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बुधवार को हिंदुस्तान में अंतिम पृष्ठ पर शीर्ष प्राथमिकता के साथ प्रकाशित विज्ञापन

इसे 'कोठे की पत्रकारिता' कहें तो कत्तई अनुचित न होगा। जनरल वी.के.सिंह ने भी क्या गलत कहा। हकीकत तो उससे कहीं बहुत अधिक शर्मनाक है। आज बुधवार को दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि ज्यादातर अखबारों ने सैक्स वर्द्धक दवाएं बेचने के बड़े बड़े विज्ञापन छाप रखे हैं। हिंदुस्तान ने तो अंतिम पेज पर हैडर के नीचे ही चेंप दिया है। ये कोई एक दिन की बात नहीं, प्रायः रोजाना हमारे घरों में पहुंच रहे अखबारों के साथ मुख्यधारा का मीडिया धड़ल्ले से ये बेशर्मियां परोस रहा है। रामपाल के 'अड्‍डे' पर शक्तिवर्धक दवाएं, कंडोम बरामद होने की खबरें तो अखबार और न्यूज चैनल कूद कूद कर दिखाते पढ़ाते हैं, लेकिन अपने गिरेबां में झांकने में उन्हें तनिक शर्म नहीं आती है। अखबार जिस तरह की सैक्स वर्धक दवाओं के विज्ञापन छाप रहे हैं, उनकी तरफ ने हमारे चिकित्सा तंत्र का ध्यान है, न शासन-प्रशासन और कानून के जानकारों का। आए दिन जनहित याचिकाएं दायर करने वाले भी इस ओर से बेखबर हैं।

 

बुधवार को ही हिंदुस्तान में पृष्ठ 17 पर प्रकाशित विज्ञापन

सेक्स पावर और हाईट बढ़ाने जैसे विज्ञापनों से आए दिन अखबारों के पन्ने पटे रहते हैं। मीडिया की इन करतूतों की आड़ में जरायम गिरोह भी अपनी रोटियां सेंकते रहते हैं। याद होगा, मुंबई में दो नवंबर 2012 को एक ऐसा ही रैकेट पकड़ा गया था, जो अखबारों में ए टू जैड ब्यूटीफुल गर्ल्स नाम से विज्ञापन देकर ग्राहक जुटाता था। पूरा खेल मीडिया की जानकारी में चल रहा था। बाद में पुलिस छापे के दौरान बड़े सैक्स रैकेट का पर्दाफाश हुआ था। इसी तरह पंजाब में विज्ञापन छपवाकर सेक्स वर्धक दवाइयां सप्लाई करने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टरों की टीम होटल में पकड़ी गई थी। टीम लीडर डॉ. हरफूल सिंह ने पुलिस को बताया था कि इसके लिए तो सम्राट नामक कंपनी का अखबारों में विज्ञापन आता है।

बुधवार को दैनिक जागरण में पृष्ठ 15 पर प्रकाशित धत्कर्मी विज्ञापन

वाराणसी में सार्वजनिक स्थानों पर सेक्स पॉवर, लंबाई और ब्रेस्ट आदि बढ़ाने के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ बीएचयू के एक प्रोफेसर ने पुलिस से शिकायत की तो ड्रग एंड मेजिक रेमेडीज एक्ट के तहत  21 उत्पादों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया। इस तरह विज्ञापनों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित या प्रसारित करना ड्रग एंड मेजिक रेमेडीज (ओब्जेकश्नेबल एडवर्टाईजमेंट ) एक्ट के सेक्शन 3 ,5,7 एवं 9 (ए ) के तहत सेक्स समेत 54 अन्य बीमारियों के निश्चित इलाज का विज्ञापन देना कानून अपराध है।

भड़ास4मीडिया ने भी एक खबर प्रसारित की थी, जिसमें बताया गया था कि किस तरह बुलंदशहर में न्यूज नेशन चैनल घटिया तत्वों को पत्रकारिता के प्रमाण-पत्र बांट रहा है। चैनल का रिपोर्टर नदीम खान बुलंदशहर में सैक्स ताकत बढ़ाने की दवाएं बेचने का कारोबारी पाया गया। उसने देहव्यापार चलाने वाली वेश्या को ब्लैकमेल किया और उससे हजारों रुपये भी वसूले। (वीडियो http://goo.gl/BxutjE देखें)। पुलिस ने छापा मार कर इस सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ किया था जिसमें दर्जनभर से ज्यादा महिलाएं सेक्स के धंधे में लिप्त मिलीं और करीब 3 दर्जन ग्राहक मौका ए वारदात से गिरफ्तार हुए थे। बाला के पास से मिली डायरी में नदीम खान की काली करतूतों का चिठ्ठा दर्ज था। 

प्रश्न उठता है कि क्या ये सब शासन-प्रशासन, सरकार, नैतिकता और आदर्श का पाठ पढ़ाने वाली समाजसेवी संस्थाओं, तरह-तरह के जनधर्मी एवं महिला संगठनों, भांति भांति के बुद्धिजीवियों की नाजानकारी में हो रहा है? फिर वे सब-के-सब चुप क्यों हैं? क्या ठाणे (महाराष्ट्र) के संयुक्त आयुक्त एस टी पाटिल ने जिस तरह 'जादुई' उपचार का दावा करने वाले विज्ञापनों के प्रकाशन को लेकर 80 से अधिक अखबारों को नोटिस जारी करने के साथ ही दवा निर्माता कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था, उस तरह की कार्रवाई अन्यत्र संभव नहीं है? क्या पोर्न जर्नलिज्म के ठेकेदार ये मीडिया घराने देश, समाज, कानून और घर-परिवार की हकीकतों से सचमुच अनजान हैं या जिस्म का कारोबारी होने तक के लिए उतावले? क्या इनके खिलाफ सख्‍त एंटी पोर्नोग्राफी कानून नहीं बनना चाहिए?

देश के एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन की बात भी यहां उल्लेखनीय होगी। आफिस के लिए महिला कर्मचारी रखने के सम्बंध में प्रकाशित विज्ञापन में लिखा गया कि ऐसी लड़की चाहिए, जो कभी भी, कहीं भी साथ चलने के लिए तैयार रहे। माह में 5-6 दिन बाहर रहना अनिवार्य है। वेतन 12 हजार। इस विज्ञापन का क्या मतलब है? ये साफ साफ सेक्स ऑफर का विज्ञापन है। प्रायः सभी कथित बड़े अखबार ऐसे विज्ञापन पूरी बेशर्मी से कमोबेश रोजाना ही प्रकाशित कर हर घर के वातावरण में जहर घोल रहे हैं। सच्चाई ये भी है कि ऐसे विज्ञापनों का भरपूर पैसा मिलता है। 

सौमित्र राय लिखते हैं- 'अखबार क्राइम स्‍टोरी के बहाने पिकनिक पर गए परिवारों की आपत्तिजनक डेमो फोटो छापने का धंधा भी कर रहे हैं। बॉलीवुड, लाइफस्‍टाइल, सेलेब्‍स, जरा हटके जैसे टेम्‍पलेट्स छाप-दिखाकर मीडिया किस तरह की नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है? कोई मानक नहीं, कोई रोक-टोक नहीं, कोई नैतिकता नहीं। सिर्फ धंधा, वह चाहे जितना गंदा हो। एक पत्रकार बेलाग कहते हैं कि उनके माध्‍यम में कंटेंट का हर हिस्‍सा बिकना चाहिए। इन जनाब ने डेढ़ साल पहले एक मॉल में जाकर कॉमन ट्रायल रूम में अपना कैमरा ऑन करके कपड़ों के बीच छिपा दिया। कुछ देर बाद कैमरा खोने का बहाना करते हुए वापस उसी ट्रायल रूम में पहुंचे और एक शानदार क्‍लिपिंग के साथ लौटे। दूसरे दिन सुबह उन्‍होंने महिलाओं से ट्रायल रूम में सावधान होने की अपील करते हुए एक ‘पीस’ लिख मारा और एक ‘रियल टाइम’ फोटो डाल दी। जनाब सीना तानकर बताते हैं कि उस अकेली खबर पर 30 हजार से ज्‍यादा हिट्स आए और मेरी नौकरी जाते जाते बची। 

'एक न्‍यूज पोर्टल में काम करने वाले पत्रकार महोदय तो सुबह उठते ही गूगल पर ‘सैक्‍सी, हॉट, लिंगरी, गर्ल्‍स’ जैसे शब्‍दों के साथ खोज में जुट जाते हैं। वजह, रोजाने की उन दो ‘खबरों’ का तनाव, जो उसे देनी होती है। पोर्टल मैनेजमेंट की सख्‍त ताकीद है, ‘अगर पेज व्‍यूज नहीं बढ़े तो पगार भी नहीं बढ़ेगी और फिर नौकरी जाएगी सो अलग। इन जनाब का कहना है, अलग, कैची, रोचक, सैक्‍सी कंटेंट पर ही हिट्स मिलते हैं। न्‍यूज तो सब परोसते हैं। प्रबंधन खुश होकर उस पत्रकार की पगार बार-बार बढ़ाने लगा। ऑनलाइन न्‍यूज पोर्टल तो आक्रामक रूप से ‘न्‍यूड पोर्टल’ होते जा रहे हैं ?'

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