सहारा मीडिया के कर्मचारियों ने आफिस के अंदर सामूहिक धरना दिया लेकिन प्रबंधन मस्त

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Comments on “सहारा मीडिया के कर्मचारियों ने आफिस के अंदर सामूहिक धरना दिया लेकिन प्रबंधन मस्त

  • आनंद says:

    ऐसे तो हो चुकी आर पार की लडाई… सहारा कर्मियों के हालात पर जनकवि पाश की कविता की चंद पंक्ति ” बहुत खतरनाक होता है किसी सपने का मर जाना ” अब यह मीडिया जगत में छिपा नहीं है कि सहारा अपने कर्मचारियों को कई माह से वेतन नहीं दे रहा है। वेतन के इंतजार में कई कर्मचारियों की मौत हो गई । जिसमें एक ने बहुमंजिली इमारत से कूदकर जान दे दी तो दूसरे की मौत भूख से तडप तडप कर हुई । ऐसे कर्मचारियों की संख्या भी दर्जनों में होगी जो पैसे के अभाव में परिजनों का क्या अपना तक इलाज नहीं करा पा रहे हैं और मालिक है कि जेल में भी ऐय्याशी नहीं तो ठाठ से रह ही रहा है । बहरहाल, यह आम धारणा है कि ” जब पानी सिर से गुजरने को होता है तो हाथ पांव मारा जाता है । शायद इसी का नतीजा जुलाई १५ में हुई मीडिया की हडताल थी । शान ए सहारा (इसी समूह का साप्ताहिक अखबार) के कर्मचारियों की हडताल को अगर ताक पर रख दें तो जुलाई १५ की हडताल को ऐतिहासिक कहा जा सकता है। हालांकि यह हडताल स्वतः स्फूर्ति थी । अब यही स्वतः स्फूर्ति घातक साबित हो रही है क्योंकि यह हडताल एक मजबूत नेतृत्व नहीं पैदा कर पाया वरना जेल से जारी किए गए सुब्रत राय के एक संदेश पर हडताल टूटती क्या? इस हडताल का टूटना कर्मचारियों के सपने के टूटने की शुरु आत थी । पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा हुआ है क्या कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अलावा तीन अन्य राज्यों की राजधानी से कोई अखबार कई दिनों तक न छपा हो । शायद २०/२५ वर्षों से ऐसा नहीं हुआ । फिर आज हालात बद से बदतर क्यों हैं जबकि सहारा के कर्मचारियों की माली हालत पहले से ज्यादा खराब है बावजूद इसके वो ठोस निर्णय नहीं ले पा रहे हैं । बताते चलें कि जुलाई के तीसरे सप्ताह में हडताल समाप्त हुई । हर प्रबंधन की तरह ही सहारा प्रबंधन ने भी अपने कर्मचारियों को सब्जबाग दिखाये । अक्टूबर में कर्मचारियों ने हडताल की चेतावनी दी । सोशल मीडिया पर खबर भी आई लेकिन हडताल हुई नहीं क्योंकि घाघ मालिक ने हड्डी का एक टुकडा फेंक दिया । इस बीच हाल में ही अस्तित्व में आई एकमात्र यूनियन सहारा कामगार संगठना का दिल्ली के कर्मचारियों को साथ मिला लेकिन वह भी लंबा नहीं चला । आज मीडिया कर्मियों का हाल यह है कि आंदोलन को किस दिशा में ले जाएं । लंबी रणनीति नहीं बना पा रहे हैं । मसलन अगर ऐसा नहीं हुआ तब क्या करेंगे यह तक नहीं कर पा रहे हैं । गौरतलब है कि आंदोलन करने का पहला पत्र गीता रावत के नाम से जारी हुआ जो कि सहारा की मुंबई यूनियन के लेटर हेड पर था । उसके बाद जितने भी संदेश सभी यूनिटों के लिए आये सादे कागज पर । बाद के संदेशों में गीता रावत का नाम और फिर पद हट गया । माना कि मुंबई वाली यूनियन ने लेटर हेड और दिये गए पद के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है तो आंदोलन पर तो रोक लगाई नहीं है हम मीडिया वाले उनसे बेहतर स्वरूप दे सकते हैं लेकिन इस तरीके से नहीं जो अपनाया जा रहा है। प्रसंगवश २७/१०/१५ को बिना हस्ताक्षर वाले गश्ती पत्र से तो कदापि नहीं । यह गश्ती पत्र दिल्ली/ एनसीआर के लिए था तो अन्य सभी यनिटों को २८ से प्रस्तावित आंदोलन की सूचना क्यों दी गई । अगर सभी यूनिटों के लिए था तो मुख्यालय होने के नाते यह निर्देश क्यों नहीं दिया गया कि आप लोग भी यह करें । हडताल हर एक का लोकतांत्रिक अधिकार है और पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा जाता है तो लोकतांत्रिक तरीका क्यों नहीं अपनाया जाता । ज्ञातव्य है कि पिछली बार भी यही हुआ था । इस बार भी ऐसा होगा तो फिर लड चुके आर..पार की लडाई ।

    Reply
  • दादा says:

    सहारा पर एक कर्मचारी का २ लाख से लेकर ५० लाख रुपये का बकाया हो चूका है. प्रबंधक भाईयों से निवेदन वह अपने साथियों का हिसाब कर दे. अब औकात नहीं है तो कंपनी को बंद कर पूरा भुगतान दे अहसान करने की जरुरत नहीं है.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *