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Abhishek Srivastava : एमके वेणु जब इकनॉमिक टाइम्‍स में थे तब रोहिणी सिंह को वहां लेकर गए थे। राडिया टेप आने के बाद वेणु तो निकल लिए, उधर रोहिणी ने यूपी चुनाव में भयंकर पक्षपातपूर्ण कवरेज कर के कम से कम राजनीतिक रिपोर्टिंग के मामले में इकनॉमिक टाइम्‍स की विश्‍वसनीयता को ऐसा बदनाम किया कि न केवल उन्‍हें अगस्‍त 2016 के बाद की अपनी सारे ट्वीट डिलीट करने पड़े बल्कि इकनॉमिक टाइम्‍स के कॉन्‍क्‍लेव में न्‍योते के बावजूद केंद्र सरकार के किसी भी बड़े नेता ने आने से इनकार कर दिया।

मेरे पास स्‍क्रीन शॉट नहीं है ज्‍यादा। रोहिणी को यूपी चुनाव कवर करने वाला तकरीबन हर पत्रकार फॉलो कर रहा था। मैंने खुद उसके चार दर्जन ट्वीट रीट्वीट किए होंगे। उसने खुलकर एकतरफ़ा रिपोर्टिंग की थी। रोहिणी के ट्वीट बहुत स्‍पष्‍ट रूप से सपा के पक्ष में थे। चुनाव से लकर छह महीने पीछे तक की रिपोर्ट भी देखेंगे तो सपा केंद्रित रिपोर्टें ही हैं। रोहिणी सिंह की यूपी चुनाव पर ईटी की रिपोर्ट गुगल करें। सब क्‍लीयर हो जाएगा।

बाद में रोहिणी की नौकरी जाने की वजह भी यही बना। इस मामले में कहीं कोई प्रोपगंडा नहीं है। दिल्‍ली के अधिकतर पत्रकार इस अध्‍याय से वाकिफ़ हैं। इसके बाद ही पीयूष गोयल के मुताबिक अर्थव्‍यवस्‍था के लिए इकनॉमिक टाइम्‍स से एक अच्‍छा संकेत निकला। रोहिणी बाहर हो गईं। तब गॉडफादर वेणु ने उन्‍हें दोबारा 'नॉर्मल' पत्रकारिता करने के लिए वायर में भर्ती किया। अगर 100 करोड़ की मानहानि को न्‍योता देने वाली रिपोर्ट 'नॉर्मल' पत्रकारिता है, तो मुझे मानने में कोई शक़ नहीं कि हम सब ऐबनॉर्मल हैं।

द वायर की स्‍टोरी की मेरिट अपनी जगह है। मुझे वित्‍तीय दस्‍तवेज़ों की व्‍याख्‍या करनी नहीं आती, इसलिए कुछ नहीं कहूंगा लेकिन रिपोर्टर के अतीत में काम को लेकर यहां एक टिप्‍पणी की है। यह एक अलग बात है। मैंने रोहिणी की ताजा रिपोर्ट को कठघरे में नहीं रखा है। मेरा कमेंट एमके वेणु की ''नॉर्मल जर्नलिज्‍म'' वाली टिप्‍पणी पर तंज है।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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