ध्वस्त होता शेयर बाज़ार : पैसा ग़ायब नहीं होता, किसी के हाथ से निकल कर किसी दूसरे के हाथ में चला जाता है!

रवीश कुमार-

महंगाई की दर 7.79% नहीं, 79% हो जाए, जीत नहीं पाएगी मुस्लिम विरोधी मुद्दों से

2014 के बाद महंगाई सबसे अधिक स्तर पर है। उस समय महंगाई बढ़ती थी, तब सड़कों पर जनता भी बढ़ जाती थी। आज महंगाई उससे भी ज़्यादा है मगर, जनता ग़ायब हो गई है।अब जनता बोलने नहीं आती है, उससे पूछना पड़ता है कि क्या वह बोलना चाहती है। अप्रैल महीने में मुद्रास्फीति की दर 7.79 प्रतिशत हो गई है। मार्च के महीने में महंगाई की दर 6.95 प्रतिशत थी। 2014 के बाद महंगाई इस स्तर पर पहुंची है।अमीर तबके में महंगाई का असर नहीं दिखेगा, लेकिन ज़रा सा नज़र नीचे करेंगे तो एक देश दिखाई देगा, जो कम ख़रीद रहा है, कम खा रहा है। अपने सिक्योरिटी गार्ड से पूछिए, उसे कितना वेतन मिलता है, वह इन दिनों कैसे घर चला रहा है। आपके घर सामान पहुंचाने वाले डिलिवरी ब्वॉय से पूछिए कि इस महंगाई में अपना घर कैसे चला रहा है। टैक्सी चलाने वाले से लेकर शाम को गोलगप्पे बेचने वाले हिन्दुस्तान से उसका हाल पूछ कर देखिए। महंगाई तेज़ी से लोगों को कंगाल करती जा रही है। ठीक है, कि समाज का यह तबका टीवी से ग़ायब है मगर यही तबका तो टीवी देख रहा है। उसे हिन्दू मुस्लिम की बहस से किसी और लोक में पहुँचा दिया गया है।

जनता ने बोलना बंद कर दिया है। धर्म की राजनीति ने सिखा दिया है कि सरकार नोटबंदी से बर्बाद कर दे, महंगाई से कंगाल कर दे, कोई बात नहीं है, हर हाल में चुप रहना है। गैस हज़ार रुपये का हो गया है, बिजली महंगी है, खाने-पीने की चीज़ें महंगी है, स्कूल की फीस से लेकर बस का किराया तक, लेकिन, इतना चुप तो यह जनता अपने भगवान के सामने भी नहीं होती है। उनके सामने भी तरह-तरह की मन्नतें मांगती रहती हैं, उनसे शिकायतें करती रहती हैं, लेकिन, सरकार के सामने चुप है। महंगाई के बारे में लिखते-बोलते समय लगता है कि अपने शौक़ के लिए लिख रहे हैं। दो साल से जनता भीषण महंगाई का सामना कर रही है। पिछले साल सौ रुपया लीटर पेट्रोल कई हफ्तों तक मिला तब महंगाई के सपोर्टर आ गए, कहने लगे कि विकास हो रहा है, रक्षा पर ख़र्च हो रहा है। इस साल यूक्रेन आ गया है। बहाने आते जा रहे हैं, बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है।

कोविड के दौरान करोड़ों लोग शेयर बाज़ार की तरफ गए।बैंकों में बचत घटा कर शेयर बाज़ार की तरफ धकेला गया। जनवरी से लगातार शेयर बाज़ार गिरता जा रहा है। छोटे और मध्यम स्तर के शेयरों के दाम बहुत ज़्यादा गिरे हैं। हमारे एक मित्र ने कहा कि शेयर बाज़ार का पैसा ग़ायब नहीं होता है। किसी के हाथ से निकल कर, किसी के हाथ में चला जाता है। यानी आपका पैसा किसी के पास चला गया। शेयर बाज़ार की गति दूसरी होती है। कुछ लोग कमाते हैं, बाकी लोग धीरज के सहारे इसमें टिके रहते हैं ।यानी जो भी शेयर बाज़ार में है, उसे तुरंत तो राहत नहीं मिलेगी। तुरंत कमाई के तमाम रास्ते बंद से हो गए हैं।उसके सामने तो आज की देनदारी खड़ी है।EMI भी सीढ़ी चढ़ने लगी है। लेकिन, उम्मीद यही है कि जनता इस महंगाई का सामना कर लेगी। जब तक इस देश में मुस्लिम विरोधी मुद्दे हैं, जनता को ये सारे मुद्दे हवा मिठाई लगने लगे हैं। मुस्लिम विरोधी मुद्दों ने महंगाई को हरा दिया है। ऐसा करने वाला भारत दुनिया का पहला देश है।

शीतल पी सिंह-

बाज़ार बुरी तरह से टूट रहा है! रुपया डालर के मुक़ाबले फिर लड़खड़ाकर 77.55 तक जा गिरा है! विदेशी निवेशक हमारे शेयर बाज़ार से रोज़ अपना पैसा निकालने में लगे हैं! इसी वजह से जिस Forex के भंडार की शेखी मारी गई थी वह सिकुड़ने लगा है!

अभी तुरंत कोई बहुत बड़ा ख़तरा नहीं है लेकिन रास्ता ख़तरनाक हो चला है इसमें संदेह नहीं है। यदि मई में शेयर बाज़ार का यही हाल रहा तो भारतीय मध्य वर्ग के इस अंतिम भरोसे का तहस नहस हो जाना स्वाभाविक है।

बाज़ार पिछले चालीस पचास दिनों में क़रीब तीस पैंतिस लाख करोड़ रुपये डुबो चुका है, इसमें विदेशी निवेशकों का भी बड़ा हिस्सा है लेकिन देशी निवेशकों ने शेयर बाज़ार में दाखिल होकर जो रिकार्ड बनाया था, उनको जो सदमा लग रहा है इसको शब्दों में बयान करना मुश्किल है!



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One comment on “ध्वस्त होता शेयर बाज़ार : पैसा ग़ायब नहीं होता, किसी के हाथ से निकल कर किसी दूसरे के हाथ में चला जाता है!”

  • आशीष says:

    शेयर बाजार कंपनियों और बड़े उद्योगपतियों के लिए पैसे जुटाने का सबसे आसान साधन है,बैंकए रक्खा धन ज्यादा सुरक्षित होता है जिससे कर्ज लेने पर उद्योगपतियों को उसे लौटने की जिम्मेदारी होती है लकी शेयर बाजार में ऐसा कुछ नहीं होता,जिसमे आम के आम और गुठलियों के दाम मिलते हैं,जिसमे शेयर धारक को घाटा होने पर कुछ भी नही मिलता और फायदा होने पर एक निश्चित हिस्सा ही मिलता है,

    शेयर बाजार एक ऐसा खेत है जहां शेयर धारकों की जब अच्छी फसल खड़ी हो जाति है तो मंदरिए औने पौने दाम पर अच्छी फसल खरीदने के लिए जानबूझकर मार्केट गिराया करते हैं,तो 100 की चीज 5 रुपए मे मिल जाए….

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