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-तारकेश्वर मिश्र-
दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड में शुमार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई के लिये सुप्रीम कोर्ट का आदेश कोई मायने नहीं रखता। सर्वोच्च न्यायालय भले ही बीसीसीआई को आदेश या निर्देश देता रहे लेकिन बीसीसीआई के कर्ताधर्ता अपनी सुविधा और मर्जी के हिसाब से ही हिलते-डुलते हैं। असल में बीसीसीआई का दुस्साहस इतना बढ़ चुका है कि वो देश की शीर्ष अदालत को भी गुमराह करने की हिमाकत करने से परहेज नहीं करता है। ऐसा ही मामला उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को मान्यता देने से जुड़ा है।

बिहार क्रिकेट एसोसिएशन बनाम बीसीआई केस में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने लोढा समिति की सिफारिशों के मुताबिक वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट में अपील संख्या 4235/2014, 4236/2014 एवं 1155/2015 के द्वारा सूचित किया था कि उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को मान्यता प्रदान कर दी गयी है। इस बाबत एक रिपोर्ट भी बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। लेकिन इसम मामले में बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना सीधे तौर पर की है। क्योंकि बीसीसीआई ने अब तक कागजी कार्रवाई के अलावा जमीन पर कुछ भी अभी तक नहीं किया है। जमीनी हकीकत यह है कि उत्तराखण्ड क्रिकेट आज भी उत्तर प्रदेश की बैसाखियों के सहारे है। बीसीसीआई की कारस्तानी और मनमर्जी के चलते इस साल भी प्रदेश के क्रिकेटरों को अपने गृह राज्य से रणजी मैच खेलने का मौका नहीं मिल पाया है।

उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बने 17 साल हो चुके हैं। बावजूद इसके पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड क्रिकेट सियासत के भंवर में डूब-उतर रहा है। पिछले डेढ दशक के लंबे समय में उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को बीसीसीआई से मान्यता दिलाने के के कई गंभीर प्रयास हुए। बावजूद इसके नतीजा सिफर ही रहा है। उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को बीसीसीआई से मान्यता ने होने के चलते प्रदेश के प्रतिभावान क्रिकेट खिलाड़ियों को दूसरे राज्यों से खेलना पड़ता है। कई दफा खिलाड़ियों को दूसरे राज्यों से खेलने का अवसर नहीं मिल पाता है।

उत्तराखंड की बात करें तो राज्य गठन के बाद से यहां की तीन-चार एसोसिएशन बोर्ड से मान्यता का दावा कर रही हैं। एसोसिएशनों की आपसी गुटबाजी के चलते अभी तक उत्तराखंड को मान्यता नहीं मिल पाई। जिससे यहां के प्रतिभावान क्रिकेटरों का भविष्य अधर में लटक गया। नतीजतन बीसीसीआई उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को मान्यता नहीं दे रहा है। बोर्ड ने उत्तराखंड की मान्यता का मामला एफिलिएशन कमेटी के सुपुर्द कर इसे सुलझाने का भी प्रयास किया। जुलाई 2016 में एफिलिएशन कमेटी के सदस्य अंशुमन गायकवाड़ व प्रकाश दीक्षित ने देहरादून में सभी एसोसिएशनों को बुलाकर उनका पक्ष जाना। सभी ने अपने-अपने दावे पेश किए। तब अंशुमन गायकवाड़ व प्रकाश दीक्षित ने एसोसिएशनों को प्रदेश की क्रिकेट की बेहतरी के लिए एकजुट होकर मान्यता लेने की बात कही, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। दो सदस्यीय यह कमेटी अपने मिशन में सफल नहीं हो पायी।

ऊपरी तौर पर यह आभास होता है कि प्रदेश में सक्रिय क्रिकेट एसोसिएश्न के वर्चस्व के झगड़े के चलते उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को बीसीसीआई मान्यता नहीं दे रहा है। लेकिन अगर मामले को थोड़ा नजदीक से देखा जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है। असल में बीसीसीआई भले ही ऊपरी तौर पर कुछ कहता रहे, अंदरूनी तौर पर स्वयं बीसीसीआई ही उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को मान्यता देना नहीं चाहता है। अंदरखाने बीसीसीआई अपने मनपसंद क्रिकेट एसोसिएशन को मान्यता देना चाहता है। बीसीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने के बावजूद उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन में 12वां जोन बना रखा है। बीसीसीआई के इशारे पर ही उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन ने देहरादून क्रिकेट एसोसिएशन को अपना सदस्य बना रखा है। इससे बीसीसीआई की मिलीभगत और मंशा साफ हो जाती है।

वर्तमान में प्रदेश में क्रिकेट को लेकर उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) ही सबसे अधिक सक्रिय और संजीदा दिखाई देती है। उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) के निदेशक व सचिव दिव्य नौटियाल के अनुसार, प्रदेश में यूसीए ही एकमात्र एसोसिशन है जिससे राज्य के सभी 13 जिलों में क्रिकेट एसोसिएशन जुड़ी हैं। बकौल नौटियाल हम सीनियर, जूनियर, महिला और दृष्टि बाधित सभी कैटगरी की प्रतियोगिताओं का लगातार आयोजन कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) के सचिव दिव्य नौटियाल के अुनसार, यूसीए का गठन कंपनी एक्ट 1956 के तहत वर्ष 2000 में हुआ। यूसीए के पदाधिकारी मान्यता के लिये बीसीसीआई की मान्यता कमेटी से 29 अगस्त 2009 को मिले थे। हमने यूसीए को प्रदेश में मान्यता देने के लिये कमेटी के सामने तमाम सूबूत और कागजात पेश किये थे, बावजूद इसके अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। बकौल नौटियाल, बीसीसीआई के रवैये से नाराज होने और घर बैठने की बजाय पिछले 17 सालों से हम प्रदेशभर में क्रिकेट प्रतियोगिताओं का आयोजन करवा रहे हैं।

28 फरवरी 2015 को उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव सचिव दिव्य नौटियाल ने बीसीसीआई को पत्र लिखकर ये अवगत कराया कि अभिमन्यु क्रिकेट अकादमी के आरपी ईश्वरन, तनिष्क क्रिकेट अकादमी के त्रिवेंद्र सिंह रावत व यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन के राजेंद्र पाल और आलोक गर्ग उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीएस) के निदेशक बन गए है। उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव व निदेशक दिव्य नौटियाल का दावा है कि इससे बीसीसीआई को फैसला लेने में आसानी होगी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से मान्यता के लिए भले ही उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए), यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन, तनिष्क क्रिकेट अकादमी और अभिमन्यु क्रिकेट अकादमी का उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन में विलय हो गया हो, लेकिन मान्यता के मामले में अभी कई पेंच है।

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के सचिव पीसी वर्मा कहते हैं कि, पूर्ण सदस्य का दर्जा मिलने से क्रिकेटरों की राह खुली है। जहां तक मान्यता का मामला है तो हम एकजुट होने को तैयार हैं। खिलाड़ियों के भविष्य के लिए बोर्ड जिसे भी मान्यता दे हमें स्वीकार होगा। वहीं यूनाइटेड क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के संरक्षक राजेंद्र पाल कहते हैंकि, अब चूक गए तो फिर कभी मान्यता नहीं मिल पाएगी। सीओए हमें बुलाए इससे पहले हम सभी को आगे बढ़कर पहल करनी होगी। हम एकजुट होने को तैयार हैं, इसमें औरों को भी आगे आना होगा। उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव चंद्रकांत आर्य के मुताबिक यह साफ हो गया है कि कुछ ही समय में उत्तराखंड को मान्यता मिल जाएगी। हमारा दावा सबसे मजबूत है। हमारी स्टेट बॉडी काम कर रही है। अगर अन्य एसोसिएशन बातचीत करने आगे आती हैं तो हमें कोई एतराज नहीं। बीसीसीआई की मान्यता के लिये गुटबाजी में उलझी सूबे की क्रिकेट एसोसिएशनों को एक मंच पर आना होगा। सीओए के इस निर्णय के बाद एसोसिएशनों ने भी जल्द मान्यता मिलने की उम्मीद जताई है, लेकिन उनके सुर अभी भी जुदा नजर आ रहे हैं।

यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह रावत एवं पूर्व क्रिकेटर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर राजेंद्र पाल ने 26 जनवरी 2015 को देहरादून में आयोजित प्रेसवार्ता में कहा कि, उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखण्ड को भी अब साथ आ जाना चाहिए। वर्तमान में त्रिवेंद सिंह रावत सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वो सूबे के खिलाड़ियों के हित के मद्देनजर मामला सुलझाने में तत्परता दिखाएंगे। जानकारों का कहना है कि जब तक चंद्रकांत आर्य, हीरा सिंह बिष्ट और पीसी वर्मा के संरक्षण वाली एसोसिएशन साथ नहीं आती मान्यता का मामला लटका रह सकता है।

बीसीसीआई की मान्यता के बावजूद इसी माह रणजी मैच की जिम्मेदारी देहरादून क्रिकेट एसोसिएशन को दी गयी है। गौरतलब है कि डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन देहरादून उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन से संबद्ध है। यहां यह भी उल्लेख करना लाजिमी है कि डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन देहरादून के अध्यक्ष एवं क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखण्ड के सचिव पीसी वर्मा लोढ़ा समिति के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुये 70 वर्ष के आयु पूर्ण करने के बाद भी पदाधिकारी बने हैं। पीसी वर्मा को उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के राजीव शुक्ला का वरदहस्त प्राप्त है। वहीं क्रिकेट पर वर्चस्व और अपनी हनक बरकरार रखने के लिये पीसी वर्मा ने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखण्ड के सचिव की कुर्सी अपने बेटे को सौंप दी है।

इस माह देहरादून में होने वाले रणजी ट्राफी का मैच का अयायोजन डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन देहरादून उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के साथ मिलकर कर रही है। बीसीसीआई से मान्यता मिलने के बावजूद उत्तराखण्ड राज्य की किसी क्रिकेट एसोसिएशन को तवज्जो नहीं दी जा रही है। सवाल यह भी है क्यों यूपीसीए द्वारा क्यों​ रणजी मैच का आयोजन देहरादून क्रिकेट एसोसिएशन कर रही है। उसने क्यों नहीं चारों एसोसिएशनों को​ एक मंच पर लाकर मैचों का आयोजन किया। इस बात की आशंका जतायी जा रही है कि रणजी मैच के दौरान बीसीसीआई की टीम उत्तराखण्ड आकर एक बार चारों एसोसिशनों के पदाधिकारियों से मिलकर सुलह का प्रयास करेगी। संभावना इस बात की भी जतायी जा रही है इस दौरान उत्तराखण्ड राज्य क्रिकेट को बीसीसीआई की मान्यता मिल जाएगी।

मान्यता मिलने पर देश की प्रतिष्ठित क्रिकेट प्रतियोगिताओं यथा अंडर-14 राजसिंह डूंगरपुर ट्राफी, अंडर-16 विजय मर्चेट ट्रॉफी, अंडर-19 वीनू माकंड ट्रॉफी, कूच बिहार ट्रॉफी, सी.के. नायडू ट्राफी, रणजी ट्रॉफी, विजय हजारे ट्रॉफी, ईरानी ट्राफी, सैय्यद मुश्ताक अली टी-20 टूर्नामेंट, प्रो. डीबी देवधर ट्रॉफी, महिला अंडर-19 प्रतियोगिता और सीनियर महिला राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता सूबे की टीम उतर सकेगी।

दुर्भाग्य देखिए कि आपसी गुटबाजी और खुद को मजबूत दावेदार बताने वाली एसोसिएशनें मान्यता के लिए झगड़ती रहीं। नतीजा, मान्यता के मौके हाथ से फिसलते रहे। बोर्ड की एफिलिएशन कमेटी के सामने भी सभी अपने-अपने दावे करते रहे। अब अगर चारों एसोसिएशन एक झण्डे के तले नहीं आयी तो उत्तराखंड फिर पिछड़ जाएगा। लोढा कमेटी की सिफारिशें लागू होने से कई एसोसिशनों के पदाधिकारियों का बाहर हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। चारों एसोसिएशनों के बीच सामंजस्य न बन पाने और एक मंच पर न आने की यह भी एक बड़ी वजह है।

उत्तराखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन (यूसीए) का एक प्रतिनिधिमण्डल पिछले दिनों इस मसले पर मुख्यमंत्री त्रिदेव सिंह रावत से मिला था। मुख्यमंत्री ने शीघ्र ही इस संबंध में ठोस निर्णय लेने का आश्वासन यूसीए को दिया है। राज्य क्रिकेट के हित में होगा कि मुख्यमंत्री चारों एसोसिएशन के पदाधिकारियों केा बुलाकर एक तदर्थ कमेटी का गठन करके इसी माह बीसीसीआई को भेजें। हालांकि, यह भी संभव है कि बीसीसीआई प्रशासकों की समिति एसोसिएशनों के दावों को दरकिनार कर अपनी निगरानी में उत्तराखंड की बॉडी का गठन कर दे।

फिलहाल बीसीसीआइ ने उत्तराखंड को पूर्ण सदस्य का दर्जा देकर क्रिकेटरों के भविष्य की राह खोल दी है। अब बस इंतजार है तो बोर्ड से मान्यता मिलने का। प्रदेश में क्रिकेट की बेहतरी और खिलाड़ियों के भविष्य के मद्देनजर फिलहाल यह बेहतर होगा कि बीसीसीआई स्वतः संज्ञान लेते हुये सूबे में सक्रिय चारों क्रिकेट एसोसिएशनों के सदस्यों को मिलाकर एक कमेटी का गठन कर कार्य को आगे बढ़ाये। क्योंकि यहां सवाल एसोसिएशनों के वर्चस्व या राजनीति का नहीं बल्कि उन सैंकड़ों प्रतिभावान युवा क्रिकेटरों का है जिनका भविष्य इस खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई में पिस रहा है।

लेखक तारकेश्वर मिश्र राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनसे संपर्क या 9453377999 के जरिए किया जा सकता है.

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