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पोंटी चड्ढा ग्रुप से पैसे खाकर अखिलेश यादव की सरकार भी जांच के अपने वादे को भूल गई थी....

अजय कुमार, लखनऊ

बसपा सुप्रीमों और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सियासी रूप से काफी कमजोर हो गई हैं। 2014 में बसपा का एक भी नेता लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाया था और 2017 के विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी के विधायकों की संख्या मात्र 19 पर सिमट गई। मायावती को पता है कि उनकी सियासी जमीन पर बीजेपी सेंधमारी कर रही है,इसी लिये वह बीजेपी पर हमलावर होने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं। आजकल वह ईवीएम मशीन में गड़बड़ी करके यूपी विधान सभा चुनाव जीतने का आरोप बीजेपी वालों पर लगा रही हैं तो उधर बीजेपी ने भी बसपा सुप्रीमों की जबर्दस्त मोर्चाबंदी कर दी है। योगी सरकार ने 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती द्वारा नियम विरूद्ध प्रदेश की 35 चीनी मिलों की बिक्री की जांच का आदेश देकर माया की मुश्किलें बढ़ा दी है।

मायावती राज में जिस तरह से चीनी मिलों को औने-पौने दाम पर बेचा गया था, उस पर उस समय काफी हो-हल्ला मचा था। इसमें से अधिकांश चीनी मिलें पोंटी चड्ढा गु्रप को बेची गई थीं। चीनी मिलों की बिक्री की कीमत इतनी कम रखी गई थी कि चीनी मिल एरिया की जमीन का सर्किल रेट ही बेची गई कीमत से कहीं अधिक था। तब विपक्ष में बैठे समाजवादी पार्टी के नेताओं ने ताल ठोंककर दावा किया था कि उनकी सरकार बनेगी तो चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच कि जायेगी और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे जाना होगा, लेकिन पांच वर्षो तक अखिलेश सरकार ने कुछ नहीं किया। इस पर यही समझा गया कि अखिलेश सरकार पोंटी चड्ढा ग्रुप के दबाव में थी, जिसके सपा के कई बड़े नेताओं और पार्टी को फायदा मिल रहा था। जबकि 2012 में ही भारत के नियंत्रक एवं महा लेखापरीक्षक ने उत्तर प्रदेश में औने-पौने दाम में चीनी मिलें बेचने के मामले में कई हजार करोड़ रूपये के घोटाले की पुष्टि की थी।

सीएजी रिपोर्ट में कहा गया था कि अनुमानतः 25 हजार करोड़ रुपये के चीनी मिल बिक्री घोटाले में मूल्यांकित किये गये मूल्यों में कटौती करने के कारण जहां 864.99 करोड़ रुपये राजस्व की क्षति हुई वहीं जो चीनी मिलें बेची गयीं उनके मूल्यांकन में सर्किल रेट की अनदेखी करने के कारण 600.18 करोड़ रुपये राजस्व की क्षति हुई। दरअसल सारा घोटाला और घपला मूल्यांकन के दौरान ही किया जाता है। इस तरह कुल 35 सरकारी चीनी मिलों को मायावती सरकार ने अपने चहेते शराब माफिया पोंटी चड्ढा ग्रुप को लाभ पहुंचाने के लिए गैर-पारदर्शी ढंग से बेचा और सरकारी राजस्व को लगभग 25 हजार करोड़ का चूना लगाया था।

महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में चीनी मिलों के मूल्यांकन में हेराफेरी, मनमाने ढंग से मूल्यांकित मूल्य में कमी करने, मूल्यांकन में सर्किल रेट के आधार पर आगणन न करने, गुपचुप लेनदेन, गैरपारदर्शी तरीके से नीलामी तथा टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी से हजारों करोड़ रुपये के राजस्व हानि की पुष्टि की है। उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड (यूपीएसएससीएल) की स्थापना 1971 में हुई थी। वर्ष 1971 से 1989 में 29 चीनी मिलों को अधिग्रहित किया गया। वर्ष 1978 से 1988 तक छह चीनी मिलें स्थपित की गयी। इन 35 चीनी मिलों में पांच मिले चीनी निगम की सब्सिडियरी के प्रबंधन में दी गयी, जिनमें किच्छा चीनी मिल, नंदगंज और सिरोही चीनी मिलें, छाता चीनी मिल तथा घाटमपुर चीनी मिल शामिल हैं। शेष 30 कंपनियां चीनी निगम के सीधे नियंत्रण में थीं।

मई 1995 में चीनी निगमों को भारी घाटा होने के कारण बीआईएफआर में चली गयीं। जिसके सुझाव के आधार पर चीनी निगम 11 स्वस्थ अच्छी चलने वाली मिलें चलाने का निर्णय लिया गया तथा दस बंद मिले (इसमें बाराबंकी, बरेली, छितौनी, घुघली, हरदोई, मोहाली, मेरठ, मुंडेरवा, नवाबगंज तथा रामपुर शामिल है) तथा आठ बीमार चीनी मिलों (भटनी, भूरवल, देवरिया, रामकोला तथा साहदगंज, बैतालपुर, लक्ष्मीगंज और पिपराइच) को मई 2002 में गठित उत्तर प्रदेश राज्य चीनी एवं गन्ना विकास निगम  लिमिटेड को दे दी गयी। डोईवाला और किच्छा चीनी मिलें 2002 में उत्तराखंड को दे दी गयीं तथा चार चीनी मिलें नंदगंज, छाता, घाटमपुर और रायबरेली चीनी निगम की सब्सिडियरी के पास रह गयीं। वर्ष 2009 से चीनी मिलों के विनिवेश के लिए इनके मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू की गयी।

उत्तर प्रदेश में तीन प्रकार की चीनी मिलें हैं सरकारी, प्राइवेट, कोआपरेटिव। शुगर कारपोरेशन की 35 शुगर फेडरेशन की 28 और 93 प्राइवेट मिलें हैं। शुगर कारपोरेशन तब अस्तित्व में आया जब काफी चीनी मिलें घाटे में थीं। सन 1971 से 1989 के बीच में उन्हें राष्ट्रीयकृत किया गया। अभी पिछले कई सालों से यूपी शुगर कारपोरेशन की चीनी मिलें घाटे में चल रही थीं। बसपा सरकार ने इसमें अपना निजी स्वार्थ साधने की नियत से और अवैध लाभ कमाने के लिए इन चीनी मिलों को औने-पौने दामों में बेचना शुरू कर दिया। शुरुआती बोली का दौर दिल्ली में पिछले साल सम्पन्न कराया गया। उस दौर में चीनी उद्योग से जुड़े कुछ बड़े नाम जैसे बिरला शुगर, डालमियां ग्रुप, सिम्बोली शुगर, धामपुर शुगर, द्वारिका शुगर, उत्तम शुगर, त्रिवेणी शुगर और मोदी शुगर ने बोली में भाग लिया। लेकिन इण्डियन पोटास और वेव इण्डस्ट्री को छोड़कर बाकी शेष बड़े नामों ने खुद को बोली से अलग कर लिया।

गौरतलब है कि सरकार ने सुनियोजित तरीके से अपने चहेते उद्यमी पोंटी चड्ढा जिसके पास इससे पहले तक केवल एक चीनी मिल थी, उसी की फ्रंट कम्पनीज के पक्ष में नीलामी स्वीकार की। जो नीलामी की गयी, उसमें जो बोली लगायी गयी या लगवायी गयी वह दिखावा मात्र थी क्योंकि चीनी मिलों की जमीन की कीमत से भी कम बोली लगी थी। आरोप है कि बाकी बोली लगाने वाले जिन्होंने पहले हिस्सा लिया था उनको नीलामी में भाग लेने से रोका गया। जरूरत से कम दामों में बोली लगाने से कुछ खास चहेतों को लाभ पहुंचाकर बोली के न्यूनतम मूल्य से कम की बोली लगवायी गयी। जमीन का दाम न के बराबर लगाया गया। उस मील की मशीनें, भवन, कच्चा माल, आवासीय परिसर की सुविधाओं को भी ध्यान में नहीं रखा गया। उनका मूल्य भी नहीं के बराबर लगाया गया। डिस्काउंट कैश फ्लो तरीके के जरिए इनके मूल्य का आंकलन किया गया। इस तरीके से बोली की शुरुआत ही कम कीमत से हुई।

अखिलेश सरकार ने महालेखाकार की रिपोर्ट पर कार्रवाई करने की बजाय मायावती सरकार में हुए 1180 करोड़ रूपये चीनी मिल ब्रिकी घोटाले की जांच नवंबर 2012 में लोक आयुक्त को सौप दी थी। तत्कालीन लोकायुक्त न्यायामूर्ति एनके मेहरोत्रा ने डेढ़ साल से ज्यादा समय तक जांच भी की, लेकिन नतीज शून्य  रहा। जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भेजी गई अपनी जांच रिपोर्ट में लोकायुक्त ने चीनी मिलों की ब्रिकी में सराकार को लगी 1180 करोड़ रूपये की चपत के लिए किसी को जिम्मेदार नही ठहराया था। लोकायुक्त ने सरकार को इस मामले में विधानमंडल की सार्वजनिक उपक्रम एंव निगम संयुक्त समिति व सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन एसएलपी पर अपना पक्ष प्रस्तुत करने की सिफारिश की थी इसके बाद मामल ठंडे बस्ते मे चला गया,जबकि यह मामला विधान सभा तक में उठा था।

बहरहाल, योगी सरकार ने चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच का ओदश देकर न केवल माया-अखिलेश सरकार की कारगुजारी उजागर करने का फैसला यिला है इसके अलावा उसने खुद अपनी सरकार के मंत्रियों के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। बसपा सरकार में चीनों मिलों की बिक्री में हुए घोटाले की जांच का आदेश देकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह साफ कर दिया है कि वह अनियमितताओं के मामले में किसी को छोड़ने वाले नहीं हैं। इसी तरह की कुछ जांचे अखिलेश सरकार में किये गये कुछ महत्वपूर्ण फैसलों पर भी बैठाई गई है। लखनऊ में बन रहे रिवर फ्रंट की जांच तो बैठा भी दी गई है। खैर, चीनी मिलों की बिक्री की जांच कराकर योगी सरकार ने एक ऐसा मसला उठाया है जो सीधे स्तर पर सरकारी लोगों की मिलीभगत से सरकारी लूट की श्रेणी में आता था और साफ दिखाई भी देता था कि सरकार की शह पर किस तरह कुछ लोगों के लिए भ्रष्टाचार के रास्ते खोले जाते हैं।

योगी का फैसला न सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले सिंडीकेट पर चोट है, बल्कि यह चेतावनी भी है कि भाजपा सरकार के मंत्री और अफसर भी ऐसे सिस्टम से दूर रहें तो ही बेहतर। संदेश स्पष्ट है कि शुचिता-पारदर्शिता के मानदंड सबके लिए बराबर हैं और नेतृत्व की सतर्क निगाह अपनों पर भी होगी। निस्संदेह ऐसे निर्णय जनता पसंद करती है। योगी सरकार के इस फैसले से पूर्व की सरकारों में शामिल कई नेताओं-अफसरों में बेचैनी देखने को मिल सकती है। संभावना है कि आने वाले दिनों में सपा और बसपा सरकार के कई ऐसे फैसले जांच की परिधि में आ सकते हैं, जिन पर सीएजी या अन्य किसी भ्रष्टाचार विरोधी संस्था या बोर्ड ने सीधे तत्कालीन सत्ता पर अंगुलियां उठाई होंगी।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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