थरूर साहब दिक्कत ये है कि आप अपने देश को नहीं जानते

Mayank Saxena : जो बेहद क़ाबिल साथी गीता चोपड़ा अवॉर्ड के तर्क से सहमत हैं…उनको ये पता होना चाहिए कि ये एक पुरस्कार है जो बहादुर बच्चों को दिया जाता है…न कि कोई क़ानून जिसमें अमानवीय बलात्कारियों को सज़ा…आपको घटनाओं, अपराधों, स्थितियों और पुरस्कारों-क़ानूनों का अंतर पता होना चाहिए…ये इतना अजीब सा तर्क है जहां एक क़ानून की पुरस्कार से तुलना की जाती है… क्या दंगा रोधी क़ानून को बिल्कीस के नाम पर कर दिया जाए, क्या हत्या की धारा को नैना साहनी या प्रियदर्शिनी मट्टू के नाम पर रखा जाए…कुछ सब्सटैंशियल भी है आप लोगों के पास कि बस भावनाओं में बह कर कुछ भी कह देना और उसका आंख और दिमाग बंद कर के समर्थन कर देना ही मानवता है.

जिस समाज में हम रहते हैं, उसकी रवायतों का विरोध बेहद ज़रूरी है…ये परिपाटी भी बदलनी होगी कि बलात्कार पीड़िता को अपनी पहचान छुपानी पड़े…लेकिन जब तक हमारा समाज इतना सभ्य और उदार नहीं होता…तब तक क्या हम ऐसे संकीर्ण मानसिकता वाले समाज को ये मौका दे दें कि वो बलात्कार पीड़िता का नाम जाने और फिर न जाने क्या क्या हो… साथ आप को याद तो होगा बोस शब्द के वाहियात इस्तेमाल वाला वो गाना…कितने डी के बोस अदालत चले गए थे…ज़रा सोचिए कि बलात्कार और यौन हिंसा के खिलाफ क़ानून का नाम उस लड़की के नाम पर रख देने के बाद क्या होगा उस नाम की और लड़कियों के साथ…पहले समाज को बदलिए उसके बाद ऐसी राय दीजिए.

और देशों में ऐसा होता है…बिल्कुल होता है…तो पहले अपने समाज को उन देशों के खुलेपन और औदार्य के बराबर ला खड़ा कीजिए, उसके बाद ऐसा कुछ करिए…आपका स्वागत है…थरूर साहब दिक्कत ये है कि आप अपने देश को नहीं जानते…लेकिन बाहर के देशों की रवायतों को बिना यहां बदलाव की कोशिश किए लागू करना चाहते हैं… समाज में काम कीजिए…उसे बदलिए और फिर इस तरह की पहल कीजिए…आम खाने के लिए उसके मौसम का इंतज़ार कीजिए….तब तक उसको पानी दीजिए…और धैर्य रखिए.

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के फेसबुक वॉल से साभार.

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