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पुस्तक मेला में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर ‘‘मीडिया : मिशन या प्रोफेशन‘‘ पर चर्चा

पटना। पुस्तक मेला में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर रविवार को ‘‘मीडिया : मिशन या प्रोफेशन‘‘ विषय पर चर्चा करते हुए पत्रकारों ने कहा कि यह सच है कि आज मीडिया के मिशन से प्रोफेशन बन जाने की बात की जाती है लेकिन इसमें आज भी मिशन के तत्व शामिल है और यह लोकतंत्र के चौथे खम्भे की भूमिका में है। चर्चा में मीडिया के अंदर की छुपी हुई बहुत-सी बातें सामने आई।

वरिष्ठ पत्रकार और पीटीआई से जुडे संजय सिन्हा ने कहा कि ‘‘मीडिया : मिशन या प्रोफेशन‘‘ में दोनां बातें हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया में नकारात्मक और सकारात्मक बात है हैं और इसमें सब तरह के लोग रहते है। उन्होंने कहा कि लोग यहां मिशन के लिए तहत आते है और बाद में प्रोफेशनल हो जाते हैं। श्री सिन्हा ने कहा कि निजी मीडिया बाजार देखता है। मीडिया में दो तरह का चरित्र है फिर भी मीडिया पर भरोसा है। उन्होंने कहा कि पत्रकार एक नागरिक भी है और उसे भी जीवन जीने का हक है। उन्होंने पत्रकार शब्द का विच्छेद कर के कहा कि इस प्राइवेटाइजेशन के दौर में अधिकतर पत्रकार कार की लालची हो गए हैं और इसके लिए वे पित्त पत्रकारिता कर रहे हैं, जो गलत है।

वहीं साहित्यकार और आकाशवाणी पटना के संयुक्त निदेशक, समाचार राजेंद्र उपाध्याय ने कहा कि सरकारी मीडिया मिशन के तहत काम करती थी और आज भी कर रही है। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले और बाद में मिशन थी बाद में इसमें प्रोफेशनलिज्म आया। उन्होंने कहा कि सरकारी मीडिया अभी विश्वसनीय है। श्री उपाध्याय ने कहा कि प्रभाष जोशी के दौर में आवेदन आता था कि वे ही आवेदन करें जो नौकरी के लिए नहीं मिशन के लिए आये। श्री उपाध्याय ने भी पित्त पत्रकारिता पर जोर देते हुए कहा कि यह गलत है। मीडिया का असली चेहरा समाज के सामने आना चाहिए।

चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने कहा कि पत्रकारिता मिशन क्यों रहेगा। हम सब नौकरी कर रहे है। और पत्रकारों को भी बेहतर जीवन जीने का हक है। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकार को ज्यादा पैसा मिलता है तो किसी को आपत्ति क्यों। अगर कोई पत्रकार या संपादक गाडी से घूमता है तो, इसका मतलब यह नही कि वह भ्रष्ट है। श्री विजय का कहना था कि आजादी के बाद पत्रकारिता पर लेफ्ट का कब्ज़ा था, जो टूटा है और मीडिया के प्रोफेशन होने का सवाल उठने लगा। उन्होंने मीडिया के अंदर विचारधारा का सवाल उठाया।

चर्चा को आगे बढाते हुए वरिष्ठ पत्रकार और 'मीडिया : महिला, जाति और जुगाड़' के लेखक संजय कुमार ने कहा कि मीडिया कल भी मिशन था और आज भी है। जहां तक इसके प्रोफेशन होने की बात है तो मीडिया हाउस प्रोफेशनल हुए हैं पत्रकार नहीं। श्री कुमार ने कहा कि आज समाचार अखबार एवं चैनल के करीब सभी मालिक पूंजीपति हैं। उनके आगे संपादकों की नही चलती है, वे जो चाहते है संपादक वहीं करते हैं। पत्रकार आज भी खबरों के पीछे भागते हैं लेकिन बाजार देखने वाला मीडिया हाउस सामाजिक सरोकार वाली खबर की हत्या करवा देता है। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक अंग्रेज ने अखबार निकाल कर आवाज उठायी थी। अंग्रेजी हुकूमत ने उसे प्रताड़ित भी किया और आज भी यह बरकरार है। जब कोई पत्रकार सच लिखता है तो उसे मीडिया हाउस के अदंर और बाहर प्रताड़ित किया जाता है। यहां तक कि उसकी हत्या कर दी जाती है।

इस चर्चा के दौरान प्रभात प्रकाशन के डॉ. पीयूष कुमार ने कहा कि अंदर की तस्वीर कब बदलेगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह मीडिया हाउस की खबरें आती है और इसें मिशन से प्रोफेशन होने से जनता को ही नुकसान है। चर्चा का संचालन जेपी ने किया। मौके पर पत्रकार, साहित्यकार और पत्रकारिता के छात्र मौजूद थे।

मो.सादिक़ हुसैन की रिपोर्ट.

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