कल तक जिनके इशारे पर छापा मार रहे थे, आज उन्हीं की गोद में बैठकर चुनाव लड़ेंगे!

सौमित्र रॉय-

चुनाव का मौसम आ चुका है और कहीं वर्दी तो कहीं शराफ़त की आड़ में छिपे संघी बाहर आ रहे हैं।

प्रवर्तन निदेशालय के संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह ऐसे ही चेहरे हैं। कल तक जिनके इशारे पर छापा मार रहे थे, आज उन्हीं की गोद में बैठकर चुनाव लड़ेंगे।

अब जबकि उनके चेहरे का संघी नकाब उतर चुका है, क्या मोदी सरकार राजेश्वर सिंह के सुपुर्द हुए सारे मामले वापस लेगी?

इन सारे मामलों की पैरवी कर रहे वकीलों को CrPC की धारा 482 का मामला दाखिल करना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होगा।

अभी और भी छिपे चेहरे हैं जो हिन्दू हृदय सम्राट की सेवा में धर्म युद्ध जीतने बाहर निकलेंगे।

जो फिर भी छिपे रहेंगे, उनसे बीजेपी और योगी की जीत की अफवाह बार-बार सुनाई देती रहेगी।

समाज और सिस्टम के कोढ़ से मवाद बहना शुरू हो चुका है।


संजय कुमार सिंह-

कैप्टन भाजपा के समर्थन में चले गए हालांकि एक सफल रैली नहीं करवा पाए। अब चर्चा है कि एक ईडी अफसर ने भी वीआरएस मांगा है। मिल गया तो टिकट भी मिल जाएगा।

कायदे से वीआरएस मिलना नहीं चाहिए और चुनाव में ड्यूटी भी नहीं लगनी चाहिए। बिहार का मामला उदाहरण है। वीआरएस देकर टिकट नहीं देने का। पर ऐसे लोगों के रहते राहुल गांधी ने क्या अकेले देश बचाने का ठेका लिया है?

यह अलग बात है कि राहुल गांधी के पास चन्नी जैसे उस्ताद हैं और खुद को कप्तान भले नहीं कहते हों टीम में तरह-तरह के सूरमा हैं। दूसरी तरफ टीम तो नहीं ही है कप्तान को अपने लोगों पर भरोसा भी नहीं है।


Shouldn’t there be a cooling-off period for bureaucrats joining politics?



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