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शराब और साहित्यकार : शिव बटोलवी 36 साल की उम्र में लीवर सिरोसिस से ससुर के घर मर गए!

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शैलेंद्र प्रताप सिंह-

आइये शिव बटोलवी जी की कहानी सुनाते है। मात्र 36 वर्ष ही ज़िंदगी पायी पंजाबी भाषा के विख्यात कवि शिव कुमार ‘बटालवी’ ( जन्म 1936 – बड़ापिंड, शकरगढ़ तहसील, पंजाब, अविभाजित भारत , मृत्यु मात्र उम्र 36 वर्ष , वर्ष 1973 में ) जी ने । उनकी कविताओं में भावनाओं का उभार, करुणा, जुदाई और प्रेमी के दर्द का बखूबी चित्रण है।

मैंनू तेरा शबाब लै बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा,
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए
मैंनू एहो हिसाब लै बैठा
चंगा हुंदा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब लै बैठा
दिल दा डर सी किते न लै बैठे
लै ही बैठा जनाब लै बैठा

वे 1967 में वे साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार बन गये। भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार गुरदासपुर जिले के बटाला चला आया था । उन्होने विख्यात पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से असफल प्यार किया । प्यार की यह पीड़ा उनकी कविता में तीव्रता से परिलक्षित होती है।

1960 में उनकी कविताओं का पहला संकलन पीड़ां दा परागा (दु:खों का दुपट्टा) प्रकाशित हुआ, जो काफी सफल रहा। 5 फ़रवरी 1967 को उनका विवाह गुरदासपुर जिले के किरी मांग्याल की ब्राह्मण कन्या अरुणा से हुआ । बाद के वर्षों में वे खराब स्वास्थ्य से त्रस्त रहे । 7 मई 1973 में 36 साल की उम्र में शराब की दुसाध्य लत के कारण हुए लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप अपने ससुर के घर पर उनका निधन हो गया।

मैंनू विदा करो (मुझे विदा करो)
असां ते जोबन रुत्ते मरना,
मर जाणां असां भरे भराए,
हिजर तेरे दी कर परिकरमा..
( हमें तो यौवन की ऋतु में मरना है,
मर जाएंगे हम भरे पूरे
तुम से जुदाई की परिक्रमा पूरी करके)

अमृता प्रीतम ने इन्हें “बिरह का सुल्तान” कहा। शिव की रचनाओं में निराशा व मृत्यु की इच्छा प्रबल रूप से दिखाई पड़ती है। मुझे लगता है शिव बटोलवी की मात्र 36 वर्ष तक जीने की यह कहानी उनके असफल प्यार का प्रतिफल थी ।

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