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जनता के बीच से जो गीत-संगीत निकल कर आता है, उसका आनंद ही कुछ और होता है. अवधी हो या भोजपुरी. इन देसज बोलियों की लोक रंग से डूबी रचनाओं में जो मस्ती-मजा है, वह अन्यत्र नहीं मिलता. नीचे तीन वीडियोज हैं. सबसे आखिर में जाने माने कवि स्व. कैलाश गौतम की रचना है, उन्हीं की जुबानी- 'अमउवसा का मेला'. जो लोग इलाहाबाद में कुंभ-महाकुंभ के मेलों में जाते रहे हैं, उन्हें इस कविता में खूब आनंद आएगा.

शुरुआती वीडियो में जो लोक गीत है, उसे एक कस्बे की एक चाय की दुकान पर सुना रहा है एक नौजवान. क्या अंदाज है सुनाने का.. इसके आगे तो बड़े बड़े मंचीय कवि फेल दिख रहे हैं... इस गीत के बोल हैं- ''मेघवा कूदे कोनवा कोनवा, घर सिवनवा होई गई ना...''. बीच वाले वीडियो में एक अवधी है. अहा... इस अवधी को इतने इत्मीनान और प्यार से इस बंधु ने गाया है कि सुनकर दिल बाग बाग हो गया.. अवधी में गाई जा रही इस गारी और नकटा का आनंद लीजिए...

देखें वीडियोज...

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