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Shishir Soni : बहुरूपिये समाज के तेजी से स्खलित होने का परिणाम है जैन मुनि का कुकृत्य और उनकी गिरफ्तारी. इन्हे जूते की माला पहना कर सार्वजनिक अभिनन्दन करना चाहिए. आये दिन ये खबरें आती हैं की फलां करोड़पति सांसारिक वैभव को छोड़ जैन मुनि बन गया. लेकिन उन तपस्वी मुनियों के बीच से ऐसी बजबजाती दुर्गन्ध आये तो समाज का स्वरुप क्या होगा? मन सिहरता है ये सोच कर.

अपने एक जैन मित्र के साथ कई जैन मुनियों से मिला. यकीन मानिये किसी से प्रभावित नहीं हुआ. बातों में कोई गहराई नहीं. वाणी में माधुर्यता का रसखान नहीं. बेहद सतही प्रवचन. कई तो स्वनामधन्य महा-मूर्ख भी मिले. हो सकता है ऐसे मुनि हों जिन्हें सुनने का अवसर नहीं मिला हो और वो अच्छा ज्ञान रखते हों. अच्छा कनेक्ट करने की विधा में पारंगत हों. लेकिन ज़्यदातर मुनियों की एक ही लालसा होती है कि हमारे चातुर्मास या अन्य धार्मिक समागम में बड़े-बड़े राजनेता आएं.

क्यों भाई! ये नेताओं की लालसा क्यों? क्यूंकि मुनियों में आपसी प्रतिद्वंता जबरदस्त है. खुद को दूसरे मुनियों से श्रेष्ठ दिखाने के लिए वीवीआईपी आमद कैसे बैढे इसकी खुशामद में वे कुछ जैन धन्ना सेठों का बगलबच्चा बने रहते हैं. उसके ऐवज में, धर्म की आड़ में वो धन्ना सेठ अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है. ऐसा कमोबेश हर धर्म में प्रचलित रहा है. सादगी की प्रतिमूर्ती माने जाने वाले जैन धर्म गुरुओं और जैन धर्मावलम्बियों में ऐसी गंदगी तेजी से घर कर रही है. जो सर्वथा शर्मनाक है. वृहत समाज के लिए घातक भी.

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सोनी की एफबी वॉल से.

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