सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को क्रियान्वित करवाना योगी के लिए बड़ी चुनौती

अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों से दो माह के अंदर सरकारी आवास खाली कराने का आदेश राज्य सरकार को दिया है। इस आदेश का देश की जनता भले ही स्वागत कर रही हो , लेकिन यह राज्य के उन सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को रास आएगा यह कहना मुश्किल है। राज्य के एक प्रमुख राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश पर अपनी पीड़ा का सार्वजनिक रूप से इजहार करने से भी परहेज नही किया। उन्होंने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली करा लेने से जाने कौन सी देश की हालत सुधर जाएगी। मुलायम सिंह यादव ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हम ही अकेले प्रभावित नही हो रहे है ,बल्कि देश के कई अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी प्रभावित हो रहे है। एक दो मुख्यमंत्रियों को छोड़कर किसी के पास अपना मकान नही है।

उत्तरप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव व उनके बेटे अखिलेश यादव अभी भी सरकारी बंगले में रह रहे है। इसके अलावा एनडी तिवारी,कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह ,वीरबहादुर सिंह ,मायावती आदि के नाम पर पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में बंगलें आवंटित है। सर्वोच्च न्यायालय ने दो माह की अवधि में इनसे बंगलें खाली कराने का आदेश दिया है। विदित हो कि इनमे कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास दूसरे भी सरकारी आवास है,परंतु उनमे से किसी ने भी लखनऊ का सरकारी आवास छोड़ने की स्वमेव इच्छा व्यक्त नही की है।

कोर्ट का यह आदेश नया नही है। इससे दो वर्ष पूर्व भी कोर्ट ने तत्कालीन अखिलेश सरकार को पूर्व मुख्यमंत्रियों से बंगला खाली कराने का आदेश दिया था,किन्तु इसके उलट अखिलेश सरकार ने पुराने कानून में संसोधन कर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन शासकीय आवास रखने के लिए पात्र कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरप्रदेश की पूर्व अखिलेश सरकार द्वारा उस कानून में किए गए प्रावधान को ही रद्द कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में प्राकृतिक संसाधन, शासकीय भूमि, सरकारी बंगलें या कार्यालय जैसी संपत्ति पर केवल जनता का ही हक बताया है।

सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश का पालन दो माह की अवधि के अंदर किया जाना है। अब देखना यह है कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अक्षरश पालन करने में कितनी ईमानदारी दिखाती है। इस मामले में उन पूर्व मुख्यमंत्रियों से क्या यह अपेक्षा नही की जा सकती है कि वह न्यायालय द्वारा तय की सीमा के अंदर ही शासकीय आवास खाली कर नैतिकता का परिचय दे।

यहां यह बात गौर करने लायक है कि केवल उत्तरप्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों में भी कमोवेश यही स्थिति देखी जा सकती है। दूसरे राज्यों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिए है कि वे अपने स्तर पर निर्णय ले। दरअसल उत्तरप्रदेश में में पूर्व अखिलेश सरकार द्वारा कानून में किए गए संसोधन के कारण ही यह स्थिति निर्मित हुई थी, इसलिए न्यायालय का यह आदेश उक्त संसोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर ही आया है। इसके तहत ही अन्य राज्यों की सरकारों से कहा गया है कि वे अपने स्तर से ही फैसला ले। अब देखना यह है कि अन्य राज्यों की सरकारें इस संबंध में कोई तत्परता दिखाती है या नही।

गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों में भी ऐसे ही पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास में रहने की सुविधा प्रदान की गई है। इतना ही नही अन्य प्रभावशाली नेताओ ओर अन्य वर्गों की महत्वपूर्ण हस्तियों को किसी संस्था अथवा संगठन के नाम पर आवास ,भवन या कार्यालय उपलब्ध कराया गया है। इनमे ऐसी भी संस्थाएं है ,जो केवल कागजों तक ही सीमित है। धर्मार्थ संस्थाओं के नाम पर भी ऐसी सुविधाएं प्राप्त करने वालों की कमी नही है। यह सब उन्हें आसानी से मिल जाता जिनका संबंध राजनीतिक हस्तियों से गहरा होता है,जबकि कई बार यह भी देखा जाता है कि पात्र व्यक्ति भी इससे वंचित रह जाता है। खैर अदालत का आदेश अब आ गया है। उसकी समय सीमा भी तय कर दी गई है। अब उत्तरप्रदेश की योगी सरकार को तय करना है कि वह कितनी जल्दी कार्यवाही करती है। इसके साथ ही बाकी राज्य भी इसमे जितनी जल्दी रुचि लेंगे उतनी जल्दी ही जनता के सिर से बोझ कम होगा।

लेखक कृष्णमोहन झा राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.