाया गया है। उत्पीड़न का असल औजार तो मालिक की हां में हां मिलाने वाले ये दलाल ही रहे हैं। पत्रकार है तो औकात है। वह बोलेगा मालिक के खिलाफ भी, भांड़ सम्पादक के खिलाफ भी या हर गलत शख्स या बात के खिलाफ। पर पत्रकार हैं कितने देश भर में? पहले पत्रकार तो सामने आयें...

Dayanand Pandey : लोगों को जान लेना चाहिए कि भारत में अब मीडिया नहीं है। मीडिया की दुकानें हैं, मीडिया के दलाल हैं। संविधान में भी तीन खंभों का ही ज़िक्र है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। बस। मीडिया के नाम पर चौथा खंभा जो है वह काल्पनिक है, संवैधानिक नहीं। फिर भी चौथा खंभा अगर है तो वह पूंजीपतियों का खंभा है, दलालों का खंभा है, गरीबों का खंभा नहीं है, गरीबों के लिए नहीं है। निर्बल और लाचार के लिए नहीं है। सर्वहारा के लिए नहीं है। कारपोरेट घरानों का है मीडिया, इसकी सारी सेवा कारपोरेट घरानों के लिए है। सिर्फ़ इनकी ही तिजोरी भरने के लिए है, इनकी लायजनिंग करने के लिए है, इनका ही स्वार्थ साधने के लिए है। बहुत सारे राजनीतिज्ञ भी इनके लिए सिर्फ़ कुत्ते हैं। दुम हिलाते हुए कुत्ते। इस मीडिया में काम करने वाले भी दलाल और चाकर हैं। गली वाले कुत्तों से भी बदतर। अरबों खरबों के साम्राज्य वाले इस मीडिया के ज्यादतर चाकर एक दिहाड़ी मज़दूर से भी कम वेतन पाते हैं। लोगों को यह बात भी जान लेनी चाहिए।

कई अखबारों में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार रमेश राय, श्रीकांत अस्थाना और दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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