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जर्नलिज्म ऑफ करेज बनाम पब्लिसिटी ऑफ द पावरफुल : प्रचारकों की इस रणनीति को कोई समझता भी है?

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संजय कुमार सिंह-

जर्नलिज्म ऑफ करेज बनाम पबलिसिटी ऑफ द पावरफुल :
प्रचारकों की इस रणनीति को कोई समझता भी है?

पैसे लेकर उत्तर प्रदेश सरकार का प्रचार करने के लिए चुने गए इंडियन एक्सप्रेस ने कल दावा किया था कि, “…. (कोलकाता के मां फ्लाईओवर) की विवादास्पद तस्वीर अखबार के सभी डिजिटल एडिशन से हटा दी गई है।”

अव्वल तो प्रिंट एडिशन के साथ डिजिटल एडिशन में भी फर्जी तस्वीर छापकर पढ़वा देने के बाद डिजिटल एडिशन से हटाने का कोई मतलब नहीं है लेकिन अखबार ने दावा यही किया था। आज इंडियन एक्सप्रेस के ई पेपर की साइट इस तरह खुल रही है। इसमें कल का विवादास्पद विज्ञापन तो है लेकिन 10 सितंबर का पहला पन्ना नहीं दिख रहा है। 10 सितंबर को भी अखबार में पहले पन्ने पर विज्ञापन था और अगर पैसे लेकर छापे गए विज्ञापन को डिजिटल एडिशन से हटाने का कोई मतलब है तो 10 सितंबर वाला क्यों हटाया गया और उत्तर प्रदेश वाला कहां हटाया गया है?

दोनों में अंतर सिर्फ यह है कि कल का अखबार खोलने पर विज्ञापन वाला पहला पन्ना नहीं खुलकर खबरों वाला पहला पन्ना आ रहा है पर 10 सितंबर वाला अखबार खोलने पर विज्ञापन का पन्ना आ रहा है। इस तरह कहा जा सकता है कि विज्ञापन से तस्वीर हटाई नहीं गई है, सिर्फ दावा किया गया है। जर्नलिज्म ऑफ करेज का दावा करने वाला इंडियन एक्सप्रेस आजकल भाजपा के प्रचारक की भूमिका में है। उसपर मैं लिखता रहा हूं। आज मुद्दा वह नहीं है बल्कि इंडियन एक्सप्रेस और उसके प्रचारकों का वह दावा है जब अखबार कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहा था और बोफर्स के खिलाफ अभियान चला रहा था। बोफर्स रिश्वतखोरी के मामले को जितना तूल दिया गया उसके मुकाबले सत्यता क्या निकली आप जानते हैं।

तब मैं जनसत्ता में नौकरी करता था और दावा किया गया जाता था कि इंडियन एक्सप्रेस सत्ता का विरोधी है। उसी इंडियन एक्सप्रेस का अब यह हाल है और यह उसकी स्वतंत्रता है मुझे उसपर कुछ नहीं कहना है। मेरा एतराज इस बात पर है कि अब सरकार के विरोधी को सीधे कांग्रेसी कह दिया जाता है। पत्रकारिता खेमों में बंट गई है। इंडियन एक्सप्रेस को ना तब और ना अब भाजपाई कहा जाता है। मुझे लगता है कि यह भाजपाई राजनीति और प्रचार का ही असर है कि कांग्रेस विरोध सत्ता विरोध हो जाता है और भाजपा विरोध कांग्रेस का समर्थन या प्रचार।

जहां तक गलत तस्वीर छापने का सवाल है, अखबारों में (खबर के साथ भी) प्रतिनिधित्व या समझाने-बताने के लिए घटाने से अलग और पुरानी तस्वीरें या स्केच छपते रहे हैं। इस मामले में चूक या खेल सिर्फ वह सूचना नहीं होना है जो अक्सर बहुत छोटे फौन्ट में होती है। गलती पर विवाद होने के बाद अखबार ने यह नहीं कहा कि वह लाइन रह गई है बल्कि उसे एडवर्टोरियल बता कर सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली जबकि एडवर्टोरियल पर भी यह बताने और लिखने का रिवाज रहा है।

तो पूरा मामला यह है कि एक विज्ञापन को खबर की तरह छापा-छपवाया गया। उसमें गलत तस्वीर का उपयोग किया गया और जब चोरी पकड़ी गई तो खुद ही बलि का बकरा बनने की सेवा मुहैया करवाई गई क्योंकि एक्सप्रेस के जिम्मेदारी लेने से सबसे कम नुकसान एक्सप्रेस का ही हुआ है। बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टी के लोग ऐसी टुच्ची हरकत करें तो छवि का मामला बनता है जिसे इंडियन एक्सप्रेस संभालने की कोशिश कर रही है और यह जर्नलिज्म ऑफ करेज नहीं, पबलिसिटी ऑफ द पावरफुल है। तथ्यों के आधार पर किसी को भी मीडिया का विरोध या समर्थन करने का अधिकार है। निष्पक्ष तो वह हो ही सकती है पर विरोध करने का मतलब विरोधी का समर्थक होना नहीं होता है पर आजकल यही प्रचारित किया जा रहा है और खुद को निष्पक्ष समझने वाले भी इस प्रचार या रणनीति के शिकार लगते हैं।

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  • अखबार भी इंसान ही चलाते हैं,भड़ास मीडिया मीडिया से जुड़े लोगों के हित के लिए है ,नाकि उससे जुड़े लोगों को बदनाम करने के लिए, इंडियन एक्सप्रेस ने अपना जिगर दिखाते हुए खुद सामने आकर अपनी गलती को स्वीकार, जो व्यक्ति अब इसमें अपना हित साध रहे हैं वह विपक्षी दलों के हाँथ की कठपुतली बन गए हैं।
    उनको समझना चाहिए विज्ञापन में जो चित्र होतें है वह सांकेतिक होते हैं, जर्नलिस्ट और बड़े पत्रकार खुद को बुद्धिजीवी मानते हैं और ऐसी मूर्खतापूर्ण बयान और रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शर्म आती है ऐसे पत्रकारों और उनकी निम्न स्तर की पत्रकारिता पर।टीवी जर्नलिस्ट तो एक विदूषक की भूमिका में नजर आते हैं,

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