विज्ञापन घोटाला : क्या सिर्फ वेबसाईट संचालक ही घोटालेबाज हैं, दूसरी तरफ नजर टेढ़ी क्यों नहीं?

मध्यप्रदेश में मचे विज्ञापन घोटाले के हंगामे के बीच निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वेब मीडिया यानी समाचार वेबसाईट्स हैं। वेबसाईट्स को दिये गये विज्ञापनों को लेकर एक हद तक काफी चीजें सही भी हैं जो बताती हैं कि गड़बड़ तो हुई है लेकिन सवाल ये है कि क्या गड़बड़ सिर्फ वेबसाईट्स को लेकर ही है? सुना है किसी मीडिया सन्घ के पदाधिकारी द्वारा कोर्ट में विज्ञापन घोटाले को लेकर सीबीआई जांच की मांग की गई है इस पूरे मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि एकतरफा खेल खेला जा रहा है हर तरफ सिर्फ वेबसाइट्स की चर्चा है। जताया ऐसा जा रहा है कि सबसे बड़े घोटालेबाज सिर्फ और वेबसाईट संचालक पत्रकार ही हैं। वेबसाईट संचालक पत्रकारों पर सबकी टेढ़ी नजर है मगर क्यों?

जारी की गई सूची को या तो कोई पूरा देख नहीं रहा या देखना नहीं चाहता। अगर वेबसाइटों की ही बात करें तो असली फर्जीवाड़े पर बात हो ही नहीं रही लोग सिर्फ इस बात पर पगलाये हुये हैं कि उसे इतना मिला, इसे इतना मिला। लगातार यह बात कही जा रही है कि बन्द वेबसाइटों को भी विज्ञापन जारी हुए। इस पूरी सूची में जो तमाम तरह की सोसायटीज हैं उनकी कोई बात नहीं कर रहा सवाल इस पर भी उठने चाहिए कि 257 वेबसाइट्स को 12 करोड़ और एक-एक चेनल को 11-12 करोड़?

सवाल यह भी उठे कि मांगे जाने पर चाहे जिसने भी जानकारी मांगी हो तमाम तरह के चार पन्नों के अखबार, पत्र—पत्रिकाओं को क्यों बख्श दिया गया? बाला बच्चन ने भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया? यहां बता दूं कि मुझे शुरू से ही सूची देखने में रुचि नहीें थी मगर बार—बार कुछ ऐसी बातें की गईं जिससे मैंने रुचि ली और सबसे बड़ी बात जिन पत्रकारों को सबसे ज्यादा सूची देखने की खुजली मची हुई थी अब सारे एपीसोड में खामोशी अख्तियार किए हुये हैं।

मैं किसी गलत के साथ नहीं हूँ चाहे वेबसाईट्स हों या कोई और मगर मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि सवाल वेबसाइट्स पर ही क्यों? बेशक सबकुछ ठीक नहीं है मगर बहुत कुछ छुपा हुआ ऐसा भी है जो बताता है कि बहुत ज्यादा बहुत कुछ ठीक नहीं है। सुना है कुछ वेबसाइट चला रहे पत्रकारों को संस्थानों ने नौकरी से हटा दिया है अगर उक्त बातें साफ हों तो कितने लोग कमा खा पायेंगे? जो बाकी लोग दूध के धुले बनकर न्यूज वेबसाइट वालों को टेढ़ी नजर से देख रहे हैं अगर उनके प्रकाशनों को मिले विज्ञापनों का ब्यौरा बाहर आ जाए तो…?

बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है न ही मैं किसी का टूल बन रही हूं मगर ये वो सवाल हैं जो हर वेबसाईट संचालक को पूछने चाहिए? पर उससे पहले मेरा सवाल क्यों छुपाया गया कि वेबसाईट भी चलाई जा रही हैं? क्यों एक सीधे रास्ते को चोर रास्ता बना दिया गया? क्यों एक लाईन से सब घोटालेबाजों में शामिल कर दिये गये? इस पूरे खेल में गलती चाहे जिसकी भी हो पिसेंगे छोटे ही। खबरनेशन और बाला बच्चन से मेरा यह सवाल तब तक जारी रहेगा जब तक यह स्पष्ट नहीं कर दिया जाता कि असली घोटालेबाज कौन और विशुद्ध पत्रकार कौन? या सिर्फ थोड़ी देर की पब्लिसिटी और वाहवाही पाने के लिये यह किया गया? खबरनेशन बताये ​क्या उसने पत्रकारिता के सारे मापदंड पूरे किये? क्यों नहीं सारी बातें स्पष्ट की गईं? बसाईट्स को लेकर सवाल हर बार उठते हैं मगर जवाब क्यों नहीं दिये गये? यहां बता दूं कि मुझे किसी ने उकसाया नहीं है लेकिन ये बातें भी तो साफ हों? कहीं ऐसा न हो कि पत्रकार एक दूसरे की टांग—खिचाई में घर फूंक तमाशा देखते रहें। एक साथ दो काम करना गुनाह तो नहीं है?

लेखिका ममता यादव मल्हार मीडिया वेब न्यूज पोर्टल की संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क 7566376866 या 9826042868 के जरिए किया जा सकता है.



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Comments on “विज्ञापन घोटाला : क्या सिर्फ वेबसाईट संचालक ही घोटालेबाज हैं, दूसरी तरफ नजर टेढ़ी क्यों नहीं?

  • बाला बच्चन बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने इस बड़े मुद्दे को उठाया। अब कम से कम चर्चा तो हो रही है। कुछ पत्रकार केवल काम करते हैं और कुछ केवल उगाही का धंधा। वेबसाइट की सूची में कई तो नियमित पत्रकार हैं, जो कि वास्तविक वेबसाइट चला रहे हैं लेकिन अधिकांश अपने संस्थानों से भी मोटी रकम उठा रहे हैं, और सरकार से भी उगाही कर रहे हैं। जनसंपर्क विभाग में भी जबर्दस्त घोटाले हैं। किसको विज्ञापन, कितने कमीशन पर दिए गए, इन सभी की वास्तविक स्तर पर गंभीर जांच होनी चाहिए। और जिन वरिष्ठों की नौकरी इस मुद्दे पर गई है, उन्होंने इतना कमा लिया है, कि अब शायद जिंदगीभर नौकरी की जरुरत न पड़े।

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  • ramesh singh says:

    कहीं न कहीं जनसंपर्क भी जिम्मेदार है। दिल्ली दफ्तर में लंबे समय से कामचलाउ व्यवस्था कायम है। केंद्र की राजधानी होने के बावजूद, कोई ठीक-ठाक अधिकारी यहां नियमित रूप से पदस्थापना नहीं चाहता। कई वरिष्ठ अफसरों से विभाग ने इस बारे में सहमति चाही, लेकिन सभी ने इंकार कर दिया। अब कामचलाउ व्यवस्था के अंतर्गत काम हो रहा है, तो वह भी इसी तरह के निचले स्तर का होगा। दिल्ली में मध्य प्रदेश को कवर करने वाले कई पत्रकार सक्रिय हैं, लेकिन कभी कोई मीडिया को जानकारी नहीं दी जाती, प्रदेश का कौन मंत्री यहां आता है, उसका पता नहीं चलता। जो कनिष्ठ अफसर यहां हैं, उनकी कभी भी पहले अपने वरिष्ठों से नहीं जमी, अब अपने मातहतों को परेशान कर रहे हैं। इन कथित अफसरों को सरकार की नीतियों की भी जानकारी नहीं है, यदि कोई इसके बारे में पूछने पहुंचता है, तो उसे भी टरका दिया जाता है।

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