स्वराज एक्सप्रेस न्यूज़ चैनल का सच : भाग-2 (सप्पल को संजय का जवाब)

संजय कुमार-

चलिए बात डबलटिक मीडिया कंपनी के पॉलिसी डायरेक्टर, स्वराज एक्सप्रेस चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ यानी ‘गागर में सागर’ गुरदीप सप्पल साहब के जवाब से ही करते हैं। जो खुद उनके गुनाहों की गवाही दे रहा है। पत्रकारिता और कानून को लेकर उसकी गैर जानकारी और नासमझी को दर्शाता है। बाकी निजी हमले और धमकियां हैं, जो किसी काम की नहीं हैं। मुझे लगता है कि गुरदीप सप्पल को पहले इन सवालों के जवाब देने चाहिए।

क्या अच्छी पत्रकारिता का ये मतलब है कि आप अपने यहां काम करने वाले पत्रकारों और दूसरे कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र तक नहीं देंगे, और वो आपके जरखरीद गुलाम बने रहेंगे? आपकी भक्ति में लीन रहेंगे।

क्या आपने लेबर ऑफिस में ये कहने में मालिकों का साथ नहीं दिया कि हमलोग संस्थान के पक्के कर्मचारी नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट वाले कर्मचारी हैं। जबकि हमारा टैक्स कर्मचारी होने की इनकम टैक्स की धारा में काटा गया है? रिटर्न फाइल करने के लिए दिए दस्तावेजों में बतौर अधिकारी आपके नाम भी हैं। इस फर्जीवाड़े पर आप क्या कहेंगे?

आपकी नजर में अच्छी पत्रकारिता का मतलब ये है कि कर्मचारियों को समय पर सैलरी, पीएफ, मेडिकल, ग्रैच्युटी, इंश्योरेंस, अर्न लीव इनकैशमेंट जैसे कानूनी हकों के लिए आवाज नहीं लगानी चाहिए?
आप कहते हैं कि सभी कर्मचारियों को काम के अंतिम दिन तक यानी 7 सितंबर तक की सैलरी दे दी गई है। क्या स्वराज एक्सप्रेस में काम करने वाले पत्रकार दिहाड़ी मजदूर थे? जिस दिन तक काम किया उतने दिन के पैसे दिए और लात मारकर बाहर का रास्ता दिखा दिया? ये आपकी कैसी समझ है।
सैलरी का मतलब समझते हैं आप? जब आप सैलरी कहते हैं तो वो पूरे एक महीने की होती है। 37 दिनों की या सितंबर के 7 दिनों की नहीं होती। दरअसल आजतक आपने किसी ढंग के अखबार, पत्रिका या न्यूज चैनल में नौकरी ही नहीं की है। और ये बात नेताओं की चमचागिरी और उनके लिए हेराफेरी से समझ में नहीं आती।

क्या ये सच नहीं है कि आपने कंपनी के मालिकों के साथ दिल्ली एयरपोर्ट के पास एक पांच सितारा होटल में बैठकर कर्मचारियों को 7 सितंबर तक का पैसा (वो भी कोरोना के नाम पर गैरकानूनी कटौती के साथ) फुल एंड फाइनल के कागजात पर साइन करने की शर्तों के साथ दिया?

क्या ये सच नहीं है कि चैनल के कार्यकारी संपादक सत्येंद्र रंजन जी को आपके ऑफिस असिस्टेंट जेपी ने एक हफ्ते पहले फोन कर कहा कि 37 दिन की सैलरी का चेक तभी मिलेगा जब वो फुल एंड फाइनल के कागजात पर दस्तखत करेंगे? इसे कॉरपोरेट गुंडागर्दी कहते हैं।

आप ये कैसे दावा कर सकते हैं कि जिन लोगों ने जबरन फुल एंड फाइनल के कागजात पर दस्तखत कर ऑफिस की जगह 5 स्टार होटल में चेक/ड्राफ्ट लिया वो संतुष्ट हैं? उनमें से कई आज लेबर कोर्ट की शरण में जाने को आतुर हैं। क्योंकि ये मामला अनुचित श्रम व्यवहार यानी UNFAIR LABOUR PRACTICES का बनता है।

आपका कहना है कि बाकी 37 असंतुष्ट लोगों ने भी लेबर कमिश्नर ऑफिस में सैलरी ले ली है। जनाब सैलरी ले नहीं ली है वसूल की है। और वो भी ये लिखकर की अपने बकाए का एडवांस ले रहे हैं। हमारा पूरा हक बना रहेगा और कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। आप दरअसल कानून के मामले में कच्चे हैं। सैलरी लेने और वसूलने का फर्क नहीं समझते।

क्या ये सच नहीं है कि लॉकडाउन के दौरान आपने तकनीकी और दूसरे विभागों के 20-25 कर्मचारियों को बिना उनका हिसाब किए अचानक नौकरी से निकाल बाहर कर दिया। और उन्हें बकाए के लिए कई महीने तक दौड़ाया? पता नहीं उन्हें अबतक बकाया मिला है या नहीं?

क्या ये सच नहीं है कि आपने राजस्थान के निम्स यूनिवर्सिटी के फाउंडर और News India 24×7 के मालिक डॉ बी एस तोमर को फांसने की पूरजोर कोशिश की। जिनके ऊपर अपनी मेडिकल छात्रा के साथ बलात्कार के आरोप हैं और इस मामले में वो गिरफ्तार और फरार दोनों हो चुके हैं?

क्या ये सच नहीं है कि दिल्ली ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों को नया मुर्गा फांसने का झांसा देकर आप बिना सैलरी दिए काम कराते रहे और कर्मचारियों को मुकेश मोहता के साथ मिलकर 4 करोड़ के इंतजाम का झूठा भरोसा देते रहे। और जब मुर्गा नहीं फंसा तो आपने हाथ खड़े कर दिए?

क्या आपने सार्वजनिक रूप से दफ्तर में ये एलान नहीं किया था कि जुलाई तक की सैलरी डॉ कपूर देंगे और उसके बाद की सैलरी हम देंगे? और जब सैलरी देने का मौका आया तो आप चैनल के मालिक से सीधे नौकर बन बैठे? लेकिन आपका बर्ताव और अंदाज-ए-बयां आज भी मालिकों वाला ही है।

आप राजस्थान में नए चैनल खोलने के नाम पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत साहब के पास RKDF UNIVERSITY का ब्रांच जयपुर में खुलवाने के लिए जुगाड़बाजी के काम में जुटे रहे?

क्या ये सच नहीं है कि जब स्वराज एक्सप्रेस के कर्मचारियों को दो महीने से सैलरी नहीं मिली थी तब आप अपने नए बिजनेस वेंचर की जुगाड़ में लगे थे और नई कंपनियां रजिस्टर करा रहे थे?

क्या ये सच नहीं है कि आपने स्वराज एक्सप्रेस चैनल को रिजनल चैनल बनाने के लिए वरिष्ठ पत्रकार श्री विजय त्रिवेदी को बतौर चैनल हेड नियुक्त किया था? जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन गाथा लिखी है?

क्या ये सच नहीं है कि आपने बीजेपी के एक बड़े नेता के कहने पर एक शख्स को बतौर ‘घोस्ट कर्मचारी’ रखा हुआ था। जो केवल सैलरी लेता था?

क्या ये सच नहीं है कि हम संपादकों ने जब भी चैनल को प्रोफेशनल तरीके से चलाने की बात की तो आपने अमृता जी समेत हमलोगों पर कमेंट किया कि हमलोग पैदाइशी नौकरों की तरह सोचते हैं जबकि आप बिजनेसमैन की तरह सोचते हैं। काश आपमें कांग्रेसी होने के अलावा और कोई हुनर होता।

क्या ये बात सच नहीं है कि अमृता जी ने आपको सितंबर महीने से ही कहना शुरू कर दिया था कि डॉक्टर कपूर मार्च के बाद पैसे नहीं देंगे। आप चैनल को बंद करो या कमाई का दूसरा रास्ता देखो। फिर भी आप उनकी बात अनसुनी कर पता नहीं अपने किस मकसद में लगे रहे और 150 से ज्यादा लोगों को बिना नियुक्ति पत्र दिए फर्जी बातों में उलझाए रखा। चैनल को घिसट-घिसट कर चलाते रहे।

क्या ये सच नहीं है कि अमृताजी बीते 9 महीने से ज्यादा से चैनल के कामकाज से वास्ता नहीं रख रही थी और भोपाल में रहते हुए अपना वेबसाइट ‘हम संवेत’ चला रहीं थीं?

अब बात श्रम कार्यालय में चल रहे मामलों में कानूनी दांव-पेंच की। जो आपके चेहरे से नकाब उतार देता है। आप बार-बार हमारी कंपनी, हमने तनख्वाह दिया, हमने नौकरी देकर एहसान किया, हमने तनख्वाह दिलवाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस बात का भी रोना रोते हैं कि कंपनी ने आपकी सैलरी मार ली है। आप कंपनी के पेड डायरेक्टर थे और आपके पास कोई शेयर नहीं थे। वैसे ये बात भी सरासर झूठ है। (लेबर ऑफिस में कंपनी की ओर से दिए गए दस्तावेज संलग्न है) अपने शेयर्स की संख्या को जरा निहार ही लीजिए जनाब।

आप कहते हैं कि आपने कंपनी के डायरेक्टर के पद से 1 अक्तूबर 2020 को ही इस्तीफा दे दिया है तो फिर कंपनी के काले-सफेद के आरोप से आपको मिर्ची क्यों लग रही है? कंपनी के बाकी डायरेक्टर्स तो तांडव नहीं कर रहे हैं! दाल में कुछ काला है क्या? या फिर पूरी दाल ही काली है। एक तरफ आप कंपनी के सभी पदों से इस्तीफे का नाटक कर रहे हैं, दूसरी तरफ 10 दिसंबर की तारीख में बकाया सैलरी के चेक पर दस्तखत कर रहे हैं। (चेक देने की कॉपी संलग्न हैं) आप कहते हैं कि कंपनी से अब हमारा कुछ लेना देना नहीं है और कंपनी लेबर ऑफिस में कहती है कि कर्मचारियों के सारे रिकॉर्ड आपके पास है और आप उन्हें देने में सहयोग नहीं कर रहे हैं। (लेबर ऑफिस में कंपनी की ओर से दिए गए दस्तावेज संलग्न है) एक तरफ आप कह रहे हैं कि आप लोगों की सेलरी दिलवा रहे हैं तो दूसरी तरफ बैंक को लिखकर दे रहे हैं कि इनके चेक बाउंस करा दिए जाएं। भाई आदमी हो कि पायजामा हो। (दस्तावेज संलग्न हैं)

कंपनी के डायरेक्टों की इस नूरा-कुश्ती को हमलोग खूब समझते हैं गुरदीप सप्पल साहब। पहले तय कर लीजिए कि आज की तारीख में आप कहां खड़े हैं, फिर अपनी बात कहिए। आप मालिकों के लिए बैटिंग कर रहे हैं या कर्मचारियों के साथ हैं या फिर मोदीजी की तरह आपदा में अवसर ढूंढ रहे हैं? आपने और अमृताजी ने 15 सितंबर 2020 को मिलाप भवन स्थित दफ्तर में चैनल को बंद किए जाने का एलान किया। लेकिन इसके लिए ना तो कोई नोटिस दिया और ना ही लेबर ऑफिस से इसकी मंजूरी ली। उसके बाद से कर्मचारी कंपनी से अपना हक ही तो मांग रहे हैं जिसने पहले ही साल में ही मुनाफा कमाया है।

कंपनी ने दूसरे साल भी 10-12 करोड़ रुपए विज्ञापन और दूसरे माध्यमों से कमाए हैं। फिर कर्मचारियों को वाजिब हक देने में परेशानी क्या है और इसे वसूलने में गुनाह क्या है? भाई आरकेडीएफ के पास 10 हजार करोड़ की संपत्ति है उसमें से 2-3 करोड़ निकल ही जाएंगे तो उसके मालिक डॉ सुनील कपूर दुबले थोड़े ही हो जाएंगे।

वैसे लगता है कि आप कानून की किताबें जेब में लेकर चलते हैं। कभी फुर्सत मिले तो निकालकर सुकून से पढ़ भी लीजिएगा। कंपनी का कोई भी डायरेक्टर कानून की निगाह से बच नहीं सकता, भले ही उसने इस्तीफा दे दिया हो। उसके डायरेक्टर रहते हुए जो भी काम कंपनी में हुए उसके लिए वो इस्तीफा देने के बाद भी जिम्मेदार होता है।

बड़बोलापन तो आपमें इतना है कि आप देश चलाने का दावा करते रहते हैं, कानून बनाने का दावा करते रहते हैं, लेकिन इतनी छोटी सी बात नहीं जानते। आप ये भी नहीं जानते कि जिस तरह कंपनी को खोलने की एक प्रक्रिया होती है उसी तरह उसे बंद करने की भी एक प्रक्रिया होती है। ये बड़े अफसोस की बात है मेरे दोस्त। कोर्ट-कचहरी और मानहानि के मुकदमे की धमकी आप पहले भी दो कर्मचारियों को दे चुके हैं लेकिन कोर्ट में जाने की आपकी हिम्मत नहीं हुई। क्योंकि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।

गुरदीप सप्पल साहब! क्या आप गुनाहों का देवता होने के बावजूद मसीहा बनने की कोशिश नहीं कर रहे हैं? दरअसल आप आदतन झूठ बोलने के आदि हैं और शेखी बघारते हुए देश चलाने का दावा करते रहते हैं, जबकि सच्चाई ये है कि आप एक दफ्तर भी संविधान और कानून के नियमों के हिसाब से चलाने की काबिलियत नहीं रखते हैं। मुर्गा फांसकर तो आज कोई भी चीफ एडिटर बन जाता है लेकिन संपादक होने के लिए पत्रकारिता की तमीज आनी चाहिए। केवल सरोकारी पत्रकारिता, अच्छी पत्रकारिता की रट लगाने से लोग आपको मुर्ख ही समझेंगे। क्योंकि कोई अच्छा काम आपको उसके बदले कई बुरे काम करने का ना तो लाइसेंस देता है और ना ही इसकी इजाजत देता है। आपको उन सभी लोगों का शुक्रगुजार होना चाहिए जिनकी मेहनत और कौशल की वजह से RSTV या फिर स्वराज एक्सप्रेस चैनल कंटेंट के मामले में कामयाब साबित हुआ और आप राजनीतिज्ञों और पत्रकारों के बीच जाकर अकेले इसकी वाहवाही लूटते रहे। अंत में एक बात और कि नींव के पत्थरों को छेड़ा नहीं करते वर्ना इमारत भरभरा कर गिरते ज्यादा देर नहीं लगती। याद रखिएगा।

और हां, कोर्ट से भागेंगे तुम्हारे दुश्मन, दोस्त भागा नहीं करते। रही बात शराब की तो प्रेस क्लब में आप मुफ्त की शराब के लिए आमंत्रित हैं। जहां फिर से मिल बैठकर करेंगे संविधान, लोकतंत्र, संसद, कानून और जनवादी अधिकार की बातें। कहते हैं ना: गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले।

पहला पार्ट और उस पर आई प्रतिक्रिया पढ़ें-

काला धन सफेद बनाने के लिए खुला था स्वराज एक्सप्रेस!

काला सफेद आरोपों पर गुरदीप सप्पल का जवाब पढ़ें

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