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आखिरकार सहाराकर्मियों का धैर्य टूट ही गया। नोएडा कैंपस के कर्मचारियों ने काम बंद कर दिया। कर्मचारियों ने कहा कि जब तक सैलरी नहीं तब तक कोई काम नहीं। कर्मचारियों को समझाने के लिए सीबी सिंह, विनोद रतूडी रणविजय सिंह जैसे दिग्गज लग गए। लेकिन कर्मचारियों ने साफ काम करने से मना कर दिया। फिर मीडिया हेड राजेश सिंह को बुलाया गया। शाम करीब साढ़े सात बजे राजेश सिंह कैंपस पहुंचे। उन्होंने दिलासा दिलाया कि सोमवार को सैलरी जरुर आएगी। आप हमारी बात समझिए, हम मजबूर हैं। कर्मचारियों ने कहा कि हम आपकी ताकत खूब जानते हैं। आप जो चाहे कर सकते हैं। अभी चाहे अभी सैलरी दे सकते हैं। इसके बाद कर्मचारियों ने उनकी बात को अनसुना करते हुए काम बंद दिया। दिलचस्प है कि पूरे आंदोलन में पूरा एडिटोरियल टीम, सर्कुलेशन और मशीन वाले सभी एकजुट है। पहले मैनेजमेंट उन्हें तोड़-फोड़ कर काम करवाता था।

 

कर्मचारियों के इस आंदोलन का विकल्प सहारा के मैनेजमेंट के पास कुछ नहीं था। लिहाजा अखबार के दो-तीन संपादकों ने मिलकर कानपुर एडिशन की पूरी कापी दिल्ली का बनाया। लेकिन वो भी सहारा के प्रिंटिंग मशीन में नहीं छप सका। मैनेजमेंट उसे अमर उजाला के प्रिंटिंग प्रेस से जाकर छपवाया। यानि आज की राष्ट्रीय सहारा की जो आपको कापी मिलेगी उसमें अधिकतर कानपुर और उसके एडिशन से जुड़ी खबरें ही मिलेंगी। अखबार के इस आंदोलन का असर टीवी पर भी पड़ा। दस जुलाई की शाम से ही सारे चैनल टेप पर चल रहे हैं। आधे से ज्यादा कर्मचारियों ने काम ही नहीं किया। शाम होते होते सभी कर्मचारियों ने हाथ खड़े कर दिए।

आपको बता दें कि पिछले करीब डेढ़ साल से सहारा मीडिया का प्रबंधन मीडियाकर्मियों को सैलरी टाइम से नहीं दे रहा है। पिछले साल दीवाली के बाद से तो इंतहा ही हो गई। दो दो महीने पर दो किश्तों  में एक महीने की सैलरी मिलने लगी। कर्मचारी पत्रकारों के सामने भूखमरी की नौबत आ गई। लेकिन प्रबंधन ने ऊपर से और पलीता लगाने का काम किया। अप्रैल माह से आधी सैलरी देने लगे। इस डील को करवाने में मैनेजर टाइप के लोगों की भूमिका रही जिनकी सैलरी लाख रुपये के ऊपर है। यानि उनकी दाल रोटी में घी पड़ती रहे लेकिन जिनकी सैलरी 15 से 30 हजार रुपये के बीच है वो भला कैसे गुजारा करें। उसमें भी आधी सैलरी मिलने की कोई निश्चित तिथि नहीं होती थी।

प्रबंधन ये भी लोगों के बीच भ्रम फैला रहा है कि कंपनी की हालत खराब है। मालिक जेल में हैं। कैसे काम होगा। लेकिन सवाल है कि जिन दो कंपनियों के मामले में मालिक जेल में है उन कंपनियों से सहारा के मीडियाकर्मियों का क्या लेना-देना। वे तो सहारा इंडिया मीडिया और सहारा इंडिया टीवी के कर्मचारी हैं। ऐसे में प्रबंधन ये कैसे कह सकता है कि उस कंपनी की हालत बिगड़ने से उन्हें सैलरी नहीं मिल रही है। जब इनकम टैक्स का छापा पड़ता है तो 137 करोड़ रुपये मिलते हैं और कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं है ये भला कैसे हजम होगा। ओ पी श्रीवास्तव की बेटी की शादी में 65 करोड़ खर्च हों और कर्मचारियों को पैसे नहीं मिले भला ये कर्मचारियों को कैसे हजम हो। लेकिन अब कर्मचारियों ने बगावत करने की ठान ली है। और वो किसी भी हद तक जा सकते हैं।

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