डा. लक्ष्‍मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ स्‍मृति पर्व आयोजित

लखनऊ। 30 दिसम्बर, 2012 को यूपी प्रेस क्लब के सभागार में डॉ0 लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ स्मृति पर्व का आयोजन किया गया। समारोह का प्रारम्भ स्व0 निशंक जी द्वारा लिखित सरस्वती वंदना का सस्वर गायन ‘मुझको भी अपना वर दो’ के साथ हुआ, जिसका गायन प्रो0 कमला श्रीवास्तव एवं सहयोगी डॉ0 सरोजनी सक्सेना, श्रीमती इन्दिरा श्रीवास्तव, श्रीमती स्मिता जैन एवं श्रीमती रेखा मित्तल द्वारा किया गया। डॉ0 लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ के चित्रा पर माल्यार्पण करने वाले मुख्य अतिथियों में श्रीमती स्वरूप कुमारी बख्शी, श्री गोपाल चतुर्वेदी, श्री उदय प्रताप सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, डॉ0 सुधाकर अदीब, निदेशक, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, प्रो शैलनाथ चतुर्वेदी, श्री महेश चन्द्र द्विवेदी (पूर्व डीजीपी, उ0प्र0), डॉ0 मंजुलता तिवारी व श्री गिरीश चन्द्र शुक्ला मुख्य थे।

कार्यक्रम का प्रारम्भ प्रो0 कमला श्रीवास्तव एवं सहयोगियों द्वारा निशंक जी द्वारा लिखे गीत – ‘मेरा गीत मुखर हो जाता’ और ‘सावन मास मा रूमति-झूमति’, के गायन से हुआ। इस अवसर पर उपस्थित वक्ताओं में बोलते हुए डॉ0 रमेश दीक्षित ने कहा कि विद्यार्थी जीवन में केकेसी कालेज में निशंक जी ने शिक्षक के रूप में हमें लिखने सुनने और समझने का संस्कार दिया। हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष श्री उदय प्रताप सिंह ने निशंक जी को स्मरण करते हुए कहा कि उनसे मेरा कवि एवं शिक्षक के नाते गहरी मित्राता थी वे अच्छे शिक्षक और कालजयी कवि थे। न जाने कितने लोगों को निशंक जी ने गढ़ा है। श्री सिंह ने कुछ छंदों का पाठ कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

हिन्दी संस्थान के निदेशक सुधाकर अदीब ने कहा कि निशंक जी एक आचार्य कवि थे। उनके चरणों में बैठकर अनेक कवियों ने कविता के मर्म को समझा। अदीब ने निशंक जी की लिखी वाणी वन्दना का पाठ किया। वरिष्ठ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी ने इस अवसर पर कहा कि निशंक जी ने पढ़ा ही नहीं, गुना भी है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। तत्कालीन साहित्यकारों से उनका सम्बन्ध प्रगाढ था। ऐसे रचनाकार कभी मरा नहीं करते। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 सरला शुक्ल ने कहा कि वे जीवन पर्यन्त साहित्य की सेवा में संलग्न रहे। वे एक अनुशासन प्रिय अध्यापक थे। ‘सुकवि विनोद’ नाम से पत्रिका का सम्पादन करने वाले निशंक जी परम्परावादी छंद के रचनाकारों को सदा महत्व देते थे। इस अवसर पर प्रो0 शैलनाथ चतुर्वेदी ने निशंक जी के सम्मान में आयेाजित 35 वर्ष पहले के एक कार्यक्रम के आयोजक पं0 श्रीनारायण चतुर्वेदी का एक भाषण सुनाया, जिसमें उन्होंने निशंक के व्यक्तित्व और कृतित्व को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा कि सम्मान व्यक्ति का नहीं उसके लोकोपयोगी कार्यो का होता है। निशंक ऐसे ही लोकोपयोगी साहित्यकार थे। पूर्व डीजीपी श्री महेश चन्द्र द्विवेदी ने ‘निशा के तिमिर में आकाश में तारे असंख्य होते हैं, सुसंस्कृत पत्थर तो बस निशंक होते हैं’ नामक छंद पढ़ कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। वरिष्ठ समाजसेवी स्वरूप कुमारी बख्शी ने कहा कि निशंक जी के लिखे छंद अमर हैं। उनकी कविताएं हमे रास्ता दिखाती हैं, जिसने विश्व को ज्ञान की रश्मियाँ दीं। ऐेसे कवि को नमन। उन्होंने यह भी कहा कि सूर्य इधर से उधर से छिप सकता है लेकिन कवि दुनिया से कभी छिप नहीं सकता।

इस अवसर पर अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’, उमा शंकर शुक्ल ‘शितिकंठ’ द्वारा निशंक जी की कविताओं एवं सवैयों का पाठ किया गया। वरिष्ठ पत्राकार एवं साहित्यकार दयानन्द पाण्डेय ने निशंक जी की साहित्यिक रचनाओं पर एक शोधपरक लेख पढ़ा। उन्होंने बताया कि निशंक जी ने अपनी रचनाओं में सत्ता से आम आदमी की मुठभेड़ करते दिखते हैं। वे सत्ता पक्ष की कमियों को उजागर करते हैं। हिन्दी संस्थान के पूर्व निदेशक विनोद चन्द पाण्डेय ने कहा कि निशंक जी काव्य के क्षेत्रा में सत्यम-शिवम-सुन्दरम के पक्षधर थे। हिन्दी भाषा और साहित्य को उनका अवदान अविस्मरणीय है। इस अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 आभा अवस्थी ने सभी अतिथियों का आभार व धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह में शहर के कई वरिष्ठ साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, कवि आदि मौजूद थे। समारोह का संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो0 उषा सिन्हा ने किया। अन्य वक्ताओं में वरिष्ठ अधिवक्ता श्री असित चतुर्वेदी, मिर्जा हसन नासिर, डॉ0 कमला शंकर त्रिपाठी व डॉ0 पी0आर0 मिश्र इत्यादि रहे।

उक्त कार्यक्रम का आयोजन संस्कृति निलयम् द्वारा भारतीय लेखिका परिषद, नव परिमल, ज्ञानप्रसार संस्थान, आ0 परशुराम चतुर्वेदी स्मारक एवं समारोह समिति, कादम्बिनी क्लब, भारतीय भाषा प्रतिष्ठान परिषद, जागो भारत महान, लखनऊ वीमेन्स एसोसिएशन के सहयोग से किया गया। समारोह के अंत में स्व0 निशंक जी एवं दिल्ली में बलात्कार की पीड़ित दामिनी की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा गया।

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