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जुटाना होगा जनाधार : हम देख ही रहे हैं कि मजीठिया के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट, लेबर कमिश्नर ऑफिस, लेबर कोर्ट और सरकार का रवैया क्या है। कितने अफ़सोस की बात है कि जिन लोगों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर रिकवरी चालान इश्यू कराने तक की जीत हासिल की,उनमें से भी अधिकतर लोगों के खाते में पैसा नहीं पहुंचा है। बीयूजे सहित देश की कई संस्थाएं- संगठन हर स्तर पर संघर्षरत हैं ही, पर हमें मीडिया हाउसेस के खिलाफ़ अपनी जंग जीतने के लिए एक नई रणनीति भी अपनानी होगी। इस रणनीति के जनक यशवंत सिंह हैं, जिन्होंने ‘भड़ास 4 मीडिया’ लांच कर पत्रकारों को पूरे पत्रकारिता-जगत से जोड़ा।

मजीठिया-क्रांति में पत्रकारों को शामिल करने के मामले में इस वेबसाइट का योगदान अवर्णनीय है। लेकिन हमें इस क्रांति में आम जनता को भी शामिल करना चाहिए। इतिहास गवाह है कि अब तक सारी क्रांतियां जनाधार के बल पर ही सफल हुई हैं। ‘तीन तलाक ’ का मुद्दा और उस पर आया ऐतिहासिक फ़ैसला इसका नवीनतम उदाहरण है। अब ज़रूरत है कि हम महसाणा आयोग, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट , मजीठिया वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों और उस पर न्यायपालिका व कार्यपालिका का रवैया तथा मीडिया हाउसेस की मनमानी को इतना प्रचारित करें कि यह गली- नुक्कड़ और चाय- पान की दुकानों तक पर चर्चा व बहस का मुद्दा बन जाए।

ज़ाहिर है कि इसमें अखबार और टीवी हमारा साथ नहीं देगा। लेकिन सोशल मीडिया आज इतना सशक्त माध्यम बन चुका है, जिसके सामने अख़बार और टीवी भी कमज़ोर है। देखिए न, अख़बार और टीवी मोदी- कीर्तन किए जा रहे हैं, इसके बावजूद सोशल मीडिया ने मोदी-सरकार के ख़िलाफ एक तबका तैयार कर दिया है। हम इस सबसे ज़्यादा ताक़तवर माध्यम का उपयोग मजीठिया पर जनाधार जुटाने के लिए बख़ूबी कर सकते हैं। बीयूजे की आम सभा में मेरे इस विचार का सभी ने खुले दिल से स्वागत किया था और इंदर जैन, जे.सी पांडे सहित कार्यकारिणी के सदस्यों ने इसकी रूपरेखा तैयार करने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी। वह ड्राफ्ट प्रस्तुत है, जिसमें करेक्शन और एडीशन की ज़िम्मेदारी हम सभी की है-

1. हम सभी प्रिंट मीडियाकर्मी फ़ेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, टंबलर, वीचैट आदि ज्यादा से ज्यादा सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़ें और उन पर अपनी सक्रियता बढ़ाएं। अपने ‘ कॉन्टैक्ट्स/ फ़्रेड्स’ को ‘भड़ास 4 मीडिया’ पढ़वाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करें। 

2. हर बेवसाइट की अपनी अलग तरह की रीच और अप्रोच है। उसके स्वरूप को समझें, उसी के अनुसार सामग्री पोस्ट करें। जैसे कि आप फेसबुक पर पूरा आर्टिकल और ढेर सारे फ़ोटो पोस्ट कर सकते हैं, मगर इंस्टाग्राम मुख्य रूप से तस्वीरें पोस्ट करने के लिए है।

3. सबसे अहम् बात कि हमारी पोस्ट कैसी हो। अगर हम सीधे-सीधे मजीठिया का ज़िक्र करेंगे तो आम जनता क्या, हमारे – आपके घरवाले भी नहीं पढ़ना चाहेंगे। ज़रूरी होगा कि पोस्ट में निजी जीवन की घटनाओं- अनुभवों या सार्वजनिक चर्चाओं से मजीठिया को इंडायरेकटली जोड़ें, ताकि वह रूखी ख़बर की जगह इमोशनल , इंटरेस्टिंग, रीडेबल आइटम बन पड़े और लोग पढ़ने- ध्यान देने पर मज़बूर हो जाएं। संबंधित फ़ोटो सोने पर सुहागा का काम करेंगे । मैंने जल्दबाजी में इस तरह का पहला प्रयास अपने फ़ेसबुक अकाउंट Anil Rahi पर एक अलग पेज Anil Rahi : To The Point क्रिएट करके किया है। अगर ठीक लगे तो आप भी ऐसा कुछ करें, वर्ना सुझाव दें।

4. अपने अकाउंट में कांटैक्ट्स,फ्रेंड्स, फॉलोअर्स की संख्या बढ़ाएं। इसके लिए फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने के साथ – साथ खुद भी रिक्वेस्ट भेजने में संकोच न करें। जब बड़े- बड़े स्टार हमें रिक्वेस्ट भेज सकते हैं, फॉलो कर सकते हैं तो हमें कैसा संकोच !

5. फैमिली ग्रुप, फ्रेंड्स ग्रुप के अलावा भी तरह- तरह के ग्रुप से जुड़कर उनमें मजीठिया की चर्चा अप्रत्यक्ष रूप से करें।

6. प्रॉपर्टी, बिजनेस, फिटनेस, डेटिंग, रिलीजन आदि हर किस्म की कम्यूनिटी से भी जुड़ें और घुमा- फिराकर मजीठिया की बात करें।

7. पत्रकारों- गैरपत्रकारों की महसाणा- मजीठिया वाली पोस्ट पर लाइक, कमेंट, री-ट्वीट करने में कंजूसी न करें।

8. कानून की सीमा में रहते हुए मीडिया हाउसेस, लेबर कमिश्नर ऑफिस के अधिकारियों, कोर्ट्स के जजों- वकीलों के सहयोग , असहयोग, लापरवाही, पक्षपात आदि की चर्चा उनके नाम के उल्लेख के साथ करें।

9. जो लोग अखबारों में कार्यरत हैं, वे बगावती पोस्टिंग करके नौकरी न खोएं, जितने महीनों की सैलरी विदड्रॉ कर सकते हैं, करें। लेकिन मजीठिया संबंधी पोस्ट को लाइक, शेयर, री-ट्वीट वगैरह करने का साहस और सक्रियता ज़रूर रखें। ध्यान रहे कि आप डर कर मैनेजमेंट के तलवे भी चाटेंगे, तब भी आपकी नौकरी सुरक्षित नहीं है।  

10. हम में से कुछ लोग टीवी, रेडियो, स्कूल- कॉलेज के कार्यक्रमों आदि में आमंत्रित किए जाते हैं। वहां भी घुमा-फिरा कर मजीठिया और महसाणा का ज़िक्र करें। कुछ उसी तरह, जैसे कि नेताजी पुल का उद्घाटन करने आते हैं, मगर पुल से ज़्यादा अपनी और अपनी राजनीतिक पार्टी की उप्लब्धियां गिना जाते हैं। ख़ासकर मास मीडिया के स्टूडेंट्स से जुड़ने- जोड़ने का प्रयास करें।

11. पत्रकारों की छोटी- बड़ी ऐसी दर्जनों- सैकड़ों संस्थाएं हैं, जिनके ज़्यादातर सदस्य वर्किंग जर्नलिस्ट तो नहीं हैं, लेकिन जर्नलिस्ट वाला माइंडसेट रखते हैं। हम उन संस्थाओं को जोड़कर बीयूजे जैसे संगठन को और मज़बूत करें या फिर उनकी बेवसाइट्स, कम्युनिटीज़, ग्रुप्स से जुड़कर मजीठिया पर उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करें।

12. वर्तमान सरकार को सपोर्ट करने वाली राजनीतिक पार्टियों से तो अपना दुखड़ा रोएं ही, विपक्ष की पार्टियों, प्रभावी लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करें। इसके लिए लैपटॉप को किनारे रखकर खुद भी आना- जाना पड़ सकता है।

13. आजकल हर मशहूर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरद्वारों की अपनी बेवसाइट, पोर्टल, कम्युनिटी है। हमें उनके प्रमुख पुजारी, मुल्ला- मौलवी, पोप, गुरु साहब आदि से जुड़कर उनका समर्थन और सहयोग हासिल करना चाहिए। श्रद्धालु इनके प्रवचन को ऊपरवाले के फ़रमान की तरह ग्रहण करते हैं और हमारा 90 फ़ीसदी देश आस्तिक व श्रद्धालु है। इसके लिए नेटवर्किंग के अलावा पर्सनल विज़िट की भी ज़रूरत होगी। शुरुआत यूं भी हो सकती है कि हम लोग आते- जाते किसी मंदिर, मस्जिद गुरद्वारे में जाएं और पुजारी, पोप, मौलवी को इस हद तक कनविंस करें कि वे वहां पहुंचने वाले लोगों को मजीठिया के मुद्दे से परिचित कराएं, उन्हें हमारे पक्ष में खड़ा करें। इनकी बातों का असर बड़े- बड़े नेताओं और फिल्म स्टारों के आव्हान से भी ज्यादा होगा।

14. सक्रिय राजनीति से अलग और सरकारों के प्रभाव से  मुक्त अण्णा हज़ारे, बाबा रामदेव, श्री श्री रवि शंकर  जैसी हस्तियों को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया जाए। इसके लिए नेटवर्किंग के साथ फ़ोन कॉल और मेल- मुलाक़ात की भी ज़रूरत पड़ सकती है।

जनाधार जुटाने के ऐसे कई अन्य तरीके भी खोजे जा सकते हैं। मगर एक बात तय है। अगर हम सब पूरे हफ्ते में 22-24 घंटे भी मजीठिया के मुद्दे पर सोशल नेटवर्किंग को दें तो इस क्रांति की हवा के मंद झोखे देखते ही देखते आंधी- तूफ़ान बनकर देश को अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे और ढीठ- बेगैरत मीडिया हाउसेस को वेतन व सुविधा संबंधी सारी सिफारिशें लागू करने के लिए मज़बूर होना पड़ेगा।

अनिल राही

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  • Guest - KRITI NATH JHA

    Has 'Majithia Wage Board' turned out to be another variant of 'Doklam' for newspaper owners and managements, behaving like China with their nefarious designs and ulterior motives. Precisely, the Union government is now ensuring the award to be implemented in full and no leeway, may also gradually tighten the noose around the 'delinquent and defiant' media houses.

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