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एनडीटीवी ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर केवल मीठी मीठी खबर ही अपने यहां चलाई ताकि मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी दी जा सके. भड़ास में जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सारांश प्रकाशित कर इसे एक तरह से मीडियाकर्मियों की हार और मीडिया मालिकों की जीत बताया गया तो देश भर के मीडियाकर्मी कनफ्यूज हो गए. वे चर्चा करने लगे कि किस खबर को सच मानें? एनडीटीवी की या भड़ास की? एनडीटीवी ने जोर शोर से टीवी पर दिखाया कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोई उनसे पूछे कि भइया मजीठिया लागू करने का निर्देश कोई नया थोड़े है और न ही यह नया है कि ठेके वालों को भी मजीठिया का लाभ दिया जाए.

(आज हुए फैसले पर एक वेबसाइट पर छपी मीठी-मीठी खबर)

(एनडीटीवी पर चली मीठी-मीठी पट्टी.)

कांग्रेस के जमाने वाले केंद्र सरकार की तरफ से पहले ही मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कानून बनाकर नोटिफाई कर दिया गया था और इसके खिलाफ वर्षोंं चली सुनवाई के बाद मीडिया मालिकों की आपत्ति को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के आदेश दे दिए थे. ये सब पुरानी बातें हैं. ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देने के खिलाफ अवमानना याचिका का था. फिलहाल जो मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था वह यह था कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं कर रहे हैं इसलिए उन्हें अवमानना का दोषी माना जाए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, संभव हो तो जेल भेजा जाए ताकि आगे से ऐसी हिमाकत न कर सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी नहीं माना. दूसरा मामला यह था कि जिन हजारों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनके संस्थानों ने नहीं दिया, उनको लाभ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई बड़ी पहल करे, आदेश करे. जैसे एक संभावना यह थी कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तरह नेशनल मजीठिया ट्रिब्यूनल बना दिया जाए और यह ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में डे टुडे सुनवाई करके सारे क्लेम को अंजाम तक पहुंचाकर मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाए. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने सारी जिम्मेदारी लेबर कोर्टों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.

अरे भाई, लेबर कोर्ट तो पहले से ही मीडिया मालिकों से फिक्स थे और हैं. लेबर विभाग और कोर्ट मीडिया मालिकों के इशारे पर काम करते हैं, यह कोई नई बात नहीं है. कायदे से सुप्रीम कोर्ट को दोषी लेबर कमिश्नरों को टांगना चाहिए था जो इतने समय बाद भी मीडियाकर्मियों को उनका क्लेम नहीं दिलवा सके. एनडीटीवी की तरफ से फैसले के नतीजे को बताने की जगह मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी देने के लिए केवल मीठी मीठी बातें ही प्रकाशित प्रसारित की गई.

भड़ास का मानना है कि तथ्यों को सही तरीके से और पूरे सच के साथ रखना चाहिए ताकि हकीकत और हालात की पूरी तरह समीक्षा के बाद संबंधित पक्ष अपनी-अपनी अगली और रायलीस्टिक रणनीति तय कर सकें. जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे थे, उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए हैं. लेबर कोर्टोंं में सबको लड़ना है और अच्छे से लड़ना है, बड़े वकीलों द्वारा बनाई गई रणनीति (इस बारे में शीघ्र खबरें भड़ास पर प्रकाशित होंगी या सभी को मेल कर बता दिया जाए) के तहत लड़ना है और मीडिया मालिकों को हराकर अपना हक लेना है. अगर लेबर कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट दाएं बाएं करेंगे तो उनको टांगा जाएगा, उनकी कुंडली निकाली जाएगी और उन्हें नंगा किया जाएगा ताकि वह किसी भी प्रलोभन या दबाव में मीडिया मालिकों का पक्ष न लेकर पूरे मामले में सच और झूठ का फैसला कर न्याय करें.

मूल खबर...

इस लड़ाई के अंजाम के बारे में भड़ास संपादक यशवंत ने पिछले साल अगस्त में ही ये लिख दिया था...

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