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एमजे अकबर तो महा ठरकी आदमी निकला, पढ़िए उसके बारे में 7 महिला पत्रकारों का #metoo

मोदी सरकार के विदेश राज्य मंत्री और पूर्व संपादक एमजे अकबर के ठरकीपने के किस्से इन दिनों पूरे देश में गूंज रहे हैं. आधा दर्जन महिला पत्रकारों ने इस महा बदमाश आदमी की हकीकत को उजागर किया है. अब तक 6 महिला पत्रकारों ने #metoo लिखकर पत्रकारिता करने के दौरान एमजे अकबर को सीरियल यौन उत्पीड़क बताया है. पेश है उन छह महिला पत्रकारों द्वारा कही गई कहानी जिससे पता चलता है कि वे अपने पत्रकारीय करियर में एमजे अकबर द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं.

एमजे अकबर अंग्रेजी अखबार एशियन एज के संपादक हुआ करते थे. बाद में वह इंडिया टूडे पत्रिका के संपादक बने. इसके बाद वह भाजपा नेता बने और फिर मंत्री बने. सबसे पहले महिला पत्रकार प्रिया रमानी ने एमजे अकबर के बारे में खुलासा किया. उसके बाद एशियन एज अखबार की कार्यकारी संपादक सुपर्णा शर्मा ने एमजे अकबर के वहशीपन का किस्सा बताया.

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सुपर्णा के मुताबिक- ‘यह घटना एक अखबार के लांच करने के दौरान की है, जिसमें मैंने 1993 से 1996 के बीच काम किया. उस समय मैं कोई 20 वर्ष की थी. मैं अपना पेज बना रही थी. मेरे कुर्सी के ठीक पीछे एमजे अकबर खड़े थे. तभी उन्होंने एकाएक मेरी ब्रा का पट्टा खींच दिया. मैं हतप्रभ हो उन पर चिल्ला पड़ी. इस घटना के कुछ दिन बाद मैं एक दिन टी शर्ट पहनकर आई जिस पर कुछ लिखा था. मैं एमजे अकबर के केबिन में गयी तो वह मेरी छाती ही निहारते रहे और उन्होंने कुछ ऐसा कहा, जिसे मैंने इग्नोर किया. महिला कर्मचारियों को ताड़ना एमजे अकबर का रोज का धंधा था. एक दिन एक महिला दफ्तर में स्कर्ट पहनकर आ गयी तो एमजे अकबर तुरंत अपनी केबिन से बाहर आ गए. वह नीचे झुककर कुछ उठाने को हुई तो वह उसे घूरते रहे और मुझसे पूछा- यह महिला कौन है? एमजे अकबर हमेशा उन जवान लड़कियों को अपना शिकार बनाने की कोशिश में जुटे रहते थे जो महात्वाकांक्षी थीं, आगे बढ़ना चाहती थीं और अपने काम को प्यार करती थीं.’

अब सुनिए लेखिका शुहा राहा का दर्द- ‘एमजे अबकर ने मुझे 1995 में कोलकाता के ताज बंगाल होटल में साक्षात्कार के लिए उस समय बुलाया जब वे एशियन एज के संपादक थे. मेरा साक्षात्कार उन्होंने बिस्तर पर बैठाकर लिया, जहां साक्षात्कार लिए जाने का कोई तुक नहीं था. उन्होंने साक्षात्कार के बाद बताया कि आपकी नौकरी हो गयी है. लेकिन इसके बाद उन्होंने कहा कि आप शाम को ड्रिंक पर क्यों नहीं आतीं? मुझे यह सुनकर अजीब लगा और उनके इसी आफर के कारण मैंने यह नौकरी नहीं की.’

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पत्रकार प्रेरणा सिंह बिंद्रा ने 7 अक्टूबर को जो ट्ववीट किया, वह इस प्रकार है- ”एमजे अबकर ने मुझे रात में होटल में बुलाया कि वह ‘काम की बात’ करेंगे, जिसे मैंने इनकार कर दिया था. इसी दौरान मुझे मेरी दोस्त ने बताया कि गंदे कमेंट करना उनकी फितरत है.”

फ्रीलांस पत्रकार कनिका गहलोत ने एमजे अबकर के बारे में बताया- ‘मेरा अनुभव इतना बुरा नहीं रहा पर उनके बारे में सब ऐसी बातें करते थे कि वे ऐसा सबके साथ करते हैं. एक बार उन्होंने मुझे सुबह होटल में नाश्ते के लिए बुलाया, मैं जाने का तैयार भी हुई पर मैंने वहां पहुंचने से इनकार कर दिया कि मुझे बहुत नींद आ रही है.’

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एमजे अकबर द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार रहीं शुतापा पॉल ने रमानी के ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा- ”मैं भी शिकार हुई जब एमजे अकबर 2010—2011 में संपादक थे और मैं कोलकाता में काम कर रही थी.”

पत्रकार गजाला वहाब ने एमजे अकबर द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न का विस्तार से वर्णन ‘द वायर’ वेबसाइट में लिखकर किया है. प्रस्तुत है उनके लिखे का कुछ प्रमुख अंश-

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”जैसे ही मीटू आंदोलन भारत में शुरू हुआ, मैंने 6 अक्तूबर को ट्वीट किया कि “मुझे इस बात का इंतजार है जब @mjakbar के बारे में बाढ़ का दरवाजा खुलेगा।” बहुत जल्द ही मेरे दोस्त और एशियन एज के पुराने सहयोगी मुझ तक पहुंच गए। मैंने एशियन एज में 1994 में इंटर्न के तौर पर ज्वाइन किया था। इन लोगों ने कहा कि तुम अपनी ‘अकबर स्टोरी’ को क्यों नहीं लिखती हो? मैं इस बात को लेकर निश्चित नहीं थी कि क्या दो दशकों बाद उसे लिखना किसी भी रूप में उचित रहेगा। लेकिन जब संदेशों के जरिये दबाव बढ़ने लगा तब मैंने इसके बारे में सोचा। नौकरी के लिए 1994 में मैं “एशियन एज” की दिल्ली आफिस में पहुंची। मैंने सुना कि लोग “एशियन एज” के दिल्ली दफ्तर को अकबर का हरम कहकर बुलाते हैं। मैं दफ्तर के गपशप में अक्सर उनकी सब एडिटरों/रिपोर्टरों के साथ के अफेयर सुना करती थी। या फिर “एशियन एज” के हर रिजनल दफ्तर में उनकी एक गर्लफ्रेंड थी। मैं इन सब को दफ्तर की संस्कृति समझ कर सरका दती थी। ‘एशियन एज’ में तीसरे साल उनकी नजरें मुझ पर आ पड़ीं। इसके साथ ही मेरा डरावना दौर शुरू हो गया। मेरी डेस्क बिल्कुल उनकी केबिन के सामने शिफ्ट कर दी गयी। उनके रूम का दरवाजा अगर थोड़ा भी खुलता तो हमारे चेहरे एक दूसरे के सामने होते। वो अपने डेस्क पर बैठ जाते और हर समय मुझे देखते रहते थे। अक्सर “एशियन एज” के इंट्रानेट नेटवर्क पर अश्लील संदेश भेजते रहते। उसके बाद मेरी असहाय स्थिति को देखते हुए उसका साहस और बढ़ गया। उसने बातचीत के लिए मुझे अपनी केबिन (जिसका दरवाजा वो हमेशा बंद कर देता था।) में बुलाना शुरू कर दिया। कई बार वो मुझे अपने बिल्कुल सामने बैठा लिया करता था जब वो अपना साप्ताहिक स्तंभ लिख रहा होता था। इसके पीछे विचार ये था कि उसकी केबिन के आखिरी में दूर रखी ट्राइपोड पर बड़ी डिक्शनरी से शब्दों को देखने की जरूरत होगी, तो खुद पैदल चलकर जाने की जगह वो मुझसे कहेगा। डिक्शनरी इतनी नीचे रखी गयी थी कि शब्द देखने के लिए किसी को या तो बिल्कुल झुकना पड़ता था या फिर उंकड़ू बैठ जाना होता था और उसकी पीठ अकबर की तरफ होती थी। एक दिन 1997 की सर्दी में डिक्शनरी पर मैं आधी झुकी हुई थी वो छुपकर मेरे पीछे आया और उसने मेरी कमर पकड़ ली। मैं भयंकर तरीके से डर कर कांपने लगी और किसी तरह से अपने पैर पर खड़े होने की कोशिश की। उसने मेरे स्तन से हिप तक अपने हाथ फेर दिए। मैंने उसके हाथ को दूर हटाने की कोशिश की लेकिन वो मेरी कमर पर बिल्कुल चिपक गए थे। उसके अंगूठे मेरे स्तनों के किनारे को रगड़ रहे थे। न केवल दरवाजा बंद था बल्कि उसके पिछले हिस्से ने भी उसे ब्लाक कर रखा था। आतंक के उन कुछ क्षणों में सभी तरह के विचार मेरे दिमाग में दौड़े। आखिर में उसने मुझे छोड़ दिया। इस पूरे दौरान उसकी धूर्ततापूर्ण मुस्कान कभी उसके चेहरे से नहीं गयी। मैं उसके केबिन से बाहर निकलकर चीखने और आंखों को साफ करने के लिए शौचालय में भागी। अभी मेरे डरावने सपने की सिर्फ शुरुआत भर हुई थी। अगली शाम उसने मुझे अपने केबिन में बुलाया। मैंने खटखटाया और प्रवेश कर गयी। वो दरवाजे के बिल्कुल पास में खड़ा था। और मैं कुछ प्रतिक्रिया दे पाती उससे पहले ही उसने दरवाजा बंद कर दिया। और मैं उसके शरीर और दरवाजे के बीच फंस गयी। मैं आराम से निकलने की कोशिश की लेकिन उसने मुझे पकड़ लिया और मुझे किस करने के लिए झुका। अपने मुंह को बिल्कुल बंद करने के साथ ही मैं चेहरे को दूसरी तरफ करने का संघर्ष कर रही थी। संघर्ष जारी रहा लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली। पैंतरेबाजी की वहां कोई जगह नहीं थी। क्योंकि मेरी शरीर दरवाजे के बिल्कुल विपरीत दिशा में थी। एक बिंदु पर उसने मुझे जाने दिया। आंख में आंसू लेकर मैं बाहर दौड़ पड़ी। दफ्तर के बाहर। सूर्या किरन बिल्डिंग के बाहर एक पार्किंग स्थल पर। एक अकेला स्थान पाकर मैं फुटपाथ पर बैठ गयी और चींख-चींख कर रोने लगी। मेरी एक सहयोगी संजरी चटर्जी ने मेरा पीछा करते हुए पार्किंग में पहुंच गयी। उसने मेरी आंखों से आंसू बहते हुए केबिन से बाहर आते देख लिया था। वो कुछ देर मेरे पास बैठी रही। उसने सुझाव दिया कि तुम इसके बारे में सीमा मुस्तफा को क्यों नहीं बताती। शायद वो अकबर से बात कर सकें और एक बार अगर वो जान जाते हैं कि वो जानती हैं। शायद वो पीछे हट जाएं। सीमा उस समय ब्यूरोचीफ थीं। हम दोनों वापस दफ्तर आए। मैं उनके कक्ष में गयी और उन्हें अपनी पूरी कहानी बतायी। उन्होंने मुझे सुना। वो चकित नहीं थीं। उन्होंने कहा कि ये पूरा मेरा निजी मामला है। और मैं क्या चाहती हूं उसे मुझे तय करना है। ये 1997 था। मैं बिल्कुल अकेली, उलझन में, असहाय और भीषण रूप से डरी हुई थी। आखिर में मैं अपनी डेस्क पर लौट आयी। मैंने “एशियन एज” के नेटवेयर मेसेज सिस्टम से एक संदेश भेजा। मैंने उन्हें बताया कि एक लेखक के तौर पर मैं उनका कितना सम्मान करती हूं, उनका ये व्यवहार मेरे दिमाग में उनकी छवि को कितना खराब करता है और मैं चाहती हूं कि आइंदा वो मेरे साथ इस तरह का व्यवहार न करें। उन्होंने मुझे तुरंत केबिन में बुलाया। मैंने सोचा कि वो मुझसे माफी मांगेंगे। मैं गलत थी। मेरे विरोध से वो दुखी दिख रहे थे और मुझे एक लेक्चर देना शुरू कर दिए कि मैं कैसे उनको ये सुझाव देकर कि उनकी भावनाएं मेरे लिए असली नहीं हैं, अपमानित कर रही हूं। “एशियन एज” के दफ्तर में बिताया गया प्रत्येक क्षण बहुत डरावना था। हर समय जब भी वो अपनी केबिन में बुलाते मैं सौ बार मर जाती। मैं उनके कमरे में प्रवेश करते समय दरवाजे को थोड़ा खुला रखती थी और मेरा हाथ दरवाजे के नाब पर हुआ करता था। इसने उन्हें अचंभित कर दिया। कभी-कभी वो दरवाजे तक आ जाते और अपना हाथ मेरे हाथ पर रख देते। कभी-कभी वो अपनी शरीर को मेरी शरीर के साथ रगड़ने लगते। कभी-कभी अपनी जीभ को मेरे सिकुड़े होठों पर फेरने लगते और हर समय मैं उन्हें दूर धकेलती और बचकर कमरे से बाहर निकलने की कोशिश करती। बहुत सारे रतजगों के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची कि “एशियन एज” में नौकरी करते हुए दूसरी नौकरी की तलाशी कोई अच्छा विकल्प नहीं है। मुझे तत्काल छोड़ देना चाहिए। इसलिए मैंने साहस जुटाया और उसे बताया कि मैं नौकरी छोड़ रही हूं। उसने अपना संतुलन खो दिया। वो चिल्लाया। अकबर ने मुझे बताया कि वो अहमदाबाद से एक संस्करण लांच कर रहे हैं और चाहते हैं कि मैं वहां शिफ्ट हो जाऊं। मेरे माता-पिता द्वारा वहां शिफ्ट होने की इजाजत न देने समेत हर तरह के विरोध को किनारे कर दिया गया। जैसा कि उसने चिल्लाकर अपनी योजना बताना शुरू कर दिया। मुझे अहमदाबाद में एक घर दिया जाएगा और मेरा सारा कुछ कंपनी संभालेगी। और जब भी वो वहां आएंगे वो मेरे साथ रुकेंगे। मेरी बदहवाशी छत को छूने लगी। उस आतंक के क्षणों में मैंने अपने भीतर शांति के एक तालाब की खोज कर ली। मैंने विरोध करना बंद कर दिया। धीरे-धीरे अपने कुछ सप्ताहों तक मैंने अपनी डेस्क खाली करनी शुरू कर दी। अपनी किताबों आदि को थोड़ा-थोड़ा कर अपने घर लेते गयी। इस तरह से अहमदाबाद रवाना होने से एक शाम पहले मेरी पूरी डेस्क खाली हो चुकी थी। अकबर के निजी सचिव को अपने इस्तीफे वाले सीलबंद लिफाफे को देने के बाद मैंने रोजाना के समय पर दफ्तर छोड़ दी। मैंने उससे निवेदन किया कि वो लिफाफे को अकबर को अगली आने वाली शाम को देगा। जब ये पता चल जाएगा कि मैंने अहमदाबाद की फ्लाइट नहीं पकड़ी। अगले दिन, मैं अपने घर पर रही। शाम को अकबर ने मेरे घर के नंबर पर फोन किया। उसने दफ्तर से मेरे नंबर को हासिल कर लिया था। वो बिल्कुल बड़बड़ाने के अंदाज में कभी नाराज होता और कभी उसने भावना दिखाने की कोशिश की। मैं बिल्कुल डरी हुई थी। अगर वो घर पर आ गया तब? मैं पूरी रात जगी रही और अगली सुबह की पहली ट्रेन को पकड़ कर अपने माता-पिता के पास चली गयी। घर पर किसी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा। मेरे मां-बाप जान गए कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। लड़ाई हम लोगों के बाहर चली गयी थी। मैं कुछ हफ्ते घर रही। उसके बाद जब मैंने अपने पिता को बताया कि मैं अपनी नौकरी पर दिल्ली लौटना चाहती हूं तो उन्होंने उसका विरोध नहीं किया। उन्होंने केवल यही कहा कि दूसरी नौकरी ढूंढ लो। और मैं रो पड़ी। पिछले 21 सालों में मैंने ये सब कुछ अपने पीछे रखा हुआ था। मैंने तय कर लिया था कि मुझे एक पीड़ित नहीं बनना है और न ही एक राक्षस का व्यभिचार मेरे कैरियर को खराब कर सकता है। हालांकि कभी-कभी मुझे डरावने सपने आते थे। शायद अब वो आने बंद हो जाएं।”

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