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आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार 'जंग' है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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  • Guest - umesh shukla

    sabko milkar aawaz uthana hoga, koi sarkaar bhala kaise choton ka dam ghont sakati hai.//

    from Jhansi, Uttar Pradesh, India
  • Guest - Sudarshil

    भैया, जब एक हजार कॉपी के 80 हजार बताओगे तो कभी न कभी तो ऐसा होना ही था। बेईमानी उतनी करो जितना आटे में नमक। फिर सब चल जाता है। अपने शहर में देखता हूं जिनकी प्रतियां 500 से अधिक नहीं उन्होंने 70 से 90 हजार तक बता रखीं थी। जब सरकार कठोर हुई तो पहले ही झटके में ऐसे अखबार बंद ही हो गये। अब फाइल कॉपी निकाल रहे हैं कि कभी सरकार बदल और वे फिर से पुराना धंधा शुरू कर दें। पुरानेे अखबारों ने प्रतियां घटाकर दर्शाना शुरू कर दिया तो विज्ञापन शुरू हा गय। लेकिन अब तक चोरी की उसका क्या होगा। वसूली हो रही है तो मिर्ची तो लगेगी ही। भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो हर तरह के भ्रष्टाचार का विरोध होना चाहिए। अखबारों मालिकों को इससे क्यां छूट मिलनी चाहिए।

    from Rajasthan, India

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