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एनडीटीवी के स्पोर्ट्स एडिटर संजय किशोर ने भी इस्तीफ़ा दे दिया!

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रवीश कुमार के बाद अब वरिष्ठ खेल पत्रकार और एनडीटीवी के स्पोर्ट्स एडिटर संजय किशोर ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है। एनडीटीवी इंडिया के शुरुआती दिनों से साथ रहे संजय क़रीब 20 साल तक क्रीज़ पर डटे रहे। इस लंबी पारी के दौरान कई तूफ़ान और चक्रवात आए लेकिन संजय आउट नहीं हुए। अब जब एनडीटीवी में अधिग्रहण और बदलाव का दौर चल रहा है तो संजय ने ख़ुद को ’रिटायर्ड हर्ट’ कर लिया है।

संजय का कहना है कि ‘ऑफ़र’ ही ऐसा है जिसे ठुकराया नहीं जा सकता था वरना ख़्वाहिश तो थी की एनडीटीवी से ही संन्यास लेते। दिल्ली के ग्रेटर कैलाश वन में अर्चना कॉम्प्लेक्स की दफ़्तर की सीढ़ियाँ आख़िरी बार पूरे परिवार के साथ उतरने की सोची थी। ठीक उसी तरह जैसे ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर संन्यास लेते हैं।

बहुत समय से कहा जा रहा है कि डिजिटल भविष्य है। इस बार आईपीएल के मीडिया अधिकारों के लिए टेलीविजन से ज़्यादा बोली डिजिटल के लिए लगी थी। संजय बदलते वक़्त की नब्ज़ को टटोलते हुए डिजिटल की दुनिया में अगली पारी खेलने जा रहे हैं। संजय किशोर RPSG ग्रुप से जुड़ रहे हैं। RPSG Sports (RP-Sanjiv Goenka Group) की आईपीएल में टीम है-लखनऊ सुपर जाइंट्स और दक्षिण अफ़्रीका में अगले साल शुरु होने वाली नई क्रिकेट लीग में डरबन सुपर जाइंट्स। इसके अलावा ATK मोहन बाग़ान भी। 25 साल के अनुभव को देखते हुए संजय को सीनियर कंटेंट एडिटर की ज़िम्मेदारी दी गई है।

संजय किशोर की स्कूल के दिनों से ही लेखन में रुचि थी। पाँचवीं क्लास में एक लेख को पढ़कर हिन्दी के शिक्षक शैलेंद्र किशोर की टिप्पणी थी-इस उम्र में इससे बेहतर नहीं लिखा जा सकता। शैलेंद्र सर कहते थे कि संजय ने उनका सरनेम चुरा लिया है।दसवीं क्लास में हिन्दी के शिक्षक प्रमोद रंजन सिंह यह तय नहीं कर पा रहे थे कि क्लास के टॉपर को ज़्यादा अंक दें या संजय को। संजय की पत्र-पत्रिकाएँ और किताब पढ़ने में बहुत दिलचस्पी थी। नई किताब की महक से मानो उसको ‘किक’ मिलती थी।

संजय अपनी सोच को दुनिया से साझा करना चाहता था। सोच को शब्दों का पंख मिला और फिर परवाज़। ‘धर्मयुग’, ‘फ़िल्म-फ़ेयर’, ‘जनसत्ता’, ‘संडे मेल’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में विचार छपने लगे। इस दौरान धर्मयुग में आठ बार सर्वश्रेष्ठ पत्र का पुरस्कार मिला। ‘संडे मेल’ में पहला बड़ा आलेख छपा। ‘संडे मेल’ ने दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक सेमीनार का आयोजित किया तो संजय को भी अपने विचार साझा करने के लिए निमंत्रित किया गया। तब पहली बार संजय पटना से दिल्ली आए थे। उस गोष्ठी में ख़ुशवंत सिंह, कन्हैया लाल नंदन, अर्जुन सिंह, सैफ़ुद्दीन सोज़ और संजय डालमिया के सामने संजय को अपनी बात रखने का अवसर मिला। सेमीनार में संजय को मंज़िल मिल गयी। पत्रकारिता के कीट ने काट लिया।

पटना लौटे तो भारत सरकार के प्रतिष्ठान इनलैंड वॉटरवेज ऑथरिटी ऑफ़ इंडिया में जूनियर हिंदी ऑफ़िसर की नौकरी मिल चुकी थी। पटना के बिस्कोमान भवन में होम टाउन पोस्टिंग मिली हुई थी। मगर पत्रकारिता का ज़हर अब तक मन-मस्तिष्क पर चढ़ चुका था। पक्की सरकारी नौकरी छोड़कर संजय पत्रकारिता के मक्का भारतीय जन संचार संस्थान, दिल्ली पहुँच गया। हिन्दी पत्रकारिता और विज्ञापन और जन संपर्क दोनों में उसका चयन हुआ था मगर सीनियर की सलाह पर एडीपीआर की पढ़ाई की। वैसे 1994-95 बैच के हिन्दी पत्रकारिता के कई नाम आज दिग्गज़ बन चुके हैं। रविश कुमार और सुप्रिया प्रसाद आज चौथे खंभे के मज़बूत स्तंभ हैं।

भारतीय जन संचार में संजय की सोच दूसरे विचारों से टकराया तो शब्द और सपनों को नई धार मिली। संस्थान के बाद संघर्ष का दौर था। विज्ञापन की दुनिया में भटकने के बाद कदम वापस पत्रकारिता की ओर ले आए। ख़ुशक़िस्मती कहिए इलेक्ट्रॉनिक्स न्यूज़ मीडिया के शुरुआती उड़ान में सीट मिल गई। तब यानी 1998 में ज़ी न्यूज़ साउथ एक्स में हुआ करता था। बाद में नोएडा शिफ़्ट हुआ।

ज़ी न्यूज़ से 1999 में संजय को काठमांडू में हुए SAF-South Asian Games कवर करने का मौक़ा मिला। उसी साल इंडियन एयरलाइंस का विमान काठमांडू से हाईजैक हुआ था। संजय बताते हैं कि कैसे पूरी रात उन्हें ऑफ़िस की कैब में रूपिन कटयाल के घर के बाहर ठंढ में गुज़ारनी पड़ी थी। 25 साल के कटयाल को हाईजैकर ने मार दिया था। उनका मृत शरीर आने वाला था। ज़ी न्यूज़ में संकट में स्पोर्ट्स वालों को भी बाक़ी बीट पर जाना होता था।

संजय किशोर ज़ी न्यूज़ के स्पोर्ट्स डेस्क का अघोषित हेड बन चुके थे। संजय ने 2002 में श्रीलंका में आईसीसी चैंपियनशिप ट्रॉफ़ी कवर की। विनोद कापड़ी और सतीश के सिंह बॉस थे। संजय ने खूब मसालेदार स्टोरियाँ की। ढेर सारे इंटरव्यू किए। ताज कोलंबो के लॉबी या स्विमिंग पूल के पास बैठे रहते और जैसे ही कोई खिलाड़ी दबोच देता। उनकी मेहनत देख कर एनडीटीवी के जयदीप भंडारकर ने संजय के नाम की अनुशंसा राजदीप सरदेसाई के पास की। इस बीच 2003 का वर्ल्ड कप था। फ़रवरी और मार्च में। संजय ज़ी न्यूज़ की तरफ़ से दक्षिण अफ़्रीका भेजे गए। संजय के करियर का सबसे बड़ा असाइनमेंट था। वर्ल्ड कप से लौटे तो एनडीटीवी से तुरंत बुलावा आ गया। राजदीप ने दिबांग के हवाले कर दिया।दिबांग ने टेस्ट लिया। स्टोरी की सीडी देखी और हामी भर दी। मई 2003 से संजय एनडीटीवी की ओर से बल्लेबाज़ी करते रहे। 2006 में दो महीने के लिए पाकिस्तान दौरा और 2008 में ऑस्ट्रेलिया में सीबी सीरीज़ जीत में संजय गवाह रहे। कॉमनवेल्थ खेलों पर डॉक्यूमेंटरी के लिए एनटी अवॉर्ड मिला था। एक डॉक्यूमेंटरी प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवॉर्ड में रनर्स अप रही थी।

संजय की मज़बूत पक्ष उनकी सृजनात्मक स्क्रिप्ट रही है। आजकल ब्लॉगिंग और Vlog करते हैं। कई Vlog के 1M व्यूज़ हैं। संजय का मानना है कि भारत में खेल संस्कृति अभी विकसित होना शुरू हुई है। खेल को एक घटना के रूप में रिपोर्ट करना पर्याप्त नहीं है। रिपोर्टिंग व्याख्यात्मक और आत्मविश्लेषी होनी चाहिए। संजय अपने को खेल पत्रकार कम खेल कार्यकर्ता मानते हैं। अफ़सोस की न्यूज़ चैनल्स पर स्पोर्ट्स के लिए जगह कम होती जा रही है।

संजय का कहना है कि पत्रकारिता उनका जुनून रहा है। वो ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानते हैं कि जुनून उनका पेशा बना। संजय की सोच की छटपटाहट को खेल सीमित नहीं कर पाया, लिहाज़ा दूसरे मुद्दों पर भी लिखते हैं।

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