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नैतिकता के चोले में रंगे सियार (पार्ट-तीन) : सैकड़ों पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें तत्कालीन मुलायम सरकार ने रियायती दरों पर भूखण्ड और मकान उपलब्ध करवाए थे इसके बावजूद वे सरकारी आवासों का मोह नहीं त्याग पा रहे। इनमें से कई पत्रकार ऐसे हैं जिनके निजी आवास भी लखनऊ में हैं फिर भी सरकारी आवासों का लुत्फ उठा रहे हैं जबकि नियम यह है कि सरकारी आवास उन्हीं को दिए जा सकते हैं जिनका निजी आवास लखनऊ में न हो। कुछ पत्रकारों ने रियायती दरों पर मिले मकानों को किराए पर देकर सरकारी आवास की सुविधा ले रखी है तो कुछ सरकारी आवासों को ही किराए पर देकर दोहरा लाभ उठा रहे हैं।

बीबीसी में संवाददाता रहने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके रामदत्त त्रिपाठी को तत्कालीन मुलायम सरकार ने अनुदानित दरों पर पत्रकारपुरम में प्लाट संख्या 2/91 आवंटित किया था। सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर जो प्लाट दिया गया था, उस पर इन्होंने तीन मंजिला निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्य के लिए किराए पर दे रखा है। गौरतलब है कि तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर भूखण्ड आवंटन के समय स्पष्ट रूप से कहा था कि जो भूखण्ड उन्हें दिया जा रहा है उसे 30 वर्ष से पहले न तो बेचा जा सकता है और न ही व्यवसाय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है इसके बावजूद श्री त्रिपाठी ने अपने भूखण्ड पर निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्यों के लिए दे रखा है। जानकार सूत्रों का दावा है कि उक्त भवन को आवासीय से व्यवसायिक में भी परिवर्तित नहीं कराया गया है।

जाहिर है नगर निगम को व्यवसायिक दरों पर टैक्स भी नहीं मिल रहा है। बताया जाता है कि उन्हीं के कुछ निकट साथियों ने गुपचुप तरीके से नगर निगम को वस्तुस्थिति से अवगत कराया था, लेकिन विभाग वरिष्ठ पत्रकार के सत्ताधारियों से करीबी रिश्तों के कारण कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। वर्तमान समय में श्री त्रिपाठी किस मीडिया संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं? किसी को जानकारी नहीं, इसके बावजूद श्री त्रिपाठी न सिर्फ स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से राज्य मुख्यालय की मान्यता लेकर सरकारी सुख सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं बल्कि सरकारी आवास में भी नियमविरुद्ध तरीके से अध्यासित हैं। पत्रकारों के मध्य वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी ने गुलिस्तां कालोनी में (भवन संख्या 55 नम्बर) सरकारी आवास पर अपना कब्जा जमा रखा है।

किसी समय जनसत्ता एक्सप्रेस में सम्पादक रहे पंकज वर्मा को भी सरकारी अनुदान पर गोमती नगर, विनय खण्ड में भूखण्ड संख्या 4/49 आवंटित किया गया है लेकिन वे राजधानी लखनऊ के अति विशिष्ट इलाके में मौजूद राजभवन कालोनी में भवन संख्या 1 पर अवैध रूप से काबिज हैं। इनके कब्जे को राज्य सम्पत्ति विभाग ने भी अवैध मानते हुए इनका आवास एक अन्य पत्रकार को आवंटित कर दिया था लेकिन सूबे की सत्ताधारी सरकारों से मधुर सम्बन्धों के चलते राज्य सम्पत्ति विभाग सरकारी आवास से कब्जा नहीं हटवा सका। जिस पत्रकार को पंकज वर्मा का सरकारी आवास आवंटित किया गया था उस पत्रकार ने श्री वर्मा के अवैध कब्जे को न्यायालय में भी चुनौती दी थी।

टाईम्स आफ इण्डिया के समाचार सम्पादक रहे रतनमणि लाल अब किसी मीडिया संस्थान में काम नहीं करते। इस वक्त वे एक एनजीओ के तहत निजी काम कर रहे हैं इसके बावजूद डालीबाग कालोनी के 7/13 के सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। कुबेर टाईम्स समाचार पत्र को बन्द हुए कई वर्ष हो चुके हैं इस अखबार के नाम पर एक पत्रकार ने सरकारी आवास हथिया रखा है। 

एएनआई की संवाददाता कामिनी हजेला पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर विराज खण्ड, गोमती नगर में भूखण्ड संख्या 3/214 पा चुकी हैं फिर भी कामिनी हजेला ने सरकारी आवास संख्या ए-1006 से अपना मोह नहीं त्यागा। द पायनियर के संवाददाता विश्वदीप बनर्जी इन्दिरा नगर की सचिवालय कालोनी बी-26 पर वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं जबकि इन्हें भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/216 आवंटित किया गया था। दैनिक ग्रामीण सहारा के संवाददाता शरत पाण्डेय भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हासिल करने के साथ ही सरकारी आवास (विधायक निवास-2) पर कब्जा जमाए बैठे हैं।

कमोवेश इसी तरह से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हथियाने के बावजूद सरकारी मकानों का सुख भोग रहे पत्रकारों में अतुल चंद्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/119’, गोलेश स्वामी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/120’ अजय जायसवाल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/45’, कमल दुबे ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/130’ मनोज श्रीवास्तव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/121’, आशुतोष शुक्ल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/122’, संदीप रस्तोगी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/123’, स्वदेश कुमार ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/63 सी’, विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/187’, नदीम ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/136ए’, रूमा सिन्हा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-1/156ए’, विनोद कुमार कपूर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/124’, संजय मोहन जौहरी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/47’, संजय भटनागर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/29’, प्रज्ञान भट्टाचार्य ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या सी 3/7’, सुधीर मिश्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 2/118’, सुरेश यादव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 1/85’, अनिल के. अंकुर ‘सी 3/10 विराट खण्ड’, ज्ञानेन्द्र शर्मा ‘3/78 पत्रकार पुरम’, कामिनी प्रधान ‘सी 3/132 विराज खण्ड’, एम.पी. सिंह ‘1/353 विनम्र खण्ड’, अश्विनी श्रीवास्तव ‘2/64 विराट खण्ड’, प्रदीप विश्वकर्मा ‘सी 1/311 विकल्प खण्ड’, मोहम्मद तारिक खान ‘सी 1/312 विकल्प खण्ड’, बालकृष्ण ‘सी 1/313 विकल्प खण्ड’, प्रदुम्न तिवारी ‘1/157 विराज खण्ड’ और दिलीप कुमार अवस्थी पत्रकार पुरम 2/77 सहित सैकड़ों की संख्या में पत्रकार सरकारी की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड पाने के बावजूद दूसरे के हक पर डाका डाल रहे हैं।

नियमों की उड़ती रही धज्जियां
गोमती नगर, लखनऊ योजना में पत्रकारों के लिए भूखण्डों के लिए पंजीकरण-आवंटन पुस्तिका के कॉलम 13 में यह शर्त रखी गयी थी कि आवंटित भूखण्ड का उपयोग केवल आवासीय प्रयोजन के लिए ही किया जायेगा। यदि किसी समय यह पाया जाता है कि आवंटी ने अन्यथा उपयोग किया है तो उपाध्यक्ष (लविप्रा) को आवंटित भूखण्ड निरस्त करने का पूर्ण अधिकार होगा।

उक्त शर्त के बावजूद ज्यादातर पत्रकारों ने अपने भूखण्डों का उपयोग कामर्शियल के तौर पर कर रखा है। इतना ही नहीं कॉलम 12 में यह स्पष्ट वर्णित है कि यदि कोई आवंटी भूखण्ड के निबंधन तिथि से पांच वर्ष के अन्दर मानचित्र स्वीकृत कराकर मानचित्र के अनुसार निर्माण कार्य पूरा नहीं करवाता है उसे अतिरिक्त 5 वर्ष का समय सरचार्ज लेकर दिया जायेगा। अधिकतम 10 वर्ष तक यदि भूखण्ड पर निर्माण नहीं होता तो दस वर्ष लीज को समाप्त कर दिया जायेगा। कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने निर्धारित अवधि बीत जाने के बावजूद भूखण्ड पर कोई निर्माण नहीं करवाया है और उनके भूखण्ड मौजूदा समय में भी उन्हीं के कब्जे में हैं।

सरकारी आवास आवंटन नियमावली भी रद्दी की टोकरी में
नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि पत्रकारों के आवास तभी आवंटन होगा जब वे लखनऊ में किसी मान्यता प्राप्त अखबार में कार्यरत होंगे। आवास का आवंटन कम से कम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष के लिए होगा। सेवानिवृत्त हो जाने के बाद अथवा तबादलदा हो जाने की स्थिति में उनका आवंटन स्वत: निरस्त कर दिया जायेगा। कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनका दूर-दूर तक पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है इसके बावजूद वे दशकों से सरकारी आवासों का लाभ उठा रहे हैं।

तो क्या दबाव में है राज्य सम्पत्ति विभाग!
तमाम शिकायतों के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा पत्रकारों से आवास खाली न करवाया जाना कहीं न कहीं यह संकेत दे रहा है कि विभाग उन पत्रकारों से आवास खाली करवाने में अक्षम है जिनके सम्बन्ध राज्य की सत्ता और नौकरशाहों से बने हुए हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारी भी यही मानते हैं कि  वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन उपरी दबाव के कारण नहीं कर पा रहे हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक अधिकारी का कहना है कि पत्रकारों के मकान आवंटन से जुडे अधिकतर मामलों में सरकार के किसी न किसी मंत्री अथवा उच्चाधिकारी का सिफारिशी पत्र लगा होता है। ज्यादातर मामलों में तो फाईल पहुंचने से पहले ही अधिकारी अथवा मंत्री-नेता का सिफारिशी फोन आ जाता है। इन परिस्थितियों में नियमों के तहत जानकारी जुटाने का अर्थ ही नहीं रह जाता। इस अधिकारी की मानें तो पत्रकारों की फाइलों पर अक्सर सही सूचना देने पर डांट तक खानी पड़ती है। अब तो हालात यह है कि पत्रकारों के प्रार्थना-पत्रों में सच्चाई नहीं बल्कि सिफारिशी पत्रों को तलाशा जाता है। जिसके प्रार्थना-पत्र में किसी अधिकारी अथवा नेता का सिफारिशी पत्र अथवा फोन से निर्देश मिलते हैं उसी को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी मकानों पर कब्जा दिला दिया जाता है।

लाभ के लिए अनैतिक रास्ते
पत्रकारों को घर और जमीन देने की नींव मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में रखी गयी। राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर में पत्रकारपुरम नाम से पूरी एक कालोनी ही बसा दी गयी थी। पत्रकारों को जमीन भी रियायती दरों पर दी गयी। उस वक्त कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो रियायती दरों पर भी जमीन लेने की हालत में नहीं थे। मुलायम ने अपनी सहृदयता का परिचय देते हुए ऐसे पत्रकारों की आर्थिक मदद भी की। मुलायम ने जिन पत्रकारों को दयाभाव से देखा, असल में वे बेहद शातिर किस्म के थे। अनैतिक तरीकों से लाभ लेने के लिए फर्जी हलफनामों से लेकर फर्जी दस्तावेज तक लगाए गए। हालांकि राज्य सम्पत्ति विभाग इस बात को भलीभांति जानता था लेकिन ऊपर से आदेश मिलने के कारण किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया गया। कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने दो-दो भूखण्ड हथिया लिए।

रियायती दरों पर भूखण्ड लेने के बाद भी सरकारी आवासों में अध्यासित हैं पत्रकार
गोमती नगर योजना में पत्रकारों के लिए अनुदानित भूखण्ड    राज्य सम्पत्ति विभाग के आवासों में अध्यासित
01.    रवीन्द्र सिंह      3/33, पत्रकार पुरम   17, राजभवन कालोनी
02.    रामदत्त त्रिपाठी  3/81, पत्रकारपुरम    55, गुलिस्तां कालोनी
03.    दीपक गिडवानी 1/12 विराज खण्ड     65, गुलिस्तां कालोनी
04.    पंकज वर्मा      4/49, विनय खण्ड     1,  राजभवन कालोनी
05.    विश्वदीप बनर्जी  2/216, विराज खण्ड   बी-26, इन्दिरा नगर
06.    रचना सरन     1/28, विराज खण्ड     बी-78, इन्दिरा नगर
07.    संगीता बकाया  1/33 विराज खण्ड      सी-16 बटलर पैलेस
08.    हेमंत तिवारी    1/19, विराज खण्ड     बी-7, बटलर पैलेस
09.    वीर विक्रम बहादुर 3/82 पत्रकार पुरम   3/8, कैसरबाग
10.    सुरेन्द्र दुबे      1/15, विराज खण्ड      1/2, डालीबाग
11.    राजेन्द्र कुमार  1/27, विराज खण्ड       9/1, डालीबाग
12.    राजेन्द्र द्विवेदी  1/115, विराज खण्ड     51, अलीगंज
13.    शोभित मिश्रा  1/155, विराज खण्ड      23, अलीगंज
14.    ज्ञानेन्द्र शर्मा   3/78, पत्रकारपुरम        23, गुलिस्ता कालोनी
15.    कमाल खान  1/97 विराज खण्ड        बटलर पैलेस 1/315 विकल्प खण्ड
16.    नदीम        1/136-ए, विराज खण्ड   5/16, डालीबाग
17.    अनूप श्रीवास्तव    सीपी-5, सी अलीगंज    09, गुलिस्ता कालोनी
18.    के. विक्रम राव,    सेक्टर सी, अलीगंज       गुलिस्तां कालोनी
19.    मुकेश अलख       1/73, विराज खण्ड       66, गुलिस्ता कालोनी
20.    के.डी बनजी       1/151, विराज खण्ड      7/8, डालीबाग
21.    जोखू प्रसाद तिवारी   1/204 विराज खण्ड    3/43, टिकैतराय कालोनी

आदेश किसी के लिए, लाभ किसी ने उठाया
विगत वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने जब राज्य के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने का निर्देश दिया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी 4, विक्रमादित्य वाले मकान की सुधि जागी। उन्हें लगा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करवाया गया तो निश्चित तौर पर भविष्य में उनके इस मकान पर भी गाज गिर सकती है। साथ ही बगल में स्थित उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का 5, विक्रमादित्य वाला मकान भी हाथ से चला जायेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाने के लिए जरूरी था कि स्थानीय मीडिया को दबाव में लिया जाए। हुआ भी कुछ ऐसा ही। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पत्रकारों के सरकारी आवास को लेकर कोई आदेश नहीं दिया था, लेकिन राज्य सम्पत्ति विभाग ने उसी आदेश को पत्रकारों पर लागू कर दबाव की रणनीति अपनायी। जैसी उम्मीद थी, ठीक वैसा ही हुआ।

नोटिस मिलते ही पत्रकारों को सुख-सुविधा वाला सरकारी आवास हाथ से जाता नजर आया तो शुरू हो गयी अधिकारियों के समक्ष गिड़गिड़ाने की प्रथा। पत्रकारों और फोटोग्राफरों के संगठनों में सरकार के समक्ष नतमस्तक होने की होड़ सी मच गई। एक दूसरे से 36 का आंकड़ा रखने वाले, मोटी कमाई करने वाले और नैतिकता का पाठा पढ़ाने वाले सारे पत्रकार इस मुद्दे पर एकजुट हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे पत्रकारों ने ठान रखा हो कि चाहे कुछ भी हो जाए मगर सरकार की कृपा से मिले मकान खाली न करने पड़ें। अखिलेश सरकार को अपना मकसद उस वक्त सफल होता नजर आया जब पत्रकार ‘जनता दर्शन’ में मुख्यमंत्री की तारीफ करते नजर आए। वैसे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री पहले ही विधानसभा बैठक के दौरान पत्रकारों को आश्वस्त कर चुके थे कि किसी के भी घर खाली नही कराए जाएंगे, फिर भी पत्रकार पूरी तरह से मुतमईन होना चाहते थे लिहाजा पूर्व मुख्यमंत्री ने जनता दर्शन में एक बार फिर पत्रकारों को आश्वस्त किया। परिणामस्वरूप पत्रकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भूलकर तत्कालीन मुख्यमंत्री का यशगान करने में जुट गए। बीच-बीच में दबाव बनाए रखने की गरज से राज्य सम्पत्ति विभाग की तरफ से पत्रकारों को नोटिसें दी जाती रहीं।

राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त एक पत्रकार का दावा है कि तत्कालीन सरकार की यह चाल विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश किये जाने तक चलती रही। इसी दौरान पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा ट्रस्टों, राजनीतिक दलों, अधिकारियों, मंत्रियों, कर्मचारी संघों आदि को सरकारी भवनों के आवंटन के लिए एक अन्य बिल ‘राज्य सम्पत्ति विभाग नियंत्रणाधीन भवन आवंटन विधेयक 2016’ पेश किया गया। पत्रकारों के लिए भवनों का आवंटन भी इसी दायरे में लाया गया।

इस विधेयक के बाद की स्थिति यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी खुश हैं कि उनका और उनके पिता का बंगला खाली नहीं कराया जा सकेगा और पत्रकार भी खुश हैं कि सभी के घर बच गए। रही बात सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तो जैसा पहले होता आया है वैसा ही आगे भी होता रहेगा। कानून की किताबों में एक अध्याय और जुड़ जायेगा, भले ही वह किसी काम का न हो।  कहने का तात्पर्य यह है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री यदि चाह ले तो हमारे की देश की न्यायपालिका को भी नतमस्तक हो जाना पड़ता है।

अधिकारियों के आदेश भी कोई मायने नहीं रखते
नौकरशाहों और सत्ताधारियों के चरण चापन करने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई सम्बन्धी सरकारी आदेश भी कोई मायने नहीं रखते। 9 नवम्बर 2012 को पत्रकारों के आवास आवंटन और नवीनकरण के लिए तत्कालीन प्रमुख सचिव (मुख्यमंत्री) राकेश गर्ग और सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गयी। बैठक में चिन्हित किए गए उन पत्रकारों के आवास आवंटन को लेकर चर्चा हुई जिन्होंने फर्जी ढंग से सरकारी आवासों पर कब्जा जमा रखा था। बैठक में सम्बन्धित अधिकारी को आदेश दिया गया था कि जिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आवास आवंटन का नवीनीकरण नहीं हुआ है उनसे तत्काल दोबारा प्रार्थना पत्र मांगा जाए, साथ ही गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को नोटिस देकर उनके आवास खाली कराए जाएं। मुख्यालय से बाहर स्थानांतरित पत्रकारों के आवासों का निरस्तीकरण किया जाए। जिन पत्रकारों का निधन हो गया है, उनके आश्रितों में यदि कोई मान्यता प्राप्त पत्रकार है, तो उनको छोड़कर सभी के आवास निरस्त करने के साथ ही सख्ती से मकानों से कब्जे हटवाए जाएं। उस वक्त प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों की कार्रवाई से ऐसा लगने लगा था कि बहुत जल्द फर्जी ढंग से सरकारी आवासों पर कब्जा जमाए तथाकथित पत्रकारों से उनके मकान खाली करवा लिए जायेंगे। उस वक्त सूबे मे अखिलेश यादव की सरकार सत्ता में थी। पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद सरकार तो चली गयी लेकिन सम्बन्धित विभाग कार्रवाई नहीं कर पाया। इसके विपरीत अखिलेश सरकार के कार्यकाल में पत्रकारों को और अधिक सुविधाएं दे दी गयीं।

...समाप्त...

लखनऊ से प्रकाशित चर्चित खोजी पत्रिका 'दृष्टांत' में यह स्टोरी मैग्जीन के प्रधान संपादक अनूप गुप्ता के नाम से छपी है. वहीं से साभार लेकर इसे भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

इसके पहले वाले दोनों पार्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें...

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