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22. प्रत्युत्तर में दायर किए गए विभिन्न शपथपत्रों में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा अपनाए गए स्टैंड/कदम से, समय-समय पर विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों द्वारा दायर की गई रिपोर्टों में किए गए बयानों से, और साथ ही दायर की गई लिखित दलीलों से और आगे दखी गई मौखिक प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड हिस्से में या नहीं कार्यान्वित किया है, इसके तहत क्या इन समाचारपत्र संस्थानों ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड, जिसे दी गई चुनौती को इस न्यायालय द्वारा रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 के फैसले/जजमेेंट में निरस्त कर दिया गया है, की गुंजाईश और दायरे को माना है। दृढ़मत है कि अवार्ड के गैर-कार्यान्वयन या आंशिक कार्यान्वयन को लेकर जो आरोप है, जैसा कि हो सकता है, स्पष्ट रूप से विशेष तौर पर संबंधित समाचारपत्र संस्थानों की अवार्ड की समझ से उपजा है, यह हमारा विचारणीय नजरिया है कि संबंधित प्रतिष्ठानों को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को दिए गए फैसले/जजमेेंट की जानबूझकर अव्हेलना का जिम्मेवार नहीं ठहरया जा सकता है। अच्छा रहेगा, कथित चूक को बदल कर इस न्यायालय द्वारा बरकरार रखे गए अवार्ड की गलत समझ के तौर पर जगह दी जाए। इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाएगा, ताकि न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 की धारा 2बी में परिभाषित सिविल अवमानना के उत्तरदायित्व को अकर्षित किया जा सके। यद्यपि कथित चूक हमारे लिए स्पष्टत: साक्ष्य है,किसी भी समाचारपत्र प्रतिष्ठान को जानबूझकर या इरादतन ऐसा करने के विचार की गैरमौजूदगी में अवमानना का उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर वे अवार्ड को इसकी उचित भावना और प्रभाव में, इस रोशनी के साथ कि हम अब क्या राय/समझौता प्रस्तावित करते हैं, लागू करने का एक और अवसर पाने के हकदार हैं।

23. मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को इस अदालत ने दिनांक 07.02.2014 को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिए गए फैसले में मंजूरी दे दी गई है। इसलिए, इस अवार्ड को पूर्ण रूप से लागू किया जाना है। हालांकि यह सही है कि संबंधित मुद्दों (i) खंड 20जे, (ii)क्या पुरस्कार अनुबंधित कर्मचारियों पर लागू होता है, (iii) क्या इसमें वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन शामिल है और (iv) वित्तीय क्षरण/घाटे की सीमा जो कि बकाए के भुगतान को रोकने के लिए उचित होगी, को विशेष रूप से किसी भी अवार्ड या इस न्यायालय के फैसले में नहीं निपटा गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है हो सकता है कि अवार्ड की शर्तों के क्षेत्र और दायरे की पुनरावृत्ति जरूरी और उचित होगी। न्यायलय के आदेश(ओं) का उचित और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हम इसके बाद ऐसा करने का प्रस्ताव करते हैं। 

24. जहां तक कि अधिनियम के प्रावधानों के साथ पढ़े जाने वाले अवार्ड के अभी तक के अत्याधिक विवादास्पद मुद्दे क्लॉज 20(जे) का का स्वाल है, यह स्पष्ट है कि अधिनियम की धारा 2(सी) में परिभाषित प्रत्येक अखबार कर्मचारी को अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन/मजदूरी प्राप्त करने की गारंटी का हकदार बनाता है। अधिसूचित वेतन/मजदूरी, जैसा कि हो सकता है, सभी मौजूदा अनुबंधों की जगह लेती है(supersedes करती है)।  हालाकि विधायिका ने धारा १६ के प्रावधानों को शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया है कि मजदूरी तय होने और अधिसूचित होने के बावजूद , संबंधित कर्मचारी के लिए अधिनियम की धारा 12 की अधिसूचना के मुकाबले उसे अधिक फायदा देने वाले/अनुकूल किसी लाभ को स्वीकार करने का अवसर हमेशा खुला रहेगा। मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड का क्लॉज 20(जे), इसलिए, उपरोक्त रोशनी में पढऩा और समझना होगा। अधिनियम के तहत एक कर्मचारी को जो देय है, उससे कम प्राप्त करने के विकल्प की उपलब्धता पर  अधिनियम खामोश है। इस प्रकार का विकल्प वास्तव में आर्थिक छूट के सिद्धांत के दायरे में है, संबंधित कर्मचारियों के विशिष्ट स्टैंड/दृढ़मत को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले में ऐसा मुद्दा नहीं उठता है, जो वर्तमान मामलों में उनके द्वारा तैयार की गई कथित रूप से अनैच्छिक प्राकृति की अंडरटेकिंग(परिवचन/वचन) से संबधित है। इसलिए अधिनियम की धारा 17 के तहत तथ्यों की पहचान करने वाली अथारिटी/प्राधिकरण द्वारा इसके तहत उत्पन हो रहे विवाद का निराकरण किया जाना चाहिए, जैसा कि बाद में व्यक्त/विज्ञापित किया गया है।

25. विधायिका के इतिहास से संबंधित किसी भी घटना में और अधिनियम को अधिनियमित/लागू करने से प्राप्त होने वाले उद्देश्य अर्थात अगर समाचारपत्र कर्मचारियों के लिए उचित मजदूरी नहीं है, तो न्यूनतम उपलब्ध करवाने के लिए, विजय कॉटन मिल्ज लि. और अन्य बनाम अजमेर राज्य (एआईआर1955 एससी 33) मामले में घोषणा/निर्णय के अनुपात के तहत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत अधिसूचित तय मजदूरी को बिना-मोलभाव के कारण मौजूदा अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से नियंत्रित किया जाएगा।  बिजय कॉटेन मिल्ज़ लिमिटेड(सुप्रा) मामले की रिपोर्ट में पैरा चार, जोकि विशिष्ट सूचना के लिए उपरोक्त मुद्दे से जुड़ता है, नीचे दिया गया है:
"4. यह शायद ही विवादित हो सकता है कि श्रमिकों को जीने के लिए मजदूरी सुरक्षित करना, जो न केवल महज शारीरिक निर्वाह परंतु साथ ही स्वास्थ्य और मर्यादा का पोषण/अनुरक्षण करता है, जनता के सामान्य हित के अनुकूल है। हमारी संविधान के अनुच्छेद 43 में समाहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि 1928 में जिनेवा में एक न्यूनतम मजदूरी फिक्सिंग सम्मेलन आयोजित किया गया था और इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों को अंतरराष्ट्रीय श्रम संहिता में शामिल किया गया था। कहा जाता है कि इन प्रस्तावों को प्रभावी बनाने के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम परित किया गया था। साउथ इंडिया एस्टेट लेबर रेजोल्यूशंस आर्गेनाइजेशनबनाम स्टेट आफ मद्रास(एआईआर 1955 एमएडी45,पृष्ठ47) के अनुसार:
यदि श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी के आनंद से सुरक्षित किया जाना है और वे अपने नियोक्ता के शोषण से सुरक्षित किए जाने हैं, तो यह पूरी तरह जरूरी है कि उनके अनुबंध की आजादी पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए और इन पावंदियों को किसी भी मायने में अनुचित नहीं ठहरया जा सकता। दूसरी ओर, नियोक्ताओं को शिकायत करते नहीं सुना जा सकता, अगर वे अपने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने को मजबूर करते हैं, भले ही मजदूर अपनी गरीबी और असहाय होने के कारण कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं।  (जोर/Emphasis हमारा है)       

बाकी अगले भाग में पढ़ें ........

द्वारा: रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश
संपर्क: 9816103265


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