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लोग जाने कौन कौन सा रोग पाल लेते हैं. खासकर वे लोग जो पैसा तो कमा लिए हैं, पर उनके दिल की कामना पूरी नहीं हुई. किसी की इच्छा साहित्यकार बनने की होती है तो किसी की सेलिब्रिटी. ऐसे में ये लोग अपनी आरजू के लिए भरपूर पैसा बहाकर खुद से ही खुद को साहित्यकार / सेलिब्रिटी घोषित कर लेते हैं.

उमेश कुमार नामक एक न्यूज चैनल संचालक एक जमाने में इंडिया टुडे में अपनी दो पन्ने की फीचर परिशिष्ट (यानि विज्ञापन) छपवाकर खुद को सेलिब्रिटी घोषित करता फिरता था तो इन दिनों लखनऊ के मुकेश सिंह नामक सज्जन हिंदुस्तान अखबार में खुद ही अपने हाथों अपनी प्रशंसा लिखकर और उसे पैसे देकर विज्ञापन के रूप में छपवाकर अपने को साहित्यकार घोषित कर चुका है.

लोग पूछने लगे हैं कि ये अचानक से मुकेश सिंह नामक नया साहित्यसेवी कहां से पैदा हो गया. दरअसल हिंदुस्तान लखनऊ में 24 जुलाई को अंदर पूरा का पूरा एक पेज (पेज नंबर 7) मुकेश सिंह के नाम समर्पित है. इस पेज के बारे में हिंदुस्तान अखबार के फ्रंट पेज पर सूचना दी गई है कि अंदर मुकेश सिंह पर एक विज्ञापन परिशिष्ट है.

जो लोग पहले पन्ने पर सूचना न पढ़े होंगे वे मुकेश सिंह नामक नए साहित्यकार का प्राकट्य उत्सव मनाने में लग गए होंगे. लोग इस तरह के विज्ञापन को पेड न्यूज की श्रेणी में रख रहे हैं और हिंदुस्तान अखबार की विज्ञापन पालिसी पर सवाल उठा रहे हैं. साथ ही सवाल उठ रहे हैं हिंदुस्तान के संपादकों पर जिन्होंने ऐसे पेड कंटेंट जाने दिया. 

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  • Guest - Prabhat

    Sir ji wo to sahitya premi aur samajsevi dono hai but news wale bina paise lekar koi bhi news nahi chhapte.hamara bhi ek startup hai jiske bare me hum chahte hai ki newspaper me news aaye but bina paise ke nahi chhapegi isme aap koi help kar sakte hai

  • Guest - Prabhat

    Sir ji jiske bare me aap kah rahe hai vah byakti sahityapremi aur samajsevi hai but newspaper wale bina paise liye koi news nahi chhapte .yah satya hai hamara ek startup hai uski story chhapwani but no one interested. Kya bhadas koi madad kar sakta hai

    from Lucknow, Uttar Pradesh, India
  • Guest - vivek

    आपकी इस खबर के ये महानुभाव रायबरेली से है बॉस। और लगभग हर तीसरे साल 40-45 लाख खर्च कर के मेला लगवाते है जिसमे बॉलीवुड की हस्तिया आती है।

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