निर्मल बाबा के बहाने हिन्दू धर्म पर निशाना क्यों?

: अपने गिरेबां में भी तो झांकिये : निर्मल बाबा महान हैं या गिरे हुये इन्सान, यह तो वही बता सकता है जो उनके सम्‍पर्क में आया हो या जिसने उन्हें आज़माया हो। पर उनके बहाने हिन्दू धर्म या सारे साधु-सन्त समाज को ही निशाने पर रख कर सब को ही ढोंगी या धोखेबाज़ बता देना उतना ही गिरा हुआ काम है जितना कि कोई भी गिरा हुआ इन्सान करता है। एक साधारण व्यक्ति कैसे सारे समाज या पन्थ को ही बदनाम कर सकता है? यदि किसी परिवार, किसी जाति, समुदाय या धर्म का कोई व्यक्ति चोर, उचक्का, व्यभिचारी या अपराधी निकल आये तो उससे सब की बदनामी तो अवश्यक होती है पर क्या उसके कुकृत्य से सारा परिवार, सारी जाति, सारा समुदाय या धर्म ही ऐसा बन जाता है?

चलो कुछ क्षण के लिये बाबा के आलोचकों के आरोप को सही मान लेते हैं। धोखा देने के लिये ऐसा तो कोई भी ढोंगी कर सकता है। आज अपराध मजबूरी नहीं दिमाग़ का खेल बन गया है। व्यक्ति पहले जनता की नब्ज़ टटोलता है और उसे मूर्ख बना कर धोखा देने का चक्रव्यूह रचता है। लोग विभिन्न स्थानों पर कहीं वकील, कहीं समाजसेवी, कहीं पुलिस अफसर, आयकर या आईएएस अधिकारी, विधायक या सांसद होने का ढोंग रच कर लोगों का ठगते हैं। तो क्या एक व्यक्ति के ऐसा करने पर सभी ऐसे लोगों और व्यवसायों व अधिकारियों पर हम ऐसा होने का इलज़ाम ठोंक देंगे और कहेंगे कि वह सब ऐसे ही होते हैं?

साधु-सन्त व एक पण्डित, पादरी, मौलवी, ज्योतिषी, तान्त्रिक हुये बिना यदि कोई व्यक्ति ऐसा होने का ढोंग रचता है और लोगों को ठगता या लूटता है तो क्या उसके कुकर्म के कारण ये सभी सम्माननीय लोग ठग बन जायेंगे? व्यक्ति बुरा बनता है अपने कुकर्मों से, न कि दूसरे की कुकर्म से। पर यहां तो हिन्दू धर्म, साधू-सन्त, पण्डित, पादरी, मौलवी, आदि सभी एक ही पंक्ति में खड़े कर दिये गये हैं दूसरों के पापों के कारण हालांकि उन्हों ने स्वयं कुछ गलत किया ही नहीं जैसा निर्मल बाबा ने किया हो। यदि कोई ठग अपने आप को हिन्दू, सिख, ईसाई या मुस्लिम आदि होने का ढोंग रच दे और लोगों को धर्म के नाम पर लूटना शुरू कर दे तो कसूर उस व्यक्ति विशेष का है, न कि उस धर्म विशेष का जिस से वह सम्‍बन्धित भी नहीं है पर होने का ढोंग करता है। इस प्रकार तो कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति को बदनाम कर सकेगा। जैसा कि दिखाया जा रहा है, निर्मल बाबा न तो कोई पूजा-पाठ स्वयं करते हैं न करने की सलाह देते हैं। हां, इतना अवश्य बताया गया है कि वह किसी मन्दिर में कुछ राशि चढ़ाने को कहते हैं, खीर खाने या खिलाने को कहते हैं, किसी विशेष किस्म का पर्स और उसमें कुछ धनराशि रखने को कहते हैं, आदि, आदि।

तो इसमें कौन सी बड़ी बात है। हमारे घरों में आम धारणा है कि किसी शुभ काम के लिये जाने से पूर्व दही-मीठा खाकर निकलो। बाहर एक कलश रख दिया जाता है जिसकी जाते समय बन्द ना की जाती है। ऐसा करने के लिये हमारी मां-बहनें-बुज़ुर्ग कहते हैं। साथ यह भी सच है कि सदा हमारी कामनायें पूरी नहीं हो जातीं। फिर भी हम यह सब कुछ करते जाते हैं। वस्तुत: हमारे ही मन में कुछ भ्रान्तियां या भ्रम हैं जिनका फायदा वह लोग उठाते हैं जो भोली-भाली जनता को इस बहाने लूटना चाहते हैं। पीछे एक टीवी चैनल हमारे अग्रणी क्रिकटरों की भ्रान्तियों या भ्रमों की चर्चा कर रहे थे। यह सब निजी मामले हैं। इन को तर्क की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है। हम रातों-रात करोड़पति बन जाना चाहते हैं। मनचाहा पद चाहते हैं। किसी को हटाकर मन्त्री, मुख्य मन्त्री या प्रधान मन्त्री बन बैठना चाहते हैं चाहे हम उस योग्य हों या न। हमारा विश्वास हो गया है कि कोई बाबा-तांत्रिक-ज्योतिषी ऐसा करिश्मा कर सकता है। हम समझते हैं कि ऐसे महानुभाव उस नामुराद बेइलाज बीमारी से भी हमें छुटकारा दिलवा सकते हैं, जिसके इलाज के लिये बड़े से बड़े डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये हों। तब हम अपना सब कुछ लुटाने के लिये तैयार हो जाते हैं। तो फिर इसमें दोष किसका?

हम किसी डाक्टर के पास जाते हैं। वह कहता है कि तुम ठीक हो जाओगे। उसे मुंहमांगी फीस देते हैं। बड़े से बड़े अस्पतालों में जातें हैं। सभी कहते हैं कि आप ठीक हो जायेंगे। क्या सभी ठीक हो जाते हैं? हम अपना मामला लेकर वकील के पास जाते हैं। वह कहता है कि तुम्हारा मामला बड़ा ठोस है। वह कचहरी में मुकद्दमा दाखिल करवा देता है। क्या सब जीत जाते हैं? निर्मल बाबा हमारे पास नहीं आये। हम उनके पास गये। जो फीस मांगी वह दी क्योंकि हमें कोई चमत्कार चाहिये, करिश्मा चाहिये। हम सोच-समझ कर क्यों नहीं गये? कोई कहता है कि अपने ही बच्चे को जि़न्दा ज़मीन में गाड़ दो चमत्कार हो जायेगा। हम क्यों अपनी तर्क शक्ति को तिलांजलि देकर अपने ही बच्चे को मारने के लिये तैयार हो जाते हैं? हैरानी की बात तो यह है कि जो मीडिया आज निर्मल बाबा के झूठ की बखियां उधेड़ रहे हैं वही उनके विज्ञापन भी प्रसारित करते थे। क्या उनकी कोई जि़म्मेदारी नहीं है? आरोप तो यह भी लग रहे हैं कि जो आज बाबा के पीछे पड़े हैं वही उनसे विज्ञापन की खासी बड़ी रकम मांग रहे थे। सच क्या है यह तो जाने बाबा या मीडिया। एक बात और उठ रही है। क्या कारण है कि मीडिया केवल हिन्दू धर्म से जुड़े लोगों को ही नंगा करने में लगा है? जो गलत कर रहा है उसका सच तो बाहर आना ही चाहिये। उसे सज़ा तो मिलनी ही चाहिये। पर क्या ऐसा ढोंग और पाखण्ड अन्य पन्थों-सम्प्रदायों में नहीं हो रहा? फिर मीडिया उनका पर्दाफाश क्यों नहीं करता? इस शंका का समाधान तो मीडिया को ही करना होगा।

लेखक अम्बा चरण वशिष्ठ जाने-माने स्‍तंभकार हैं। हिंदी और अंग्रेजी के तमाम समाचार-पत्रों में लगातार लेखन। संप्रति नई दिल्‍ली में एक राजनीतिक पाक्षिक पत्रिका से संबद्ध।

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