परिवर्तनगामी चेतना के संवाहक थे गोरख : चितरंजन सिंह

: हिंदी विवि में गोरख का महत्‍व : संदर्भ वर्तमान भारतीय परिदृश्‍य विषय पर हुआ विशेष व्‍याख्‍यान : वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के बौद्ध अध्‍ययन केंद्र व डॉ.अंबेडकर केंद्र द्वारा गोरख का महत्‍व : संदर्भ वर्तमान भारतीय परिदृश्‍य विषय पर आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान के दौरान मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह ने कहा कि गारेख पांडे परिवर्तनगामी चेतना के संवाहक थे। वे छात्र जीवन में ही नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े और सामाजिक परिवर्तन के‍ लिए वैचारिकी के माध्‍यम से छात्रों, युवाओं को प्रेरित करते रहे। दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए केवल विवेचना ही नहीं अपितु नज़रिया भी होना चाहिए। गोरख कहते थे जितनी जल्‍दी हो दुनिया को बदल दो। आज जो लोग प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की बात करते हैं, उनको कैद किया जा रहा है, दंडित किया जा रहा है।

विश्‍वविद्यालय परिसर स्थित गोरख पांडे छात्रावास में आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह की अध्‍यक्षता विश्‍वविद्यालय के राइटर-इन-रेजीडेंस वरिष्‍ठ साहित्‍यकार से.रा.यात्री ने की। इस दौरान अनुवाद व निवर्चन विद्यापीठ के स‍हायक प्रोफेसर व छात्रावास अधीक्षक डॉ.रामप्रकाश यादव मंचस्‍थ थे। चितरंजन सिंह ने गोरख पांडे जैसे संवेदनशील रचनाकार का नाम छात्रावास को देने पर कुलपति विभूति नारायण राय को धन्‍यवाद देते हुए आशा जतायी कि यहां के छात्र भी गोरख पांडे जैसे परिवर्तनगामी विचारधारा के निकलेंगे। उन्‍होंने समकालीन व्‍यवस्‍था का जिक्र करते हुए कहा कि 42 साल से लोकपाल बिल संसद में है। लोकपाल बिल के अंतर्गत मंत्री और प्रधानमंत्री को क्‍यों नहीं आना चाहिए। आज राजनीतिक तंत्र बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों से लयबद्ध हैं। जनकल्‍याण के नाम पर अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष व विश्‍व बैंक की षडयंत्रकारी घुसपैठ जारी है। आज गरीबी व असमानता बढ़ी है।

उन्‍होंने कहा कि सरकार कहती है कि हम सुपर पावर बनने जा रहे हैं। यह कैसी खुशहाली का आलम है कि, अनाज गोदामों में सड़ रहे हैं और गरीब, किसान भूखे मर रहे हैं। ढाई लाख से अधिक किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली। अर्जुन सेनगुप्‍ता कमिटी की रिपोर्ट है कि इस देश में 77 प्रतिशत लोग 20 रूपये से कम में गुजारा करते हैं। सरकार नए-नए कानून बनाकर जल, जंगल, जमीन को बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के हवाले कर रही है। जो भी जल, जंगल, जमीन को बचाने की बात करते हैं, हाशियाकृत समाज के अधिकारों के बारे में बात करते हैं, सरकार उनको दोषी मानकर मुकदमा चलाती हैं। पीयूसीएल कार्यकर्ता विनायक सेन आदिवासियों के हित के लिए काम कर रहे थे, उन्‍हें माओवादी संगठनों से जुड़े होने का हवाला देकर कैद किया गया, हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनायी, सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। सरकार सलवा जुडूम के माध्‍यम से बड़ी संख्‍या में ग्रामीणों के साथ दुर्व्‍यवहार व हिंसा करवा रही है।

छत्‍तीसगढ़ के 640 गांवों को खाली करा दिया क्‍योंकि वहां लौह अयस्‍क है, ताकि उस क्षेत्र पर कब्‍जा किया जा सके। 5 जुलाई को सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कैसे इनको हथियार मुहैया कराए गए। कामनवेल्‍थ गेम हुआ तो डेढ़ लाख बेसहारा लोगों को दिल्‍ली से भगा दिया गया। इस देश में मेहनत व शारीरिक श्रम करने वालों के बारे में नहीं सोचा जा रहा है। गोरख पांडे बहुत आगे की सोचते थे, उन्‍हों‍ने कहा था कि समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी। गोरख का सपना था इस देश में खुशहाली आएगी। वे वर्तमान समस्‍याओं से त्रस्‍त होकर सिजोफ्रेनिया के शिकार हो गए। आज पूरी स्थिति देश को विनाश करने पर तुली हैं। हम कैसे बेहतर मनुष्‍य बन सकते हैं। शोषण मुक्‍त समाज कैसे बना सकते हैं। देश की बागडोर किससे हाथ में है। यहां के युवा इस देश की दशा को समझने के लिए अध्‍ययन करें ताकि कार्पोरेट शक्तियों के खिलाफ लड़ने की क्षमता विकसित हो सके।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में से.रा.यात्री ने हमारी शासन व्‍यवस्‍था किनके हाथों में है और कहां से संचालित होती है, का जिक्र करते हुए कहा कि ये वर्ल्‍ड बैंक के दलालों के हाथ से संचालित हो रही हैं। अमेरिका ने भोगी संस्‍कृति को पैदा किया। अमेरिका में पिछले 50 वर्षों से पनप रहे भोगी समाज में पूंजीवादी लोगों द्वारा अकूत संपत्ति जमा करने की होड़ मची है, नतीजा यह हुआ कि संपत्ति चंद धन कुबेरों के पास संग्रहित हो गयी। दुनिया में बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अपने व्‍यापार के माध्‍यम से साम्राज्‍य स्‍थापित करना चाहती हैं। भारत में भी टाटा, अंबानी, मित्‍तल जैसे कुछ ही लोगों के पास अकूत संपत्ति है। असमानता की खाई इतनी चौड़ी है कि इसे पाटा नहीं जा सकता। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के निशाने पर मध्‍यम वर्ग हैं। पूंजीपति तबका उनको अपना उपभोक्‍ता मानकर सारी सुख-सुविधाएं दे रहे हैं। आज मध्‍य वर्ग को ऐसा सपना दिखाया जा रहा है कि वे दलित, शोषित, वंचित की ओर आंख उठाकर भी नहीं देख पाते हैं। यहां के विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वे अपने आप को सिर्फ डिग्री तक सीमित न रखें अपितु एक बेहतर समाज के निर्माण में कुछ नया कर पाएं। 

कार्यक्रम का संचालन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के रिसर्च एसोसिएट लक्ष्‍मण प्रसाद ने किया तथा डॉ.रामप्रकाश यादव ने आभार व्‍यक्‍त किया। इस अवसर पर डॉ.सुरजीत सिंह, ज्‍योतिष पायेंग सहित बड़ी संख्‍या में विश्‍वविद्यालय के शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे। प्रेस रिलीज

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