The worldwide economic crisis and Brexit

Brexit is a product of the worldwide economic recession, and is a step towards extreme nationalism, growth in right wing politics, and fascism. What is the cause of this recession, and what is the solution ? This is what will be examined here. For quite some time there has been an economic recession all over the world. From time to time we hear of a recovery, but in fact there has not been, and there is unlikely to be, a genuine recovery of the world economy for a long time. I will try to explain.

धार्मिकता को एक अकेली बात में सिकोड़ा जा सके तो वह है तादात्म्य का न होना

बुद्ध ने कहा है कि जब मैंने जाना तो मैंने पाया है कि अदभुत हैं वे लोग, जो दूसरों की भूल पर क्रोध करते हैं! क्यों? तो बुद्ध ने कहा कि अदभुत इसलिए कि भूल दूसरा करता है, दंड वह अपने को देता है। गाली मैं आपको दूं और क्रोधित आप होंगे। दंड कौन भोग रहा है? दंड आप भोग रहे हैं, गाली मैंने दी! क्रोध में जलते हम हैं, राख हम होते हैं, लेकिन ध्यान वहां नहीं होता! इसलिए धीरे-धीरे पूरी जिंदगी राख हो जाती है। और हमको भ्रम यह होता है कि हम जान गये हैं! हम जानते नहीं– क्रोध की सिर्फ स्मृति है और क्रोध के संबंध में शास्त्रों में पढ़े हुए वचन हैं और हमारा कोई अनुभव नहीं।

पूर्णता एक विक्षिप्त विचार है, अपने अपूर्ण और सामान्य होने का आनंद लो

पूर्णता एक विक्षिप्त विचार है। भ्रष्ट न होने वाली बात मूर्ख पोलक पोप के लिए उचित है पर समझदार लोगों के लिए नहीं। बुद्धिमान व्यक्ति समझेगा कि जीवन एक रोमांच है, प्रयास और गलतियां करते हुए सतत अन्वेषण का रोमांच। यही आनंद है, यह बहुत रसपूर्ण है! मैं नहीं चाहता कि तुम परफेक्ट हो जाओ। मैं चाहता हूं कि तुम जितना संभव हो उतना परफेक्टली, इनपरफेक्ट होओ। अपने अपूर्ण होने का आनंद लो! अपने सामान्य होने का आनंद लो!

यूपी में कांग्रेसी कुछ ऐसा माहौल बना रहे जैसे वह खुद सत्ता के सबसे बड़े दावेदार हों!

अजय कुमार, लखनऊ

यूपी में अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तेजी चौकाने वाली है। कांग्रेस आलाकमान ने देश भर के अपने तमाम धुरंधरों को मिशन यूपी पर लगा दिया है। कांग्रेस से जुड़ी खबरें मीडिया में सबसे अधिक सुर्खिंया बटोर रही हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब कांग्रेस खेमे से कोई चौका देने वाली खबर न आती हो। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत कुमार(पीके)जब से कांग्रेस के साथ आये हैं तब से कांग्रेस मेें कुछ अधिक बेचैनी देखने को मिल रही है। इस पर गुलाम नबी आजाद को यूपी का प्रभारी बनाया जाना ‘सोने पर सुहागा’ साबित हो रहा है। उम्मीद है कि देर-सबेर यूपी कांग्रेस को निर्मल खत्री की जगह नया प्रदेश अध्यक्ष भी मिल जायेगा। सब कुछ चुनावी बिसात के लिये किया जा रहा है।

अमेरिकी संसद में नरेंद्र मोदी को पारदर्शी तख़्ती ने बनाया हिट जिस पर लिखा था पूरा भाषण

प्रधानमंत्री मोदी की हिन्दी और मिस्टर प्राइम मिनिस्टर मोदी की अंग्रेज़ी..

प्रधानमंत्री मोदी की हिन्दी और मिस्टर प्राइम मिनिस्टर मोदी की अंग्रेज़ी.. भारत के दो प्रधानमंत्री हैं। एक हिन्दी बोलने वाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और दूसरे अंग्रेज़ी बोलने वाले मिस्टर प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी। एक जो गांव गांव में हिन्दी बोलते हैं और दूसरे जो अंतरर्राष्ट्रीय सभाओं में अंग्रेजी बोलते हैं। हमारे देश में भाषा के विकास और विस्तार में साहित्यकारों, फ़िल्मकारों और पत्रकारों की चर्चा तो होती है लेकिन नेताओं के योगदान की कम चर्चा होती है। प्रधानमंत्री भाषा का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। समय समय पर इस आधार पर भी मूल्याकंन होना चाहिए।

अलविदा रिलायंस सीडीएमए

रिलायंस की सीडीएमए सेवा अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। रिलायंस ने अपने सभी सीडीएमए कस्टमर्स को जीएसएम के 4G नेटवर्क में अपग्रेड करना शुरु कर दिया है। 93 नंबर से शुरु होने वाली रिलायंस की सीडीएमए सेवा की अब तक अपनी अलग पहचान रही है। जीएसएम में अपग्रेड होने के बाद अब इस नंबर का अस्तित्व तो रहेगा, लेकिन सीडीएमए वाली पहचान नहीं रह पाएगी। वर्षों से रिलायंस सीडीएमए फोन का इस्तेमाल करने वाले मेरे जैसे लोगों का इससे कितना लगाव रहा है, इसकी बयां शब्दों में करना मुश्किल प्रतीत हो रहा। रिलायंस से मेरा गहरा लगाव रहा है। आज से 14 साल पहले हुई लॉन्चिंग के शुरुआती दिनों में ही रिलायंस सीडीएमए से मेरा संबंध जुड़ गया था। तब पटना में हुआ करता था, और अब दिल्ली में। लेकिन रिलायंस सीडीएमए फोन हमेशा मेरे साथ रहा। हां, इस दौरान कई बार मेरे फोन नंबर बदल गए, लेकिन क्या मजाल कि सीडीएमए छोड़कर जीएसएम सर्विस की तरफ कभी आंख उठाई हो।

Nuclear deal with the US would mean destruction for Indian people and environment

The joint declaration issued by India and the United States during the Prime Minister’s visit is shocking as it effectively celebrates the undermining of India’s sovereign Nuclear Liability Act, passed by the parliament in 2010 to ensure justice to the victims in case of an accident. The joint statement holds India’s signing of the Convention on Supplementary Compensation (CSC) as “strong foundation” for building US-imported nuclear power plants in India. The CSC is a template promoted by international nuclear lobbies, channeling the entire liability to the operator of plants and exempting the supplier companies. In case of a future nuclear accident in India, this would create a situation worse than Bhopal, whose victims continue to struggle for justice.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों को जनता के बड़े तबके से अलगाव के कारणों की छानबीन करनी चाहिए : अखिलेंद्र प्रताप सिंह

पांच राज्यों के चुनाव पर कुछ बातें लोगों के सामने उभरकर आ रही थीं। केरल में वाम मोर्चे की सरकार बनेगी, असम में भाजपा सरकार बना सकती है और पश्चिम बंगाल में ममता की वापसी हो सकती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि केरल में वाम मोर्चे को, असम में भाजपा को और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को इतनी अधिक सीटें मिलेंगी। दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों में तमिलनाडु में इतनी कांटे की टक्कर होगी, ऐसा भी नहीं सोचा जा रहा था। बहरहाल, पांच राज्यों के चुनावों में जो बात उभरकर आयी है वह यह है कि कांग्रेस के राजनीतिक प्रभाव में और गिरावट आयी है और भाजपा राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी बनकर उभर रही है। हालांकि, कांग्रेस के मत प्रतिशत में कोई खास गिरावट नहीं है। असम में आज भी वह भाजपा से आगे है। पश्चिम बंगाल में उसका वोट बढ़ा है, पांडिचेरी में उसकी सरकार बनी है और तमिलनाडु में भी लोकसभा चुनाव की तुलना में वोट बढ़ा है और पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में सीटें बढ़ी हैं। वहीं यदि केरल को छोड़ दिया जाए जहां भाजपा के मतों में लोकसभा चुनाव की तुलना में 0.05 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और हर राज्य में लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के मतों में गिरावट हुई है। पांच राज्यों की 824 सीटों में भाजपा को महज 64 सीटें ही मिली हैं फिर भी उसे एक विकासमान पार्टी के बतौर लोग देख रहे हैं जो कांग्रेस को बेदखल करती जा रही है।

पश्चिमी यूपी फिर सियासत की प्रयोगशाला

लखनऊ : ऐसा लगता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी मथुरा में खौफनाक हादसे के बाद उठे सियासी भूचाल, दादरी की घटना में नये मोड़ और मुजफ्फरनगर दंगों की आड़ में सियासी सूरमा एक बार फिर चुनावी बिसात बिछाने में जुट गये हैं।वेस्ट यूपी में जो सियासी मंजर दिखाई दे रहा है उससे तो यही लगता है कि 2017 के विधान सभा चुनाव में तमाम राजनैतिक दल अपनी विजय गाथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही लिखना चाहते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जिस तरह से तमाम राजनैतिक दलों ने अपना सियासी अखाड़ा बना रखा है वह चौकाने वाली घटना भले ही न हो लेकिन प्रदेश के अमन-चैन के लिये खतरे की घंटी जरूर है। एक बार फिर पश्चिमी यूपी वहीं खड़ा नजर आ रहा है जहां वह 2014 के लोकसभा चुनावों के समय खड़ा था। यहां रोज कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है जिससे सियासतदारों को अपनी सियासी फसल उगाने के लिये यह क्षेत्र ‘सोना उगलने वाली जमीन’ नजर आ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 में भी पश्चिमी यूपी तमाम दलों के लिये सियासी प्रयोगशाला बनती नजर आ रही है। यहां ऐसे ही बड़े-बड़े राजनेता दस्तक नहीं दे रहे हैं।

मथुरा कांड का एक पहलू यह भी : जवाहर बाग को चौतरफा घेरकर आग लगाने के बाद पुलिस ने धुआंधार फायरिंग में सैकड़ों को मार डाला!

सरकार के संरक्षण में सार्वजनिक सम्पदा की लूट के कारण हुई मथुरा की घटना : उच्च न्यायालय के न्यायाधीश करें जांच, आश्रमों को दी जमीनों की भी हो जांच : जांच टीम ने किया मथुरा का दौरा, राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह को सौपेंगे रिपोर्ट

आगरा : जवाहर बाग की घटना ने उत्तर प्रदेश में सरकार के संरक्षण में जारी सार्वजनिक सम्पदा की लूट के सच को सामने लाया है। इस घटना में साफ तौर पर यह दिखता है कि उ0 प्र0 में कानून का राज नहीं है और न्यायालयों तक के आदेश निष्प्रभावी हो जाते है। जवाहरबाग में कब्जा की गयी 280 एकड़ जमीन की अनुमानित कीमत 56 अरब रूपए थी। जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक नगर कार्यालय और जिला मुख्यालय के बगल में खुलेआम उद्यान विभाग के सार्वजनिक पार्क की इतनी कीमती जमीन पर दो साल से भी ज्यादा समय से अवैध कब्जा बरकरार रखना सरकार के संरक्षण के बिना सम्भव नहीं है।

चंदोखर की हत्या पर मौन हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

अखिलेश सरकार ने प्रदेश भर के तालाबों की भूमि पर से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन सरकार का निर्देश बुंदेलखंड के बाहर जाकर निरर्थक सा हो जाता है, क्योंकि प्रदेश के अधिकांश जिलों के तालाब माफियाओं और दबंगों के कब्जे में हैं। हाल-फिलहाल बदायूं जिले का चंदोखर नाम का प्राचीन तालाब चर्चा का विषय बना हुआ है। जिस प्रकार चरखारी के तालाबों का दो सौ वर्ष पुराना इतिहास है। चरखारी के तालाब चन्देल राजाओं द्वारा बनवाए गए थे, उसी प्रकार बदायूं शहर के चंदोखर तालाब का भी प्राचीन इतिहास है, यह राजा महीपाल द्वारा बनवाया गया था, जिसका नाम चंद्रसरोवर था, जो अब चंदोखर के नाम से जाना जाता है।

यूपी में कार्यरत 416 आईपीएस अफसरों में से कोई भ्रष्ट नहीं!

यूपी में भ्रष्टाचार को लेकर भले ही राजनैतिक गलियारों से लेकर गली-मोहल्लों के नुक्कड़ तक घमासान मचा हो और भले ही यूपी की बदहाल कानून व्यवस्था के लिए पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को एक प्रधान कारक माना जाता हो पर सरकारी रिकॉर्ड में यूपी की कानून व्यवस्था के रखवाले कहे जाने वाले वर्तमान कार्यरत 416 आईपीएस अधिकारियों में से कोई भी भ्रष्ट नहीं है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 416 आईपीएस अधिकारियों में से न तो किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी मामलों की कोई जांच लंबित है और न ही इनमें से किसी के भी खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति का कोई भी मामला शासन स्तर पर लंबित है.

सडेन कार्डियक अरेस्ट के शिकार युवा आईएएस अधिकारी का सावित्री आसन से प्राथमिक उपचार किया गया होता तो जान बच गई होती

Sanjay Sinha : आपने खबर पढ़ी होगी कि दो दिन पहले उत्तराखंड के एक आईएएस अधिकारी नोएडा के मॉल में अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ खाना खा रहे थे, तभी उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। 39 साल के इस आईएएस अधिकारी का नाम था- अक्षत गुप्ता। ये उधमसिंह नगर में कलेक्टर थे। इनकी पत्नी भी आईपीएस अधिकारी हैं और ये परिवार उत्तराखंड से नोएडा घूमने-फिरने के ख्याल से आया था। यह बताने के लिए आज मैं पोस्ट नहीं लिख रहा कि वो कितने लोकप्रिय अधिकारी थे, कितनी मेहनत करके वो आईएएस अधिकारी बने थे, या उनके दोनों बच्चे कितने छोटे हैं। मैं आज सिर्फ अागाह करने के लिए पोस्ट लिख रहा हूं कि उस अधिकारी के साथ अचानक जो हुआ, वो किसी के साथ कभी भी कहीं भी हो सकता है।

रामवृक्ष यादव तो मोहरा था… जय गुरुदेव से लेकर, आसाराम तक और रामपाल से लेकर परमानंद और नित्यानंद तक की यही कहानी है….

Navin Kumar : रामवृक्ष यादव तो मोहरा था। किसी गुरुदेव, उसकी दौलत और राजनीति के गठजोड़ का। वह पहला भी नहीं था आखिरी भी नहीं है। जंगलों में धूनी रमाने वाले, कंदमूल पर जीने वाले अनासक्त बाबाओं को जब से रुपया कमाने की लत लगी, आलीशान आश्रम बनाने की लत लगी, टीवी के कैमरों पर चमकने की लत लगी, कारोबार करने की लत लगी तभी से ऐसे गठजोड़ बनने शुरू हुए। सुना था कि संत मृत्यु से नहीं डरते। लेकिन बाबा जब इतना डरपोक होगा कि एक्स वाई ज़ेड टाइप की सुरक्षा लिए बगैर चल ही न सके तो समझ लीजिए वह आध्यात्म के धरातल पर कहां खड़ा है।

प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम वेतन कब

हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अनुभव होता है जो सोचने पर मजबूर करता
है। ऐसे अनुभवों में मैं पिछले महीने से जूझ रहा हूं। ये मेरा व्यक्तिगत
अनुभव है लेकिन सही मायने में ये दर्द हर उस व्यक्ति का है जो जीना चाहता
है, सम्मान की जिंदगी चाहता है। भारत में रहने वाले उन करोड़ों लोगों की
कहानी है। इसमें मजदूर से लेकर महीने पगार पाने वाले कामगार, ठेके पर
मजदूरी करने वाले या किसी कंपनी में कंप्यूटर वर्क करने वाले यहां तक की
पत्रकार, शिक्षक, हर वो कोई जो अपने हाथों से मेहनत करता है, उसके बदले
उस बेहतर जिंदगी के लिए उचित वेतन पाने का अधिकार है। लेकिन इन प्राइवेट
क्षेत्रों में सही सरकारी नीति का न होना व कामगारों के लिए ठोस कानून का
नहीं होना, यहां पर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी होम कर रहे हैं। कम वेतन  व
काम के अधिक घंटे उनके प्रकृतिक जीवन के साथ खिलवाड़ है। बेगारी व शोषण
के शिकार  ऐसे लोग उन नियोक्ता के लिए काम करते हैं, जो वाता​नुकूलित
ढांचों में सांसें लेते हैं और काम कराने के लिए ऐसे वर्गों का उदय किया
है जो बिल्कुल अंग्रेजों के जमीदारों के भूमिका में है, ऐसे चुनिंदा
मैनेजर जो अपनी अच्छी सैलरी के लिए अपने निचले स्तर के कर्मचारियों का
शारीरिक व मान​सिक शोषण करते हैं। बारह से सोलह घंटे का करने वाले ये
मानव भले ही लोकतंत्र के छत्रछाया में जी रहे हों लेकिन सही मायने में
लोकतंत्र तो इनके नियोक्ता के ​लिए ही है।

मोदी सरकार का सबसे बड़ा संकट है अपेक्षित विनम्रता का अभाव

बौद्धिक वर्ग से रिश्ते सुधारे मोदी सरकार, अच्छी नीयत से किए गए कामों को भी चाहिए लोकस्वीकृति

अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने के बाद नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक ब्रांड बने हुए हैं। उनसे नफरत करने वाली टोली को छोड़ दें तो देश के आम लोगों की उम्मीदें अभी टूटी नहीं हैं और वे आज भी मोदी को परिणाम देने वाला नायक मानते हैं। देश की जनता से साठ माह में राजनीतिक संस्कृति में परिर्वतन और बदलाव के नारे के साथ इस सरकार ने 24 माह में अपनी नीयत के जो पदचिन्ह छोड़े हैं, उससे साफ है कि सरकार ने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने और कोयले, स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों की पारदर्शी नीलामी से एक भरोसा कायम किया है। देश की समस्याओं को पहचानने और अपनी दृष्टि को लोगों के सामने रखने का काम भी बखूबी इस सरकार ने किया है। राज्यसभा के विपरीत अंकगणित के चलते कुछ जरूरी कानून जैसे जीएसटी अटके जरूर हैं, किंतु सरकार की नीयत पर अभी सवाल नहीं उठ रहे हैं।

नेपाल का माओवादी आंदोलन : एकता के नारे और विसर्जन की राजनीति

तेज आर्थिक विकास के सुपरसोनिक दौर में क्रांति की रफ्तार भी तेज होनी चाहिए। शायद इसलिए नेपाल के संसदीय माओवादी क्रांति जल्द पूरा कर लेना चाहते हैं। फौरन से पेशतर। तो क्या अगर इसके लिए कुछ मामूली ‘समझौते’ करने पड़े। जैसे, सर्वहारा की तानाशाही जैसे ‘बदनाम’ नारे को छोड़ना पड़े। ‘लोकतंत्र’ के दौर है तानाशाही की बात करना जड़सूत्रवाद है। ऐसे ही और तर्को के साथ नेपाल का माओवादी आंदोलन खुद को ‘नई’ विश्व मान्यता के अनुरूप ढालने, ‘विश्व जनमत’ का भरोसा जीतने और ‘नई’ तरह की क्रांति करने के काम में व्यस्त है। कुल मिला कर वह मार्क्सवादी या नेपाल के संदर्भ में माओवादी क्रांति को पूरा करने के लिए मार्क्सवाद और माओवाद से समझौता करने, यहां तक कि उससे पीछा छुड़ाने को तैयार है! नतीजतन नेपाल का माओवादी आंदोलन तेजी से विखरता जा रहा है।

आरजी पर भारी पीके : पुराने कांग्रेसी घुटन में… बड़ी साज़िश का अंदेशा…!

नई दिल्ली : क्या देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी इन दिनों किसी बड़ी साज़िश का शिकार हो रही है? क्या कांग्रेस के अंदर ही राहुल गांधी पर प्रशांत किशोर हावी होते जा रहे हैं?  क्या जिस प्रशांत किशोर को कांग्रेस ने अपनी नय्या पार लगाने के लिए मोटी रकम अदा की है, वो बीजेपी द्वारा कांग्रेस में फिट गये मोहरे तो नहीं ? क्या बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के प्लान पर  पीके आज भी  काम तो नहीं कर रहे ? क्या कई साल से हाशिये पर पड़ी कांग्रेस का सच्चा समर्थक और कार्यकर्ता वर्तमान में उपेक्षा और घुटन महसूस कर रहा है? क्या कांग्रेस को दोबारा खड़ा करने के नाम पर कोई बड़ी साज़िश तो नहीं रची जा रही है?

The truth about ‘Veer’ Savarkar : …what was so ‘veer’ about Savarkar?

Today is the birth anniversary of ‘Veer’ Savarkar (1883-1966). Many people have praised him as a great freedom fighter, but what is the truth about him? The truth is that many nationalists during British rule were arrested by the British, and given long sentences.  In jail the British authorities would give them an offer : either collaborate with us, in which case we will free you, or rot in jail for the rest of your life.

ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए बड़ा झटका, भाजपा के लिए खतरे की घंटी

पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुंडुचेरी के चुनाव परिणामों के जिस तरह के नतीते आए हैं, वह ममता बनर्जी और जयललिता के लिए तो बड़ी उपलब्धि है। बाकी कांग्रेस, वामपंथी और भाजपा के लिए चिंता और चिंतन का विषय है। असम में भाजपा की जीत को असमिया जनता के जायका बदलने इच्छा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सियासत के रूप में देखना-समझना होगा। पांचो राज्यों के चुनाव परिणाम का एक सार यह भी है कि मोदी सरकार के अच्छे दिनों के दावे को जनता ने खारिज कर दिया है और इस तरह भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।