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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में 63 से भी ज्यादा नन्हे-मुन्नों की मौत की घटना ने  देश के आम नागरिकों के दिलों को झकझोर कर रख दिया लोगों के मन में यह सवाल कोलाहल मचाने लगा कि आखिर आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश भारत और उसके सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी लचर क्यों हैं ..? कहना न होगा स्वास्थ्य सुविधाओं और सेवाओं के मामले में भारत अन्य कई देशों से काफी पीछे है. यहाँ तक की पड़ोसी देश बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका भी स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं के मामले में भारत से कहीं आगे हैं मेडिकल जर्नल ‘द लैनसेट’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी’ के अनुसार स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी 195 देशों की सूची में भारत का 154 वें स्थान पर होना बेहद अफसोसजनक है!

गोरखपुर के बी आर डी मेडिकल कालेज में घटित इस दिल दहला देने वाली घटना पर भले ही शासन प्रशासन अपनी सफाई में कुछ भी कहे लेकिन इस बात को नाकारा नहीं जा सकता की स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग अराजकता की स्थिति में पहुंच चुकी है. स्वास्थ्य सेवा और सुविधाओं के नाम पर मानवीय संवेदनायें इस हद तक गिर चुकी हैं कि इसी उत्तर प्रदेश में प्रसूताएं रिक्से और बैलगाड़ियों में बच्चे जनने को विवश दिखाई पडती हैं और तो और तीमारदारों को और परिजनो को मृतक के शव भी मीलों साईकिल व कन्धों पर ढोने की ख़बरें सार्वजनिक होती रहती है. हाला की इस घटना पर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घटना में मरे बच्चों के परिवारवालों से संवेदना जताते हुए यह कहा है की पीएम नरेन्द्र मोदी भी इस घटना से काफी दुखी और चिंतित हैं और उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को हर संभव मदद का भरोसा दिया है एवं पीएम ने केन्द्र के दो मंत्रियों को गोरखपुर भेजा भी है. मुख्यमंत्री योगी ने मीडिया से भी अपील की कि तथ्यों को सही तरीके से पेश करें हादसे की उच्चस्तरीय जांच हो रही है और दोषियों को उनकी सरकार कतई बख्सेगी नहीं. फिलहाल यहाँ श्री सिंह को प्रिसिपल का चार्ज देते हुए अपनी बेहतर सेवा के रूप में मीडिया के सामने आये डॉ कफील को हटा दिया गया है. मुख्यमंत्री स्वयं यहाँ दौरा भी करने पहुंचे हैं. 

खैर जांच पहले भी होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगीं लेकिन क्या जांचों से समस्या का कोई समाधान भी होगा मुख्यमंत्री जी, विचार तो इस पर करना होगा. बताते चलें की लगभग 20 करोड़ की संख्या के साथ उत्तर प्रदेश की आबादी ब्राजील देश के बराबर है यहाँ की अर्थव्यवस्था की यदि बात करें तो कतर जैसे देश के बराबर है, जब कि कतर की आबादी उत्तर प्रदेश के एक शहर के बराबर ही है करीब 24 लाख। यहां प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) केन्या के लोगों की तरह है और इस राज्य का शिशु मृत्यु दर गाम्बिया के बराबर है, यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि गाम्बिया गरीबी से त्रस्त एक पश्चिम अफ्रीकी देश है । 75 जिलों और 97607 गांवों के साथ आबादी की दृष्टि से भी उत्तर प्रदेश ऐसा सूबा है जो भारत के राजनीतिक प्रभुत्व की कुंजी अपने हाँथ लिए रहता है, लेकिन स्वास्थ्य, पोषण परिणाम, बुनियादी ढांचे और कानून व्यवस्था की दृष्टि में यह पहले भी पिछड़ा था और आज भी पिछड़ा है आखिर क्यों ...?

इस प्रदेश में 16.9 करोड़ मतदाता है जो हर बार इन बुनियादी समस्याओं में सुधार होने का सपना सजोतें है लेकिन दुर्भाग्य यह की हर बार उसके सपने चकनाचूर ही होते हैं. इसी देश का  .राज्य गोवा, जहां की आबादी उत्तर प्रदेश की आबादी से भी कम है, वहां नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति पांच गुना ज्यादा खर्च किया जाता है जब की उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य का सार्वजनिक औसत खर्च बेहद कम है। परिणामतः कम खर्च से स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों, नर्सों और सहयोगी स्टाफ की कमी जैसी समस्याएं यहाँ हमेसा बनी रहती हैं । आंकड़े इस बात के गवाह हैं की दो में से एक बच्चे का पूर्ण टीकाकरण तक यहाँ नहीं हो पाता है और राज्य के 14 फीसदी परिवारों को “अनर्गल” स्वास्थ्य व्यय से जूझना पड़ता है, जो कि कुल घरेलू खर्च से 25 फीसदी ज्यादा होता है और तो और शिशु म्रत्यु दर में जहाँ यह प्रदेश अन्य राज्यों से आगे है वहीं जन्म पंजीकरण के मामले में सबसे पीछे!

यदि  विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों को देखें तो स्पष्ट है कि प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन प्रदेश की कौन कहे हमारा भारत इस अनुपात को हासिल करने में अभी बहुत पीछे है. पिछले  दस सालों में यह कमी तीन गुना तक बढ़ी है इसका अंदाज़ा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा फरवरी 2015 में राज्यसभा में दिए गए आंकड़ों से ही लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने खुद कहा था कि देश भर में चौदह लाख डॉक्टरों की कमी है और प्रतिवर्ष लगभग 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पाते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में तो स्थिति और भी बदतर है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50 फीसद डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 82 फीसद तक पहुंच जाता है। यानी कुल मिलाकर केवल उत्तर प्रदेश की कौन बात करे  हमारा देश ही अभी स्वास्थ्य सेवा जैसे बुनियादी मामले में ही डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है।

गोरखपुर की इस घटना पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी योगी सरकार पर  अंगुली उठाने से नहीं चूके उन्होंने भी कहा कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई है योगी सरकार पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, कि “मृतकों के परिजनों को लाश देकर भगा दिया गया, यही नहीं मृतक बच्चों का पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ है. इतने बच्चों की मौत से वो बहुत दुखी हैं उन्होंने सरकार पर मौतों का आंकड़ा भी  छिपाने का आरोप लगाया तथा यह भी कहा की अगर मुख्यमंत्री स्तर पर समीक्षा में आक्सीजन का भुगतान न होने की बात सामने नहीं आई तो गलती किसकी है ...? कांग्रेस प्रमुख राज्बबर ने भी 70 बच्चों को मार दिए जाने की बात कही तथा सरकार को हत्यारी जैसे शब्दों से नवाजा कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए की इस घटना का राजनीतिकरण भी जारी है तो गलत ना होगा लेकिन सवाल यह उठ रहा है की देश में बदहाल हो चली स्वास्थ्य सेवाओं में निरंतर व्याप्त अव्यवस्थाओं के लिए क्या पूर्ववर्ती केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जिम्मेवार नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश जहां देश की 16.16 फीसदी आबादी रहती है, वहां केवल 10.81 समग्र स्वास्थ्य कार्यकर्मी  हैं हालांकि नवीनतम जनगणना के आंकड़ों (जिसका विश्लेषण बाकी है) के आधार पर संख्या में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ (एनआरएचएम) के कारण आंशिक रुप से सुधार होना संभव  है लेकिन उत्तर प्रदेश के समग्र रैंकिंग में बदलाव होने की संभावना कम है। हम बता दें कि अब भी उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में बराबर नर्सिंग स्टाफ की कमी बनी हुई है।

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों पर सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ें निराश ही करते हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य सांखियिकी 2016 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरुरतों की तुलना में मात्र पचास फीसदी स्टाफ हैं । ये ऐसे कारण हैं जिनके चलते यहाँ शिशु म्रत्यु दर भी अपेक्षाकृत अन्य राज्यों से अधिक है . यह स्थिति वास्तव में चेतावनी जैसी ही है शायद इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में यह फैसला लिया था कि वह विदेशों में पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को ‘नो आब्लिगेशन टू रिटर्न टू इंडिया’ (एनओआरआई) सर्टिफिकेट जारी नहीं करेगी. हाईकोर्ट में इस फैसले के खिलाफ याचिका भी दायर की गयी थी याचिका के जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा था कि देश खुद डॉक्टरों की भारी कमी का सामना कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक देश में इस समय 412 मेडिकल कॉलेज हैं इनमें से 45 प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में और 55 प्रतिशत निजी क्षेत्र में हैं। हमारे देश के कुल 640 जिलों में से मात्र 193 जिलों में ही मेडिकल कॉलेज हैं और शेष 447 जिलों में चिकित्सा अध्ययन की कोई व्यवस्था ही नहीं है।

मौजूदा समय में डॉक्टर बनना बहुत महंगा सौदा हो गया है और एक तरह से यह आम आदमी की पहुंच से बाहर ही हो गया है। सीमित सरकारी कालेजों में प्रवेश पाना एवेरस्ट पर चढ़ने के बराबर  है और निजी संस्थानों में दाखिले के लिए डोनेशन लाखों तक पहुंच चुका है, ऐसे में अगर कोई कर्ज लेकर पढ़ाई पूरी कर भी लेता है तो वह पढाई  पर हुए खर्चे को ब्याज सहित वसूलने की जल्दी में भी रहता है। यह एक तरह से निजीकरण को भी बढ़ावा देता है क्योंकि इस वसूली में उसे दवा कंपनियां पूरी मदद करती हैं। डॉक्टरों को लालच दिया जाता है या यू कहें की उन्हें मजबूर किया जाता है कि वो महंगी और गैरजरूरी दवाइयां और जांच लिखें. अब जब ऐसे हालात बराबर बने हुए हैं तो स्वाभाविक है यह सोचना की भारत के नीति निर्माताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को शायद मुनाफा पसंद लोगों के हवाले कर रखा है जिसके चलते हमारे देश में निजी अस्पतालों की संख्या आजादी के समय से आठ से बढ़कर 93 फीसद हो गयी  है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल हैं या अक्षम बना दी गई हैं, इसीलिए आज ग्रामीण इलाकों में कम से कम 58 फीसद और शहरी इलाकों में 68 फीसद भारतीय निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर हैं । आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं पर बढ़ते खर्च की वजह से हर साल 3.9 करोड़ लोग वापस गरीबी में पहुंच जाते हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है फिर भी इसके बजट में कटौती की जाती है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा अपने मौजूदा बजट में स्वास्थ्य बज़ट में बीस फीसद की कटौती की गई है जानकार बताते हैं कि इस कटौती से नए डॉक्टरों की नियुक्ति करना और स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर सुविधाओं देने जैसे कामों पर असर पड़ेगा। सरकार को बुनियादी समस्याओं पर ध्यान रखना होगा और यह देखना होगा कि समस्या की असली जड़ कहां पर है इसमें कोई दो राय नहीं पूरा देश स्वास्थ्य सेवाओं  के मामले में गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है । सरकार को मेडिकल कॉलेजों में सार्वजनिक निवेश करके ना केवल इनकी संख्या बढ़ाकर नए डॉक्टर तैयार करने वाली व्यवस्था का विस्तार करना होगा बल्कि निजी मेडिकल और अस्पतालों को भी किसी ऐसे व्यवस्था के तहत लाना होगा जिससे उन पर नियंत्रण रखा जा सके।

रिजवान चंचल
पत्रकार
राष्ट्रीय महासचिव
जन जागरण मीडिया मंच
मोबाइल-7080919199
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