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नवगठित प्रेस मान्यता समिति की सूरत भाजपा विधायक दल जैसी है। विधानसभा चुनाव में भाजपा किसी एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दे पायी थी। लेकिन जब सरकार बनी तो उसे इस बात का एहसास हुआ। पार्टी के राज्य प्रवक्ता मोहसिन रज़ा को मंत्रिमंडल में शामिल करके भाजपा ने इस चूक की भरपाई की। इसके बाद श्री रज़ा को विधान परिषद भेजा गया। और इस तरह सरकार ने विधानसभा में अपने एजेंडे- ''सब का साथ-साथ विकास'', की लाज रख ली।  लेकिन यूपी के पत्रकार संगठनों को इतनी भी तौफीक नहीं हुई कि वो सूचना विभाग की प्रेस मान्यता कमेटी के लिए अल्पसंख्यक वर्ग या उर्दू मीडिया का एक ही नुमाइंदा भेज देते।

काफी लम्बे अर्से बाद यूपी सरकार ने प्रेस मान्यता कमेटी में पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया है। अल्पसंख्यक वर्ग और उर्दू मीडिया को छोड़कर कमेटी गठन काफी संतुलित है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, पत्र-पत्रिका, न्यूज एजेंसी, युवा प्रतिनिधित्व, वरिष्ठों की भागीदारी, मेल-फीमेल और प्रत्येक जाति और वर्ग की बराबर की भागीदारी है।  लगभग आठ सौ पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता है।जिसमें करीब सौ अल्पसंख्यक वर्ग के पत्रकार है। इनमे तकरीबन 80 उर्दू मीडिया से है। जबकि उर्दू मीडिया में तकरीबन सौ लोगों की मान्यता है, जिसमें अल्पसंख्यक पत्रकारों के अलावा 20-25 बहुसंख्यक वर्ग के पत्रकार है।

कुल मिलाकर राज्य मुख्यालय के पत्रकारों में उर्दू मीडिया और अल्पसंख्यक वर्ग के पत्रकारों का करीब 15% तक प्रतिनिधित्व है। इसी तरह पत्रकारों के संगठनों में भी15% से अधिक तक की तादाद है।  राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकारों की इलेक्टेड बाडी- उ. प्र.मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के दोनों गुटों मे ही नौ पदाधिकारी/सदस्य अल्पसंख्यक वर्ग से हैं। करीब 25 से 35 वर्षों से लखनऊ की पत्रकारिता में सक्रिय हिसाम सिद्दीकी, उबैद नासिर, हसीब सिद्दीकी, मोहम्मद शाहिद, हुसैन अफसर, तारिक खान, कमाल ख़ान, मसूद, कुलसुम, नायला, कलाम,अफरोज़, परवेज.. जैसे एक दर्जन से ज्यादा मान्यता प्राप्त और प्रतिष्ठित सहाफी हैं जो अल्पसंख्यक वर्ग/उर्दू मीडिया से हैं। इन्हें किसी संगठन में नामित सदस्य बनाकर प्रेस मान्यता कमेटी भेजा जा सकता था।

हिसाम सिद्दीकी, हुसैन अफसर और हसीब सिद्दीकी जैसे पत्रकार संगठनों से भी जुड़े रहे हैं। हसीब सिद्दीकी तो ifwj/प्रेस क्लब के प्रतिनिधि के तौर पर एक दशक से ज्यादा समय तक उतर प्रदेश सरकार की प्रेस मान्यता समिति मे रहे हैं।  स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या आपातकाल का जिक्र हो, लखनऊ की उर्दू सहाफत ने हर दौर मे अपनी अहम भूमिका निभाई है। मरहूम इशरत अली सिद्दीकी और हयात उल्ला अंसारी से लेकर आबिद सुहैल जैसी दर्जनों हस्तियों ने लखनऊ की उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) को निष्पक्षता, निडरता, हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द, गंगा-जमनी तहज़ीब और जज़्बा-ए-वतनपरस्ती के खूबसूरत रंगों से सजाया है।

हमारे पत्रकार भाई और पत्रकार संगठन अगर ये तमाम बातें भूल भी गये थे तो कम से कम ये तो याद रखते कि पत्रकारिता की किताब का पहला पाठ " संतुलन" का महत्व तो पढ़ाता ही है, इसके बिना आप स्वस्थ पत्रकारिता की कल्पना भी नहीं कर सकते।  इसके बावजूद भी असंतुलित मानसिकता तो देखिये किसी एक पत्रकार संगठन ने भी उर्दू मीडिया या अल्पसंख्यक वर्ग के किसी एक पत्रकार का नाम प्रेस मान्यता समिति के लिये नहीं भेजा। नतीजतन प्रेस मान्यता समिति से बेदखल ये वर्ग निराश भी है और हताश भी।

नवेद शिकोह
8090180256
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  • Guest - Aazad Bharti

    यूपी प्रेस मान्यता समिति में अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व न होना सत्ता और मीडिया दोनों की नकारात्मक मानसिकता को दर्शाता है। मीडिया का सत्ता के मिजाज के मुताबिक चलना मीडिया के सन्तुलन के सिद्धांत पर सवालिया निशान लगाता है। अगर नवगठित समिति के सदस्यों में नैतिकता है तो उसे तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिये। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो इसका यही अर्थ निकलता है कि मीडिया में भी साम्प्रदायिक तत्व प्रवेश कर चुके है।

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