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Om Thanvi : अख़बारों का हाल देखिए... ''छोटे शाह 100 करोड़ का मुक़दमा दायर कर देंगे'' यह है सुर्खी। भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, धमकी आगे! कल्पना कीजिए यही आरोप केजरीवाल, चिदम्बरम, वीरभद्र सिंह या किसी अन्य दुश्मन पार्टी के साहबजादे पर लगा होता?  तब मुक़दमे की धमकी की बात ख़बर की पूँछ में दुबकी होती। टीवी चैनल सिर्फ़ एक वर्ष में 16000 गुणा बढ़ोतरी को शून्य के अंक जगमगाते हुए दुहराते। दिनभर रिपोर्टर आरोपी का पीछा करते, घर-दफ़्तर पर ओबी वैन तैनात रहतीं, शाम को सरकार, संघ, वीएचपी के आदि के साथ बैठकर सरकार समर्थक पत्रकार या बुद्धिजीवी नैतिक पतन की धज्जियाँ उड़ा रहे होते।

सुना है प्रधानमंत्री से कांग्रेस और आप पार्टी की जाँच की माँग को उचित तवज्जो सिर्फ़ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ने दी। इतने चैनल, इतने पत्रकार - सब चुप? सबको तो अंबानियों-अडानियों ने नहीं ख़रीदा होगा! हमारे मीडिया को क्या हो गया है? क्या कहें कि लकवा मार गया है या ज़मीर मर चुका है? इमरजेंसी में भी अख़बार वाले इतने कायर नहीं थे, गो कि उस वक़्त तो क़ानून लागू कर उनके हाथ और मुँह बाँध दिए गए थे।

अमित शाह के बेटे ने सही तरीक़े से धन कमाया या ग़लत तरीक़े से, इसकी जाँच की ज़रूरत ख़ुद अमित शाह को ही नहीं, समूची भाजपा को महसूस करनी चाहिए। आख़िर पार्टी के अध्यक्ष की नैतिक शक्ति (जैसी भी हो) के टिके रहने का सवाल है। इस मामले में कांग्रेस की आड़ लेना हास्यास्पद है। आप "माँ-बेटे-दामाद" की सरकार कब से हो गए? आप तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, नारी पर वार आदि से अलग सरकार देने का भरोसा देकर सत्ता में आए थे न?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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