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असली संकट से भागती ‘मोदी-भागवत टोली’ को यूँ समझिए!

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उर्मिलेश-

इन महाशय को देश की बड़ी समस्या ‘शादी के लिए धर्म बदलना’ लग रही है! 1 अरब, 39 करोड़ आबादी वाले इस महादेश में ‘शादी के लिए धर्म बदलना’ कितनों की समस्या है? कुछ की है तो उससे देश की सेहत पर क्या असर पड़ता है?

स्वदेशी की बात करने वाले लोग कहते हैं अपने को पर अर्थव्यवस्था में कितना ‘स्वदेशीपन’ बचा है, ये नही बतायेंगे? बेरोजगारी की भयावह स्थिति पर इन्हें बोलते कभी सुना है? अच्छे सरकारी अस्पतालों, अच्छे सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने की बजाय सरकार घटा क्यों रही है, इस पर नहीं बोलेंगे! शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र के भयावह निजीकरण से आम आदमी (हिन्दू-मुस्लिम सहित सभी) की मुसीबत कितनी बढी है, इस पर कभी नहीं बोलेंगे! इस वक्त स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में निजीकरण 88 फीसदी से ऊपर हो चुका है!

अभी कोयला-संकट से बिजली-आपूर्ति पर मंडराते खतरे को लेकर कुछ नहीं बोलेंगे! बंदरगाह से लेकर एयरपोर्ट, विमान सेवा से रेल सेवा और पूरी परिवहन व्यवस्था के अंधाधुंध निजीकरण से आम भारतीय की तकलीफ़ों पर मुंह नहीं खोलेगे. लखीमपुर खीरी वाले मिश्रा जी पर इनके मुखारविंद से कुछ सुना आपने? सोचिये, सरकार के असल संचालक ऐसे ही महाशयों की टोली है.

ऐसे लोग जब भी बोलेंगे, ‘मंदिर-मस्जिद’ या ‘धर्म पर मंडराते कथित खतरे’ पर बोलेंगे. इंसान और इंसानियत पर घहराते संकट पर बिल्कुल खामोश रहेंगे!


रवीश कुमार-

थीम और थ्योरी के सहारे असली मुद्दों से भागती सरकार को मिल गए हैं सावरकर… मैं अक्सर सोचता हूँ कि अगर झूठ नहीं होता तो यह सरकार क्या करती। मोदी और उनके मंत्री क्या करते। ग़नीमत है कि भारत में झूठोत्पादन बहुत है। झूठोप्पादन के ज़रिए बहसोत्पादन हो रहा है ताकि अनुपात्दक हो चुकी बेकार जनता को अहसास दिलाया जा सके कि वह जिस बहस में उलझी है वही तो विकास है। प्राइम टाइम में अक्सर कहा करता हूँ मोदी सरकार थीम और थ्योरी की सरकार है। महँगाई और बेरोज़गारी और मंदा होते कारोबार पर बोलने के लिए कुछ नहीं है तो सरकार ने एक थीम और थ्योरी लाँच कर दी है। ताकि उसके बहाने सरकार,बीजेपी और आई टी सेल को जनता के बीच सर उठा कर घूमने का मौक़ा मिले। भाव यही है कि बाक़ी चीज़ों में फेल हो गए हैं तो क्या हुआ, इतिहास में जो नाइंसाफ़ी हुई है उसे ठीक किया जा रहा है। जनता के साथ हर दिन हो रहे भयंकर अन्याय की जगह मोदी सिस्टम की तरफ़ से फ़र्ज़ी अन्याय की धारणा फैलाई जाती है और बताया जाता है कि सरकार इस अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ रही है।

आप याद करें तो सात साल में इस तरह की कई थीम लाँच की जा चुकी है जिसके सहारे जनता को किसी दूसरी बहस में उलझा दिया जाता है। आप यह भी ग़ौर करेंगे कि इसी तरह मोदी सिस्टम गोदी मीडिया को एक वैध विषय देता है। वैध मतलब जैसे गांधी-सावरकर विवाद मामले में ही राजनाथ सिंह ने बयान दे दिया। अब रक्षा मंत्री इतिहासकार की भूमिका में हैं जबकि उन्हें चीन को लेकर बोलना चाहिए था। कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की हत्या पर बोलना चाहिए था, लेकिन वे सावरकर पर बोल रहे हैं और इसकी प्रतिक्रिया में वैध बहस खड़ी हो गई है। जिसके कारण 113 रुपये लीटर पेट्रोल भरा रही जनता की तकलीफ़ पर कोई बात नहीं हो रही है। उसकी बचत समाप्त होने के कगार पर है। फ़िक्स डिपाज़िट पर रिटर्न निगेटिव है। सैलरी कम है और नौकरी नहीं है। मगर सरकार बहस कर रही है और करवा रही है सावरकर पर।

इसके लिए कई बार किसी किरदार को निकाल लाया जाता है, उसे धार्मिक आवरण में पेश किया जाता है और महायोद्धा और वीर बता कर इतिहास में उनके साथ हुए अन्याय की अवधारणा खड़ी की जाती है। ऐसे सभी पात्र वीर ही होते हैं। फिर यह समझ नहीं आता है कि इतने सारे वीर थे तब फिर भारत ग़ुलाम क्यों हुआ। हर छोटी मोटी लड़ाई से किसी न किसी के वीर होने की गाथा निकलती है। ऐसे किरदारों की अचानक से जयंती मनाई जाने लगती है और वीरता के बहाने इतिहास बोध पर हमला किया जाने लगता है।

ऐसा नहीं है कि इन्हें इतिहास के पेशेवर अध्ययन में कोई दिलचस्पी है। अगर होती तो इतिहास की कक्षाओं का विस्तार करते। पेशेवर शिक्षक रखते। लेकिन अन्याय और भुला दिए गए के नाम पर राजनीतिक समर्थक होने के नाम पर मूर्खों को रखा जा रहा है। अव्वल तो उन्हें भी लंबे समय तक नौकरी नहीं मिली। इतिहास की पढ़ाई का बहुत बुरा हाल है। क्लास में टीचर तक नहीं हैं। यह नहीं पूछा जाता कि जब आप मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की होड़ में थे तब इतिहास कौन पढ़ रहा था। ज़्यादातर लोग इतिहास को करियर का विकल्प नहीं मानते हैं। और डाक्टर इंजीनियर बनने के बाद इतिहास पढ़ते भी नहीं। अचानक से हल्ला करने लगते हैं कि इतिहास में भुला दिया गया। पढ़ाया नहीं गया। कितने लोग इतिहास पढ़ रहे थे यह नहीं पूछा जाता है।

बहुत चीज़ों पर रिसर्च नहीं हुआ है क्योंकि उसके लिए कभी और आज भी फंड और रिसर्च स्कालर की घोर कमी है।उस कमी का लाभ उठा कर अपने काम में फेल हो चुके नेता आपके सामने इतिहासकार बन कर हाज़िर हो रहे हैं। राजनीतिक दम पर बिना तथ्यों की पेशी और समीक्षा के इतिहास लिखवाया जा रहा है। सार्वजनिक रुप से बहस छेड़ दी जाती है। तथ्यों पर बात नहीं होती है। पूरी बहस भुला दिया गया और किनारे कर दिया गया के आस-पास घूमती रहती है। ताकि इसके बहाने पेशेवर जवाबदेही से बचा सके। जिनका रिसर्च हुआ है और तथ्य हैं उनके बारे में भी ग़लत तरीक़े से बहस हो रही है। हर चीज़ को मिथ बनाकर धर्म का गौरव ठेल दिया जाता है ताकि लोग जैसा कहा जा रहा है, वैसा ही स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाए। ऐसे तो इतिहास की पढ़ाई नहीं होती है।

इसका एक पैटर्न बन गया है। पहले हल्ला होगा कि इतिहास ने भुला दिया। फिर हल्ला होगा कि इतिहासकारों ने भुला दिया। फिर हल्ला होगा कि इतिहासकारों ने कम महत्व दिया। काश जनता देख पाती कि ये इतिहासकारों को याद नहीं कर रहे हैं, याद करने का नाटक कर रहे हैं क्योंकि ये जनता के वर्तमान को भुला देना चाहते हैं। वर्तमान की तकलीफ़ों से उसका ध्यान बहका देना चाहते हैं।

मैं गांधी-सावरकर विवाद उसी कड़ी में देखाते हूँ। ज़ाहिर है ग़लत बात को ग़लत लिखने के लिए लोग बोलेंगे ही। जब ये लोग तथ्यों के सामने हारते नज़र आने लगेंगे तो यह कहते हुए वापस आ जाते हैं कि इतिहास में सही जगह नहीं मिली। जो भी है या नहीं है इसकी बहस तो किताबों और संदर्भों से होगी।

सरकार ने व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से एक आधा अधूरा झूठ के आधार पर इतिहास बोध का निर्माण किया है। अब सरकार इस व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी को ओपन यूनिवर्सिटी बना चुकी है। पहले चाणक्य के नाम से अनाप-शनाप गढ़ कर फैलाए गया। अब यही काम गांधी के नाम से हो रहा है। फिर किसी और के नाम से होगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार कर्नाटक के चुनाव में कह दिया कि भगत सिंह से अंतिम दिनों में कोई नहीं मिलने गया। शहीद भगत सिंह को लेकर उन्होंने ग़लत बोला। सबने जब तथ्य सामने रख दिए कि नेहरु गए थे तब कभी प्रधानमंत्री ने पलट कर नहीं बोला की ग़लती हो गई। ग़लती तो छोड़िए, ग़लत बोलने की आदत भी नहीं छूटी। अब इसी पैटर्न पर राजनाथ सिंह ने बयान दिया है।

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