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असंतुष्ट समाज का सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्नभंग कर दिया है!

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शीतल पी सिंह-

सोशल मीडिया पर उपलब्ध वर्तमान निज़ाम से असंतुष्ट समाज का सुप्रीम कोर्ट ने स्वप्नभंग कर दिया है! अपना काम दूसरों से करवाने की आदत में पले बढ़े पनपे समाज को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए भी “दूसरा” चाहिए!

अच्छा हुआ कि यह मिथ भी टूट गया जो कभी कभार स्फुटित होने वाले (लाखों में से एकाध बार)न्यायिक फ़ैसलों से बार बार पनपता है और ज़्यादातर बार मुरझा जाता है । जस्टिस खानविलकर और उनकी बेंच को साधुवाद कि उन्होंने ग़लतफ़हमी की गुंजाइश ही ख़त्म कर दी ।

सोशल मीडिया और मीडिया की मशीन ने इस बीच उसके संपर्क में आ सकने वाले हर दिमाग़ में तीस्ता सेतलवाड के मुंबई के बंगले और श्रीकुमार द्वारा इसरो वैज्ञानिक के मामले में फर्जीवाड़ा करने की कथा दबा दबा कर ठूँस दी है । कहीं किसी कोने में भी 2002 की वीभत्सता का अंश तक नहीं बचा है जिसे हज़ारों बेबस स्त्री बच्चों बूढ़ों जवानों की देह के टुकड़ों ने दर्ज किया था । साबित हुआ कि वह एक शरीफ़ सज्जन इंसान को बदनाम करने का षड्यंत्र था जिसे उन लाशों और कुछ बचे हुओं ने कुछ बेईमान ग़द्दार पेड षड्यंत्रकारियों के कहने पर रचा था जिनका अब पर्दाफ़ाश हो चुका है और वे जेल में हैं !

मैंने भी मान लिया है कि तेस्ता सीतलवाड का बाप दादा द्वारा अर्जित बंगला हमारे क़रीब पिचहत्तर साल के गणतंत्र का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है और इसरो के वैज्ञानिक के मामले के अलावा देश की पुलिस द्वारा पिछले पिचहत्तर साल में चार्जशीट किये हुए किसी भी मामले में आज तक कोई कभी कहीं किसी अदालत में निर्दोष साबित नहीं हुआ है और न छूटने के बाद उसने जाँच एजेंसी पर उसे “फँसाने” का आरोप लगाया है!

आप भी मान ही लीजिए और कुछ तो करने से रहे !

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  • जब जस्टिस बनर्जी की वो फाइंडिंग मान ली कि 56 कारसेवकों ने , जिनमें दो साल के दुधमुंहे भी थे, मोक्ष की इच्छा से ट्रेन में आत्मदाह कर लिया था तो बाकी बातें मानने में क्या दिक्कत है?
    बाकी तो फंसे पंछियों की मदद ऐसे तो नहीं होगी। चंदा
    वंदा करो कुछ। चंदाखोरी कितनी फायदेमंद है,ये तीस्ता ही बता देगी

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