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मध्यप्रदेश का जनसंपर्क विभाग जो न कराये कम है। वेबसाईट्स को विज्ञापन देने के मामले में पत्रकारों की लानत मलानत करा चुका यह विभाग खुद भी पारदर्शिता का पक्षधर दिखाई नहीं दे रहा। सूत्रों के अनुसार समाचार वेबसाइट्स को विज्ञापन देने के लिये विभाग ने नई पॉलिसी तैयार की और उस पॉलिसी के अनुसार सभी वेबसाईट संचालकों से गूगल एनालिटक रिपोर्ट की पहले प्रिंट कॉपी मांगी। पत्रकारों ने जमा भी की बावजूद इसके पॉलिसी पर अमल नहीं हुआ। दूसरे महीने एक और आदेश दनदना दिया गया कि सारे वेबसाईट संचालक गुगल एनालिटक की लिंक को डीपीआर द्वारा दी गई एक आईडी से जोड़ें ये भी हो गया साहब मगर जनसंपर्क इस बार गच्चा दे गया ऐन टाईम पर।

जब सारे नियमों का पालन कर लिया गया और करीब 150 वेबसाईट के नाम इस नई नीति के तहत फायनल हुये तो ऐन मौके पर जनसंपर्क आयुक्त और एक उपसंचालक जो इन सारे मामलों के कर्ताधर्ता हैं अचानक छुटटी पर चले गये। अब जनसंपर्क की यह कौन सी नीति है यह पत्रकार समझ नहीं पा रहे हैं। क्योंकि जिन वेबसाईटों को एक तय राशि के विज्ञापन दिये जा रहे थे उन्हीं वेबसाईट्स के हिट्स 20 से 30 हजार तक हैं। ऐसे में जनसंपर्क के सामने संभवत:संकट यह है कि अब वह क्या करे?क्योंकि हिट्स के अनुसार अब विज्ञापन के आरओ जारी करने होंगे जो कि बड़ी राशि के होंगें।

बताया तो यह भी जा रहा है कि अगर इस नीति के तहत विज्ञापन जारी होने लगें तो खुद जनसंपर्क के कई लोगों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। वैसे सूत्र बताते हैं कि आनन—फानन में विज्ञापन शाखा के 4 लोगों के तबादले कर दिये गये हैं। उपसंचालक 7 मई को छुट्टी से वापस आने वाले थे लेकिन उन्होंने अपनी छुट्टी बढ़ा ली है। उधर सीपीआर भी विदेश प्रवास पर हैं बताया जा रहा है कि श्रीलंका में सीतामंदिर निर्माण को देखने की खानापूर्ति कर वे दूसरे देश रवाना हो चुके हैं छुट्टियां मनाने। नये कमिश्नर अनुपम राजन ने जबसे जनसंपर्क की कुर्सी सम्हाली तभी से रोज नये विवाद नये बखेड़े सामने आते रहे, खासकर वेबसाईटों को लेकर। लेकिन अब पॉलिसी बनने के बाद भी उस पर अमल करने को लेकर जनसंपर्क द्वारा पीछे हटने की मंशा दिखार्इ दे रही है और इससे ऐसी ही आशंका है कि शायद सिस्टम को सुधारने के पक्ष में खुद विभाग ही नहीं है।

ऐसा बताया जा रहा है कि कुछ तथाकथित स्वघोषित पत्रकार नेताओं का भी दबाव है क्योंकि अभी तक तो रामभरोसे का चल रहा था लेकिन नई पॉलिसी आने के बाद इनकी नाममात्र की वेबसाईटों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब देखना यह है कि वास्तविक काम कर रहे वेबसंचालकोंं के साथ जनसंपर्क का रवैया क्या होता है या फिर काम वही पुरने ढर्रे पर चलता रहेगा। अचानक से अधिकारियों के छुट्टी पर जाने के बाद अब लोग यह कहने लगे हैं गूगल एनालिटिक मांगने के बाद अब अधिकारी ही गूगल हो गये हैं गुगली देकर। वैसे इस पूरे मामले के दौरान कुछ ऐसे लोग भी सामने आये जिनकी वेबसाईट चल रही थीं,लेकिन कभी उन्होंने सावजनिक नहीं किया। इनके बारे में पता तो अब चल रहा है जब सब गूगल एनालिटिक को जोड़ने की कवायदें कर रहे हैं और जानकारी जुटा रहे हैं। इनमें से कुछ लोग बकायादा मुहिम चलाये हुये थे वेबसाईट संचालकों को माफिया बताने की लेकिन इन्हें अपने गिरेबान में झांकने की फुरसत नहीं थी। वक्त सबका हिसाब रखता है। राजन जी ने कमाल कर दिया।

भोपाल से आई एक चिट्ठी.

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