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'इंसाफ इंडिया' एक समाजिक न्याय पर काम करने वाला संगठन है. लेकिन दैनिक हिन्दस्तान अखबार ने इसे सिमी की तर्ज पर उभरता हुआ संगठन बता कर लंबा चौड़ा आर्टकिल छाप दिया. इस संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि हिंदुस्तान अखबार ने खबर में संगठन पर कई गंभीर, मंगढ़त और बेबुनियाद आरोप लगाए हैं. इसके चलते अखबार प्रबंधन को लीगल नोटिस भेजा गया है.

संगठन से जुड़े मुस्तकीम सिद्दीकी बताते हैं-

''इंसाफ इन्डिया अधिकारिक रूप से 14/10/2016 को बनी. कम समय में ही स्वार्थरहित एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने इसे दरवाजे-दरवाजे तक न्याय, अधिकार, मानवता एवं समानता के लिए काम करने वाले संगठन के रूप में स्थापित किया. झारखंड राज्य के कई ज़िलों में आज इंसाफ इन्डिया को एक बड़ा बदलाव लाने वाले संगठन / मुहिम के तौर पर देखा जा रहा है. इंसाफ इन्डिया ने कई मुद्दे उठाए. धर्म, जाति एवं समुदाय से ऊपर उठकर आवाजें बुलंद की. यह मुहिम हर उस परिवार, समुदाय, जाति एवं धर्म के लोगों के साथ है जो किसी भी तरह के अत्याचार, अन्याय एवं जुल्म के शिकार हो रहे हैं. इंसाफ इन्डिया किसी भी धार्मिक या राजनीतिक संगठन द्वारा समर्थित या प्रायोजित मुहिम नहीं है. यह देश के हर आम नागरिक का, आम नागरिक द्वारा, आम नागरिक के लिये एक मुहिम है. इंसाफ इंडिया ने पिछले कुछ दिनों में बिहार, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल में दलितों-अल्पसंख्यकों व महिलाओं के हिंसा-उत्पीड़न व बलात्कार की घटनाओं को अहिंसक-लोकतांत्रिक तरीके से उठाने का काम किया है. सांकृतिक राजधानी देवघर की 5 साल की नन्ही कुमारी का अपहरण, बलात्कार एवं हत्या का मामला हो या अमेठी की 17 साल की सरिता मौर्या का अपहरण, ब्लातकार एवं हत्या, चाहे गिरीडिह के 20 साल के राजकुमार हेंबरम की पुलिस लापरवाही से मौत या कोडरमा के 52 साल के प्रदीप चौधरी की पुलिस द्वारा हत्या, इंसाफ इंडिया ने मुखर होकर इन सभी मामलों में आवाज उठाई है. बिहार के नवादा में रामनवमी के वक्त बीजेपी सांसद-केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के इशारे पर भगवा गुंडों व पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से की गई साम्प्रदायिक हिंसा और बिहार-झारखण्ड के दर्जनों जगहों पर हुई इस किस्म की घटनाओं के खिलाफ इंसाफ इंडिया के संयोजक मुखर रहे हैं. हाल के दिनों में जारी मॉब लिचिंग व साम्प्रदायिक आधार पर नफरत फैलाये जाने के खिलाफ भी इंसाफ इंडिया सक्रिय रहा है. यही सब सक्रियता ही इस संगठन का गुनाह बन गया है. गौ-आतंकियों और साम्प्रदायिक नफरत-हिंसा के सौदागरों को खुली छूट देने वाली सत्ता और इसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से इंसाफ की आवाज बुलन्द करने वालों को आतंकी बताया जाना इस देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य है.''

इंसाफ इंडिया के पदाधिकारी मुस्तकीम सिद्दीकी हिंदुस्तान अखबार के झारखंड के संपादकों / रिपोर्टरों से पूछते हैं कि आखिर वे किस आधार पर सिमी के समानांतर इंसाफ इंडिया को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. कोई एक गतिविधि बताएं जिससे इंडिया इंडिया के क्रियाकलाप को संदिग्ध गतिविधी के रूप में दर्ज किया जा सके. इस संगठन ने कौन-सा सरकार विरोधी किया कार्य किया है? सांप्रदायिक तौर पर भड़काने का कोई एक उदाहरण दें हिंदुस्तान अखबार के संपादक और रिपोर्टर. इंसाफ इंडिया ने मुस्लिम एकता मंच का साथ कब और कैसे दिया, कोई एक सबूत पेश करें. 24 परगना का दौरा क्या कोई समाजिक संगठन नहीं कर सकता, यहां दौरा करने पर प्रतिबंध का उल्लेख कहां लिखा है? 17 जुलाई को बिहार के नालंदा में इंसाफ इंडिया की कोई सभी नहीं थी. पुलिस के साथ कभी भी या कहीं भी संगठन के लोग नही भिड़े हैं. अगर भिड़े होते तो संगठन के लोगों पर एफआईआर दर्ज होती. इन सारे सवालों का जवाब हिंदुस्तान अखबार को देना चाहिए अन्यथा उन्हें पहले पन्ने पर उतना ही बड़ा माफीनामा छाप कर माफी मांगनी चाहिए जितना बड़ा उन्होंने इंसाफ इंडिया को बदनाम करने के लिए प्रकाशित किया है.

आखिर में मुस्तकीम कहते हैं-

''मेरा सवाल हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर जी से है कि आपके अखबार ने जो नाइंसाफी 'इंसाफ इंडिया' संगठन के साथ की है, क्या आप उसकी भरपाई कर सकेंगे? क्या दोषी संपादकों और रिपोर्टरों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे? क्या माफीनामा छाप कर इंसाफ इंडिया के दिल पर लगे घाव-दाग को धोने-खत्म करने की कोशिश करेंगे?''

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