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महिला पत्रकार के सवाल पर मंत्री जी लगे बगले झांकने

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर झारखंड सरकार के श्रम मंत्री राज पालिवार को रांची में उन्हीं की पत्रकार वार्ता में पत्रकारों ने घेर लिया और लगे दनादन जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सवाल दागने। इस अप्रत्याशित सवाल से थोड़ी देर के लिये मंत्री महोदय भी घबड़ा गये। बताते हैं कि झारखंड के श्रम मंत्री राज पालिवार ने अपने विभाग और अपने किये गये कार्य का बखान करने के लिये रांची के सूचना भवन में एक प्रेस कांफ्रेस रखी।

मंत्री जी की इस प्रेस कांफ्रेस के लिये रांची के सभी पत्रकारों को बुलाया गया था। अपने लाव-लश्कर के साथ सूचना भवन पहुंचे मंत्री महोदय ने पहले तो अपने विभाग का गुणगान किया फिर पत्रकारों से कहा कि अब आप पूछ सकते हैं जो भी सवाल पूछना है। पत्रकारों की तरफ से पहला सवाल दागा गया कि आपकी सरकार और आपका विभाग पत्रकारों के अधिकार और वेतन से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्या कर रहा है और माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन अब तक क्यों नहीं करा पाया।

इस अप्रत्याशित सवाल से मंत्री महोदय बगले झांकने लगे। लगे हाथ एक और सवाल दाग दिया गया- झारखंड में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े १०३ मामले लंबित हैं, मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों को काम से निकाल दिया जा रहा है, आपकी सरकार अब तक मौन क्यों है? मंत्री जी ने पत्रकारों को बेसिर-पैर का उत्तर दिया और कहा कि बिना मांगे तो मां भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती। आप लोग क्लेम लगाईये। मजीठिया वेज बोर्ड की शिफारिश लागू कराना सरकार की प्रतिबद्धता है।

मंत्री जी के इस सवाल पर एक महिला पत्रकार ने पूछ लिया कि मंत्री जी आप बताईये क्या अगर बच्चा रोये नहीं तो मां का कर्तव्य नहीं है कि उसे समय पर दूध पिला दे और उसका ठीक से पालन पोषण करे? अब मंत्री जी को काटो तो खून नहीं। बेचारे पानी पानी हो गये। उन्होंने पत्रकारों को कहा कि आप लोग पांच लोगों की टीम बनाकर हमारे कार्यालय में आइये। इस मुद्दे पर हम गंभीरता से बात करेंगे और जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड जरुर लागू होगा।

इस दौरान सन्मार्ग अखबार के पत्रकार नवल किशोर सिंह के मामले को भी उठाया गया जिनको जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन मांगने पर कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया। श्रम मंत्री राज पालिवार ने कहा कि जो अखबार भी लापरवाही करेंगे और कर्मचारियों का शोषण करेंगे उनको नोटिस भेजी जायेगी। सन्मार्ग अखबार मामले को उन्होंने गंभीरता से लिया और कहा कि ऐसे अखबारों पर सरकार शिकंजा कसेगी। इस दौरान कामगार सचिव अमिताभ कौशल और झारखंड के कामगार आयुक्त और संबंधित अधिकारी भी मौजूद थे। फिलहाल माना जारहा है कि झारखंड सरकार भी जल्द भी माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश को अमल में लाने के लिये ठोस कदम उठायेगी।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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  • Guest - Raj Alok Sinha

    झारखंड के ज्यादातर अखबार (इनमें दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान जैसे राष्ट्रीय समाचारपत्र शामिल नहीं हैं) नियुक्ति के समय पत्रकारों को नियुक्ति पत्र नहीं देते. साथ ही समय पर वेतन भी नहीं देते. पीएफ आदि की तो बात ही करना बेमानी है. जब इस शोषण के खिलाफ कोई पत्रकार श्रम विभाग में शिकायत करने की हिम्मत करता है तो अखबार का प्रबंधन उसे अपना कर्मचारी मानने से इंकार कर उसे उसके हक से महरूम कर बकाया वेतन तक देना नहीं चाहता है. यह एक बड़ा विरोधाभास है. इस प्रक्रिया में शिकायतकर्ता पत्रकार के काफी समय व पैसे की बर्बादी होती है. एक तो वह नौकरी जाने व बकाया न मिल पाने के दुख को झेल रहा होता है, वहीं प्रबंधन अपने वकील के माध्यम से मामले को टालमटोल कर इस स्थिति को इंज्वाय करता है. दूसरी तरफ इस मामले में राज्य सरकार का श्रम विभाग लगभग असहाय विंग की भूमिका में होता है. ऐसो में राज्य सरकार को चाहिए कि वह हरेक मीडिया हाउस के कागजात की जांच कर इस बात की तह तक तहकीकात करे, तब एक बड़ा घोटाला सामने आयेगा. आने वाले वक्त में यह देखना लाजिमी होगा कि झारखंड सरकार के श्रम मंत्री इन मामलों में क्या कदम उठाते हैं?

    from Ranchi, Jharkhand, India

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